[{"Value":"","Discard":false,"Expires":9999999999}] मज़हबी तौर-तरीके – Learn Islam https://learnislam.net Sat, 22 Nov 2025 21:20:32 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.2 नमाज़ियों की चालीस ग़लतियाँ https://learnislam.net/question/namaziyon-ki-40-ghaltiyan/ Wed, 19 Nov 2025 19:38:39 +0000 https://learnislam.net/question/%e0%a4%a8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b8-%e0%a4%97%e0%a4%bc%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%bf/

नमाज़ियों की चालीस ग़लतियाँ

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
إِنَّ أَوَّلَ مَا يُحَاسَبُ بِهِ الْعَبْدُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مِنْ عَمَلِهِ صَلَاتُهُ فَإِنْ صَلُحَتْ فَقَدْ أَفْلَحَ وَأَنْجَحَ وَإِنْ فَسَدَتْ فَقَدْ خَابَ وَخَسِرَ
(ترمذي، نسائی، ابن ماجه عن أبي هريرة (صحيح) [صحيح الجامع ۲۰۲۰]]

” क़ियामत के दिन बंदे से उसके आमाल में से सबसे पहले उसकी नमाज़ का हिसाब लिया जाएगा। अगर उसकी नमाज़ सही निकल आई तो वो कामयाब व कामरान हो गया। और अगर उसकी नमाज़ में बिगाड़ रहा तो वो नाकाम वा ना-मुराद हो गया।”

1. नमाज़ की पाबन्दी ना करना

قال : خَمْسُ صَلَوَاتٍ كَتَبَهُنَّ اللَّهُ عَلَى الْعِبَادِ فَمَنْ جَاءَ بِهِنَّ لَمْ يُضَيِّعْ مِنْهُنَّ شَيْئًا اسْتِخْفَافًا بِحَقِّهِنَّ كَانَ لَهُ عِنْدَ اللَّهِ عَهْدٌ أَنْ يُدْخِلَهُ الْجَنَّةَ وَمَنْ لَمْ يَأْتِ بِهِنَّ فَلَيْسَ لَهُ عِنْدَ اللَّهِ عَهْدٌ إِنْ شَاءَ عَذَّبَهُ وَإِنْ شَاءَ أَدْخَلَهُ الْجَنَّةَ. [موطا، مسند احمد، ابو داود ،نسائی، ابن ماجه ابن حبان حاكم عن عبادة بن الصامت. صحيح الجامع ٣٢٤٣] (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“अल्लाह ताला ने बंदों पर पांच नमाज़ें फ़र्ज़ की हैं। पांच नमाजों का एहतेमाम करे और उन के हक में ला परवाही बरतते हुवे उन्हें ज़ाया ना करे तो उसके लिए अल्लाह के यहां यह वादा है कि अल्लाह तआला उसे जरूर जन्नत में दाख़िल करेगा। इसके बिल मुक़ाबिल जो शख़्स इन नमाज़ों का एहतमाम ना करे तो उसके लिए अल्लाह के यहाँ कोई वादा नहीं। उसे इख्तियार है कि वो हमें (बंदे को) अज़ाब दे या फिर मुआफ़ करदे।”

قال : إِنَّ بَيْنَ الرَّجُل وَبَيْنَ الشِّرْكِ وَالْكُفْرِ تَرْكَ الصَّلَاةِ ((مسلم: الإيمان ١٣٤ – (٨٢)) عن جابر

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“बंदे और शिर्क व कुफ़्र के दरमियान बस नमाज़ का छोड़ देना है।”

2. दिखावे की नमाज पढ़ना:

قال تعالى : إِنَّ الْمُنَافِقِينَ يُخَادِعُونَ اللَّهَ وَهُوَ خَادِعُهُمْ وَإِذَا قَامُوا إِلَى الصَّلَاةِ قَامُوا كُسَالَى يُرَاءُونَ النَّاسَ وَلَا يَذْكُرُونَ اللَّهَ إِلَّا قَلِيلًا [النساء ١٤٢]

अल्लाह तआला ने फरमाया :
“मुनाफिक़ीन (अपने गुमान में) अल्लाह के साथ चालबाजी करते हैं और (उनकी इस हरकत की सजा में) अल्लाह भी उनके साथ तरकीब करता है। (उनका हाल ये है कि) जब वो नमाज के लिए खड़े होते हैं तो बहुत ही बोझल होकर (उठते हैं), वो महज़ लोगों के सामने दिखावा करते हैं, और अल्लाह को कम ही याद करते हैं।” (सूरह अन-निसा-142)

عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِي قَالَ:
خَرَجَ عَلَيْنَا رَسُولُ اللَّهِ وَنَحْنُ نَتَذَاكَرُ الْمَسِيحَ الدَّجَّالَ فقال: أَلا أُخْبِرُكُمْ بِمَا هُوَ أَخْوَفُ عَلَيْكُمْ عِنْدِي مِنَ الْمَسِيحِ الدَّجَّالِ؟ فَقُلْنَا: بَلَى يَا رَسُولَ اللَّهِ فَقَالَ: الشَّرْكُ الْخَفِيُّ، أَنْ يَقُومَ الرَّجُلُ فَيُصَلِّي فَيُزَيِّنُ صَلَاتَهُ لِمَا يَرَى مِنْ نَظَرِ رَجُلٍ ابن ماجه، بيهقي) [صحيح الترغيب ٣٠) (حسن

अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, फरमाते हैं:
“रसूल ए अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमारे पास बाहर तशरीफ़ लाए और हम दज्जाल का तज़किरा कर रहे थे। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: क्या मैं तुम्हें एक ऐसी चीज ना बताऊं जिसका मुझे तुम पर दज्जाल से भी ज़्यादा ख़ौफ़ है? तो हमने कहा: जरूर ऐ अल्लाह के रसूल ! आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: शिर्क-ए-खफी (छुपा हुआ शिर्क), कि आदमी नमाज पढ़ने लगे और किसी के देखने की वजह से अपनी नमाज को और मुज़य्यन करने लगे।“

3. ख़िलाफ़- ए-सुन्नत के तारिक़े के अनुसार नमाज़ पढना :

عَنْ أَبِي سُلَيْمَانَ مَالِكِ بْنِ اخْوَيْرِثِ قَالَ:
أَتَيْنَا النَّبِيَّ ﷺ وَنَحْنُ شَبَبَةٌ مُتَقَارِبُونَ فَأَقَمْنَا عِنْدَهُ عِشْرِينَ لَيْلَةً فَظَنَّ أَنَّا اشْتَقْنَا أَهْلَنَا
وَسَأَلَنَا عَمَّنْ تَرَكْنَا فِي أَهْلِنَا، فَأَخْبَرْنَاهُ – وَكَانَ رَفِيقًا رَحِيمًا –
فَقَالَ: «ارْجِعُوا إِلَى أَهْلِيكُمْ فَعَلَمُوهُمْ وَمُرُوهُمْ، وَصَلُّوا كَمَا رَأَيْتُمُونِي أُصَلِّي،
وَإِذَا حَضَرَتِ الصَّلَاةُ فَلْيُؤَذِّنُ لَكُمْ أَحَدُكُمْ، ثُمَّ لِيَؤْمَكُمْ أَكْبَرُكُمْ»
بخاري: الأدب ٦٠٠٨ – مسلم : المساجد ومواضع الصلاة ۲۹۲ – (٦٧٤)] واللفظ للبخاري

हज़रत अबू सुलेमान मलिक बिन हुवैरिस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, फरमाते हैं:
“हम नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आये, और हम सब हम-उम्र नौजवान थे। हमने बीस रातों तक आपके साथ काम किया। आप को एहसास हुआ कि हमें अपने घर वालों की याद आ रही है।
आप ने हमसे पूछा कि हम अपने पीछे किन को छोड़ आये हैं, तो हमने आप को (अपने घर वालों के बारे में) बताया। नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बड़े ही नर्म मिज़ाज और रहम दिल इंसान थे।
आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: तुम लोग अपने घर वालों के पास लौट जाओ और उन्हें (दीन की) तालीम दो और (शरीयत पर अमल करने का) हुक्म दो, और तुम वैसे ही नमाज पढ़ो जैसे मुझे पढ़ते देखा
है, और जब नमाज का वक्त हो जाए तो तुम में से एक शख़्स अज़ान दे और जो शख़्स तुम में बड़ा है वह इमामत करे।“

4. पेशाब पखाने की शदीद हाज़त के बावजुद नमाज पढ़ना

قال : لَا صَلَاةَ بِحَضْرَةِ الطَّعَامِ وَلَا هُوَ يُدَافِعُهُ الْأَخْبَتَانِ
مسلم: المساجد ومواضع الصلاة ٦٧ – (٥٦٠))

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“खाना सामने आ जाने के बाद नमाज़ नहीं, और उस वक्त भी नहीं जब आदमी दो खबीस चीजें (यानी पेशाब व पखाना) की हाजत महसूस कर रहा हो ।“

إِذَا أَرَادَ أَحَدُكُمْ أَنْ يَذْهَبَ الْخَلَاءَ وَقَامَتِ الصَّلَاةُ فَلْيَبْدَأُ بِالْخَلَاءِ.
(موطاء الشافعي ابن حبان، ترمذی، نسائی، ابن ماجه ابن حبان حاکم بيهقي عن عبد الله بن أرقم.
صحيح الجامع (۳۷۳] (صحيح

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“जब तुम में से किसी शख़्स को बैतुल-ख़ला जाना हो और नमाज़ खड़ी हो जाए तो उसे चाहिए कि पहले हाजत से फ़ारिग़ हो जाए।”

5. हवा ख़ारिज होने के बावजूद नमाज पढ़ना

قال : لَا يَقْبَلُ اللَّهُ صَلَاةَ أَحَدِكُمْ إِذَا أَحْدَثَ حَتَّى يَتَوَضَّأَ
بخاري: الحيل ٦٩٥٤ – مسلم الطهارة ٣٣٠] عن أبي هريرة

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“तुम में से किसी का वुज़ू टूट जाए तो अल्लाह तआला उसकी नमाज़ उस वक़्त तक क़बूल नहीं करता जब तक कि वह दोबारा वुज़ू ना कर ले।”

قال : وَلَا يُحافظ على الوُضُوءِ إِلَّا مُؤْمِنٌ (1)
(مسند احمد، ابن ماجه، حاكم بيهقي عن ثوبان (ابن ماجه، طبراني عن ابن عمرو (طبراني) عن سلمة بن الأكوع. صحيح الجامع ٩٥٢) (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: “वुज़ू की पाबंदी मोमिन ही करता है।”

6. बदबू-दार चीज़ खा कर मस्जिद में आना

 قال : مَنْ أَكَلَ مِنْ هَذِهِ الشَّجَرَةِ فَلَا يَقْرَبَنَّ مَسْجِدَنَا وَلَا يُؤْذِيَنَّا بِرِيحِ النُّومِ
مسلم: المساجد ومواضع الصلاة ٧١ – (٥٦٢))
وفي رواية :
فَإِنَّ الْمَلَائِكَةَ تَأَذَى مِمَّا يَتَأَذَى مِنْهُ الْإِنْسُ
مسلم: المساجد ومواضع الصلاة ٧٢ – (٥٦٣)]

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“जो शख़्स इस (बदबू-दार) से कुछ खा ले वो हमारी मस्जिद के करीब भी ना आए, और हमें लेहसन की बू से तकलीफ़ ना दे।“
एक रिवायत में है:
“इसलिए कि फरिश्तों को भी उस चीज़ से तकलीफ़ होती है जिस से लोगों को तकलीफ़ होती है।“

7. तहियात उल मस्जिद अदा किये बगैर मस्जिद में बैठना

عَنْ أَبِي قَتَادَةَ صاحِبِ رَسُولِ اللَّهِ قَالَ:
دَخَلْتُ الْمَسْجِدَ وَرَسُولُ اللَّهِ جَالِسٌ بَيْنَ ظَهْرَانِي النَّاسِ
قَالَ فَجَلَسْتُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ : مَا مَنَعَكَ أَنْ تَرْكَعَ رَكْعَتَيْنِ قَبْلَ أَنْ تَجْلِسَ
قَالَ فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ، رَأَيْتُكَ جَالِسًا وَالنَّاسُ جُلُوسٌ قَالَ : فَإِذَا دَخَلَ أَحَدُكُمُ الْمَسْجِدَ فَلَا يَجْلِسُ حَتَّى يَرْكَعَ رَكْعَتَيْنِ
هذا لفظ مسلم والبخاري فلا يَجْلِسْ حَتَّى يُصَلِّيَ رَكْعَتَيْنِ
بخاري: التهجد ١١٦٣ – مسلم: صلاة المسافرين وقصرها ٧٠ – (٧١٤)]

सहाबी-ए-रसूल, हजरत अबू क़तादा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत हैं, फरमाते हैं: मैं मस्जिद में दखल हुआ तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) लोगों के साथ बैठे हुए थे। पास मैं भी जाकर बैठ गया।
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: “तुम ने बैठने से पहले दो रक़तें क्यों अदा नहीं कीं?” मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), मैंने देखा कि आप और सारे लोग बैठे हुए हैं
(तो मैं भी आकर बैठ गया)। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: “जब तुम में से कोई शख़्स मस्जिद में दाखिल हो तो वो दो रक़तें अदा करने से पहले हरगिज़ ना बैठे।”

8. नमाज़ के लिए दौड़ कर आना

قال : إِذَا أُقِيمَتِ الصَّلَاةُ فَلَا تَأْتُوهَا تَسْعَوْنَ وَأْتُوهَا تَمْشُونَ وَعَلَيْكُمُ السَّكِينَةُ فَمَا أَدْرَكْتُمْ فَصَلُّوا، وَمَا فَاتَكُمْ فَأَتِمُوا
مسلم: المساجد ومواضع الصلاة ١٥١ – (٦٠٢)) عن أبي هريرة بخاري: الجمعة ٩٠٨

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“जब जमात खड़ी हो जाए, तो नमाज़ के लिए दौड़ते हुवे मत आओ बल्की चलते हुवे सुकून व वकार से आओ। फिर जितनी नमाज़ मिल जाए अदा करो और जो रह गई उसे मुकम्मल करो।“

9. ज़बान से नमाज़ की नियत करना

عن أبي هريرة:
أَنَّ النَّبِيَّ ﷺ دَخَلَ الْمَسْجِدَ،
فَدَخَلَ رَجُلٌ، فَصَلَّى، ثُمَّ جَاءَ،
فَسَلَّمَ عَلَى النَّبِيِّ ﷺ فَرَدَّ النَّبِيُّ ﷺ عَلَيْهِ السَّلَامَ،
فَقَالَ: ارْجِعْ فَصَلِّ فَإِنَّكَ لَمْ تُصَلِّ،
فَصَلَّى، ثُمَّ جَاءَ، فَسَلَّمَ عَلَى النَّبِيِّ ﷺ
فَقَالَ: «ارْجِعْ فَصَلَ، فَإِنَّكَ لَمْ تُصَلِّ ثَلَاثًا،
فَقَالَ: وَالَّذِي بَعَثَكَ بِالْحَقِّ، فَمَا أُحْسِنُ غَيْرَهُ، فَعَلَّمْنِي
قَالَ: إِذَا قُمْتَ إِلَى الصَّلَاةِ، فَكَبِّرْ … فذكر الحديث (۱)
بخاري: الآذان ۷۹۳ – مسلم : الصلاة ٤٥ – (٣٩٧)]

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है,
कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मस्जिद में दाख़िल हुवे। एक और शख़्स भी मस्जिद में आया। उसने नमाज पढ़ी और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की खिदमत में हाज़िर हुआ। उसने आप को सलाम किया तो आप ने उसे सलाम का जवाब दिया और फरमाया: वापिस जाओ और दोबारा नमाज अदा करो क्योंकि तुम ने नमाज नहीं पढ़ी। तीन मरतबा ऐसा ही हुआ (चौथी बार) उस शख़्स ने कहा: उस ज़ात की क़सम जिस ने आप को हक़ के साथ भेजा है, मैं इस से अच्छी नमाज नहीं पढ़ सकता। आप ही मुझे सिखा दीजिए. इस पर आप ने फरमाया: जब तुम नमाज के लिए खड़े हो तो तकबीर कहो। (फिर इसके बाद पूरा वाकिया….।)

1 قال ابن القيم :
كان إذا قام إلى الصلاة قال ” الله اكبر ” ولم يقل فيما قبلها ولا تلفظ بالنية البنة ولا قال أصلى الله صلاة هذا مستقبل القبلة أربع ركعات إماما أو مأموما ولا قَالَ أَذَاهُ وَلَا قَضَاء وَلَا فَرْضَ الْوَقْتِ وهام عشر بدع ثم ينقل عنه أحد قط بإسناد صحيح ولا ضعيف ولا تشي ولا ترسل الحظة واحدة منها البتة بل ولا عن أخر من أصحابه ولا استمنة أحد من التابعين ولا الأئمة الأريمة زاد المعاد ج ١ ص ١٩٤

10. तंग लिबास में नमाज पढ़ना

قال تعالى : يَا بَنِي آدَمَ خُذُوا زِينَتَكُمْ عِنْدَ كُلِّ مَسْجِدٍ [الأعراف : ٣١]

अल्लाह तआला ने फरमाया :
“ऐ बनी आदम ! हर नमाज़ के वक्त अपने आप को (लिबास से) अरस्ता कर लिया करो।”

قال ابن حجر:
ونقل بن حَزْمِ الاتِّفَاقَ عَلَى أَنَّ الْمُرَادَ سَتْرُ الْعَوْرَةِ
فتح الباري لابن حجر (١/ ٤٦٥) رقم ]

इब्ने हज़र (रहिमहुल्लाह) फ़रमाते हैं:
“इब्ने हज़्म ने इस बात पर इत्तिफ़ाक नक़ल किया है कि इस आयत में (ज़ीनत से) मुराद सतर का ढापना है।”

قال : مَا بَيْنَ السُّرَّةِ والرَّكْبَةِ عَوْرَةٌ (1)
(حاكم) عن عبد الله بن جعفر – [صحيح الجامع ٥٥٨٣] (حسن)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“नाफ़ और घुटनों के दरमियान का हिस्सा औरह (यानी छुपाने की चीज़) है।“

1 قال الألباني:
والمصيبة الثانية: أن البنطلون يحجم العورة وعورة الرجل من الركبة السرة والمصلي يفترض عليه أن يكون أبعد ما يكون عن أن يعصي الله وهو له ساجد الأخطاء الأصلين من ٢٠]

11. एहराम में इज्तिबा की हालत में नमाज पढ़ना

قال :
لا يُصَلِّي أَحَدُكُمْ
في الثَّوْبِ الوَاحِدِ لَيْسَ عَلَى عَائِقَيْهِ شَيْءٌ
بخاري: الصلاة ٣٥٩ – مسلم: الصلاة ۲۷۷ – (٥١٦) عَنْ أَبِي هُرَيْرَة

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“तुम में से कोई शख़्स एक कपडे़ में है, इस हाल में नमाज़ ना पढ़े कि उसके कंधों पर ( ढापने के लिए) कुछ भी ना हो।”

12. तसवीर वाले लिबास में नमाज़ पढ़ना

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا
أَنَّهَا اشْتَرَتْ غُرُقَةً فِيهَا تَصَاوِيرُ
فَقَامَ النَّبِيُّ بِالْبَابِ فَلَمْ يَدْخُلْ
فَقُلْتُ: أَتُوبُ إِلَى اللَّهِ مِمَّا أَذْنَبْتُ؟
قَالَ: مَا هَذِهِ التَّمْرُقَةُ؟ قُلْتُ: لِتَجْلِسَ عَلَيْهَا وَتَوَسَّدَهَا !
قَالَ: إِنَّ أَصْحَابَ هَذِهِ الصُّوَرِ يُعَذِّبُونَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ!
يُقَالُ لَهُمْ: أَحْيُوا مَا خَلَقْتُمْ، وَإِنَّ الْمَلَائِكَةَ لَا تَدْخُلُ بَيْتًا فِيهِ الصُّورَةُ.
بخاري : اللباس ٥٩٥٧ مسلم: اللباس والزينة ٣٩٤١]

हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि
उन्होन ने नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के लिए एक छोटा सा तकिया खरीदा जिस पर तसवीर बनी हुई थी। जब नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तशरीफ़ लाए तो आप दरवाज़े पर ही रुक गए और अंदर घर में दाख़िल न हुए।
हज़रत आयशा ने अर्ज़ किया: (ऐ अल्लाह के रसूल,) मैं अल्लाह के हुजूर तौबा करती हूं, मुझसे क्या गलती हो गई? आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: तसवीर वालों को क़ियामत के दिन अज़ाब दिया जाएगा। उन से कहा जाएगा अपनी बनाई हुवी तसवीरों को अब जिंदा भी कर के दिखा दो! और फ़रिश्ते हमारे घर में दाख़िल नहीं होते
जिस में (किसी जानदार की) तसवीर हो।

عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ:
قَامَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ يُصَلِّي
فِي خَمِيصَةٍ ذَاتِ أَعْلَامٍ، فَنَظَرَ إِلَى عَلَمِهَا
فَلَمَّا قَضَى صَلَاتَهُ قَالَ:
اذْهَبُوا بِهَذِهِ الْخَمِيصَةِ إِلَى أَبِي جَهْمِ بْنِ حُذَيْفَةَ وَائْتُونِي بِأَنْبِجَانِيهِ، فَإِنَّهَا أَهْتُنِي آئِفًا فِي صَلَاتِي. (1)
بخاري: الصلاة: ۳۷۳ – مسلم المساجد ومواضع الصلاة : ٦٢ – (٥٥٦)] واللفظ المسلم

हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है, फ़रमाती हैं:
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) खड़े हुए और नमाज़ पढ़ने लगे। आपने एक ऐसा कुर्ता पहन रखा था जिसमें नक्श ओ निगार बने हुए थे। आप की निगाह एक नुक़ूश पर पड़ी। जब आप नमाज़ से फारिग हुए तो आप ने फरमाया: ये कुर्ता अबू जहम बिन हुजैफा के पास ले जाओ, और उनके पास से मेरे लिए उन का सादा कुर्ता ले आओ।
इसलिए कि इसके नुक़ूश ने मुझे नमाज़ में अपनी तरफ से मशगुल कर दिया है।

1 قالت اللجنة الدائمة: لا يجوز التعلم أن يصلي بملابس فيها صور ذوات الأرواح من إنسان وحيوان وطيور وغيرها وإن صلى بها فالصلاة صحيحة مع الإثم في حل من علم الحكم الشرعي، الفتاوى اللجنة الدائمة – ٢ (١٤٢/٥))

13. नमाज़ में इस्बाल करना

قال :
مَنْ أَسْبَلَ إِزَارَهُ فِي صَلَاتِهِ خُيَلَاءَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ فِي حِلَّ وَلَا حَرَامٍ (1) (ابو داود) عن ابن مسعود صحيح الجامع ٢٠١٢) (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जो शख्स नमाज़ में अकड़ के तौर पर अपना तहबंद (टख़नों से नीचे) लटकाए, उसके लिए अल्लाह की तरफ से ना (जन्नत) हलाल है ना (जहन्नम) हराम।

قال :
وَارْفَعْ إِزَارَكَ إِلَى نِصْفِ السَّاقِ فَإِنْ أَبَيْتَ فَإِلَى الْكَعْبَيْنِ وَإِيَّاكَ وَإِسْبَالَ الْإِزَارِ فَإِنَّهَا مِنْ الْمَخِيلَةِ وَإِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمَخِيلَةَ (ابو داود) عن جابر بن سليم، صحيح الجامع (۷۳۰۹] (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
अपना तहबंद ऊंचा कर, निस्फ पिंडली तक, अगर तू ये ना करना चाहे तो टखनों तक। और खबरदार तहबंद को (टख़नों से नीचे) मत लटका, क्योंकि ये चीज़ अकड़ (की अलामत) है और अल्लाह को अकड़ पसंद नहीं है।

1 قال العينية
معنى الحديث: من أسبل إزاره في صلاته الخيلاء فليس هو عند الله في شيء، ولا يعبا الله به ولا بصلاته (شرح أبي داود العيني (۱۷۰/۳)]
قال المناوي:
وقيل معناه لا يؤمن خلال الله وحرامه قال النووي: معناه برى من الله وفارق دينه فيض القدير حديث ۸۳۹۹
قال أبو الحسن الندية
وقولها في حل ولا حرام أي في أن يجعله في حل من الذنوب وهو أن يغفر له، ولا في أن يمنعه ويحفظه من سوء الأعمال أو في أن يحل له الجنة وفي
أن يحرم عليه النار إفتح الوجود في شرح سنن أبي دلوه (٤٠٤/١)]

14. नमाज़ में कपडे़ समेटना या मोड़ना

قال :
أُمِرْنَا أَنْ نَسْجُدَ عَلَى سَبْعَةِ أَعْظُم
وَلَا نَكُفَّ ثَوْبًا وَلَا شَعَرًا (1)
بخاري: الأذان ۸۱۲ مسلم: الصلاة ۲۲۸ – (٤٩٠)) عن ابن عباس واللفظ للبخاري

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
हमें सात हड्डियों पर सजदे का हुक्म दिया गया है, और ये भी कि हम कपड़े और बाल न समेटें।

15. नमाज़ में सूतरा का एहतमाम न करना

قال :
لا تُصَلِّ إِلَّا إِلَى سُتْرَةٍ
ابن حبان، ابن خزيمه عن ابن عمر أصل فقة صلاة النبي ج ۱ ص ۱۱۰] (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
नमाज़ न पढ़ मगर सुत्रे की तरफ।

ا قال النووي : اتفق العلماء على النهي عن الصلاة ودولة مفكر أو الله أو الحلوة ….
فلو صلى كذلك فقد أساء وصحت صلالة واحتج في ذلك أبو جعفر محمد بن جرير الطبري بإجماع العلماء وسكي بن الكادر الإعادة فيه عن الحسن البصري في مذهب الجمهور أن النهي مطلقا لِمَنْ صَلَّى كذلك سواء العداء السلام أم كان قبلها كذلك لا ما بل المعلى أخر شرح النووي على مسلم (٢٠٩/٤)

قال :
إِذَا صَلَّى أَحَدُكُمْ فَلْيُصَلِّ إِلَى سُتْرَةٍ وَلْيَدْنُ مِنْهَا وَلَا يَدَعْ أَحَدًا يَمُرُّ بَيْنَ يَدَيْهِ فَإِنْ جَاءَ أَحَدٌ يَمُرُّ فَلْيُقَاتِلُهُ فَإِنَّهُ شَيْطَانٌ
) ابو داود، ابن ماجه ابن حبان، بيهقي عن أبي سعيد واللفظ لابن ماجه.
صحيح الجامع ٦٥١) (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जब तुम में से कोई शख़्स नमाज़ पढ़े तो उसे चाहिए कि सुत्रे की तरफ़ नमाज़ पढ़े और सुत्रे से करीब हो जाए। और किसी को अपने सामने से जाने ना दे। और अगर कोई जाने ही लगे तो उसे रोकने के लिए उससे लड़े क्योंकि वो शैतान है।

16. क़ुदरत के बावज़ूद फ़र्ज़ नमाज़ बैठ कर पढ़ना

عَنْ عِمْرَانَ بْنِ حُصَيْنٍ له
قَالَ كَانَتْ بِي بَوَاسِيرُ فَسَأَلْتُ النَّبِيَّ ﷺ عَنْ الصَّلَاةِ فَقَالَ صَلِّ قَائِمًا فَإِنْ لَمْ تَسْتَطِعْ فَقَاعِدًا (1) فَإِنْ لَمْ تَسْتَطِعْ فَعَلَى جَنْبِ [بخاري: الجمعة ١١١٧]

इमरान बिन हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, फरमाते हैं:
मुझे बवासीर का मर्ज था. मैंने नबी करीम (सल्लल्लाहु अलाहि व सल्लम) से नमाज के बारे में पूछा, तो आप ने फरमाया: खड़े हो कर नमाज़ पढ़ो, अगर ना हो सके तो बैठ कर पढ़ो, और अगर ये भी ना हो सके तो करवा पर (यानी लेट कर) नमाज़ पढ़ो।

1 قال ابن حجر: استدل به من قال لا ينتقل المريض إلى القعود إِلَّا بَعْدَ عَنْهِ الْقُدْرَةِ عَلَى الْقِيَامِ
وقد شكل عياض عن الشافعي وعن مالك وأحمد وإسحاق لا يشترط العلم من وجود المشقة افتح الباري لابن سمر (۲) ۵۸۸)]

17. नमाज़ में हाथ छोड़ना या नाफ़ के नीचे बंधना

عَنْ وَائِلِ بْنِ حُجْرٍ قَالَ :
صَلَّيْتُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ
وَوَضَعَ يَدَهُ الْيُمْنَى عَلَى يَدِهِ الْيُسْرَى عَلَى صَدْرِهِ
صحیح ابن خزيمة ٤٧٩) (صحيح)

वायल इब्न हुज्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं:
मैं ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ नमाज पढ़ी। आप ने अपना दाहिना हाथ अपने बाए हाथ पर सीने पर रखा।

18. रुकू’ से क़बल वा बाद और तशहुद से खड़े होकर रफ़उल यदैन करना

عَنْ نَافِعِ
أَنَّ ابْنَ عُمَرَ
كَانَ إِذَا دَخَلَ فِي الصَّلَاةِ كَبَّرَ وَرَفَعَ يَدَيْهِ
وَإِذَا رَكَعَ رَفَعَ يَدَيْهِ
وَإِذَا قَالَ سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ رَفَعَ يَدَيْهِ
وَإِذَا قَامَ مِنْ الرَّكْعَتَيْنِ رَفَعَ يَدَيْهِ
وَرَفَعَ ذَلِكَ ابْنُ عُمَرَ إِلَى نَبِيِّ اللَّهِ ﷺ [: الآذان ٧٣٩]

नाफ़े’ रहिमहुल्लाह से रिवायत है कि
(अब्दुल्लाह) बिन उमर जब नमाज़ में दाख़िल होते तो तकबीर कहते और रफ़ुल यदैन करते। फिर जब रुकू’ करते तो रफ़ुल यदैन करते , और जब समीअल्लाहु लिमन हमीदा कहते तब भी रफ़ुल यदैन करते और जब दो रकअतों के बाद (अत्तहियात से) खड़े होते तब भी रफ़ुल यदैन करते और इब्ने उमर ने इस (अमल) को नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तरफ मंसूब किया है।

19. इमाम के पीछे सूरह फ़ातिहा न पढ़ना

قال :
لا صَلاةَ لِمَنْ لَمْ يَقْرَأْ بِفَاتِحَةِ الْكِتَابِ.
خ: الأذان ٧٥٦ – م: الصلاة ٣٤ – (٣٩٤)) عن عبادة

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जिस ने सूरह फातिहा न पढ़ी उस की नमाज नहीं।

20. इमाम वा मुक़्तदी का जहरी नमाज़ में सिर्रन आमीन कहना

عَنْ وَائِلِ بْنِ حُجْرٍ
أَنَّهُ صَلَّى خَلْفَ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ فَجَهَرَ بِآمِينَ
(د) [د بتحقيق الألباني (۹۳۳) (حسن صحيح)

वैल इब्न हुज्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि:
उन्हों ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पीछे नमाज पढ़ी तो आप ने जहर से आमीन कहा।

عن بن جريج عن عطاء قال :
قُلْتُ لَهُ : أَكَانَ بْنُ الزُّبَيْرِ
يُؤْمِنُ عَلَى إِثْرِ أُمِّ الْقُرْآنِ؟ قَالَ نَعَمْ وَيُؤَمَّنُ مِنْ وَرَاءِهِ حَتَّى أَنَّ لِلْمَسْجِدِ لَلَجَّةٌ
مصنف عبد الرزاق : ٢٦٤٠]
رواه البخاري تعليقا كتاب صفة الصلاة : ۲۹ – باب جهر الإمام بالتأمين
تمام المئة ص ۱۷۸ – الضعيفة ج ۲ ص ٣٦٨-٣٦٩ وصححه الألباني]

इब्न ए जुरैज अता से रिवायत करते हैं, फरमाते हैं:
मैंने उन से (यानी हज़रत अता से) पूछा: क्या इब्न ए ज़ुबैर उम्मुल क़ुरआन (यानी सूरतुल फ़ातिहा) के इख़्तिताम पर आमीन कहते थे? अनहोन ने फरमाया: हां, और जो उनके पीछे होते वो भी आमीन कहते ह्त्ता कि मस्जिद गूंज उठती ।

21. नमाज में यहां वहां देखना

عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ
سَأَلْتُ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ
عَنْ الالْتِفَاتِ فِي الصَّلَاةِ
فَقَالَ: هُوَ اخْتِلَاسُ (1)
يَخْتَلِسُهُ الشَّيْطَانُ مِنْ صَلَاةِ الْعَبْدِ [بخاري: الأذان: ٧٥١]

हज़रत आयशा [] से रिवायत है,
कि मैंने नमाज में यहां वहां मुतवज्जह होने के बारे में कहा, मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पुचा तो आप ने फरमाया: ये वो हिसाब है जो बंदे की नमाज में से शैतान उचक ले जाता है

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا قَالَتْ
دَخَلَ رسولُ اللهِ ﷺ الكَعْبَةَ
ما خَلَفَ بَصَرُهُ مَوْضِعَ سُجُودِهِ حَتَّى خَرَجَ مِنْهَا .
ابن خزيمه بيهقي، حاكم الإرواء ج ۲ ص ۷۳] (صحيح)

हज़रत आयशा से रिवायत है, फरमाती हैं:
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)(नमाज़ के लिए) काबा में दाख़िल हुए, तो आप की निगाह सजदे की जगह पर टिकी रह रही है यहाँ तक कि आप बाहर तशरीफ ले आएं।

1 قال القاري: فقال: (هو) أي: الالتفات (المتلاس) : المتعال من الكلس وهو الكلب، أي: استلاب واحد بسرعة وقيل شيء يختلس به مرقاة
المفاتيح شرح مشكاة المصابيح (۷۸۱/۲)

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الزُّبَيْرِ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ  كَانَ إِذَا قَعَدَ فِي التَّشَهُدِ وَضَعَ كَفَّهُ الْيُسْرَى عَلَى فَخِذِهِ الْيُسْرَى وَأَشَارَ بِالسَّبَّابَةِ لَا يُجَاوِزُ بَصَرُهُ إِشَارَتَهُ (نسائی) [نسالي بتحقيق الألباني (١٢٧٥] (حسن صحيح)

अब्दुल्ला बिन ज़ुबैर से रिवायत है,
कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब तशहुद में बैठे तो हथेलियों को बाएइन रान प्रति रखते और (दाएं हाथ की) सब्बाबा से इशारा करते। आप की नजर आप के (नाखूनों के) इशारे पर टिकी रहती हैं।

22. नमाज में आंखें बंद कर लेना

قال ابن القيم :
وَلَمْ يَكُنْ مِنْ هَدْيِهِ تَعْمِيضُ عَيْنَيْهِ فِي الصَّلَاةِ (1)
زاد المعاد: ج ۱ ص ۲۸۳]

इब्ने क़य्यिम رحمه الله फ़रमाते हैं:
नमाज में आंखें बंद कर लेना नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का तरीक़ा नहीं था।

23. नमाज़ में आसमान की तरफ देखना

قال :
إذا كانَ أَحَدُكُمْ فِي الصَّلاةِ
فَلَا يَرْفَعْ بَصَرَهُ إِلَى السَّمَاءِ أَنْ يَلْتَمِعَ بَصَرُهُ
(مسند احمد، نسائي) عن رجل من الصحابة [صحيح الجامع ٧٤٩] (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जब तुम में से कोई शख़्स नमाज़ में हो तो वो आसमान की तरफ निगाह उठा कर ना देखे। कहीं ऐसा ना हो कि उसकी बीनाई चौंधिया जाए।

1 قال الشيخ الفوزان:
ذكر الفقهاء أن مما يكره في الصلاة تغميض عينيه، إلا إذا كان في ذلك الغرض صحيح، كأن يكون أمامه ما يشغله فإنه لا بأس بإغماض عينيه عن ذلك الشيء الذي يشغله أما تخاذ الحماض العينين في الصلاة عادة ولو لم يكن أمامه ما يشغله، هذا يكره. [مجموع فتاوى فضيلة الشيخ صالح بن
فوران (١/ ٢٦٤)

24. नमाज़ में बेजा हरकत करना

قال تعالى :  قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ هُمْ فِي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَ [المؤمنون ١، ٢]

अल्लाह तआला फरमाया:
ईमान वाले कामयाब हो गए. ये वो लोग हैं जो अपनी नमाज़ों में ख़ुशूअ् इख़्तियार करते हैं।

عن ابن عباس خَاشِعُونَ } خَائِفُونَ سَاكِنُونَ وَكَذَا رُوِيَ عَنْ مُجَاهِد وَالْحَسَن وَقَتَادَة وَالزُّهْرِي [تفسير ابن كثير ]

इब्न ए अब्बास से रिवायत है कि (खाशिऊं) से मुराद खैफून और सकीनूं है। यानी अल्लाह से डरने वाले और सुकून वाले। मुजाहिद, हसन बसरी, क़तादा और ज़ुहरी से भी इसी तरह मरवी है।

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ  أَنَّهُ رَأَى رَجُلًا يُحَرِّكُ الْحَصَى بِيَدِهِ وَهُوَ فِي الصَّلَاةِ فَلَمَّا انْصَرَفَ قَالَ لَهُ عَبْدُ اللَّهِ : لا تُحَرِّكُ الْحَصَى وَأَنْتَ فِي الصَّلَاةِ فَإِنَّ ذَلِكَ مِنْ الشَّيْطَانِ (1)  نسائي: التطبيق ١١٦٠] [التعليقات الحسان ١٩٤٤] (صحيح)

अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत है कि उनहों ने एक शख़्स को देखा कि जो नमाज़ ही पढ़ रहा है, उसके हाथ में कंकरियां को हरकत दे रहा है। हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर ने हमसे कहा: नमाज़ में कंकरियों को हरकत न दो, क्योंकि ये चीज़ शैतान की तरफ से है।

عن علي بن عبد الرحمن المعاوي أنه قال: رأني عبد الله بن عمر وأنا أغبت بالحصى في الصلاة فلما الصرف لهاي فقال: صنعُ كَمَا كَانَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم يضع، فقلت: وكيف كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنع قال: «كان إذا جلس في الصلاة وضع كُلَّهُ الْيُمْنَى عَلَى فضله اليمنى، وقبض أصابعه كلها وأشار بإصبعه التي على الإبهام، ووضع كلة البشرى على فيلم المشرعية [مسلم: المساجد ومواضع الصلاة
[(١١٤ – )٥٨٠

25. नमाज़ में पढ़ी जाने वाली क़िरात वा अज़कार के मानी न सीखना

قال : مَا مِنْ مُسْلِمٍ يَتَوَضَّأُ فَيُسْبِغُ الْوُضُوءَ ثُمَّ يَقُومُ فِي صَلَاتِهِ فَيَعْلَمُ مَا يَقُولُ إِلَّا انْفَتَلَ كَيَوْمٍ وَلَدَتْهُ أُمُّهُ مِنَ الْخَطَايَا لَيْسَ عَلَيْهِ ذَنْبٌ. (حاكم) [صحيح الترغيب (٥٤٦] (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जो भी मुसलमान कामिल वुजू करता है, फिर नमाज में खड़ा होता है, और जो कुछ पढ़ता है उसे समझता भी है तो नमाज से फारिग होकर वो गुनाहों से इस तरह पाक लौटता है जैसे उस दिन था जब उसकी मां ने उसे जन्म दिया था। उस पर कोई गुनाह नहीं होता।

26. नमाज में ध्यान ना देना

وقال زكريا عا العام لقومه : وَإِنَّ اللَّهَ أَمَرَكُمْ بِالصَّلَاةِ فَإِذَا صَلَّيْتُمْ فَلَا تَلْتَفِتُوا فَإِنَّ اللَّهَ يَنْصِبُ وَجْهَهُ لِوَجْهِ عَبْدِهِ فِي صَلَاتِهِ   مَا لَمْ يَلْتَفِتْ (مسند احمد، تاريخ كبير، ترمذی، نسائی، ابن حبان حاكم عن الحارث ابن الحارث الأشعري. صحيح الجامع ١٧٢٤] (صحيح) 

हज़रत ज़करिया عليه السلام ने अपनी कौम को हिदायत करते हुए कहा था:
अल्लाह ताला ने तुम्हें नमाज का हुक्म दिया है। जब तुम नमाज अदा करो तो यहां वहां मुतवज्जिह न होना, इस लिए कि बंदा जब नमाज में होता है तो अल्लाह तआला का चेहरा बंदे के चेहरे के बिल्कुल सामने होता है जब तक कि बंदा खुद ही दूसरी तरफ मुतवज्जिह न हो।

27. रुकु और सुजूद में पीठ सीधी न रखना

قال : لا تُجْزِئُ صَلَاةُ الرَّجُلِ حَتَّى يُقِيمَ ظَهْرَهُ فِي الرَّكُوعِ وَالسُّجُودِ (1) ) مسند احمد، ابو داود، ترمذی، نسائی، ابن ماجه) عن أبي مسعود . صحيح الجامع ٧٢٢٤) (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
बंदे की नमाज़ ही नहीं होती जब तक कि वो रुकु’ और सजदे में अपनी पीठ सीधी ना रखे।

قال : لَا يَنْظُرُ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ إِلَى صَلَاةِ عَبْدٍ لَا يُقِيمُ فِيهَا صُلْبَهُ بَيْنَ رُكُوعِهَا وَسُجُودِهَا (مسند احمد) عن طلق بن علي الحنفي الصحيحة ٢٥٣٦] (إسناده جيد)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
अल्लाह तआला हमें बंदे की नमाज़ की तरफ देखता भी नहीं जिसमें बंदा रुकू’ और सुजूद के दरमियान अपनी पीठ सीधी न रखे।

1 قال يا معشر المسلمين لا صلاة لمن لا يقيم مثله في الركوع والسجود
( ابن ماجعه ) عن علي بن شيان ( صحيح ) (صحيح الجامع ٧٩٧٧]

28. जल्दी जल्दी रुकू’ और सुजूद करना

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْن مُعَفَلٍ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ : أَسْرَقُ النَّاسِ مَنْ يَسْرِقُ صَلَاتَهُ قِيلَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ وَكَيْفَ يَسْرِقُ صَلَاتَهُ؟
قَالَ : لا يُتِمُّ رُكُوعَهَا وَلَا سُجُودَهَا ) طبراني في الأوسط ) عن عبد الله بن مغفل . صحيح الجامع ٩٦٦) (صحيح)

हजरत अब्दुल्ला बिन मुगफ्फल से रिवायत है, फरमाते हैं:
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
बद-तरीन चोर कौन है जो अपनी नमाज़ में चोरी करे। लोगों ने अर्ज़ किया: आए अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), आदमी अपनी नमाज़ में से कैसे चोरी कर सकता है? आप ने फरमाया: वो नमाज में रुकू’ और सुजूद ठीक से ना करे।

عَنْ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ، وَخَالِدِ بْنِ الْوَلِيدِ، وَيَزِيدَ بْنِ أَبِي سُفْيَانَ، وَشُرَحْبِيلَ بْنِ حَسَنَةً صَلَّى رَسُولُ اللَّهِ ﷺ بِأَصْحَابِهِ ثُمَّ جَلَسَ فِي طَائِفَةٍ مِنْهُمْ فَدَخَلَ رَجُلٌ، فَقَامَ يُصَلِّي، فَجَعَلَ يَرْكَعُ وَيَنْقُرُ فِي سُجُودِهِ فَقَالَ النَّبِيُّ ﷺ: «أَتَرَوْنَ هَذَا، مَنْ مَاتَ عَلَى هَذَا مَاتَ عَلَى غَيْرِ مِلَّةِ مُحَمَّدٍ، يَنْقُرُ صَلَاتَهُ كَمَا يَنْقُرُ الْغُرَابُ الدَّمَ، إِنَّمَا مَثَلُ الَّذِي يَرْكَعُ وَيَنْقُرُ فِي سُجُودِهِ كَالْجَائِعِ لا يَأْكُلُ إِلَّا التَّمْرَةَ وَالتَّمْرَتَيْنِ ، فَمَاذَا تُغْنِيَانِ عَنْهُ.
(طبراني، ابو يعلى، ابن خزيمه واللفظ له) [صحيح ابن خزيمة ٦٦٥، صحيح الترغيب ٥٢٨] (حسن)

हज़रत अम्र बिन आस, ख़ालिद बिन वलीद, यज़ीद बिन अबी सुफ़ियान, शुरहबील बिन अबी हसनाह से रिवायत है की,
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने सहाबा के साथ नमाज अदा की। फिर आप बाज़ सहाबा के साथ बैठे रहेंगे। एक शख़्स मस्जिद में दाख़िल हुआ और नमाज़ पढ़ने लगा। हमें शाखों ने रुकु’ किया और जल्दी-जल्दी सजा दी। क्या पर अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: क्या शेखों को देख रहे हो? जो शख़्स इस हाल में मारे वो मिल्लत ए मुहम्मदिया पर नहीं मारा। जो नमाज़ में इस तरह थोंग लगता है जैसे कव्वा खून में थोंग लगता है। हमारे शाखों की मिसाल जो रुकु’ और सज्दों में थोंग लगे, हमें भूखे आदमी की तरह है जो एक दो खजूर खा ले, (एक दो खजूरों से) से उसकी भूख क्या मिटेगी।

29. सजदे में ज़मीन पर बाज़ू बिछाना

قال :
اعْتَدِلُوا فِي السُّجُودِ (1)
وَلَا يَبْسُطُ أَحَدُكُمْ ذِرَاعَيْهِ الْبِسَاطَ الْكَلْبِ
بخاري: الآذان ۸۲۲ – مسلم: الصلاة ۲۳۳ – (٤٩٣) عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
सज्दों में एतेदाल इख्तियार करो, और तुम में से कोई शख़्स (सजदे में) अपने बाज़ू कुत्ते की तरह ना बिछाए।

قال : إِذَا سَجَدْتَ فَضَعْ كَفَّيْكَ وَارْفَعْ مِرْفَقَيْكَ [مسلم: الصلاة ٢٣٤ – (٤٩٤)) عَنْ الْبَرَاء

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जब तू सजदा करे तो अपनी हथेलीयां जमीन पर रख दे और कोहनी उठा ले।

30. सजदे में हाथों की उंगलियां खुली रखना

أَنَّ النَّبِيَّ ﷺ كَانَ إِذَا سَجَدَ ضَمَّ أَصَابِعَهُ
ابن خزیمه، ابن حبان حاكم أصل صفة صلاة النبي ﷺ ج ٢ ص ٧٢٦] صحیح ابن خزيمة (٦٤٢] (صحيح)

वायल से रिवायत है कि
अल्लाह के नजीब सजदा करते हैं तो हाथों की उंगली समेट लेते हैं।

ا قال : إذا سجد أحدكم فليعدل ولا يعترض ذراعيه المراض الكلب
( مسند احمد، ترمذی، ابن ماجه، ابن خزيمة الضياء ) عن جابر . ( صحيح ) (صحيح الجامع ٥٩٦]
2 قال ابن حجر: قولة اعتدلوا أبي كولوا متوسطين بين الافتراضي والقنص وقال بن دقيق العيد لعان المراد بالاعتدال لهنا وضع هيئة السجود على وقع الأثر لأن الاعتدال المشي المطلوب في المرفوع لا يتأتى لهذا فإنه هناك استواء الظهر والحر والمطلوب ها ارتفاع الأسافل على الأعالي افتح الباري

31. दूसरी और चौथी रकत की शुरुआत में जलसा ए इस्तिराहत न करना

عن مَالِكِ بْنُ الْحَوَيْرِثِ اللَّيْنِي أَنَّهُ رَأَى النَّبِيَّ يُصَلِّي فَإِذَا كَانَ فِي وِتْرِ مِنْ صَلَاتِهِ لَمْ يَنْهَضْ حَتَّى يَسْتَوِيَ قَاعِدًا.

[ح: كتاب الأذان ۸۲۳]

मालिक बिन हुवैरिस फ़रमाते हैं कि:
उनहों ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को नमाज पढ़ते देखा। जब तक ऐप अपनी नमाज की ताक रकतों में न हो जाए, हमें वक्त तक खड़े नहीं होते, जब तक कि ठीक से बैठ नहीं जाते।

32. क़ियाम के लिए उठे वक़्त ज़मीन पर एतेमाद न करना

عَنْ أَبِي قِلَابَةَ قَالَ
جَاءَنَا مَالِكُ بْنُ الْخَوَيْرِثِ
فَصَلَّى بِنَا فِي مَسْجِدِنَا هَذَا
فَقَالَ إِنِّي لَأُصَلِّي بِكُمْ وَمَا أُرِيدُ الصَّلَاةَ
وَلَكِنْ أُرِيدُ أَنْ أُرِيَكُمْ كَيْفَ رَأَيْتُ النَّبِيَّ ﷺ يُصَلِّي
قَالَ أَيُّوبُ : فَقُلْتُ لِأَبِي قِلَابَةَ : وَكَيْفَ كَانَتْ صَلَاتُهُ ؟
قَالَ مِثْلَ صَلَاةِ شَيْخِنَا هَذَا – يَعْنِي عَمْرَو بْنَ سَلِمَةَ –
قَالَ أَيُّوبُ : وَكَانَ ذَلِكَ الشَّيْخُ يُتِمُّ التَّكْبِيرَ (1) وَإِذَا رَفَعَ رَأْسَهُ عَنْ السَّجْدَةِ الثَّانِيَةِ جَلَسَ
وَاعْتَمَدَ عَلَى الْأَرْضِ ثُمَّ قَامَ
خ: كتاب الأذان ٨٢٤]

अबू क़िलाबा (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि:
हमारे पास मालिक बिन हुवैरिस आए और हमने इसी मस्जिद में नमाज भी पढ़ीं। उन्होन ने कहा: मैं तुम्हें नमाज पढ़ाऊं गा और मेरा इरादा महेज इबादत का नहीं। बाल्की मैं चाहता हूं कि तुम को दिखाऊं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) किस तरह नमाज पढ़ते हैं।
अय्यूब कहते हैं कि मैंने अबू क़िलाबा से कहा कि उनकी (यानी मालिक बिन हुवैरिस की) नमाज़ कैसी थी? अबू किलाबा ने कहा हमारे शेख अम्र बिन सलामा की तरह।
अय्यूब कहते हैं कि वो शेख़ तकबीर पूरी किया करते थे। और जब दूसरे सजदे से सर उठते तो बैठ जाते और जमीन पर एतमाद करके (यानी जमीन पर हाथ टिकाकर) खड़े होते।

1 أي يستولي عددها، ويأتي بتمامها، ولا ينقص منها شيئًا، فيض الباري رقم ٨٢٤]

33. नमाज़ बा जमात में सफ़ें सीधी न करना

قال : لَتُسَؤُنَّ صُفُوفَكُمْ أَوْ لَيُخَالِفَنَّ اللَّهُ بَيْنَ وُجُوهِكُمْ (1)
بخاري: الآذان: ۷۱۷ – مسلم: الصلاة: ٦٥٩]

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
तुम ज़रूर अपने सफ़ों को सीधा करो, वरना अल्लाह तआला तुम्हारे चेहरे (यानी तुम्हारे दिलों) में इख़तेलाफ़ अदा कर देगा।

34. सफ़न में बाहम फ़सला राखना

عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكِ عَنْ النَّبِيِّ قَالَ أَقِيمُوا صُفُوفَكُمْ فَإِنِّي أَرَاكُمْ مِنْ وَرَاءِ ظَهْرِي وَكَانَ أَحَدُنَا يُلْزِقُ مَنْكِبَهُ بِمَنْكِبِ صَاحِبِهِ وَقَدَمَهُ بِقَدَمِهِ
[بخاري: الآذان ٧٢٥]

अनस बिन मालिक नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) करेन से रिवायत करते हैं
आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हम से फरमाया;
अपनी सफें सीधी कर लो, इसलिए कि मैं अपने पीछे से तुम्हें देखता हूं।
फरमाते हैं: हम में से हर शख़्स अपना कंधा अपने साथी के कंधों से और अपना कदम अपने साथी के कदम से जोड़ लेता था।

قال : لَا تَذَرُوا فُرُجَاتٍ لِلشَّيْطَانِ
( مسند احمد ابو داود، طبراني) عن ابن عمر .
صحيح الجامع ۱۱۸۷ – الصحيحة ٧٤٣] (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
शैतान के लिए (सफों में) खाली जगहें मत छोड़ो।

1 ولفظ أبي داود:
والله القيم صفوفكم أو ليخالف الله بين قلوبكم (ابو داود عن الأعمال بن بشير. [صحيح الجامع (۱۱۹) (صحيح) وفي رواية: الشئون الصفوفكم في صلاتكم أو أبدا الفن الله بين قلوبكم (مسند احمد، طبراني) عن النعمان بن بشير صحيح الجامع ٥٠٧٠) (صحيح)

35. सफ्फ से अलग नमाज पढ़ना

عن وابصة أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ رَأَى رَجُلًا يُصَلِّي خَلْفَ الصَّفِ وَحْدَهُ فَأَمَرَهُ أَنْ يُعِيدَ
(مسند احمد ابو داود، ترمذي المشكاة ١١٠٥] (صحيح)

वबीसा से रिवायत है कि 
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक शख़्स को सफ़ के पीछे अकेले नमाज पढ़ते देखा तो आप ने उसे नमाज दोहराने का हुक्म दिया।

ولفظ ابن حبان: قال : فَأَعِدْ صَلَاتَكَ،
فَإِنَّهُ لَا صَلَاةَ لِفَرْدٍ خَلْفَ الصَّفِّ وَحْدَهُ. (1)
(ابن حبان) [التعليقات الحسان ۲۲۰۰) (صحيح)

इब्न ए हिब्बान के अल्फ़ाज़ हैं:
आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: अपनी नमाज दोहराओ, इस लिए उस शख़्स की नमाज नहीं जो सफ्फ से पीछे अकेले ही नमाज पढ़ ले।

36. अगली सफ्फ मुकम्मल होने से क़बल सफ बनाना

قال : أتموا الصَّفَ الْأَوَّلَ ثُمَّ الَّذِي يَلِيهِ وَإِنْ كَانَ نَقْصُ فَلْيَكُنْ فِي الصَّفِ الْمُؤَخَّرِ.
(مسند احمد، نسائي) عن أنس نسائي، بتحقيق الألباني ۸۱۸] (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
पहले अगली सफ्फ को मुकम्मल करो, फिर उसके बाद वाली सफ्फ को। सफ्फ में कमी सिर्फ आखिरी सफ्फ में रहे।

1 وفي رواية قال : استقبل صلاتك، لا صلاة الذي خلف الصف
( عن ابن ماجه ابن حبان ) عن علي بن شيبان ( صحيح ) (صحيح الجامع ٩٤٩]

37. बच्चों को पहली सफ्फ में खड़ा करना

قال : ليَلِنِي مِنْكُمْ أُولُو الْأَحْلَامِ وَالنَّهَى ثُمَّ الَّذِينَ يَلُونَهُمْ، ثُمَّ الَّذِينَ يَلُونَهُمْ
عَنْ أَبِي مَسْعُودٍ
مسلم: الصلاة ۱۲۲ – (٤٣٢)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
सफ़ में मुझसे क़रीब वो लोग हों जो बालिग़ हों, समझदार हों। फिर जो उनसे करीब हों, फिर जो उनसे करीब हों।

38. इमाम के आने से पहले खड़े हो जाना

قال : إِذَا أُقِيمَتِ الصَّلَاةُ فَلَا تَقُومُوا حَتَّى تَرَوْنِي قَدْ خَرَجْتُ
بخاري: الآذان ٦٣٧ – مسلم: المساجد ومواضع الصلاة ١٥٦ – (٦٠٤)]

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जब नमाज की इकामत हो तो खड़े मत हो जब तक देख न लो कि मैं अपने कमरे से निकल कर (मस्जिद में) आ गया हूं।

39. इमाम से पहले आमीन कहना

قال : إِذَا أَمَّنَ الْإِمَامُ فَأَمِّنُوا فَإِنَّهُ مَنْ وَافَقَ تَأْمِينُهُ تَأْمِينَ الْمَلَائِكَةِ غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ
بخاري: الأذان ۷۸۰ – مسلم الصلاة ۷۲ – (٤١٠) عَنْ أَبِي هُرَيْرَة

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जब इमाम आमीन कहें तो तुम भी आमीन कहो, इस लिए कि जिसकी आमीन फरिश्तों की आमीन के मुवाफिक हो जाए उसके पीछले तमाम गुनाह मुआफ हो जाते हैं।

40. इक़ामत के वक़्त भी सुन्नत व नफ़ल में मशगूल होना

قال : إِذَا أُقِيمَتْ الصَّلَاةُ فَلَا صَلَاةَ إِلَّا الْمَكْتُوبَةُ.
مسلم: صلاة المسافرين وقصرها ٦٣ – (٧١٠) ، ٦٤ – (٧١٠)] عن أبي هريرة .

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जब नमाज की इकामत हो जाए तो सिवाय फर्ज नमाज के कोई और नमाज नहीं।

عَنْ ابْنِ يُحَيْنَةَ قَالَ أُقِيمَتْ صَلَاةُ الصُّبْحِ فَرَأَى رَسُولُ اللَّهِ رَجُلًا يُصَلِّي وَالْمُؤَذِّنُ يُقِيمُ فَقَالَ: أَتُصَلِّي الصُّبْحَ أَرْبَعًا؟
بخاري: الآذان ٦٦٣ – مسلم: صلاة المسافرين وقصرها ٦٦ – (۷۱۱)] واللفظ المسلم

इब्न ए बुहैना से रिवायत है, फ़रमाते हैं:
नमाज़ की इक़ामत हुई. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने देखा कि एक शख़्स नमाज़ पढ़ रहा है जबकि मुअज़्ज़िन इक़ामत कह रहा था। इस पर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: क्या तुम सुबह की नमाज चार रकअत पढ़ रहे हो?

عنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ سَرْجِسَ قَالَ
دَخَلَ رَجُلٌ الْمَسْجِدَ وَرَسُولُ اللَّهِ فِي صَلَاةِ الْغَدَاةِ فَصَلَّى رَكْعَتَيْنِ فِي جَانِبِ الْمَسْجِدِ ثُمَّ دَخَلَ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ
فَلَمَّا سَلَّمَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ قَالَ: يَا فُلَانُ بِأَيِّ الصَّلَاتَيْنِ اعْتَدَدْتَ؟ أَبْصَلَاتِكَ وَحْدَكَ أَمْ بِصَلَاتِكَ مَعَنَا؟
مسلم : كتاب صلاة المسافرين وقصرها ٦٧ – (٧١٢)]

अब्दुल्लाह बिन सरजिस से रिवायत है, फरमाते हैं:
एक शख़्स मस्जिद में दाख़िल हुआ और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सुबह की नमाज़ पढ़ा रहे थे। उस में से एक शख्स ने मस्जिद के एक हिस्से में दो रक़तें अदा कीं और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ जमात में शरीक हो गया। जब आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सलाम फेरा तो फरमाया: ऐ फुलां! तुम अपनी किस नमाज़ को शुमार करोगे? उस नमाज़ को जो तुमने तन्हा पढ़ी है या उस नमाज़ को जो हमारे साथ अदा की?

41. नमाज़ में रुकुअ् व सुजूद में इमाम पर सबक़त ले जाना

قال : أَيُّهَا النَّاسُ إِنِّي إِمَامُكُمْ فَلَا تَسْبِقُونِي بِالرُّكُوعِ وَلَا بِالسُّجُودِ وَلَا بِالْقِيَامِ وَلَا بِالإِنْصِرَافِ
مسلم: الصلاة ١١٢ – (٤٢٦)) عن أنس

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
ऐ लोगो, मैं तुम्हारा इमाम हूं। लिहज़ा मुझसे पहले रुकुअ्’ और सजदा ना करो, और ना ही क़ियाम और सलाम में मुझसे आगे बढ़ो।

قال : مَا يَأْمَنُ الَّذِي يَرْفَعُ رَأْسَهُ فِي صَلَاتِهِ قَبْلَ الْإِمَامِ أَنْ يُحَوِّلَ اللَّهُ صُورَتَهُ فِي صُورَةِ حِمَارٍ ؟
مسلم: الصلاة ١١٥ – (٤٢٧)) عن أبي هريرة .

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जो शख़्स इमाम से पहले (रुकूअ् और सजदे से) सर उठाता है, क्या वो इस बात से नहीं डरता कि अल्लाह तआला उसकी सूरत बदल कर गधे की सूरत बना दे?

42. जमात में शरीक होने के लिए इमाम के सजदे से खड़े होने तक इंतजार करना

قال : إِذَا وَجَدْتُمُ الْإِمَامَ سَاجِدًا فَاسْجُدُوا أَوْ رَاكِعًا فَارْكَعُوا أَوْ قَائِمًا فَقُوْمُوا وَلَا تَعْتَدُّوا بِالسُّجُودِ إِذَا لَمْ تُدْرِكُوا الرَّكْعَةِ
أخرجه إسحاق بن منصور المروزي في مسائل أحمد وإسحاق)) عن ابن معقل المزني
الصحيحة ۱۱۸۸] ونحوه عند أبي داود (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जब तुम इमाम को सजदे में पाओ तो तुम भी सजदा करो, या रुकूअ् में पाओ तो तुम भी रुकूअ् करो या क़ियाम मे पाओ तो तुम भी क़ियाम करो। और अगर तुम्हें रुकुअ् ना मिले तो सज्दों को शुमार ना करो।

قال : إِذَا أَتَى أَحَدُكُمُ الصَّلَاةَ وَالْإِمَامُ عَلَى حَالٍ فَلْيَصْنَعْ كَمَا يَصْنَعُ الْإِمَامُ

( ترمذي) عن على ومعاذ  . صحيح الجامع ٢٦١) (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जब तुम में से कोई शख़्स (नमाज़ के लिए) आए और इमाम को किसी हाल में पाए तो उसे चाहिए कि वही करे जो इमाम कर रहा है।

43. इमाम की भूल पर सुब्हान-अल्लाह की बजाए अल्लाहु अकबर कहना

قَالَ رَسُولُ اللَّهِ
مَنْ رَابَهُ شَيْءٌ فِي صَلَاتِهِ فَلْيُسَبِّحْ فَإِنَّهُ إِذَا سَبَّحَ الْتُفِتَ إِلَيْهِ وَإِنَّمَا التَّصْفِيقُ لِلنِّسَاءِ
بخاري: الأذان ٦٨٤ – مسلم: الصلاة ۱۰۲ – (٤٢١))
عن سهل بن سعد الساعدي وفيه قصة

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जिस शख़्स को नमाज़ में कोई मुआमला पेश आए तो वो सुब्हान-अल्लाह कहे। क्योंकि जब कोई सुबहान-अल्लाह कहेगा तो (इमाम) उसकी तरफ जरूर मुतवज्जे होगा। और तस्फीक [यानी हाथ की पुश्त पर हाथ मरना] औरतों के लिए है।

قال : التَّسْبِيحُ لِلرِّجَالِ وَالتَّصْفِيقُ لِلنِّسَاءِ. (1)
بخاري: الجمعة ۱۲۰۳ – مسلم الصلاة ٦٤١] عن أبي هريرة

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
तस्बीह (यानी सुबहान-अल्लाह कहना) मर्दों के लिए है और तस्फीक (यानी हाथ की पुश्त पर हाथ मरना) औरतों के लिए है।

 قال
إذا ربكم أمر، فليح الرجال، وليصبح النساء
خاري: الأحكام ۷۱۹۰ – مسلمة الصلاة ۱۰۲ – (٤۲۱)) عن سهل بن سعد الساعدي واللفظ البخاري

44. नमाज़ के बाद इज्तेमाई दुआ करना

قَالَ رَسُولُ اللَّهِ :
مَنْ عَمِلَ عَمَلًا لَيْسَ عَلَيْهِ أَمْرُنَا فَهُوَ رَدُّ
بخاري: الإعتصام بالكتاب والسنة باب إذا اجتهد العامل أو الحاكم فأخطأ (تعليقا) –
مسلم: الأقضية ۱۸ – (۱۷۱۸)] عن عائشة.

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जो शख्स कोई ऐसा अमल करे जिसका हमने हुक्म नहीं दिया वह ना काबिल ए कबूल है।

قال :
مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ فِيهِ فَهُوَ رَدُّ
هذا لفظ البخاري والمسلم :
مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدُّ
بخاري: الصلح ٢٦٩٧ – مسلم: الأقضية ١٧ – (۱۷۱۸) عن عائشة

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
जो हमारे इस दीन में कोई ऐसी चीज़ निकाले जो इस में नहीं थी वो काबिल ए रद्द है.
ये बुखारी की रिवायत के अल्फाज़ हैं।
और मुस्लिम की रिवायत में इस तरह है:
जो हमारे इस दीन में कोई ऐसी चीज़ निकाले जो उसमें से ना हो वो ना काबिल ए कबूल है।

45. दूसरों की नमाज़ क़ता’आ करना

عَنْ يُسْرِ بن سَعِيدٍ
أَنَّ زَيْدَ بْنَ خَالِدٍ أَرْسَلَهُ إِلَى أَبِي جُهَيْمٍ يَسْأَلُهُ:
مَاذَا سَمِعَ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ فِي الْمَارِ بَيْنَ يَدَيِ الْمُصَلِّي؟
فَقَالَ أَبُو جُهَيْمٍ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ:
لَوْ يَعْلَمُ المَارُّ بَيْنَ يَدَيِ الْمُصَلِّي مَاذَا عَلَيْهِ
لَكَانَ أَنْ يَقِفَ أَرْبَعِينَ خَيْرًا لَهُ مِنْ أَنْ يَمُرَّ بَيْنَ يَدَيْهِ.
قَالَ أَبُو النَّضْرِ : لَا أَدْرِي، أَقَالَ أَرْبَعِينَ يَوْمًا، أَوْ شَهْرًا، أَوْ سَنَةً.
بخاري الصلاة ٥١٠ – مسلم الصلاة ٢٦١ – (٥٠٧)]

बुस्र बिन सईद से रिवायत है कि
ज़ैद बिन खालिद ने उन्हें अबू जुहैम के पास भेजा कि नमाज़ी के आगे से गुज़रने वाले के बारे में  उन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से क्या बात सुनी है? तो अबू जुहैम ने बताया कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: अगर नमाज़ी के आगे से गुज़रने वाले को मालूम हो जाए कि उस पर कितना बड़ा गुनाह है तो वो नमाज़ी के आगे से गुज़रने की बजाए चालिस तक रुके रहना ज़्यादा पसंद करेगा।
हदीस के रावी अबू नज़र कहते हैं:
मुझे नहीं मालूम कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने चालीस दिन कहा, या चालीस महीने या चालीस साल।

46. मस्जिद में शोर करना

عَنْ أَبِي سَعِيدٍ
قَالَ اعْتَكَفَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ فِي الْمَسْجِدِ فَسَمِعَهُمْ يَجْهَرُونَ بِالْقِرَاءَةِ فَكَشَفَ السِّتْرَ
وَقَالَ: أَلَا إِنَّ كُلَّكُمْ مُنَاجِ رَبَّهُ، فَلَا يُؤْذِيَنَّ بَعْضُكُمْ بَعْضًا وَلَا يَرْفَعْ بَعْضُكُمْ عَلَى بَعْضٍ فِي الْقِرَاءَةِ
– أَوْ قَالَ – فِي الصَّلَاةِ
(مسند احمد، ابو داود، حاكم) عن أبي سعيد. (صحيح) [صحيح الجامع ٢٦٣٩]

अबू सईद से रिवायत है, फरमाते हैं:
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मस्जिद में एतकाफ़ किया। आप ने कुछ लोगों को ऊंची आवाज में क़िरात करते सुना तो आप ने पर्दा हटाया और फरमाया:
ख़बरदार, तुममें से हर एक अपने रब्ब से मुनाजात करता है, लिहाज़ा कोई शख़्स दूसरे को तकलीफ न दे। तुम में से कोई शख़्स क़िरात करते वक़्त दूसरे के मुक़ाबले में आवाज़ ऊँची ना करे।
या आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: नमाज में (अपनी आवाज ऊंची न करे)।

قال :
وَإِيَّاكُمْ وَهَيْشَاتِ الْأَسْوَاقِ
مسلم : الصلاة ۱۲۳ – (٤٣٢) عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ مَسْعُودٍ

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
ख़बरदार! (मस्जिद में) बाज़ारों की तरह शोर ओ घुल का माहौल न बनाओ।

47. नमाज़ के बाद अज़कार तर्क करके फौरन सुन्नत अदा करना

عن عُمَرُ بْنُ عَطَاءِ بْنِ أَبِي الْحَوَارِ
أَنَّ نَافِعَ بْنَ جُبَيْرٍ أَرْسَلَهُ إِلَى السَّائِبِ ابْنِ أُخْتِ نَمِرٍ يَسْأَلُهُ عَنْ شَيْءٍ رَآهُ مِنْهُ مُعَاوِيَةُ فِي الصَّلَاةِ فَقَالَ : نَعَمْ، صَلَّيْتُ مَعَهُ الْجُمُعَةَ فِي الْمَقْصُورَةِ فَلَمَّا سَلَّمَ الْإِمَامُ قُمْتُ فِي مَقَامِي فَصَلَّيْتُ فَلَمَّا دَخَلَ أَرْسَلَ إِلَيَّ فَقَالَ: لَا تَعُدْ لِمَا فَعَلْتَ إِذَا صَلَّيْتَ الْجُمُعَةَ فَلَا تَصِلُّهَا بِصَلَاةٍ حَتَّى تَكَلَّمَ أَوْ تَخْرُجَ
فَإِنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ أَمَرَنَا بِذَلِكَ أَنْ لَا تُوصَلَ صَلَاةٌ بِصَلَاةٍ حَتَّى نَتَكَلَّمَ أَوْ نَخْرُجَ.
مسلم: الجمعة ۷۳ – (۸۸۳)]

उमर बिन अता बिन अबी ख़ुवार से रिवायत है,
कि नाफ़े बिन जुबैर ने उन्हें साएब बिन उखत ए नामिर के पास उस चीज़ के मुतल्लिक पुछने के लिए भेजा जो हज़रत मुआविया ने उनकी नमाज़ में देखी थी। फरमाया: हां मैं ने हजरत मुआविया के साथ जुमुआ के दिन मस्जिद में बने छोटे कमरे में नमाज पढ़ी। जब इमाम ने सलाम फेरा तो मैं फ़ौरन अपनी जगह खड़ा हुआ और नमाज़ पढ़ने लगा। जब हजरत मुआविया अपने घर में दाखिल हुए तो मुझे बुलावा भेजा और फरमाया: तुमने जो कुछ किया उसे दोबारा मत करना। जब तुम जुमुआ की नमाज अदा करो तो उसके फौरन बाद नमाज ना शुरू करो, जब तक कुछ बात ना करो, या उस जगह से हट ना जाओ। इस लिए कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें इस बात का हुक्म दिया है कि हम एक नमाज़ को दूसरी नमाज़ से ना जोड़ें यहां तक ​​कि बात कर लें या वहां से बाहर निकल जाएं।

48.इमाम का फ़र्ज़ की जगह ही सुन्नत अदा करना

قال :
لَا يُصَلِّي الْإِمَامُ
فِي مُقَامِهِ الَّذِي صَلَّى فِيهِ الْمَكْتُوبَةَ حَتَّى يَتَنَحَّى عَنْهُ
(ابو داود، ابن ماجه) عن المغيرة بن شعبة
ابو داود، بتحقيق الألباني ٦١٦ ، ابن ماجه بتحقيق الألباني ١٤٢٨) (صحيح)

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
इमाम उसी जगह नमाज न पढ़े जहां उस ने फर्ज पढ़ी है, बल्कि उस जगह से जरा हट जाए।

स्रोत: शैख़ अबू ज़ैद ज़मीर हफिज़हुल्लाह

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दीन में बिद्अत और ईद मीलादुन्नबी का उत्सव https://learnislam.net/question/innovation-in-islam-and-eid-e-milad-hindi/ Sat, 30 Aug 2025 21:54:54 +0000 https://learnislam.net/question/%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%85%e0%a4%a4-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%88%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%a6

दीन में बिद्अत और ईद मीलादुन्नबी का उत्सव

﷽

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

बिद्अत अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है बिना पूर्व उदाहरण के ईजाद कर ली गई चीज़।

शरीअत की इस्तिलाह में धर्म में गढ़ लिया गया ऐसा तरीका जो शरीअत की समानता (बराबरी) करता हो। इस प्रकार बिअत सुन्नत के विरूद्ध और सुन्नत के विपरीत है।
इस्लामी भाईयो ! आप की सेवा में बिद्अत के बारे में कुछ नुसूस प्रस्तुत किये जा रहे हैं :

१. इर्बाज़ बिन सारियह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हों ने कहा कि : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:
“तुम में से जो आदमी मेरे बाद ज़िन्दा रहे गा वह बहुत अधिक इख़्तिलाफ (मतभेद) देखेगा, अतः तुम मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायत याफ्ता (पथप्रदर्शित ) खुलफा-ए-राशिदीन की सुन्नत को दृढ़ता से थाम लो और उसे दाँतों से जकड़ लो। तथा धर्म में नयी ईजाद कर ली गयी चीज़ों (यानी बिद्अतों) से बचो, क्योंकि हर बिद्अत गुमराही (पथभ्रष्टता) है।“ (अहमद, तिर्मिज़ी, इब्ने गाजा, दारमी, हाकिम, इब्ने हिब्बान, तथा अल्बानी ने किताबुस्सुन्नह की तखरीज में इस सहीह कहा है]

२. जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हो ने कहा कि अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:
“जिसे अल्लाह तआला मार्गदर्शन प्रदान कर दे उसे कोई पथ-भ्रष्ट करने वाला नहीं, और वह जिसे पथ-भ्रष्ट कर दे उसे कोई मार्ग दर्शन करने वाला नहीं, और सर्वश्रेष्ठ बात अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल की किताब है, और सब से बेहतरीन तरीका मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीका है, और सब से बुरी बात धर्म में नयी ईजाद कर ली गई चीजें हैं, और धर्म में हर नयी ईजाद कर ली गई चीज़ बिद्अत है।” [मुस्लिम, बैहकी तथा बैहकी और नसाई के यहाँ सहीह सनद के साथ यह भी है कि { और हर गुमराही जहन्नम में ले जाने वाली है }

३. तथा आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि उन्हों ने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया
“जिसने हमारी इस शरीअत में कोई ऐसी चीज़ ईजाद की जिस का उस से कोई संबंध नही है तो वह मर्दूद (अस्वीकृत) है।” [बुखारी व मुस्लिम और मुस्लिम की एक रिवायत में है कि : “जिसने कोई ऐसा काम किया जो हमारी शरीअत के अनुसार नहीं है तो वह मर्दूद (अस्वीकृत) है।”

इब्ने हजर रहिमहुल्लाह “हर बिदअत गुमराही है” पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं : “हदीस का यह वाक्य शरीअत का एक काईदा (नियम) है, चुनाँचि हर बिद्अत गुमराही है, अतः वह शरीअत का हिस्सा नहीं हो सकती, क्योंकि शरीअत पूरी की पूरी हिदायत और मार्गदर्शन है। जहाँ तक आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस है तो वह जवामिउल-कलिम में से है (यानी कम शब्दों में अर्थ पूर्ण विस्तृत बात कहने की योग्यता अर्थात् गागर में सागर के समान है) और वह प्रत्यक्ष (ज़ाहिरी) आमाल की कसौटी है, और बिद्अती का अमल अस्वीकृत है, इसके बारे में विद्वानों के दो कथन हैं: प्रथम उसका अमल उसी के ऊपर लौटा दिया जाए गा (यानी उसे कबूल नहीं किया जायेगा) दूसरा: बिद्अती ने अल्लाह के हुक्म को रद्द कर दिया क्योंकि उसने अपने आप को अहकमुल हाकिमीन के समान (समवर्ती) बनाकर खड़ा कर दिया, और थर्म में ऐसी चीज़ को मश्रूअ (वैध) कर दिया जिसकी अल्लाह तआला ने अनुमति नही दी है।”

इस्लामी भाईयो ! आप की सेवा में बिअत के बारे में कुछ सहाबा के कथन प्रस्तुत किये जा रहे हैं :

अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया “पैरवी करो और बिद्अत ईजाद न करो, क्योंकि तुम पर्याप्त किये जा चुके हो।” (इसे तबरानी और दारमी ने सहीह इसनाद के साथ रिवायत किया है)

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं “हर बिद्अत गुमराही है, अगर लोग उसे अच्छा ही क्यों न समझें।” (इसे दारमी ने सहीह इसनाद के साथ रिवायत किया है)

तथा अब्दुल्लाह बिन मसूऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने मस्जिद में बैठे हुए उन लोगों का खण्डन किया जिन में से हर एक के हाथ में कंकरियाँ थीं, और उनके बीच में एक आदमी था जो कहता था सौ बार अल्लाहु अक्बर कहो तो वो लोग अल्लाहु -अक्बर कहते थे, फिर कहता कि सौ बार ला-इलाहा इल्लल्लाह कहो तो वो लोग सौ बार ला-इलाहा इल्लल्लाह कहते थे, वह कहता कि सौ बार सुब्हानल्लाह कहो तो वो लोग सौ बार तस्बीह पढ़ते। इस पर इब्ने मसूऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा : “उस ज़ात की कसम जिसके हाथ में मेरी जान है! तुम लोग एक ऐसी मिल्लत (रास्ते) पर हो जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मिल्लत से अधिक हिदायत वाला है, या गुमराही का द्वार खोलने वाले हो।” उन्हों ने कहा हमारा इरादा तो केवल भलाई का है, तो आप ने फरमाया: “कितने भलाई के चाहने वाले हैं जो उसे कदापि नहीं पा सकते।” (इसे दारमी और अबू नुऐम ने सहीह इसनाद के साथ रिवायत है)

और यह है उम्मत के सलफ (पूर्वज) का बिद्अत के खतरे की समझ :

चुनाँचि दारूल हिजरत (मदीना के इमाम मालिक रहिमहुल्लाह फरमाते हैं:
“जिसने इस्लाम में कोई बिद्अत ईजाद की जिसे वह अच्छा समझता है, तो उस ने यह गुमान किया कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अल्लाह का संदेश पहुँचाने में खियानत से काम लिया, क्योंकि अल्लाह तआला फरमाता है कि :
الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الإِسْلَامَ دِيناً )

“आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमतें सम्पूर्ण कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम थर्म को पसन्द कर लिया।” (सूरतुल-माईदाः3)

अतः जो चीज़ उस दिन धर्म न थी वह आज धर्म नही बन सकती।”

तथा इमाम शाफेई रहिमहुल्लाह ने फरमाया: “जिस ने (धर्म में) किसी चीज़ को अच्छा समझा, उसने शरीअत गढ़ी।”
तथा इमाम अहमद रहिमहुल्लाह ने फरमाया “हमारे निकट सुन्नत के सिद्धांत यह हैं कि अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा जिस तरीके पर थे उसको दृढ़ता से थाम लिया जाये और उनका अनुसरण किया जाये, तथा बिद्अत को छोड़ दिया जाये और हर बिद्अत गुमराही है।”

बिद्अत का खतरा :

1. बिद्अत करने वाले का अमल उसके ऊपर लौटा दिया जाये गा (यानी उसे कुबूल नहीं किया जायेगा।)
2. जब तक वह अपनी बिद्अत पर अड़ा हुआ है, उसकी तौबा कबूल नहीं होती।

3. वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हौज़ पर आने को नहीं पाये गा।
4. उसे कियामत के दिन तक उसकी बिद्अत पर अमल करने वालों का गुनाह मिले गा।

5. बिद्अती आदमी मल्ऊन (अल्लाह की दया से दूर और धिक्कारा हुआ) है।
6. बिद्अती आदमी अल्लाह से दूर ही होता रहता है।

7. बिद्अत सुन्नत को मुर्दा कर देती (मिटा देती) है।
8. बिद्अत तबाही व बर्बादी (विनाश) का कारण है।
9. बिद्अत कुफ्र की डाक (सूचक) है।
10. बिद्अत ऐसे मतभेद और इख़्तिलाफ का द्वार खोलती है जो किसी प्रमाण पर आधारित न होकर मन की इच्छाओं पर आधारित होता है।
11. बिद्अतों के मामले को महत्व न देना और उसे साधारण समझना गुनाहों, नाफरमानियों और अवज्ञा पर निष्कर्षित होता है।

बिद्अत को अच्छा ठहराने वालों के सन्देहों का खण्डनः
1. “जिस काम को मुसलमान अच्छा समझें वह अल्लाह के निकट भी अच्छा है, और जिसे मुसलमान बुरा समझें वह अल्लाह के निकट भी बुरा है।”
प्रथम : तो यह हदीस नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से शुद्ध रूप से प्रमाणित है ही नहीं, बल्कि यह अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु का कथन है। और किसी सहाबी का कथन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन का विरोधक नहीं हो सकता। और यदि इसे सहीह मान लिया जाए तो इसका मतलब यह होगा कि जिसे सभी मुसलमान अच्छा समझें वह इज्मा है, और इज्माञ् हुज्जत यानी दलील और प्रमाण है, और जो बिद्अतों को अच्छा समझता है उसके लिए इस में कोई दलील व हुज्जत नहीं है, और वह इज्माअ जो सिद्धांतिक रूप से मान्य है उस से मुराद किसी ज़माने में अल्ले-इल्म (धर्म-शास्त्रियों) का इज्माअ (सर्वसहमति) है।
और इसमें कोई सन्देह नहीं कि मुकल्लिद लोग अहले-इल्म में से नहीं हैं, और इन बिद्अतों को करने वाले अधिकतर लोग मुकुल्लिदीन में से हैं।

2. उमर रज़ियल्लाहु अन्हु का कथन “यह कितनी अच्छी बिद्अत है।”
यह कथन तरावीह की नमाज़ के बारे में है जो कि सुन्नत है, चुनांचि जब उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने इसे जमाअत के साथ पढ़ने का आदेश दिया, जबकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फर्ज़ होने के डर से एक इमाम के पीछे जमाअत के साथ पढ़ना छोड़ दिया था, तो उस समय उन्हों ने यह बात कही जिसका अरबी भाषा में यह अर्थ हुआ कि ऐसा काम जो किसी पिछले नमूना पर नहीं है, चुनाँचि वह अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़माना में नहीं थी, या उसका मतलब यह है कि उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने जब मस्जिद में चिराग (रौशनी) की व्यवस्था कर दी और लोग तरावीह की नमाज़ के लिए एकत्र हुए तो उन्हों ने अपने इस अमल को एक नया काम देखा; यानी मस्जिद में चिराग की व्यवस्था को, तो उस समय उन्हों ने फरमाया “यह कितनी अच्छी बिअत है (यानी यह नया काम कितना अच्छा है)। तथा उमर रज़ियल्लाहु अन्हु खुलफा-ए-राशिदीन में से हैं जिनके कथन से दलील पकड़ी जा सकती है जब वो कुन या हदीस की मुखालफत न करें।

3. “जिस आदमी ने इस्लाम में कोई अच्छा तरीका जारी किया, तो उसे उसका अज्र व सवाब और उसके बाद उस पर अमल करने वालों का भी अज्र व सवाब मिलेगा जबकि उनके अज्र में कोई कमी नहीं होगी…
इस हदीस के पीछे एक कहानी है, जो यह है कि मुज़र कबीले के कुछ लोग पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमम के पास आये, जो नंगे शरीर, नंगे पैर, चित्ती-दार (थारी-दार) चादर या जुब्बा पहने हुए थे, उनकी दुर्दशा को देख कर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के चेहरे का रंग बदल गया, चुनाँचि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बिलाल को हुक्म दिया तो उन्हों ने अज़ान दी और इकामत कही, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़ पढ़ाई, फिर खुत्बा दिया जिस में लोगों को सदक़ा करने पर उभारा। चुनाँचि एक आदमी एक थैली लेकर आया जिसे उसका हाथ उठाने से असमर्थ हो रहा था, और उसे लाकर रसूल सल्लल्लसहु अलैहि व सल्लम के सामने रख दिया, फिर लोग एक के बाद एक सदक़ा करने लगे यहाँ तक कि खाने और कपड़े के दो ढेर लग गए, तब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:
“जिस आदमी ने इस्लाम में कोई अच्छा तरीका जारी किया, तो उसे उसका अज्र व सवाब और उसके बाद उस पर अमल करने वालों का भी अज्र व सवाब मिले गा जबकि उनके अज्र में कोई कमी नहीं होगी…”
तो इस हदीस में सुन्नत जारी करने से मुराद यह है कि उस सहाबी ने खर्च करने की सुन्नत को बड़ी दानशीलता के साथ ज़िन्दा किया, यह अर्थ नहीं है कि उसने सदका करने की सुन्नत जारी की या ईजाद की।

4. परंपरा

यानी लोगों में कुछ बिद्अतों की परंपरा चली आ रही है, जिन से वो परिचित हैं और उन्हें बड़ी श्रद्धा और आस्था के साथ करते चले आ रहे हैं, क्योंकि ये उनकी परंपरायें हैं जिन पर उन्हों ने अपने बाप-दादा को पाया है, और ठीक यही सन्देह मुशरिकों का भी था जिसके कारण उन्हों ने हक को मानने से इन्कार कर दिया :
إِنَّا وَجَدْنَا آبَاءَنَا عَلَى أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَى آثَارِهِم مُّقْتَدُونَ ﴾ [الزخرف: ٢٣]
“हम ने अपने बाप-दादा को एक डगर पर पाया, और हम तो उन्हीं के पद चिन्हों (नक्शे कदम) की पैरवी करने वाले हैं।” (सूरतुज़-जुखरूफ : 23)

और इस्लामी दृष्टि कोण से जमाअत से मुराद बाहुल्यता नहीं है, बल्कि जमाअत से मुराद वे लोग हैं जो सुन्नत के अनुसार हों, चाहे उनकी संख्या थोड़ी ही क्यों न हो, पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
“इस्लाम की शुरूआत अजनबियत की हालत में हुई है (यानी शुरू में इसके मानने वाले थोड़े थे) और फिर निकट ही उसी अजनबियत की हालत पर लौट आये गा जैसाकि उसका आरम्भ हुआ था, तो शुभ सूचना है उन अजनबी लोगों के लिए।” पूछा गया : ऐ अल्लाह के पैग़म्बर वह कौन लोग हैं? आप ने फरमाया :
“जो लोग उस समय सुधार का काम करेंगे जब कि लोगों में बिगाड़ पैदा हो जायेगा।” (यह एक सहीह हदीस है)
तथा इब्ने मसूऊद रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं “जमाअत वह है जो हक के अनुकूल (मुताबिक) हो अगरचे तुम अकेले ही क्यों न हो।”

बिद्अतों के जन्म लेने के कारण :
1. पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पाक सुन्नत और हदीस शरीफ के नियमों से अनभिग होना, इस प्रकार कि सहीह (विशुद्ध रूप से प्रमाणित) और ज़ईफ (अशुद्ध) हदीस के बीच कोई अन्तर न करना, जिसके कारण ज़ईफ और मौजू (मनगढ़त ) त) हदीसों की भरमार हो जाती है, उदाहरण के तौर पर नूरे-मुहम्मदी की बिद्अत एक मनगढ़त हदीस (ऐ जाबिर ! सब से पहले अल्लाह ने तेरे नबी के नूर को पैदा किया) पर आधारित है, तथा मख्लूकात को मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कारण पैदा किए जाने की बिदअत का आधार एक झूठ गढ़ ली गई हदीस (अगर आप, अगर आप न होते तो मैं अफलाक को पैदा न करता) है, और इस हदीस के गढ़ने वाले से यह बात लुप्त हो गई कि अगर मख्लूक न होती तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पैग़म्बर बनाकर भेजे ही न जाते, जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है :

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ ﴾ [الأنبياء : ١٠٧].
“हम ने आप को सर्व संसार के लिए रहमत करूणा बनाकर भेजा है।” (सूरतुल अम्बियाः 107)

2. लोगों का जाहिल लोगों को अपना सरदार और अगुवा बना लेना जो उन्हें शिक्षा और फत्वा देते हैं और अल्लाह के दीन के बारे में बिना ज्ञान के अपना मुँह खोलते हैं।
3. ऐसी रीतियाँ और परंपरायें जिनका शरीअत में कोई प्रमाण नहीं, और न ही बुद्धि उन्हें स्वीकारती है, जैसेकि मीलादुन्नबी और मातम इत्यादि की बिद्अतें ।
4. अईम्मा-ए-किराम के बारे में गलतियों से मा’सूम होने का अकीदा रखना, और मशाईख को इस तरह तद्दुस (पवित्रता) का मर्तबा दे देना मानो कि वो नबियों के रूत्वे को पहुँचे हुए हैं।
5. मुताशाबेह (अस्पष्ट) आयतों और हदीसों के पीछे पड़ना और उन्हें स्पष्ट और सुदृढ़ (शंकारहित) आयतों की तरफ न लौटाना।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जयन्ती :
प्रथम घटना: इसे सर्व प्रथम चौथी शताब्दी हिजरी में फातिमी खुलफा ने काहिरा में अविष्कार किया, वो दरअसल उबैदी लोग हैं और उनका फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा से कोई संबंध नहीं है, वो लोग ज़िन्दीक (अधर्मी) हैं जो राफिज़ी होने का प्रदर्शन करते थे जबकि प्रोक्ष रूप से मात्र काफिर थे। उन्हों ने छः जयन्तियों का अविष्कार किया था, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जयन्ती, अली रज़ियल्लाहु अन्हु की जयन्ती, फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा की जयन्ती, हसन और हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा की जयन्ती, और वर्तमान खलीफा की जयन्ती। फिर अफज़ल बिन अमीरूल जैश ने इन्हें निरस्त कर दिया, लेकिन फिर आमिर बि-अहकामिल्लाह फातिमी के द्वारा 524 हिजरी में पुनः इन्हें आरम्भ कर दिया गया जबकि लोग लगभग इन्हें भुला चुके थे। तथा इरबल नामी नगर में मीलादुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सर्व प्रथम अविष्कार मलिक मुज़फ्फर अबू सईद कौकबूरी ने सातवीं शताब्दी हिजरी में किया, और आज तक उस पर अमल होता चला आ रहा है।
यह जयन्तियाँ तीन सर्वश्रेष्ठ शताब्दियों के सलफ सालेहीन के अमल से साबित नहीं है, और न ही अईम्मा-ए-अरबा (चारों सुप्रसिद्ध इमामों के अमल से ही साबित है, बल्कि इन्हें ज़िन्दीकों और जाहिलों (गंवार लोगों) ने तीन सर्व श्रेष्ठ शताब्दियों के बाद ईजाद किया है, अतः यह अल्लाह के धर्म में एक बिद्अत है। तथा आप एक मुशरिक को सदा अल्लाह सुब्हानहु व तआला को कलंकित करते हुए और एक बिद्अती आदमी को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कलंकित करते हुए पायें गे।
शैख सालेह बिन फौज़ान हफिज़हुल्लाह फरमाते हैं “लोगों ने जो घृणित बिद्अतें ईजाद कर ली हैं उन में से एक रबीउल अव्वल के महीने में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जन्म-दिवस का यादगार (स्मरणोत्सव मनाना है, और वो लोग इस उत्सव को मनाने में भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं :
उन में से कुछ ऐसे हैं जो इस दिन मात्र एकत्र होकर जन्म-कथा पढ़ते हैं, या उसमें भाषण दिये जाते और इस अवसर पर (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सराहना में ना’तें) कसीदे पेश किए जाते हैं।

– कुछ लोग खाना और हलवा वगैरह बनाकर उपस्थित लोगों को पेश करते हैं।
उन में से कुछ लोग इस उत्सव को मस्जिदों में मनाते हैं और कुछ लोग इस मजलिस को घरों में सजाते हैं।
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उपर्युक्त चीज़ों पर बस नहीं करते हैं, बल्कि उनका यह उत्सव हराम और अवैध चीज़ों पर आधारित होता है, जैसे कि मर्दों और औरतों का इख़्तिलात, नाच, गाना, या शिर्क वाले काम जैसेकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से फर्याद चाहना, आपको पुकारना, तथा आप के द्वारा दुश्मनों पर विजय मांगना वगैरह। इस में कोई सन्देह नहीं कि यह अपनी सभी किस्मों और विभिन्न रूपों, तथा इसके करने वालों के विभिन्न उद्देशों (मकासिद) के बावजूद एक हराम (अवैध) बिद्अत है जो सर्वश्रेष्ठ शताब्दियों के एक लम्बे समय बाद ईजाद की गई है।
एक मुसलमान के लिए योग्य यह है कि वह सुन्नतों को जीवित करे, बिअतों को मिटाये और किसी काम को करने लिए कदम न उठाये यहाँ तक कि उसके बारे में अल्लाह का हुक्म जान ले।
इस बिद्अत के मनाने के समर्थक ऐसे सन्देहों का सहारा लेते हैं जो मकड़ी के जाले से भी अधिक कमज़ोर हैं, इन सन्देहों को निम्न बिन्दुओं में सीमित किया (समेटा) जा सकता है :
1. उनका यह दावा करना कि इसमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान है :
इसके उत्तर में हम कहें गे कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान (ता’ज़ीम) आप की ताबेदारी, आप के आदेश का पालन और आपकी निषिध चीज़ों से बचाव करने और अल्लाह के वास्ते आप से महब्बत करने में है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान बिआत व खुराफात और ना-फरमानियों के द्वारा नहीं होता, और आपके जन्म का यादगारोत्सव मनाना इसी घृणित और अवैध प्रकार से संबंधित है; क्योंकि यह अवज्ञा (नाफरमानी) है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सब से अधिक टूट कर महब्बत करने वाले सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम हैं,
जैसाकि उऱवा बिन मस्ऊद ने कुरैश से कहा था “ऐ मेरी कौम के लोगो ! अल्लाह की कसम मैं किस्रा और कैसर (फारिस एंव रूम के बादशाह) तथा अन्य गादशाहों के दरबारों में गया हूँ, पर मैं ने किसी बादशाह को नहीं देखा कि उसके मानने वाले उसकी इस तरह ता’ज़ीम करते हों जिस तरह मुहम्मद के साथी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ता’ज़ीम करते हैं, अल्लाह की कसम उनका सम्मान करते हुए वे लोग उनकी तरफ निगाह भर कर देखते भी नहीं।” इस सम्मान के बावजूद उन्हों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस को उत्सव और त्योहार का अवसर नहीं बनाया, यदि यह वैध और नेकी का काम होता तो वे लोग इसे न छोड़ते।
2. इस बात से हुज्जत पकड़ना कि बहुत से देशों में अधिकांश लोगों का यही अमल है।
इसका उत्तर यह है कि हुज्जत और प्रमाण उस चीज़ के अन्दर है जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित है, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सामान्य रूप से बिद्अतों से मुमानियत साबित है, और यह भी उन्हीं में से एक है।
और लोगों का अमल अगर दलील के खिलाफ हो तो वह हुज्जत नहीं बन सकता, अगरचे अधिकतर लोग उसी के समर्थक हों (जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है:)
وَإِن تُطِعْ أَكْثَرَ مَن فِي الْأَرْضِ يُضِلُّوكَ عَن سَبِيلِ اللهِ ﴾ [الأنعام: ١١٦]

“और अगर आप धरती पर बसने वालों की बहुमत की बात मानें गे तो वे आप को अल्लाह के रास्ते से भटका दें गे।” (सूरतुल अन्आम : 116)
जब कि अल्लाह की तारीफ है कि हर ज़माना में ऐसे लोग निरंतर मौजूद रहे हैं जो इस बिद्अत का खण्डन करते रहे हैं और इसकी व्यर्थता को स्पष्ट करते रहे हैं, अतः हक (सत्य) स्पष्ट हो जाने के बाद जो इस बिद्अत को जीवित करने पर निरंतर अड़ा रहा उसके अमल में कोई हुज्जत नहीं।
इस अवसर का उत्सव मनाने का जिन लोगों ने खण्डन किया है उन में शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्यह अपनी किताब (इकूक्तिज़ाउस्सिरातिल मुस्तकीम) में, इमाम शातिबी (अल-ऐतिसाम) में और इब्नुल-हाज्ज (अल मख़ल) में हैं, और शैख ताजुद्दीन अली बिन उमर अल्लखमी ने इसके इन्कार में अलग से एक किताब ही लिखी है,
तथा शैख मुहम्मद बिन बशीर सहसवानी भारतीय ने अपनी किताब (सियानतुल इन्सान) में इसका खण्डन किया है, सैयद मुहम्मद रशीद रज़ा ने इस बाबत एक विशिष्ट पत्रिका लिखी है, और शैख मुहम्मद बिन इब्राहीम आलुश्शैख ने भी इसके बारे में एक विशिष्ट पत्रिका लिखी है, तथा समाहतुश्शैख इब्ने बाज़ ने भी इसका खण्डन किया है,
इनके अतिरिक्त अन्य लोग भी हैं जो हर साल इस बिद्अत के खण्डन में पत्रिकाओं और मैगज़ीनों के पन्नों में बराबर उस समय लिखते रहते हैं जिस समय इस बिद्अत को किया जाता है।
3. वो लोग कहते हैं मीलाद का समारोह करने में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के यादगार को ज़िन्दा और ताज़ा करना है।
इसके उत्तर में हम कहेंगे कि जब हम अल्लाह तआला के बताये हुए तरीके के अनुसार अज़ान व इकामत, खुत्बों, नमाज़ों, तशहुद और दरूद में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जिक्र करते हैं, और जब आप की सुन्नत (हदीसें) पढ़ते हैं और उस चीज़ की पैरवी करते हैं जिसे आप लेकर आये हैं तो इस से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की
याद ज़िन्दा और ताज़ा होती रहती है, और यह एक स्थायी अमल है जो हमेशा दिन और रात जारी रहता है, साल में केवल एक बार नहीं आता।
4. कभी-कभार वो कहते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म का स्मरणोत्सव मनाने का ईजाद एक इन्साफ पसन्द विद्वान बादशाह ने अल्लाह का तक़र्रुब हासिल करने के उद्देश्य से किया है!
इस का उत्तर यह है कि बिद्अत को किसी भी व्यक्ति से स्वीकार नहीं किया जाये गा, और मक्सद का अच्छा होना किसी बुरे काम को वैध (सत्य) नहीं ठहरा सकता, और उसके विद्वान और इन्साफ पसन्द होने का मतलब यह नहीं होता है कि वह ग़लतियों से मा’सूम (पाक व पवित्र) था।
5. उनका यह भी कहना है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्मोत्सव समारोह का मनाना एक अच्छी बिद्अत है; क्योंकि इस से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वजूद पर अल्लाह तआला का शुक्र अदा करने का प्रदर्शन होता है!
इसका उत्तर यह दिया जाये गा कि है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है: “जिसने हमारी इस शरीअत में कोई ऐसी चीज़ ईजाद की जिस का उस से कोई संबंध नही है तो वह मर्दूद (अस्वीकृत) है।” बिअतों में से कोई भी चीज़ अच्छी नहीं तथा उस से यह भी कहा जाये गा कि तुम्हारे गुमान के अनुसार इस शुक्र को अदा करने में छठी शताब्दी हिजरी तक विलम्ब क्यों हो गया, चुनाँचि सहाबा, ताबईन और उनके बाद आने वाले लोगों ने, जो कि सर्वश्रेष्ठ ज़माने के लोग हैं, इस मीलाद समारोह का आयोजन नहीं किया, जबकि वो लोग भलाई के काम पर और शुक्र की अदायगी के बड़े इच्छुक थे
और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अत्यन्त महब्बत करने वाले थे, तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि जिन्हों ने मीलाद की बिद्अत ईजाद की है ये उन (सहाबा व ताबईन) से अधिक हिदायत याफता और उनसे अधिक अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल का शुक्र अदा करने वाले थे? कभी नहीं और कदापि नहीं।
6. उनका यह कथन भी है कि मीलादुन्नबी का स्मरणोत्सव मनाना आप की महब्बत का सूचक है, इस प्रकार यह आप की महब्बत का एक प्रदर्शन है और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म की महब्बत का प्रदर्शन करना वैध (मश्रू) है।
इसके उत्तर में हम कहें गे कि इस में कोई शक नहीं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की महब्बत हर मुसलमान पर उसकी जान, बाल-बच्चों, मात-पिता और समस्त लोगों की महब्बत से कहीं बढ़कर अनिवार्य है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि हम इसमें ऐसी चीज़ गढ़ लें जो हमारे लिए वैध नहीं है, बल्कि आप की महब्बत का तकाज़ा यह है कि
आप का आज्ञा पालन और पैरवी की जाए, क्योंकि यह आप की महब्बत का सबसे महान प्रदर्शन है, जैसाकि कहा गया है:
अगर तुम्हारी महब्बत सच्ची होती, तो तुम अवश्य उनकी पैरवी करते। क्योंकि महब्बत करने वाला अपने महबूब की पैरवी करने वाला होता है।
अतः आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की महब्बत, आपकी सुन्नत को ज़िन्दा करना, उसे मज़बूती से थामे रहना, और उसके मुखालिफ सभी बातों और कामों से दूर रहना है, और इसमें कोई सन्देह नहीं कि आप की सुन्नत के खिलाफ हर चीज़ एक घृणित बिद्अत और प्रत्यक्ष अवज्ञा है, और इसी में से आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैदाइश का यादगार मनाना भी है, क्योंकि यह बिद्आत में से है।

और आदमी की नीयत का अच्छा होना दीन में बिद्अत ईजाद करने को वैध नहीं ठहरा सकता; क्योंकि दीन दो सिद्धांतों पर आधारित है इख्लिास और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी। अल्लाह तआला का फरमान है :
بَلَى مَنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَلَهُ أَجْرُهُ عِندَ رَبِّهِ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا
هُمْ يَحْزَنُونَ ﴾ [البقرة: ١١٢]

“सुनो! जिसने अपने चेहरे को अल्लाह के सामने झुका दिया (आज्ञा पालन किया) और वह नेक करने वाला (भी) है, तो उसी के लिए उसके रब के पास अज्र (पुण्य) है, और उन पर न कोई डर होगा और न वो लोग शोक ग्रस्त हों गे।” (सूरतुल बकरा :112)

चेहरे को झुकाने का मतलब अल्लाह के लिए इख़्लास अपनाना, और एहसान का मतलब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी और आपकी सुन्नत का इत्तिबा करना है।” शैख फौज़ान की बात समाप्त हुई। (अल-बयान पत्रिका)

ईद-मीलादुन्नबी कई कारणों से बातिल है :
1. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि जब आप मदीना आये और वहाँ लोगों की कई ईदें (त्योहार, उत्सव) थीं, तो उन्हें आप ने बातिल (खण्डित) घोषित कर दिया, आप ने फरमाया: “हम मुसलमानों की ईद : ईदुल-फित्र और ईदुल अज़हा है।”

2. शरीअत के नुसूस बिद्अत से रोकते हैं और उसे गुमराही (पथ भ्रष्टता) का नाम देते हैं: (और हर बिद्अत गुमराही (पथ भ्रष्टता) है)
3. और इसी कारण आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जाहिलियत (अज्ञानता काल) के लोगों की ईदों (त्योहारों) को व्यर्थ घोषित कर दिया।
4. यह इस्लाम के दुश्मन राफिज़ियों की ईजाद की हुई बिद्अत है, ये लोग अहले बिद्अत और कब्रों पर कुब्बे और मस्जिदें बनाने वाले लोग हैं।
5. सलफ सालेहीन में से किसी एक ने भी इस बिद्अत को नहीं किया है, जबकि वो लोग सबसे परिपूर्ण ईमान वाले और कुन व हदीस के नुसूस को सबसे अधिक समझने वाले थे, और कोई भी चीज़ जिसे धर्म समझ कर किया जाए और उस का ज्ञान किसी सलफ के यहाँ मौजूद न हो तो वह धर्म नहीं है, बल्कि धर्म में बिना दलील के ईजाद कर ली गई
एक बिद्अत है।
मीलादुन्नबी का समारोह करने वाले लोग :
1. एक वर्ग उन लोगों का है जिन का उद्देश्य बिद्अत फैलाना और उसके लिए अत्यन्त संघर्ष करना है, ये लोग ज्ञान वाले और नेक व परहेज़गार लोग नहीं होते हैं, बल्कि उनके बारे मे सुन्नत के अन्दर और जुमुआ व जमाअत की नमाज़ और नेकी के कामों में हाज़िर होने में कोताही करना मशहूर है, उनके अन्दर चुस्ती और फुर्ती केवल बिद्अतों के वक़्त पैदा होती है, जबकि उनके अधिकतर लोगों को पता होता है कि वह बिअत पर हैं, किन्तु वो उस पर अड़े होते हैं।

2. दूसरा वर्ग आम गंवार लोगों का है जो यह आस्था रखते हैं कि वह एक वैध इबादत और नेकी का काम है, और ऐसे लोगों के पीछे चल रहे होते हैं जो उन्हें गुमराही के गढे की तरफ हाँक कर ले जाते हैं।
3. तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो शह्वत के पुजारी हैं क्योंकि उन्हें मीलाद के समारोह में खान-पान और औरतों का इख्तिलात आदि प्राप्त हो जाता है।
शैख सालेह अल-फौज़ान हफिज़हुल्लाह फरमाते हैं सारांश यह है कि मीलादुन्नबी का स्मरणोत्सव मनाने की सभी किस्में और शक्लें एक घृणित बिद्अत हैं, मुसलमानों पर अनिवार्य है कि वो इस बिद्अत से और इसके अलावा अन्य बिद्अतों से लोगों को रोकें, और सुन्नतों को जीवित करने और उन पर दृढ़ता से जम जाने में व्यस्त हों, तथा इस बिद्अत का प्रसार व प्रचार करने और इसकी हिमायत करने वालों से थोखा न खायें; क्योंकि ये लोग सुन्नतों को जीवित करने से अधिक ध्यान बिद्अतों के जीवित करने पर देते हैं, बल्कि कभी कभार सुन्नतों पर बिल्कुल ही ध्यान नहीं देते, और जिस आदमी का यह हाल हो उसकी तक्लीद करना और उसके पीछे चलना जाईज़ नहीं है, अगरचे इस वर्ग के लोग ही अधिक संख्या में हैं, बल्कि केवल सुन्नत के मार्ग पर चलने वाले सलफ सालेहीन और उनका अनुसरण करने वालों की पैरवी की जाये गी, चाहे उनकी संख्या थोड़ी ही क्यों न हो; क्योंकि हक लोगों के द्वारा नहीं जाना जाता है बल्कि लोग हक के द्वारा पहचाने जाते हैं।
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया है :
“तुम में से जो आदमी मेरे बाद ज़िन्दा रहे गा वह बहुत अधिक इख़्तिलाफ (मतभेद) देखे गा, अतः तुम मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायत याफ्ता (पथप्रदर्शित ) खुलफा-ए-राशिदीन की सुन्नत को दृढ़ता से थाम लो और उसे दाँतों से जकड़ लो।और धर्म में नयी ईजाद कर ली गयी चीज़ों (यानी बिद्अतों) से बचो, क्योंकि हर बिद्अत गुमराही (पथभ्रष्टता) है।”
इस हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमारे लिए यह स्पष्ट कर दिया है कि हम मतभेद के समय किसकी बात मानें और परैवी करें, तथा यह भी स्पष्ट कर दिया कि सुन्नत के खिलाफ हर काम और कथन बिद्अत है और हर बिद्अत गुमराही है। (अल-बयान पत्रिका)

अल्लाह तआला सभी लोगों को उस चीज़ की तौफीक दे जिसे वह पसन्द करता और राजी होता है, अल्लाह तआला से दुआ है कि हमें, हमारे माता-पिता और सभी मुसलमानों को क्षमादान प्रदान कर दे, और अल्लाह तआला की दया एंव शांति अवतरित हो हमारे ईश्दूत मुहम्मद पर, तथा आपकी संतान और साथियों पर।

स्रोत: अब्दुल अजीज बिन सालिम अल-उमर की किताब जिसका हिन्दी अनुवाद अताउर्रहमान जियाउल्लाह साहब ने किया है।

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मसनून् अज़कार -सूबह और शाम की दुआएँ https://learnislam.net/question/zikr-for-morning-evening-hindi/ Tue, 14 Jan 2025 22:53:57 +0000 https://learnislam.net/question/%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%b8-%e0%a4%85%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%ac%e0%a4%b9-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95

ये वो दुआए है जिन्हें हमे रोज़ सुबह शाम पढ़ना चाहिए। पाबन्दी से |
सुबह यानि फ़ज् की नमाज़ के बाद और शाम यानि अस्र की नमाज़ के बाद के ज़िक्र अज़्कार क्योंकि मग़रिब बाद रात हो जाती है। और इसकी वजाहत अबू दाउद हदीस नं.3667 में है की फज्र से सूरज निकलने तक का और अस्र से गुरूब होने तक अल्लाह के ज़िक्र की फज़ीलत आयी है।

1) तीन बार सुबह और तीन बार शाम “सूरह इख़्लास”

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ
اللَّهُ الصَّمَدُ
لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ
وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम०
कुल्‌ हुवल्लाहु अहद० अल्लाहुस-समद्‌० लम्‌ यलिद्‌ व लम्‌ यूलद्‌० व लम्‌ यकुल्लहू कुफुवन्‌ अहद्‌०
तर्जुमा: (आप)कह दीजिए कि वह अल्लाह एक है। अल्लाह बे नियाज़ है। उस की न कोई औलाद है और न वह किसी
की औलाद है। और न कोई उस की बराबरी का है। (कुरआन, सूरह- 112) फ़ज़ीलत: एक तिहाई कुरआन पढ़ने के बराबर सवाब (सहीह बुखारी, हदीस- 5015)

2.)तीन बार सुबह और तीन बार शाम “सूरह फ़लक़”
1. بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ
2. مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ
3. وَمِنْ شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ
4. وَمِنْ شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ
5. وَمِنْ شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम०
1. कुल् अऊजु बिरब्बिल फलक 2. मिन् शररि मा ख़लक़ 3. वमिन् शररि ग़ासिकिन इज़ा वकब 4. वमिन् शररिन नफ़्फ़ासाति फ़िल उक़द 5. वमिन् शररि हासिदिन इज़ा हसद

तर्जुमा: (आप) कह दीजिए मैं पनाह माँगता हूँ सुबह के रब की, हर उस चीज़ की बुराई से जो उस ने पैदा की और अन्धैरे की बुराई से जब वह छा जाए। और गिरोहों पर पढ़-पढ़ कर फूँकने वालियों की बुराई से, और हसद करने वालों की बुराई से जब वह हसद करें। (कुरआन: 113) फ़ज़ीलत-अल्लाह की पनाह में आ जाते हैं, मख्लूक़ के शर, शैतान, जिन्नात, नज़रे बद, हसद, जादू, से बचाओ (तिर्मिज़ी, हदीस- 2058)

3) तीन बार सुबह और तीन बार शाम “सूरह नास”
1. بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ
2. مَلِكِ النَّاسِ
3. إِلَٰهِ النَّاسِ
4. مِنْ شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ
5. الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ
6. مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ❶ कुल अऊजु बिरब्बिन्नास ❷ मलिकिन्नास ❸ इलाहिन्नास ❹ मिन् शर्रिल् वसवा सिल् खन्नास ❺ अल्लज़ी युवस् विसु फी सुदूरिन्नास ❻ मिनल जिन्नति वन्नास

तर्जुमा: (आप) कह दीजिए मैं पनाह माँगता हूँ इन्सानों के रब की, इन्सानों के हक़ीक़ी बादशाह की, इन्सानों के मअबूद की, वस्वसे (यानि बुरे ख्याल) डालने वाले (शैतान से जो आँखों से ओझल है उसकी) बुराई (शर) से, जो लोगों के दिलों में वस्वसे
डालता है, (चाहे वह) जिन्‍मों में से हो और (चाहे) इन्सानों में से हो। (कुरआन:114) फ़ज़ीलत- वही जो सूरह फ़लक़ की है।

4) एक बार सुबह और एक बार शाम “आयतुलत्र कर्सी”
ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْحَىُّ ٱلْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُۥ سِنَةٌۭ وَلَا نَوْمٌۭ ۚ لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ مَن ذَا ٱلَّذِى يَشْفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذْنِهِۦ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَىْءٍۢ مِّنْ عِلْمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ ۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْعَظِيمُ

“अल्लाहु ला इलाहा इल्लाहू अल हय्युल क़य्यूम ला तअ’खुज़ुहू सिनतुव वला नौम् लहू मा फिस सामावाति वमा फ़िल अर्ज़ मन् ज़ल लज़ी यश फ़ऊ इन्दहू इल्ला बि इज़निह यअलमु मा बैना अयदीहिम वमा खल्फहुम वला युहीतूना बिशय इम मिन इल्मिही इल्ला बिमा शा..अ वसिअ कुरसिय्यु हुस समावति वल अर्ज़ वला यऊ दुहू हिफ्ज़ुहुमा वहुवल अलिय्युल अज़ीम”

तर्जुमा: अल्लाह (वह है कि) उसके सिवा कोई इबादत के लायक नहीं, वह हमेशा ज़िन्दा और हमेशा क़ायम रहने वाला है, उसे न ऊँघ आती है न नींद, उसी का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, कौन है जो उसके सामने बिना उसकी इजाज़त के (किसी की) सिफ़ारिश कर सके, जो कुछ लोगों के सामने है और जो कुछ पीछे हो चूका है वह सब जानता है, और लोग उसके इल्म में से किसी चीज़ पर पहुँच नहीं रखते मगर जितना वह खुद चाहे, उसकी कुर्सी छाई हुई है आसमानों और ज़मीन पर, और इनकी हिफाज़त उसके लिए कुछ भी भारी नहीं होती, और वह बड़ी अज़मत वाला (महान) है। (कुरआन 2:255)

फ़ज़ीलत: 1.जो सुबह पढ़े तो शाम तक और शाम को पढ़े तो सुबह तक शैतान से महफूज़ रहेगा। (नसाई. हदीस- 960) 2.हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद पढ़ना जन्नत में दाखिले का जरिया। (सही अलतार्गीब 1595)

5) तीन बार सुबह और तीन बार शाम
رَضِيتُ بِاللَّهِ رَبًّا وَبِالإِسْلاَمِ دِينًا وَبِمُحَمَّدٍ نَبِيًّا

“रज़ीतु बिल्‍लाहि रब्बंव्‌ वबिल्‌ इस्लामि दीनंव्‌ वबिमुहम्मदिन्‌ (सल्लललाहु अलैहि वसललम) नबिय्या०
तर्जुमाः “में राज़ी हूँ अल्लाह के रब होने पर, और इस्ल्राम के दीन होने पर, और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसलल्‍लम) के नबी होने पर।|

फ़ज़ीलत– अल्लाह कयामत के दिन राज़ी होगा। (मुसनद अहमद 3388)

6) तीन बार सुबह और तीन बार शाम
بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم

“बिस्मिल्लाहिल्लज़ी ला यजुर्रू मअ्इस्मिही शैउन्‌ फ़िल-अर्ज़ि व ला फ़िस्समाइ व हु-वस्समीअुल्-अलीम०”
तर्जुमा: उस अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ जिसके नाम की वजह से आसमान और ज़मीन में कोई चीज़ नुकसान नहीं पहुँचा सकती, और वह खूब सुनने वाला खूब जानने वाला है।

फ़ज़ीलत– पढ़ने वाले को कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकेगी। (अबू दाऊद 5088, तिरमिज़ी 3388)

7) सात बार सुबह और सात बार शाम
حَسْبِـيَ اللّهُ لا إلهَ إلاّ هُوَ عَلَـيهِ تَوَكَّـلتُ وَهُوَ رَبُّ العَرْشِ العَظـيم

“हिस्बयल्लाहु ला इला-ह इल्ला हु-व अलैहि तवक्कल्तु व हु-व रब्बुल-अर्शिल् अज़ीम०

तर्जुमा: मुझे अल्लाह ही काफी है, उसके सिवा कोई सच्चा मअबूद नहीं, उसी पर मैं ने भरोसा किया, और वह अर्श अज़ीम का रब है।”

फ़ज़ीलत– पढ़ने वाले को दुनियाबी और आख़िरत की फ़िक्रों में उसे अल्लाह काफ़ी होगा। (अबू दाऊद, हदीस- 5081)

8) तीन बार सुबह
سبحان الله وبحمده عدد خلقه، ورضا نفسه، وزنة عرشه، ومداد كلماته‏

“सुब्हानल्लाहि व बिहिम्दिही अ-द-द ख़ल्क़िही व रिज़ा नफ़्सिही, व ज़ि-न-त अर्शिही व मिदा-द कलिमातिही०

तर्जुमा: अल्लाह अपनी तअरीफ़ों समेत पाक है अपनी मख़त्ूक़ की तादाद के बराबर, अपने नफ़्स की रजामंदी के बराबर,

अपने अर्श के वज़न और अपने कलिमात की रोशनाई के बराबर। (मुस्लिम, हदीस-2726)

9) तीन बार सुबह और तीन बार शाम
أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ

“अऊज़ु बिकलिमातिल्लाहित्‌-ताम्माति मिन्‌ शर्रि मा ख़-लक़०

तर्जुमा: मैं अल्लाह के पूरे कलमात की हिफाज़त में आता हूँ उस की मख़्लूक की बुराई (शर) से। फ़ज़ीलत- जहरीले जानवर का काटना नुकसान नहीं पहुँचायेगा। (मुस्लिम, हदीस- 2709)

10) दस बार सुबह और दस बार शाम
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ ‏

” अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मदिन कमा सल्लैता अला इब्राहीम व अला आलि इब्राहीम इन्नक हमीदुम मजीद, अल्लाहुम्म बारिक अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मदिन कमा बारक्ता अला इब्राहीम व अला आलि इब्राहीम इन्नक हमीदुम मजीद।

तर्जुमा : ऐ अल्लाह ! रहमत फरमा मुहम्मद (ﷺ) पर और मुहम्मद (ﷺ) की आल (घरवालों) पर जैसा के तूने रहमत फरमाई इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर और इब्राहीम अलैहिस्सलाम की आल पर बेशक तू तारीफ के लाइक बुजुर्गीवाला है।
ऐ अल्लाह ! बरकत नाज़िल फरमा ( उतार) मुहम्मद (ﷺ) पर और मुहम्मद (ﷺ) की आल पर जैसा के तूने बरकत नाज़िल फरमाई इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर और इब्राहीम अलैहिस्सलाम की आल पर बेशक तू तारीफ के लाइक बुजुर्गीवाला है।

फ़ज़ीलत-1.क़यामत में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसलल्म की सिफारिश नसीब होगी। (सही जामेअस्सगीर, हदीस-6357)

2. एक बार दरूद शरीफ़ पढ़ने वाले पर अल्लाह दस रहमतें नाज़िल करता है, दस गुनाह माफ़ करता है, और दस दर्जे बुलंद हो जाते हैं।(नसाई, हदीस-1297) और भी बहुत सारी फ़जीलतें हैं।

11) दस बार सुबह और दस बार शाम  

لا إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ، وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهْوَ عَلَى كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ‏.‏

“ला इला-ह इल्त्ललाहु वह-दहु ला शरी-क लहू लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु व हु-व अला कुल्लि शैईन्‌ क़दीर०”

तर्जमा : अल्लाह के सिवा कोई सच्चा मअबूद नहीं, वह अकेला (यकता) है, उसका कोई शरीक नहीं, उस की बादशाहत और उसी की ही तारीफ़ है और वह हर चीज़ पर पूरी कुदरत रखता है।

फ़ज़ीलत- 1.दिन भर शैतान से हिफाज़त रहेगी। 2.दस गर्दनें आज़ाद करने के बराबर सवाब है। 3.100 नेकियाँ बेढेंगी नामे आमाल में। 4.100 गुनाह माफ़। 5.कोई शख्स इसके अमल से बेहतर अमल नहीं लायेगा अल्बत्ता वह शख्स जिसने उससे
ज्यादा अमत्र किया (बुखारी, हदसी- 6403)

12) एक बार सबह और एक बार रात
“اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي، لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَىَّ وَأَبُوءُ لَكَ بِذَنْبِي، فَاغْفِرْ لِي، فَإِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلاَّ أَنْتَ

“अल्लाहुम्म अन्-त रब्बी ला इला-ह इल्ला अन-त ख़लक़्तनी व अना अब्दु-क व अना अला अहदि-क व वअ्दि-क
मस त-तअ्तु अअुजुबि-क मिन्‌ शर्रि मा सनअतु अबूउ ल-क बिनिअ्मति-क अलयू-य व अबूउ बिज़म्बी फ़गि्फ़िर्ली फ़इन्नहू ला यग़्फिरूज़्जुनू-ब इल्ला अन्‌-त०

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! तू मेरा रब है, तेरे सिवा कोई सच्चा मअबूद नहीं, तूने मुझे पैदा किया और मैं तेरा बन्दा हूँ, और मैं अपनी ताक़त भर तेरे अहद और वादे पर क़ायम हूँ। अपनी की हुई बुराई से तेरी हिफ़ाज़त में आता हूँ। मैं अपने ऊपर तेरे इनाम का इक़रार करता हूँ और मैं अपने गुनाह का इक़रार करता हूँ, इसलियए तू मुझे माफ़ कर दे। क्योंकि तेरे सिवा कोई भी गुनाह माफ़ नहीं कर सकता। फ़ज़ीलत- शाम से पलहे मर गया तो जन्नत में जायेगा और रात में मर गया तो जन्नत में जायेगा। (बुखारी.हदीस-6306)

13) एक बार सुबह और एक बार शाम (फज्र की नमाज़ के बाद भी एक बार)
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا، وَرِزْقًا طَيِّبًا، وَعَمَلاً مُتَقَبَّلاً

“अल्लाहुम्म इन्नी असअलु-क इल्मन्‌-नाफ़िअंव्‌- व रिज़्क़न्‌ तय्यिबंव- व-अ-मल-मु-त-कब्ब्ला०
तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मांगता हूँ नफ़ा देने वाल्रा इल्‍्म, औए पाकीज़ा रिज़्क, और कबूल होने वाला अमल। (इब्ने माज़ा,हदीस-925)

14) सबह या शाम 4 बार (शाम को अस्बहत्‌ की जगह अम्सैत पढ़ें)

اللّهُـمَّ إِنِّـي أَصْبَـحْتُ أَُشْـهِدُك ، وَأُشْـهِدُ حَمَلَـةَ عَـرْشِـك ، وَمَلائِكَتِك ، وَجَمـيعَ خَلْـقِك ، أَنَّـكَ أَنْـتَ اللهُ لا إلهَ إلاّ أَنْـتَ وَحْـدَكَ لا شَريكَ لَـك ، وَأَنَّ ُ مُحَمّـداً عَبْـدُكَ وَرَسـولُـك .

“अल्लाहुम-म इन्नी अस्बहतु (अम्सैतु) उश्हिदु-क व उश्हिदु ह-म-ल-त अर्शि-क मल्राइ-क-ति-क व जमी-अ ख़ल्क़ि-क अन न-क अन्‌त अल्लाहू ला इला-ह इल्ला अन्‌-त वहद-क ला शरी-क ल-क व अन्‌-न मुहम्मदन्‌ अब्दु-क व रसूलु-क०

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! यक़ीनन मैँ ने इस हालत में सुबह (शाम) की कि तुझे गवाह बनाता हूँ और तेरा अर्श उठाने वालों और तेरे फ़रिश्तों और तेरी मख़्लूक़ को इस बात पर गवाह बनाता हूँ की तू ही अल्लाह है, तेरे सिवा कोई सच्चा मअ्बूद नहीं, तू अकेला (यकता) है, तेरा कोई शरीक नहीं। और बेशक मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसलल्‍लम) तेरे बन्दे और तेरे रसूल हैं। फ़ज़ीलतः जो एक बार पढ़ेगा अल्लाह उसके जिस्म का एक चौंथाई हिस्से को जहन्नम से आज़ाद कर देगा और जो दो बार पढेगा उसका आधा हिस्सा और जो तीन बार पढ़ेगा तीन चौंथाई और जो चार बार पढ़ेगा उसके पूरे जिस्म को अल्लाह जहन्नम से आज़ाद कर देगा। (अबू दाउद, हदीस- 4/335)

सुबह और शाम को रसूलुल्लाह सलल्लाहू अलैहि वसल्‍लम पर 10 बार दुरुद भेजने की फ़ज़ीलत

रसूलुल्लाह सलल्लाहू अलैहि वसल्‍लम ने फरमाया जो शख्स मुझ पर सुबह 10 बार और शाम को 10 बार दुरुद भेजेगा तो उसको क़यामत के दिन मेरी शफाअत हासिल होगी (सहीह अल-जामे,हदीस-6357-हसन) सही अल तरगीब व अल तरहीब, हदीस-659-हसन)

 ऐबो को छुपाने की दुआ

रसूलुल्लाह सलल्लाहू अलैहि वसल्‍लम ने सुबह और शाम को इस दुआ को पढ़ना कभी नही छोड़ा

اللَّهُمَّ اسْتُرْ عَوْرَاتِي وَآمِنْ رَوْعَاتِي

अल्लाहुम्मास्तुर औराती, वा आमीन रौआती

एह अल्लाह मेरे ऐबों को छुपा दे और मेरे दिल को मुतमईन कर दे (सुनन अबू दाऊद,जिल्द-3, हदीस- 1637-सही)

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रोज़ों के मसाईल https://learnislam.net/question/fasting-hindi/ Sat, 03 Feb 2024 18:49:41 +0000 https://learnislam.net/?question=%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%b2

रोज़ों के मसाईल

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्-स्याम(रोज़ा) अरबी में इसका शाब्दिक अर्थ है: किसी चीज़ से रूक जाना। और शरीअत के अनुसार प्रात:काल से लेकर सूर्यास्त तक अल्लाह के लिए रोज़ा की नीयत से उसको तोड़ने वाली चीज़ों से रूक जाना।

रोज़ा रखने की फज़ीलत

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया : “كل عمل ابن آدم له إلا الصيام فإنه لي وأنا أجزي به”
‘‘इब़्ने आदम का हर कार्य उसी के लिए है, सिवाय रोज़े के, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही इसका बदला दूँगा।’’ [बुखारी हदीस-1904,मुस्लिम, हदीस-1151]

अबू सईद अल-खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से मरफूअन रिवायत है कि :
“إن الله تبارك وتعالى عتقاء في كل يوم وليلة – يعني في رمضان – وإن لكل مسلم في كل يوم وليلة دعوة مستجابة“
‘‘हर दिन और रात में – यानी रमज़ान के महीने में – अल्लाह तबारका व तआला के कुछ जहन्नम से मुक्त किए हुए बंदे होते हैं,और हर मुसलमान के लिए प्रति दिन रात में एक मक़बूल (स्वीकृत) दुआ होती है।’’  [बज़्ज़ार, सहीहुत तरगीब (1/491)]

अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
“الصيام جنة فلا يرفث ولا يجهل وإن امرؤ قاتله أو شاتمه فليقل إني صائم مرتين والذي نفسي
بيده لخلوف فم الصائم أطيب عند الله تعالى من ريح المسك يترك طعامه وشرابه وشهوته من أجلي الصيام لي وأنا أجزي به والحسنة بعشر أمثالها
“
‘‘रोज़ा ढाल है, अतः वह (यानी रोज़ेदार रोज़े की हालत में) अश्लील व अशिष्ट बातें न करे और अज्ञानता और मूर्खता के काम न करे, और अगर कोई व्यक्ति उससे लड़ाई-झगड़ा करे, या उससे गाली गलूज करे, तो उसे कहना चाहिए कि : मैं रोज़े से हूँ, मैं रोज़े से हूँ। उस ज़ात की क़सम ! जिसके हाथ में मेरी जान है, रोज़ेदार के मुँह की बू अल्लाह के नज़दीक कस्तूरी की सुगंध से ज्यादा अच्छी है, वह अपना खाना, पानी और कामवासना मेरी वजह से त्याग कर देता है, रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही इसका बदला दूँगा, और नेकी उसके दस गुना के बराबर हो जाती है।’’ [बुखारी, हदीस: 1894, मुस्लिम, हदीस: 1151]

तकलीफ़ी अहकाम (शरीयत द्वारा बाध्य किए गए प्रावधानों) के पाँच प्रकार हैंः वाजिब (अनिवार्य) हराम (निषिद्ध) मुस्तहब (वांछनीय) मकरूह (घृणास्पद) और मुबाह (अनुमेय)।

ये पांचों प्रावधान रोज़े में पाए जाते हैं, हम इन प्रावधानों में से प्रत्येक के तहत आने वाले सभी प्रावधानों का उल्लेख नहीं करेंगे। केवल हम उसी का उल्लेख करेंगे जो आसान है।

पहला- अनिवार्य रोज़ा

1- रमज़ान के रोज़े।

अल्लाह तआला का फरमान है –

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمْ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ

“ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़ा रखना फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिया गया है, जैसे उन लोगों पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) किया गया जो तुमसे पहले थे, ताकि तुम मुत्तक़ी (परहेज़गार) बन जाओ।” (सूरतुल-बक़रह :183)

2- रमज़ान की क़ज़ा को रोज़े।
अल्लाह तआला का फरमान है :

وَمَنْ كَانَ مَرِيضاً أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ 

”और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे।” (सूरतुल बक़राः 185)

3- कफ़्फारे (प्रायश्चित) के रोज़े (त्रुटि से की गई हत्या का कफ़्फारा, ज़िहार (जाहिली दौर के तलाक़ की एक पकार), रमज़ान के दिन में रोज़े की हालत में संभोग करने की वजह से अनिवार्य होने वाला कफ़्फ़ारा, क़सम का कफ़्फ़ारा)।

(ज़िहार का अर्थ है पति का अपनी पत्नी से यह कहना कि तू मुझ पर मेरी माँ की पीठ के समान है। इस्लाम से पूर्व अरब समाज में यह कुरीति थी कि पति अपनी पत्नी से यह कह देता तो पत्नी को तलाक़ हो जाती थी।)
अल्लाह तआला का फरमान है:
لا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ وَلَكِنْ يُؤَاخِذُكُمْ بِمَا عَقَّدْتُمُ الأَيْمَانَ فَكَفَّارَتُهُ إِطْعَامُ عَشَرَةِ مَسَاكِينَ مِنْ
أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ أَوْ كِسْوَتُهُمْ أَوْ تَحْرِيرُ رَقَبَةٍ فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلاثَةِ أَيَّامٍ ذَلِكَ كَفَّارَةُ أَيْمَانِكُمْ إِذَا حَلَفْتُمْ وَاحْفَظُوا أَيْمَانَكُمْ كَذَلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

“अल्लाह तआला तुम्हारी लग्व कसमों पर तो तुम्हारी गिरफ्त नहीं फरमाएगा लेकिन जो क़सम तुम सच्चे दिल से खाते हो उन पर ज़रूर मुवाख़जा करेगा(अगर तुम ऐसी क़सम तोड़ दो तो) इस का कफ्फारा दस मिस्किनों का औसत दर्जे का खाना है जो तुम अपने अहल व अयाल को खिलाते है या उन का लिबास है या एक ग़ुलाम को आज़ाद करना है और जिसे मुयस्सर न हो वह तीन दिन के रोज़े रखे यह तुम्हारी क़समों का कफ्फारा है जब तुम क़सम उठा कर तोड़ दो और (बेहतर ही है कि) अपनी क़समों की हिफाज़त किया करो, अल्लाह तआला इसी तरह तुम्हारे लिए अपने अहकाम खोल कर बयान करता है ता कि तुम उसका शुक्रिया अदा करो। [सूरह मायदा, आयत-89]”

4- हज्ज तमत्तु करने वाले का रोज़ा जब वह क़ुर्बानी का जानवर न पाए, (अल्लाह तआला का फरमान हैः)

( فَمَنْ تَمَتَّعَ بِالْعُمْرَةِ إِلَى الْحَجِّ فَمَا اسْتَيْسَرَ مِنَ الْهَدْيِ فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلاثَةِ أَيَّامٍ فِي الْحَجِّ وَسَبْعَةٍ إِذَا رَجَعْتُمْ )

“फिर जो व्यक्ति हदी (क़ुर्बानी का जानवर) न पाए तो वह तीन रोज़े हज्ज के दिनों में रखे और सात रोज़े उस समय जब तुम घर लौट आओ।” (सूरतुल बक़रा : 196).

5- नज़्र (मन्नत) के रोज़े।
वैसे तो नज्र नहीं माननी चाहिए क्योंकि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस से मना फरमाया है
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
“لَا تَنْذِرُوا ، فَإِنَّ النَّذْرَ لَا يَرُدُّ شَيْئًا مِنْ الْقَدَرِ ، وَإِنَّمَا يُسْتَخْرَجُ بِهِ مِنْ الْبَخِيلِ”

“तुम नज़्र न मानो, क्योंकि नज़्र तक़दीर में से कोई चीज़ नहीं फेर सकती है, बल्कि उसके द्वारा कंजूस से निकलवाया जाता है।”
लेकिन अगर किसी ने नज्र मान ली तो उसे पूरा करना चाहिए लेकिन अगर वह नज्र शरीअत के खिलाफ हो तो पूरा नहीं करना चाहिए।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
“مَنْ نَذَرَ أَنْ يُطِيعَ اللَّهَ فَلْيُطِعْهُ ، وَمَنْ نَذَرَ أَنْ يَعْصِيَهُ فَلَا يَعْصِهِ”

“जिसने अल्लाह तआला की आज्ञाकारित की नज़्र मानी तो उसे चाहिए कि अल्लाह की आज्ञाकारिता करे, और जिसने उसकी अवज्ञा करने की नज़्रर मानी वह उसकी अवज्ञा न करे।” इसे बुखारी ने अपनी सहीह में रिवायत की है।

दूसराः मुस्तहब (वांछनीय) रोज़ेः

1- आशूरा (अर्थात् दस मुहर्रम) का रोज़ा।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
“صِيَامُ يَوْمِ عَرَفَةَ أَحْتَسِبُ عَلَى اللَّهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ وَالسَّنَةَ الَّتِي بَعْدَهُ، وَصِيَامُ يَوْمِ عَاشُورَاءَ أَحْتَسِبُ عَلَى اللَّهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ “

“अरफा के दिन के रोज़े के बारे में मुझे अल्लाह तआला से आशा है कि वह उसे उसके बाद वाले साल और उस से पहले वाले साल के गुनाहों का कफ्फारा बना देगा। तथा आशूरा के दिन के रोज़े के बारे में मुझे अल्लाह तआला से आशा है कि वह इसे उस से पहले साल के गुनाहों का कफ्फारा बना देगा (सहीह मुस्लिम हदीस संख्या: 1162)

2- अरफ़ा के दिन का रोज़ा।
जैसा कि ऊपर की हदीस में गुजर चुका है कि अल्लाह तआला अरफ़ा के दिन के रोज़े को पिछले साल और आने वाले साल के गुनाहों का कफ्फारा बना देगा।
3- प्रत्येक सप्ताह सोमवार और गुरूवार (जुमेरात) का रोज़ा।
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया
“تُعرض الأعمال يوم الإثنين والخميس ، فأحب أن يعرض عملي وأنا صائم “
“सोमवार और जुमेरात को अमाल पेश किए जाते हैं, लिहाज़ा मैं चाहता हूँ के मेरे अमाल हों तो मैं रोज़े की हालत में हूँ।”[सुनन तिर्मीज़ी, हदीस-747, शैख़ अलबानी ने सहीह अल्-तरगीब हदीस-1041 में इसे सहीह क़रार दिया है। ]
4- हर महीने में तीन दिन का रोज़ा रखना।
अब्दुल्लाह इब्न अम्रो इब्न आस रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया
“وإن بحسبك أن تصوم كل شهر ثلاثة أيام؛ فإن لك بكل حسنة عشر أمثالها فإن ذلك صيام الدهر كله”
“तेरे लिए हर माह के तीन रोज़े रखना काफी है, क्योंकि तुम्हें हर नेकी का दस गुना सवाब मिलेगा तो इस तरह यह पूरे साल के रोज़े होंगे।” [सहीह बुख़ारी हदीस-1874,सहीह मुस्लिम हदीस-1159]
अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया
“إذا صمت شيئاً من الشهر فصم ثلاث عشرة وأربع عشرة وخمس عشرة”
“अगर तुम महीने में कोई रोज़ा रखना चाहते हो तो तेरह,चौदह ,पन्द्रह कार रोज़ा रखो।” [सुनन तीर्मिज़ी हदीस-761,सुनन निसाई हदीस-2424, इमाम तीर्मिज़ी ने इस हदीस को हसन करार दिया है।]
5- शव्वाल के महीने में छह दिनों का रोज़ा रखना।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान तर्क है कि :
“مَنْ صَامَ رَمَضَانَ ثُمَّ أَتْبَعَهُ سِتًّا مِنْ شَوَّالٍ كَانَ كَصِيَامِ الدَّهْرِ”
“जिस व्यक्ति ने रमज़ान का रोज़ा रखा,फिर उसके पश्चात ही शव्वाल के महीने के छ: रोज़े रखे तो वह ज़माने भर (आजीवन) रोज़ा रखने के समान है।” (सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 1164)

6- शाबान के अक्सर दिनों का रोज़ा रखना।
” عَنْ أَبِي سَلَمَةَ قَالَ: سَأَلْتُ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا عَنْ صِيَامِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَتْ: كَانَ يَصُومُ حَتَّى نَقُولَ قَدْ صَامَ، وَيُفْطِرُ حَتَّى نَقُولَ قَدْ أَفْطَرَ، وَلَمْ أَرَهُ صَائِمًا مِنْ شَهْرٍ قَطُّ أَكْثَرَ مِنْ صِيَامِهِ مِنْ شَعْبَانَ، كَانَ يَصُومُ شَعْبَانَ كُلَّهُ، كَانَ يَصُومُ شَعْبَانَ إِلا قَلِيلا”
मुस्लिम (हदीस संख्या : 1156) ने अबू सलमा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : मैं ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रोज़े के बारे में प्रश्न किया तो उन्हों ने उत्तर दिया :
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रोज़ा रखते थे यहाँ तक कि हम कहते कि आप ने रोज़ा रखा,और आप रोज़ा तोड़ देते थे यहाँ तक कि हम कहते कि आप ने रोज़ा तोड़ दिया। तथा हमने आप को किसी महीने में शाबान के महीने से अधिक रोज़ा रखते हुए नहीं देखा। आप पूरे शाबान का रोज़ा रखते थे,आप पूरे शाबान का रोज़ा रखते थे सिवाय कुछ दिनों को छोड़कर।

7- मुहर्रम के महीने में रोज़ा रखना।
अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
“أَفْضَلُ الصِّيَامِ بَعْدَ رَمَضَانَ شَهْرُ اللَّهِ الْمُحَرَّمُ وأفضل الصلاة بعد الفريضة صلاة الليل “
“रमज़ान के महीने के बाद सबसे श्रेष्ठ रोज़े अल्लाह के महीना मुहर्रम के हैं,और फर्ज़ नमाज़ के बाद सर्वश्रेष्ठ नमाज़ रात की नमाज़ है।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या: 1163) ने रिवायत किया है।

8- एक दिन रोज़ा रखना और एक दिन रोज़ा न रखना, यह सब से श्रेष्ठ रोज़ा है।
सहीहैन में अब्दुल्लाह इब्न अम्र रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया
“إن أفضل الصيام صيام داود : كان يصوم يوماً ويفطر يوماً”
“सबसे अफज़ल रोज़े दाऊद(अलैहिस्सलाम) के रोज़े हैं,वह एक दिन रोज़ा रखते और एक दिन नहीं रखते थे।”

तीसराः मक्रूह (घृणित) रोज़ेः

1- अकेले शुक्रवार (जुमा के दिन) का रोज़ा रखना।

क्योंकि अल्लाह के पैगबंर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है किः
“لا تصوموا يوم الجمعة إلا أن تصوموا يوماً قبله أو يوماً بعده “
“अकेले शुक्रवार (जुमा के दिन) का रोज़ा न रखो सिवाय इसके कि तुम (शुक्रवार के साथ) एक दिन पहले या एक दिन बाद का भी रोज़ा रखो।” (सहीह बुखारी 1985 और सहीह मुस्लिम 1144).

2- अकेले शनिवार का रोज़ा रखनाः

क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः
“لا تَصُومُوا يَوْمَ السَّبْتِ إِلا فِيمَا افْتَرَضَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ ، فَإِنْ لَمْ يَجِدْ أَحَدُكُمْ إِلا لِحَاءَ عِنَبَةٍ أَوْ عُودَ شَجَرَةٍ”
“शनिवार का रोज़ा न रखो सिवाय उसके जो अल्लाह तआला ने तुम पर फ़र्ज किया है। अगर तुम में से किसी को अंगूर की छाल या पेड़ की ठहनी के अलावा कुछ न मिले तो वह उसी को चबा ले।”

इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 744) ने रिवायत किया है और हसन क़रार दिया है। तथा अबू दाऊद (हदीस संख्याः 2421) और इब्ने माजा (हदीस संख्याः 1726) ने रिवायत किया है और अल्लामा अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इर्वाउल गलील (हदीस संख्या : 960) में इस हदीस को सहीह करार दिया है।

इमाम तिर्मिज़ी रहिमहुल्लाह कहते हैं किः

“इसमें कराहत का अर्थ यह है कि आदमी शनिवार को रोज़ा रखने के लिए विशिष्ट कर ले, क्योंकि यहूदी शनिवार (सप्ताह के दिन) का सम्मान करते हैं।”

चैथाः हारम (निषिद्ध) रोज़ेः

1- ईदुल फ़ित्र और ईदुल अज़्हा के दिन रोज़ा रखना, इसी प्रकार तश्रीक़ के दिनों का रोज़ा रखना जो कि क़ुर्बानी के दिन (10 ज़ुल-हिज्जा) के बाद तीन दिन हैं (अर्थात 11, 12 और 13 ज़ुल-हिज्जा के दिन)।

अबू सईद अल-खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है कि उन्हों ने कहाः

‘‘नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईदुल फ़ित्र और क़ुर्बानी के दिन रोज़ा रखने से मना फरमाया है।’’ इसे बुखारी (हदीस संख्याः 1992) और मुस्लिम (हदीस संख्याः 827) ने रिवायत किया है।

अबू दाऊद (हदीस संख्या : 2418) ने उम्मे हानी के मौला (आजाद किए गए दास) अबू मुर्रह से रिवायत किया है कि वह अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा के साथ उनके पिता अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु के पास तश्रीफ लाए, तो उन्होंने उन दोनों के सामने खाना रखा और कहा कि : खाओ, तो उन्होंने कहा : मैं रोजे से हूँ। तो अम्र रजियल्लाहु अन्हु ने कहा : खाओ, क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमें इन दिनों का रोजा न रखने का आदेश देते थे, और हमें इन दिनों का रोजा रखने से मना करते थे।

इमाम मालिक कहते हैं कि : ये तश्रीक के दिन थे। अल्लामा अल्बानी ने सहीह अबू दाऊद में इस हदीस को सहीह करार दिया है।

लेकिन उस हाजी के लिए तश्रीक़ के दिनों का रोज़ा रखना जायज़ है जिस के पास क़ुर्बानी का जानवर न हो। आयशा और इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुम से वर्णित है कि उन्हों ने फरमायाः (तश्रीक़ के दिनों में रोज़ा रखने की अनुमति केवल उसी व्यक्ति के लिए है जो हदी (क़ुर्बानी) का जानवर न पाए।) इसे बुखारी (हदीस संख्यः 1998) ने रिवायत किया है।

2- संदेह के दिन का रोज़ा रखना।

इससे अभिप्राय तीस शाबान का दिन है, यदि (उन्तीस शाबान को) आकाश में कोई ऐसी चीज़ है जो चंद्रमा को देखने से रोकती है। लेकिन यदि आकाश साफ़ है, तो इसमें कोई संदेह नहीं है।
बुख़ारी (हदीस संख्या : 1914) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1082) ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
“لا تَقَدَّمُوا رَمَضَانَ بِصَوْمِ يَوْمٍ وَلا يَوْمَيْنِ إِلا رَجُلٌ كَانَ يَصُومُ صَوْمًا فَلْيَصُمْهُ “
“रमज़ान से एक या दो दिन पहले रोज़ा न रखो, सिवाय उस व्यक्ति के जो – इन दिनों में – कोई रोज़ा रखता था तो उसे चाहिए कि वह रोज़ा रखे।”

तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 686) और नसाई (हदीस संख्या : 2188) ने अम्मार बिन यासिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने फरमायाः
“مَنْ صَامَ الْيَوْمَ الَّذِي يَشُكُّ فِيهِ النَّاسُ فَقَدْ عَصَى أَبَا الْقَاسِمِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ”
”जिस किसी ने उस दिन रोज़ा रखा जिस (के रमज़ान का दिन होने) में लोगों को संदेह होता है, तो उसने अबुल-क़ासिम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अवज्ञा की।”

3- मासिक धर्म और प्रसव (निफ़ास) वाली महिला का रोज़ा रखना।

पांचवां : मुबाह (अनुमत) रोज़ाः

यह वह रोज़ा है जो उपर्युक्त चारों प्रकारों में से किसी एक के तहत नहीं आता है।

यहाँ मुबाह का मतलब यह है किः निर्धारित रूप से इस दिन का रोज़ा रखने का न तो आदेश आया है और न ही उसका रोज़ा रखने से मना किया गया है, जैसेः मंगलवार और बुधवार, हालांकि बुनियादी तौर पर नफ़ली रोज़ा रखना एक मुस्तहब इबादत है।

देखेंः “अल-मौसूअतुल फ़िक़्हिय्या” (28/10-19) और “अश-शर्हुल मुम्ते” (6/457- 483)
रोज़ा के अरकान (स्तंभ)
1. नीयत-
2. रोज़ा को तोड़ने वाली चीज़ों से रूक जाना।
फुक़हा का इस बारे में इत्तिफाक है कि रोज़ा को तोड़ने वाली चीज़ों से फज्र से मग़रिब तक रूक जाना रोज़ा के अरकान में से एक है।
रोज़ा में नीयत के प्रकार:
फर्ज़ की नीयत- 1. फर्ज़ रोज़ा की नीयत रात्रि ही में अर्थात फज्र से पहले कर लेना आवश्यक है, यदि कोई महीना के आरंभ में ही समस्त रमज़ान मास का रोज़ा रखने की नीयत कर लो तो यह भी काफी होगा, नीयत का स्थान ह्रदय है, इसलिए ज़ुबान से बोल कर इसकी नीयत करना बिदअत है।
2. नफ्ल रोज़ा की नीयत- दिन के किसी भी हिस्से में इसकी नीयत कर लेना सही है यदि उस समय तक रोज़ा तोड़ने वाला कोई कार्य नहीं किया हो तो, अलबत्ता नीयत के समय के बाद से उसको अज्र मिलेगा।
रोज़ा के प्रकार-
1. वाजिब (रमज़ान,कफ्फारा और नज़्र-मन्नत-का रोज़ा)
2. नफ्ल।
रमज़ान का रोज़ा वाजिब होने की शर्तें

अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है:

شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنْزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدىً لِلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِنَ الْهُدَى وَالْفُرْقَانِ فَمَنْ شَهِدَ مِنْكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ وَمَنْ كَانَ مَرِيضاً أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ يُرِيدُ اللَّهُ بِكُمُ الْيُسْرَ وَلا يُرِيدُ بِكُمُ الْعُسْرَ [البقرة : 185]

“ रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुर्आन उतारा गया जो लोगों के लिए मार्गदर्शक है और जिसमें मार्गदर्शन की और सत्य तथा असत्य के बीच अन्तर की निशानियाँ हैं। तुम में से जो व्यक्ति इस महीना को पाए उसे रोज़ा रखना चाहिए और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे, अल्लाह तआला तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, तुम्हारे साथ सख्ती नहीं चाहता है।” (सूरतुल बक़राः 185)

1. इस्लाम 2. अक़्ल (चेतना) 3. व्यस्क होना (बालक जब समझदार हो जाए तो उसको रोज़ा रखने के लिए प्रेरित किया जाएगा एवं उसके अभिभावक उसे रोज़ा रखने का आदेश देंगे)। 4. वतन में होना (यात्री पर रोज़ा वाज़िब नहीं है, लेकिन यदि उसे कष्ट न हो तो रोज़ा रखना ही बेहतर है- क्योंकि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ऐसा किया है, तथा इसमें अपनी ज़िम्मेवारी से भी अतिशीघ्र फरिग़ हो जाना है, मुकल्लफ (उत्तरदायी) के लिए यह सहज भी है, तथा रमज़ान महीने में रोज़ा रखने की फज़ीलत भी उसे हासिल हो जाती है)। 5. स्वस्थ होना। 6. हैज़(मासिक धर्म) तथा निफास(प्रसवोत्तर) से पाक होना।
रोज़ा के समय रोग
इसके दो प्रकार हैं
1. ऐसा रोग जिसके ठीक होने की आशा न हो, अत्याधिक बूढ़े व्यक्ति भी इसी श्रेणी में आएगा, उसके लिए रोज़ा रखना वाजिब नहीं है किन्तु प्रत्येक दिन के बदले एक फक़ीर को खाना खिलाएगा,या तो दिन की गिनती अनुसार मिस्कीन को इकट्ठा करके उनको दिन या रात का खाना दे, या प्रत्येक दिन एक मिस्कीन को खाना बाँटे, हरेक मिस्कीन को रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साअ के अनुसार एक चौथाई साअ(यदि अच्छी किस्म का गेहूँ हो तो इसका वज़न लगभग आधा किलो दस ग्राम होता है) दे, और बेहतर है कि इसके संग कुछ ऐसी चीज़ भी दे जिसका इस्तेमाल सालन की तरह होता है, जैसे मांस या तेल इत्यादि।
2. ऐसा रोग जिसके ठीक होने की आशा हो और उस समय उसके लिए रोज़ा रखना कठिन हो, इस में हैज़, निफास तथा बच्चों को दुध पिलाने वाली एवं यात्री शामिल हैं, ये लोग ठीक हो जाने के पश्चात छोड़े हुए दिन के अनुसार रोज़ा रखेंगे और यदि उससे पूर्व ही मौत हो जाए तो उनसे रोज़ा माफ हो जाएगा।
रमज़ान का महीना कैसे साबित होगा ?
यह प्रमाणित होगा:
1. चाँद देख कर 2. या शाअबान मास के तीस दिन पूर्ण होने पर।
रोज़ा को ख़राब व फासिद करने वाली चीजें
(इसमें अज्ञानी तथा भूलवश इसको करने वाले शामिल नहीं हैं)
1. जानबूझकर खाने अथवा पीने वाला, जो भूलवश ऐसा करे उसका रोज़ा सही है।
रोज़ा छोड़ने पर चेतावनी के बारे में वर्णित सहीह हदीसें में से वह हदीस है जिसे इब्ने खुजैमा (हदीस संख्या : 1986) और इब्ने हिब्बान (हदीस संख्या : 7491) ने अबू उमामा बाहिली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : मैं ने अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फरमाते हुए सुना कि :
“بينا أنا نائم إذ أتاني رجلان فأخذا بضبعيّ ( الضبع هو العضد ) فأتيا بي جبلا وعِرا ، فقالا : اصعد فقلت : إني لا أطيقه . فقالا : إنا سنسهله لك . فصعدت حتى إذا كنت في سواء الجبل إذا بأصوات شديدة ، قلت : ما هذه الأصوات ؟ قالوا : هذا عواء أهل النار . ثم انطلقا بي فإذا أنا بقوم معلقين بعراقيبهم ، مشققة أشداقهم ، تسيل أشداقهم دما، قلت : من هؤلاء ؟ قال : هؤلاء الذين يفطرون قبل تحلة صومهم”
‘‘इस बीच कि मैं सोया हुआ था मेरे पास दो आदमी आए। वे दोनों मेरा बाज़ू पकड़ कर एक दुर्लभ चढ़ाई वाले पहाड़ पर ले गए। उन दोनों ने कहा : चढ़िए। मैंने कहा : मैं इसकी ताक़त नहीं रखता। उन्हों ने कहा : हम आपके लिए उसे आसान कर देंगे। तो मैं ऊपर चढ़ गया यहाँ तक कि जब मैं पहाड़ की चोटी पर पहुँचा तो वहाँ ज़ोर की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। मैं ने कहा : ये आवाज़ें कैसी हैं? उन्हों ने कहा : यह नरक वालों के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ है। फिर वे दोनों मुझे लेकर आगे बढ़े तो मैं ने ऐसे लोगों को देखा जिन्हें उनके कूंचों से लटकाया गया था, उनके जबड़े (बाछें) चीरे हुए थे, जिनसे खून बह रहे थे। मैं ने कहा : ये कौन लोग हैं? उन्हों ने कहा : यह वे लोग हैं जो रोज़ा खोलने के समय से पहले ही रोज़ा तोड़ देते थे।’’ इसे अल्बानी ने सहीह मवारिदुज़ ज़मआन (हदीस संख्या : 1509) में सही कहा है।

अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इसपर टिप्पणी करते हुए फरमाया : ’’मैं कहता हूँ : यह उस व्यक्ति की सज़ा है जिसने रोज़ा रखा फिर जानबूझकर रोज़ा इफ्तार का समय होने से पहले रोज़ा तोड़ दिया। तो फिर उस व्यक्ति का क्या हाल होगा जो सिरे से रोज़ा ही नहीं रखता?! हम अल्लाह तआला से दुनिया व आखिरत में सुरक्षा व शांति का प्रश्नकरते हैं।’’
2. संभोग करना, यदि ऐसा रमज़ान महीने के दिन में किया हो और रोज़ा रखना उस पर वाजिब था तो उस पर मुग़ल्लज़ा कफ्फारा वाजिब है, जो इस प्रकार है- एक गुलाम आज़ाद करना, यदि इसकी शक्ति न हो तो दो महीने के लगातार रोज़े रखना,यदि इसमें भी असमर्थ हो तो साठ फक़ीर को खाना खिलाना।
3. अंतरंगता, चुम्बन अथवा आलिंगन इत्यादि के द्वारा वीर्य स्खलन।
4. ऐसी वस्तु का उपयोग जो खाने पीने के समान हो, जैसे स्वास्थ्यवर्धक सूई लगवाना, किन्तु सूई यदि स्वास्थ्यवर्धक न हो तो रोज़ा नहीं टूटेगा।
5. हिज़ामा के द्वारा रक्त निकलवाना, किन्तु यदि थोड़ा सा ख़ून जाँच इत्यादि के लिए निकलवाया जाए तो रोज़ा नहीं टूटेगा
6. जानबूझकर उल्टी करना
7. हैज़ अथवा निफास का ख़ून निकलना
रोज़ा में मुस्तहब (प्रिय, उचित) कार्य-
1. सेहरी खाना
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
“تسحروا فإن في السحور بركة”
‘‘सेहरी करो क्योंकि सेहरी में बरकत है।’’ इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1923) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1095) ने रिवायत किया है।

2. सेहरी खाने में देर करना ।
सेहरी में विलंब करना सुन्नत है, क्योंकि बुखारी ने अनस से, उन्हों ने ज़ैद बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हुम से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा :
“تسحرنا مع النبي – صلى الله عليه وسلم – ثم قام إلى الصلاة قلت: كم كان بين الأذان والسحور قال قدر خمسين آية”
‘‘हम ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ सेहरी की फिर आप नमाज़ के लिए खड़े हुए, मैं ने कहा: अज़ान और सेहरी के बीच कितना अंतर था ॽ उन्हों ने कहा : पचास आयत पढ़ने के बराबर।” इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1921) ने रिवायत किया है।

3. इफ्तार में जल्दी करना।
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
“لا يزال الناس بخير ما عجلوا الفطر”
‘‘लोग निरंतर भलाई में रहेंगे जबतक इफ्तार करने में जल्दी करते रहेंगे।’’ इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1957) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1098) ने रिवायत किया है,
4. रूतब (डम्हा खजूर) से इफ़्तार करना, यदि यह मयस्सर न हो तो (पका) खजूर से, यदि यह भी न हो पानी के कुछ घोंट से और यदि कुछ भी न हो तो दिल में इफ़्तार की नीयत कर ले।
मसनून तरीक़ा यह है कि रूतब (पके हुए ताज़ा खजूर) पर रोज़ा इफ्तार किया जाए, यदि वह न मिले तो (सूखे) खजूर पर यदि वह भी न मिले तो पानी पर, क्योंकि अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है कि उन्हों ने कहा :
“كان رسول الله – صلى الله عليه وسلم – يفطر على رطبات قبل أن يصلي، فإن لم يكن فعلى تمرات، فإن لم تكن حسا حسوات من ماء”
‘‘अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ पढ़ने से पहले कुछ रूतब पर इफ्तार करते थे, यदि वह न होती थीं तो चंद खजूरों पर, यदि वह भी उपलब्ध ने होती तो चंद घूँट पानी पी लेते थे।’’
इसे अबू दाऊद (हदीस संख्या : 2356), तिर्मिज़ी (हदीस संख्या :696) ने रिवायत किया है, और अल्बानी ने इर्वाउल-गलील (4/45) में इसे हसन कहा है।

5. इफ़्तार के समय तथा रोज़े की हालत में दुआ करना।
रोज़ा इफ्तार करते समय वर्णित दुआ पढ़ना सुन्नत है, और जो दुआ वर्णित है वह बिस्मिल्लाह कहना है, और शुद्ध मत के अनुसार वह वाजिब है, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसका आदेश दिया है, तथा ‘‘अल्लाहुम्मा लका सुम्तो व अला रिज़क़िका अफ्तरतो, अल्लाहुम्मा तक़ब्बल मिन्नी इन्नका अंतस्समीउल अलीम’’ वर्णित है,
लेकिन वह ज़ईफ (कमज़ोर) है जैसाकि इब्नुल क़ैयिम ने ज़ादुल मआद (2/51) में कहा है, तथा ‘‘ज़हा-बज़्ज़मा-ओ वब्ब-तल्लतिल उरूक़ो व सबा-तल अज्रो इन-शा-अल्लाह’’ वर्णित है, इसे अबू दाऊद (हदीस संख्या : 2357)और बैहक़ी (4/239) ने रिवायत किया है और अल्बानी ने इर्वाउल गलील (4/39) में हसन कहा है।

रोज़ेदार के लिए सुन्नत यह है कि जब वह इफ़्तार करे तो यह दुआ पढ़े :

” ذهب الظمأ ، وابتلت العروق ، وثبت الأجر إن شاء الله “

”ज़हा-बज़्ज़मा-ओ वब्ब-तल्लतिल उरूक़ो व सबा-तल अज्रो इन-शा-अल्लाह” (अर्थात् प्यास चली गई, रगें तर हो गईं और अज्र व सवाब पक्का होगया यदि अल्लाह ने चाहा)

रोज़ेदार के लिए अधिक से अधिक दुआएँ करना मुस्तहब व पसंदीदा है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहुअलैहि व सल्लम ने फरमाया :
“ثَلَاثَةٌ لَا تُرَدُّ دَعْوَتُهُمْ : الْإِمَامُ الْعَادِلُ ، وَالصَّائِمُ حَتَّى يُفْطِرَ، وَدَعْوَةُ الْمَظْلُومِ”

“तीन लोगों की दुआयेंअस्वीकार नहीं की जाती हैं : न्याय प्रिय इमाम, रोज़ेदार यहाँ तक कि वह रोज़ा खोल दे, और मज़लूम (अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति) की दुआ।” इसे अहमद (हदीस संख्या : 8043) ने रिवायत किया है और मुस्नद इमाम अहमद के अन्वेषकों ने उसकी विभन्न सनदों और शवाहिद के आधार पर इसे सहीह कहा है।

1- अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “तीन दुआयें अस्वीकार नहीं की जाती हैं : पिता की दुआ, रोज़ेदार की दुआ और मुसाफिर की दुआ।” इसे बैहक़ी (3/345) ने रिवायत किया है और अल्बानी ने सिलसिला सहीहा (हदीस संख्या : 1797) में सहीह कहा है।

इमाम नववी रहिमहुल्लाह कहते हैं:

”रोज़ेदार के लिए मुस्तहब है कि वह अपने रोज़े की हालत में दुनिया व आखिरत के महत्वपूर्ण और आवश्यक चीज़ों की अपने लिए, अपने चहेतों के लिए और मुसलमानों के लिए दुआ करे।” ”अल-मजमूअ” (6/375) से अंत हुआ।
6. अधिकाधिक सदक़ा व ख़ैरात (दान-पुण्य) करना।
बुखारी (हदीस संख्या : 6) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2308) ने इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा :
“كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَجْوَدَ النَّاسِ ، وَكَانَ أَجْوَدُ مَا يَكُونُ فِي رَمَضَانَ حِينَ يَلْقَاهُ جِبْرِيلُ ، وَكَانَ يَلْقَاهُ فِي كُلِّ لَيْلَةٍ مِنْ رَمَضَانَ فَيُدَارِسُهُ القُرْآنَ ، فَلَرَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَجْوَدُ بِالخَيْرِ مِنَ الرِّيحِ المُرْسَلَةِ “
”नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों में सबसे अधिक दानशील थे। और आप सबसे अधिक दानशील रमज़ान में होते थे जिस समय आप जिब्रील अलैहिस्सलाम से मिलते थे। और आप जिब्रील अलैहिस्सलाम से रमज़ान की हर रात में मिलते थे तो वह आपको क़ुरआन पढ़ाते थे। तो उस समय आप तेज़ हवा से भी अधिक भलाई के कामों में दानशीलता का प्रदर्शन करने वाले होते थे।”

7. रात्री की नमाज़ (तरावीह) पढ़ने का प्रयास करना।
8. क़ुरान की तिलावत(पाठ) करना।
9. उमरा करना
10. यदि कोई उसको गाली दे तो पलट कर गाली देने के स्थान पर कहना कि “मैं रोज़ेदार हूँ”।
11. लैलतुल क़द्र(क़द्र-मान-वाली रात्री) को खोजना।
12. अन्तिम दहाई(दस दिनों) में ऐतकाफ करना।

रोज़ा में मकरूह कार्य
1. कुल्ली करने तथा नाक में पानी डालने में मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) करना
2. बिना किसी आवश्यकता के खाना चखना।

रोज़ा में जायज़ कार्य
रोज़ेदार के लिए थूक निगलना, आवश्यकता के समय खाना चखना, रोज़ेदार के लिए थूक निगलना, आवश्यकता के समय खाना चखना, ग़ुस्ल करना, मिस्वाक करना, इत्र लगाना तथा ठंडक हासिल करना जायज़ है।
रोज़ा में हराम (निषिद्ध) कार्य-
1. कफ निगलना रोज़ेदार के लिए हराम है, लेकिन इससे रोज़ा नहीं टूटेगा।
2. जिसका स्वयं पर नियंत्रण न हो उसके लिए पत्नि का चुम्बन लेना।
3. ज़ूर बोलना (यह प्रत्येक ह़राम कार्य करने को कहते हैं)
4. जिहालत भरे कार्य करना (अर्थात बेवक़ूफी करना, तथा संयम से काम न लेना)।
5. मुसलसल रोज़े रखना (यानि दो दिन तक लगातार बिना इफ़्तार किए रोज़ा रखना)।

नफ्ल रोज़ा-
1. जिसने रमज़ान के रोज़े रखे हों उसका शव्वाल के छ: रोज़े रखना, और बेहतर यह है कि दूसरे दिन से लगातार छ: रोज़ा रख ले।
2. हाजियों को छोड़कर दूसरे लोगों का अरफा के दिन रोज़ा रखना।
3. आशूरा (दस मुहर्रम) को नौंवी और ग्यारहवीं मिलाकर रोज़ा रखना।
4. सोमवार तथा जुमेरात को रोज़ा रखना, सोमवार की ताकीद ज़्यादा है।
5. प्रत्येक महीना में तीन दिन रोज़ा रखना, और बेहतर यह है कि प्रत्येक हिजरी महीना के 13,14, तथा 15 तारीख़ (अय्याम-ए-बीज़) को रोज़ा रखे।
6. एक दिन बीच करके रोज़ा रखना।
7. अल्लाह के महिना मुहर्रम में (अधिकाधिक) रोज़ा रखना।
8. 9 ज़िल्हिज्जा को रोज़ा रखना।
9. शाअबान में रोज़ा रखना किन्तु पूरे महीना का न रखे।
मकरूह रोज़े
जुमा(शुक्रवार), सनीचर(शनिवार) और इतवार के दिन विशेष करके रोज़ा रखना, लेकिन यदि किसी कारणवश इस दिन रोज़ा रखे जैसे इस दिन अरफा आ जाए, तो कोई ह़र्ज नहीं।
ह़राम रोज़े-
1. विशेषत: रजब के रोज़े रखना
2. शक के दिन रोज़ा रखना, किन्तु यदि किसी की आदत हो कि व उस दिन रोज़ा रखता हो तो कोई बात नहीं।
3. ईद व बकरीद के दिन रोज़ा रखना।
4. तशरीक़ के दिनों में रोज़ा रखना, सिवाय उस ह़ाजी के जिसके पास कुर्बानी का पशु (जानवर) न हो।
5. सालोंसाल तक लगातार रोज़ा रखते जाना।

और अल्लाह तआला ही बेहतर इल्म रखने वाला है।

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नियत के मसाईल https://learnislam.net/question/intension-for-deeds-hindi/ Wed, 24 Jan 2024 21:10:42 +0000 https://learnislam.net/?question=%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%b2

नियत के मसाईल
सब तारीफें अल्लाह तआला के लिए ही हैं।

नमाज़ सहीह होने के लिए नियत शर्त है, और नियत ज़रूर होनी चाहिए,शरीअत् में इसका मतलब यह है कि : “अल्लाह तआला की नज़दीकी हासिल करने के लिए इबादत करने का इरादा करना”

नियत नमाज़ शुरू करने से पहले करनी चाहिए।

नियत के दो हिस्से हैं, पहला ये कि काम किस के लिए करना है ?और दूसरा हिस्सा ये कि कौन सा काम करना है ? पहले का जवाब यह है कि नमाज़ ख़ालिस अल्लाह के लिए है, इसी को इख़लास कहते हैं। दूसरे का जवाब यह है कि फलां नमाज़ पढ़ने लगा हूँ, मसलन् फज्र या ज़ुहर या कोई दूसरी फर्ज़ या नफल, इतनी रकअते हैं, अदा है या कज़ा, ये पूरी तफसील ज़हन में होनी चाहिए। [अल्-काफी इब्न क़ुदामाह रहिमहुल्लाह, 1/275,276]

याद रखें कि इस नियत का महल और जगह दिल है, सिर्फ बन्दे का अपने दिल के साथ इस अमल का अज़्म और इरादा करना ही नियत है, इसलिए शरीअत नें अमल के इरादे के वक़्त नियत को ज़बान के साथ अदा करने को मशरूअ् नहीं किया, बल्कि नियत की ज़बान के साथ अदायगी उन इजाद करदह् बिदआत् में से हैं जो किताबुल्लाह और सुन्नत नबवी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) में साबित नहीं, और न ही सहाबा किराम (रिज़वानुल्लाहि अलैहिम अजमअीन) में से किसी एक सहाबी से मनक़ूल है।[शरह मुमतअ् 2/283 ]

नमाज़ से पहले दिल में नियत करना लाज़मी है वरना नमाज़ नहीं होगी।

عن أمير المؤمنين أبي حفص عمر بن الخطاب رضي الله تعالى عنه قال: سمعت رسول الله صلى الله تعالى عليه وعلى آله وسلم يقول: “إنما الأعمال بالنيات ، وإنما لكل امرئ ما نوى، فمن كانت هجرته إلى الله ورسوله فهجرته إلى الله ورسوله، ومن كانت هجرته لدنيا يصيبها أو امرأة ينكحها فهجرته إلى ما هاجر إليه”

हजरत उमर बिन् अल्-खत्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के फरमाते हुए सुना है कि “अ’माल(कर्मों) का दारोमदार नियत पर है, हर शख़्स को वही मिलेगा जिस की उस ने नियत की, लिहाज़ा जिसने दुनिया हासिल करने की नियत से हिजरत किया उसे दुनिया मिलेगी या जिस ने किसी औरत से निकाह करने की ग़रज़ से हिजरत किया तो उसे औरत ही मिलेगी पस मुहाजिर की हिजरत का सिला वही है जिसके लिए उसने हिजरत की ।” [सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम]

नियत का मतलब इरादा है और इरादा करना दिल का काम है, ज़बान से नियत के अल्फाज़ कहना न रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से साबित है और न किसी सहाबी से , यहाँ तक कि किसी ताबई और इमाम ने इसे पसन्द नहीं किया।

इमाम इबने तैमिय्या (रहिमहुल्लाह) फरमाते हैं कि “अगर कोई इन्सान सैय्यदिना नूह (अलैहिस्सलाम) की उम्र के बराबर तलाश करता रहे कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और सहाबा किराम (रिज़वानुल्लाहि अलैहिम) में से किसी ने ज़बान से नियत की हो तो वह हरगिज़ कामयाब नहीं होगा,सिवाए सफेद झूठ बोलने के,अगर इसमें कोई भलाई होती तो सहाबा किराम सब से पहले करते और हमें बता कर जाते।“[इगासतुलल् हिफान,फसल अव्वल फी नियत फी तहारत व सलात, 156,नस्खा उख़रा 1/138]

लिहाज़ा साबित हुआ कि नियत दिल से करनी चाहिए, ज़बान से अल्फाज़ कहना रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और सहाबा किराम (रिज़वानुल्लाहि अलैहिम) से साबित नहीं है और यह अमल बे-असल और बिद्अत है और इस से परहेज़ लाज़मी है।
ज़बान से नियत करने के बारे मे शैख़ इब्न तैमिय्या (रहिमहुल्लाह) से सवाल किया गया तो उन्होंने फरमाया :
“तहारत यानि ग़ुस्ल या वुज़ू या तय्यमुम और नमाज़ रोज़ा और ज़कात और कफारात वग़ैरह दूसरी इबादात में बिल्इत्तफाक़ इन्सान ज़बान से नियत करने का मुहताज नहीं, बल्कि नियत दिल से होती है, इस पर सब आइमा का इत्तफाक़ है, इसलिए अगर इस ने अपनी ज़बान से दिल के मुख़ालिफ अल्फाज़ निकाले तो ऐतबार दिल का होगा न कि जो इस ने ज़बान से अल्फाज़ निकाले हैं।”
इस में दो राय पायी जाती हैं: –

पहला- असहाब अबू हनीफा और शाफअी और अहमद ज़बान से नियत के अल्फाज़ अदा करने को मुस्तहब कहते हैं क्योंकि यह ज़्यादा ताकीदी है।

दूसरा- असहाब मालिक और अहमद वगैरह कहते हैं ज़बान से नियत के अल्फाज़ अदा करना मुस्तहब नहीं, क्योंकि ये बिदअत है, इस लिए कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) इस का सबूत नहीं मिलता, और न ही सहाबा किराम से ऐसा करना साबित है, और न ही नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी उम्मत में से किसी को ज़बान से नीयत के अल्फाज़ अदा करने का हुक्म दिया है, और न किसी मुसलमान को इस की तअ्लीम दी ।
अगर यह शरीअत् में होता तो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस में सुस्ती न करते, और ना ही सहाबा किराम इसे नज़र अन्दाज़ करते, जबकि उम्मत को इसकी हर दिन सुबह व शाम ज़रूरत थी।
यह दूसरी राय ज़्यादा सहीह है, बल्कि ज़बान से नियत की अदायगी तो अक़ली और दीनी दोनों तरह से नुक्स मालूम होता है, दीनी नुक्स इसलिए कि यह बिदअत है। और अक़ली नुक़्स इस तरह कि यह बिल्कुल खाना खाने की जगह है जैसे कोई खाना चाहे तो कहे:
मैं बरतन में हाँथ डालने और उस से लुक़्मा लेने की नियत करता हूँ और वह लुक़मा अपने मूँह में डाल कर चबाऊँगा, फिर इसे निगल लूँगा ता कि पेट भर सकूँ, अगर कोई ऐसा करे तो ये हिमाक़त और जहालत है।

और अल्लाह ही बेहतर इल्म रखने वाला है

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सज्दा-ए-सह्व का तरीक़ा किताब व सुन्नत की रौशनी में https://learnislam.net/question/prostration-of-forgetfulness-hindi/ Fri, 16 Jun 2023 21:47:46 +0000 https://learnislam.net/?question=%e0%a4%b8%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%8f-%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4

सज्दा-ए-सह्व का तरीक़ा

सब तारीफें अल्लाह तआला के लिए ही हैं
सह्व का मतलब है “भूल जाना,ग़ाफिल हो जाना, दिल का दूसरी तरफ केन्द्रित होना”
सज्दा सह्व असल में सूजूद अल्-सह्व है जिसका मतलब है नमाज़ में कोई भूल हो जाने पर दो सज्दे ज्यादा करना। उर्दू-हिन्दी की आम ज़बान में इसे सज्दा-ए-सह्व कहा जाता है। सज्दा ए सह्व अल्लाह तआला की मुसलमानों पर मेहरबानी,नरमी और आसानी का नमूना है। अगर नमाज़ में किसी कमी या ज्यादती या भूल चूक की वजह से पूरी नमाज़ ही बातिल (निष्कासित) क़रार दी जाती तो फिर से शूरू से नई नमाज़ पढ़ना पड़ता।

नमाज़ में तीन किस्म के कार्य शामिल हैं।
1. बहूत ज़रूरी : जिन के बग़ैर नमाज़ अदा ही नहीं होती मिसाल के तौर पर सूरह फातिहा।
2. जरूरी: जिन के रह जाने से सज्दा सह्व करना पड़ता है, अगर न करें तो नमाज़ पूरी नहीं होगी।
3. वह जिनके रह जाने पर सज्दा सह्व नहीं करना पड़ता है।

सज्दा सह्व वाज़िब है या सुन्नत:
कुछ फुक़हा ने इन सज्दों को वाज़िब और कुछ ने सुन्नत कहा है।
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने नमाज़ में भूल चूक का शिकार हो जाने वाले नमाज़ी को हुक्म दिया कि “वह दो सज्दे कर ले” [सहीह बुखारी, 401]
इसलिए ये सज्दे वाज़िब हों या सुन्नत ! नमाज़ की कमी दूर करने के लिए ये सज्दे करने ही चाहिए।
बहुत से लोग नमाज़ में बहुत बार भूल जाते हैं या उन्हें वसवसा आता रहता है कि मालुम नहीं फलां रूक्न अदा किया कि नहीं? या फलां दुआ या तस्बीह कितनी बार पढ़ी ? याद रहे कि हर ख़्याल या वसवसा ऐसा नहीं कि उसे सज्दा सह्व अदा करने की वजह समझ लिया जाए।
शैख़ मुहम्मद बिन् सालेह अल्- उसैमिन् (रहिमहुल्लाह) फरमाते हैं कि तीन हालात में शक़ को कोई अहमियत् न दी जाए :
1. अगर नमाज़ के बीच वहम पैदा हो जिस की कोई बुनियाद नहीं होती जैसा कि वसवसा वगैरह आता है।
2. जब नमाज़ी को बकसरत वहम मैं पड़ जाने की बीमारी हो कि जब भी नमाज़ के लिए खड़ा हो तो वहम का शिकार हो जाए।
3. नमाज़ से फराग़त के बाद शक़ पड़ जाए तो उस की तरफ कोई तवज्जो न दी जाए। [अज़्-फतावा, अस्हाब अल्-हदीस, सफा-120]
इन तीन हालात के अलावा अगर शक़ पड़ जाए तो वह क़ाबिले ऐतबार होगा।
सज्दा-ए-सह्व करने का तरीक़ा:
पहला तरीक़ा:
1. नमाज़ पूरी कर के सलाम फेरने से पहले या सलाम फेरने के बाद अल्लाहु अकबर कह कर सज्दे में जाएँ।
2. सज्दे में सज़्दे वाली दुआएं और तस्बीहात में से जो भी पढ़ लें दुरूस्त है।
3.फिर अल्लाहु अकबर कह कर जलसा-ए-इस्तराहत करें
4. फिर अल्लाहु अकबर कह कर सज्दे में जाएं और सज्दे की तस्बीहात पढ़ें।
5. अल्लाहु अकबर कह कर सज्दे से सर उठा कर कादे कि शक़ल में बैठ जाएँ।
6.दाएँ और बाएँ सलाम फेर दें।

सज्दा-ए-सहु का तरीक़ा सहीह बूख़ारी की रिवायत किताबुस्सलात, 482 और मुस्लिम हदीस-573 में ज़ूल यदैन् की हदीस में बयान किया गया है।
दूसरा तरीक़ा :
कुछ ज़ईफ हदीसों से ये तरीक़ा भी मिलता है:
1. नमाज़ के आख़िर में सलाम फेरने से पहले उसी तरह दो सज्दे कर ले जिस तरह ऊपर बयान किया गया है।
2. उन दो सज्दों के बाद कादे में बैठ कर तशह्हुद पढ़ कर दुआएं पढ़ें और सलाम फेरें। अबू दाऊद-1039,तिर्मिज़ी-393,इर्वा अल्-ग़लील-403 वग़ैरह में ये तरीक़ा बयान किया गया है लेकिन इस तरीक़े को बयान करने वाली तमाम अहादीस ज़ईफ हैं।

इब्न सीरीन रहिमहुल्लाह से पूछा गया:“क्या सह्व के सज्दे के बाद तशह्हुद है ?” उन्होंने जवाब दिया: “अबू हूरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से मर्वी हदीस में तशह्हुद का ज़िक्र नहीं है।” [सहीह बुखारी, हदीस-1228]

निष्कर्ष :
सज्द-ए-सह्व के बाद सलाम फेर लेना ही अफज़ल है क्योंकि ये तरीक़ा सहीह अहादीस से साबित है।
सज्द-ए-सह्व के बाद तशह्हुद पढ़ कर सलाम फेरने से भी सज्द-ए-सह्व हो जाता है हालांकि ये तरीक़ा ज़ईफ अहादीस से लिया गया है। [देखिए अल्-दुरर अल्-बहिय्या अज़ इमाम शौकानी, तहक़ीक़ व इफादात अज़ अल्लामा अलबानी]

सज्दा-ए-सह्व का ग़लत तरीक़ा :
तशह्हुद, दरूद और दुआ के बाद सिर्फ एक ही तरफ सलाम फेर कर सज्द-ए-सह्व करना साबित नहीं, सूनन तिर्मिज़ी की हदीस -395 से इसकी दलील दिया जाता है लेकिन यह हदीस शाज़ है। [तहक़ीक़ अल्लामा अलबानी,देखिए फिक़्ह अल्-हदीस, तशरीह अल्-दुरर अल्-बहिय्या अज़-इमाम शौकानी]

सज्दा-ए-सह्व कब करना चाहिए ?
मुहद्दिसीन और फूक़हा की इस बारे में मुख़्तलीफ राय है जो मन्दरजा ज़ेल हैं:
सलाम के बाद सज्दा-ए-सह्व किया जाए, यह इमाम नख़अी, इमाम सौरी,इमाम हसन और उमर बिन् अब्दुल अज़ीज़ की राय है।
सलाम से पहले किया जाए, यह इमाम मकहुल, इमाम ज़ुहरी, इमाम औज़ाअी,इमाम शाफअी और इमाम लैस की राय है।
नमाज़ में ज़यादती की सूरत में सलाम के बाद और कमी की सूरत में सलाम से पहले किए जाएँ, यह इमाम मालिक बिन् अनस,इमाम अबू सौर, इमाम मुज़नी की राय है। इमाम अहमद की राय यह है कि सज्दा-ए-सह्व के बारे में जो कुछ अहादीस में है उसी तरह किया जाए।

निष्कर्ष :
सलाम से पहले और सलाम फेरने के बाद दोनों तरह जायज़ है।
चाहे सलाम फेरने के बाद बाते भी कर चुके हैं तो भी सज्दा-ए-सह्व कर लिया जाए।
चाहे नमाज़ की जगह से उठ कर किसी दूसरी जगह पर भी जा चूके हैं तो भी सज्दा-ए-सह्व कर लिया जाए।
याद आने पर या किसी के बताने पर सज्दा-ए-सह्व कर लिया जाए।

ज़्यादा रक्अतें पढ़ जाने पर :
अब्दुल्लाह बिन् मसअूद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जुहर की नमाज़ पाँच रकअ्त पढ़ाया तो आप से कहा गया : “क्या नमाज़ में इज़ाफा(बढ़ोतरी) कर दिया गया है?” आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : “वह क्या ?” सहाबा ने कहा: “आप(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पाँच रक़अ्त नमाज़ पढ़ी है” तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सलाम के बाद दो सह्व के सज्दे किए। [सहीह बुखारी 1226,मुस्लिम 572]

एक रिवायत में है कि (सहाबा के ध्यान दिलाने पर)…. आप(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) क़िब्ला की तरफ हुए और दो सज्दे किए, फिर सलाम फेरा और हमारी तरफ हो कर फरमाया : “मैं भी तुम्हारी तरह इन्सान हूँ और मैं भी भूलता हूँ जैसे
तुम भूलते हो, इसलिए जब मैं भूल जाया करूँ तो मूझे याद दिला दिया करो।” [सहीह बुख़ारी 401,मुस्लिम 572]

निष्कर्ष :
अगर कोई चार रक्अत नमाज़ की बजाए पाँच रक्अत पढ़ ले तो वह सज्दा-ए-सह्व करे।
इमाम अबू हनीफा और इमाम सौरी की राय के मुताबिक़ अगर चौथी रक्अत में तशह्हुद नहीं बैठा और पाँचवी रक्अत के लिए खड़ा हो गया तो उस की नमाज़ फासिद हो जाएगी।
जबकि दूसरे तमाम फुक़हा की राय यह है कि नमाज़ फासिद नहीं होगी, वह पाँचवी रक्अत पढ़ कर सज्दा-ए-सह्व कर ले।
इमाम अबू हनीफा कहते हैं कि अगर चौथी रक्अत भी मुकम्मल कर ले इस तरह ये चार रक्अत फर्ज़ और दो रक्अत नफ्ल हो जाएँगी।

अगर पहले तशह्हुद में बैठना याद न रहे :
मुग़ीरा बिन् शअ्बा रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : जब कोई आदमी दो रक्अतों के बाद (तशह्हुद पढ़े बग़ैर) खड़ा होने लगे और अभी पूरी तरह खड़ा नहीं हुआ हो तो बैठ जाए,लेकिन अगर पूरी तरह खड़ा हो गया तो फिर न बैठे और सलाम फेरने से पहले सह्व के दो सज्दे कर ले। [अबू दाऊद, 1036]

अब्दुल्लाह बिन् बहीना रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा किराम को ज़ूहर की नमाज़ पढ़ायी, और पहली दो रक्अतें पढ़ कर खड़े हो गए,(कअ्दे में) सहुअन् न बैठे, लोग रसूलुल्लाह
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ खड़े हो गए और (आख़िरी कअ्दे में सलाम फेरने का वक़्त आया) तो लोग सलाम फेरने का इन्तिज़ार करने लगे, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तक़बीर कही जब कि आप बैठे हुए थे। आप
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सलाम फेरने से पहले दो सज्दे किए फिर सलाम फेरा। [बुख़ारी, 829,मुस्लिम-570]

निष्कर्ष :
अगर दो रक्अत नमाज़ के आख़िरी तशह्हुद में बैठना याद न रहे और खड़ा हो जाए तो अगर अभी पूरा खड़ा नहीं हुआ तो बैठ जाए और नमाज़ मुकम्मल कर के सलाम फेर ले, इस सूरत में सज्दा सह्व नहीं है।
अगर तशह्हुद में बैठने की बजाए पूरा खड़ा हो गया तो अब ये तिसरी रक्अत पूरी करने के बाद तशह्हुद बैठ कर सलाम फेरने से पहले सह्वके दो सज्दे कर ले।
तीन या चार रक्अत के पहले तशह्हुद में बैठना याद न रहे तो अगर पूरा उठने से पहले याद आ गया तो वह दोबारा बैठ जाए और तशह्हुद कर ले, अगर मुकम्मल क़ियाम में खड़ा हो चूका है तो अब तशह्हुद न बैठे बल्कि नमाज़ मुकम्मल करे, और सलाम फेरने से पहले सह्वके दो सज्दे कर ले।

अगर चार रक्अत नमाज़ के पहले तशह्हुद में बैठना याद न रहे तो नमाज़ मुकम्मल चार रक्अत पढ़ने के बाद सलाम फेरने से पहले सह्व के दो सज्दे कर ले ।

अगर कोई रक्अत रह जाए :
अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ज़ूहर या अस्र की नमाज़ पढ़ायी और दो रक्अत पढ़ कर सलाम फेर दिया, कुछ सहाबा (नमाज़ पढ़ कर) मस्जिद से बाहर आ गए और कहने लगे कि क्या नमाज़ कम हो गयी है ? एक सहाबी ज़ूल यदैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सवाल किया कि क्या आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) भूल गए या नमाज़ कम हो गयी है ? आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: न मैं भूला हूँ और न ही नमाज़ कम हूई है। फिर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सहाबा किराम से पूछा : “क्या ज़ूल यदैन सच कहता है ?” उन्होंने कहा : “हाँ” फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आगे बढ़े और छूटी हुई नमाज़ पढ़ी, फिर सलाम फेरा, फिर दो सज्दे किए,फिर सलाम फेरा। [सहीह बुख़ारी 482, मुस्लिम 573]

नमाज़ से फारिग़ हो कर बातें कर चुकने के बाद :
इमरान बिन् हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अस्र की नमाज़ पढायी, और तीन रक्अत पढ़ कर सलाम फेर दिया और घर तशरीफ ले गए,एक सहाबी ख़िरबाक़ रज़ियल्लाहु अन्हु आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सह्व (भूलने) का ज़िक्र किया तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तेज़ी से लोगों के पास पहुँचे और ख़िरबाक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की बात की तस्दीक़ चाही, लोगों ने कहा ख़िरबाक़ रज़ियल्लाहु अन्हु सच कहते हैं, फिर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक रक्अत (नमाज़) और पढ़ायी, फिर सलाम फेरा और दो सज्दे किए, फिर सलाम फेरा। [सहीह मुस्लिम, 574]

निष्कर्ष :
अगर कोई रक्अत रह जाए तो जितनी रक्अत रह गयी हैं, याद आ जाने पर दोबारा उतनी रक्अतें पढ़ने के बाद सलाम फेरने से पहले सज्दा सह्व कर लें।

अगर शक़ हो कि कितनी रक्अतें पढ़ी हैं :

अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है , रसूलुल्लाहु (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया जब तुम में से किसी को नमाज़ के दौरान शक़ पड़ जाए कि उसने कितनी रक्आत पढ़ी हैं, तीन या चार, ऐसी सूरत में शक़ को नज़र अन्दाज़ कर के जिस पर यक़ीन हो उस पर नमाज़ की बुनियाद रखे, फिर सलाम फेरने से पहले सह्व के दो सज्दे कर ले। अगर उस ने पाँच रकआत पढ़ ली हैं तो ये सज्दे उस की चौथी रक्अत के क़ायम मक़ाम होंगे और अगर वह पहले ही नमाज़ पूरी कर चुका है तो ये सज्दे शैतान की ज़िल्लत और रूसवायी का कारण होंगे। [मुस्लिम, किताब अल्-मसाजिद, 175]

अब्दुर्रहमान बिन् औफ (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: “जिस शख़्स को नमाज़ में ये शक़ पड़ जाए कि उसने एक रक्अत पढ़ी है या दो तो वह उस को एक रक्अत यक़ीन कर ले और बाक़ी की नमाज़ पूरी कर ले और जिस को यह शक़ हो कि उसने दो रक्अत पढ़ी हैं या तीन तो वह उस को दो रक्अत यक़ीन कर ले और फिर (आख़िरी कअ्दे में) सलाम फेरने से पहले (सह्व के) दो सज्दे कर ले।”
[तिर्मिज़ी 398,इब्न माज़ा 1209]

निष्कर्ष :
जितनी रक्अतें पढ़ने का यक़ीन हो उतनी संख्या को मान कर के बाक़ी की रक्अतें पूरी कर ले और सलाम फेरने से पहले सज्दा सह्व कर ले।
सोच विचार कर ले और अगर रक्अतों की संख्या पर विश्वास न हो तो फिर कम संख्या को ज़हन में रख कर बाक़ी नमाज़ पूरी कर के सलाम फेरने से पहले सह्वकर के दो सज्दे कर ले।
[देखिए अद्-दूरर अल्-बहियया, अलाम- 244/1,अल्-बदाय वल्-सनाय् 1/168]

सूरह अल्-फातिहा या बिस्मिल्लाह भूल जाने पर :
सूरह फातिहा के बगै़र रक्अत नहीं होती, बिस्मिल्लाह भी सूरह फातिहा का हिस्सा है इसलिए इन दोनों को भूल जाए तो:
“अगर क़ियाम ही में याद आ गया तो दोबारा तस्मिया से क़िरात शुरू कर ले।” अगर बाद में याद आया तो इस रक्अत को अमान्य समझ कर आख़िर में और एक रक्अत पढ़ सज्दा सह्व कर ले। [अज़् मौलाना मुब्बशिर अहमद रब्बानी]

रूकूअ़ भूल जाने पर :
अगर अभी सज्दे में नहीं गए और याद आ गया तो रूकूअ़ कर लें। अगर सज्दे में चले जाने के बाद याद आाय तो अब इस रक्अत को शुमार न करें और आख़िर में और एक रक्अत का इज़ाफा कर लें, क्योंकि रूकूअ़् न हो तो रक्अत नहीं होती। [मौलाना मुब्बशिर अहमद रब्बानी] और सलाम फेरने से पहले सह्व के दो सज्दे भी कर लें।

सज्दा भूल जाने पर :
अगर कियाम में पूरा खड़ा होने से पहले याद आ गया तो सज्दे में चला जाए वरना आख़िर में सलाम फेरने से पहले सह्व के दो सज्दे कर ले।
अगर तशह्हुद बैठ गए और दो मिनट बाद याद आया तो सज्दा कर ले नहीं तो आख़िर में सह्व के दो सज्दे कर ले।

वित्र में दुआए कुनूत पढ़ना भूल जाने पर:
वित्र में दूआए कुनूत अगर पढ़ना याद न रहे तो इस पर सज्दा-ए-सह्व नहीं है क्योंकि दुआए कुनूत पढ़ना वाजिब नहीं। बग़ैर दुआए कुनूत के भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने वित्र की नमाज़ पढ़ी है। [देखिए- फतावा सिराते मुस्तकीम, मौलाना अहमद मीर पूरी,स-232]

अगर इमाम भूल जाए :
अगर इमाम भूल जाए तो इमाम के साथ मुक़तदी भी सज्दा सह्व करेंगे। देखिए [सहीह बुख़ारी, 829, मुस्लिम-570,इबने माजा,1206]

अगर मुक़तदी भूल जाए तो वह अकेला सज्दा सह्व करेगा। [अल्-मुहल्ला अज़् इमाम इब़्न हज़म,161/3]

अगर इमाम सिर्री नमाज़ में जहरी क़िरात कर बैठे:

अहतियात यही है कि सिर्री नमाज़ में भूल कर ज़ुहरी क़िरात करने पर सज्दा सह्व कर लिया जाए। [फतावा सिराते मुस्तक़ीम, सफा-189 मौलाना मुहम्मद अहमद मीर पूरी रहिमहुल्लाह]

किन चीज़ों के भूल जाने पर सज्दा सह्व नहीं :
* तकबीर-ए-तहरीमा के बाद सना और नमाज़ की शुरूआती दुआएँ भूल जाने पर।
* तअव्वुज़ भूल जाने पर
* सूरह फातिहा के बाद क़िरात करना भूल जाने पर [मौलाना मुबश्शिर अहमद रब्बानी]

* रफअ् यदैन न करने पर
* रूकूअ् में सज्दे वाली तस्बीह पढ़ जाने पर।
* सज्दे में रूकूअ़ वाली तस्बीह पढ़ जाने पर ।
* जलसा-ए-इस्तिराहत में जम कर न बैठने पर।
* तशह्हुद में उँगली को उठाने या हरकत न देने पर
* आखिरी क़ाअ्दे में दरूद के बाद दुआएँ न पढ़ने पर।
* वित्र में दुआए कुनूत न पढ़ने पर।
* दूसरी तरफ सलाम न फेरने पर।

[स्रोत- उम्मे अब्द-मुनीब की किताब सज्दा-ए- सह्व से लिया गया]

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