आसान नेकियाँ (अच्छे कर्म)
आसान नेकियाँ (अच्छे कर्म)
الحمد لله والصلاة والسلام على رسول الله، وبعد:
अल्लाह ने जन्नत पाने के लिए कई आसान काम बताए हैं। ये काम इतने आसान हैं कि एक मुसलमान इन्हें चलते-फिरते भी कर सकता है। और जहन्नम में ले जाने वाले काम भी उतने ही आसान हैं। इसलिए समय की क़द्र करते हुए, ज़्यादा से ज़्यादा नेकियाँ जमा करें।
हर भलाई की अहमियत
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“الْجَنَّةُ أَقْرَبُ إِلَى أَحَدِكُمْ مِنْ شِرَاكِ نَعْلِهِ وَالنَّارُ مِثْلُ ذَلِكَ”
“जन्नत तुममें से हर एक के लिए उसके जूते के फिते से भी अधिक निकट है, और जहन्नम भी उसी के मिस्ल।” [बुख़ारी: 2133, अब्दुल्लाह बिन् मसऊद रज़ि, (सहीह अल्-जामेअ् : 3115)]
भले ही कोई अच्छा काम देखने में छोटा ही क्यों न हो, लेकिन वह अमल जन्नत में ले जा सकता है। यही बात गुनाहों के बारे में भी है।
1.अमल से पहले नेक नीयत की अहमियत
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“إِنَّمَا الْأَعْمَالُ بِالنِّيَّاتِ وَإِنَّمَا لِكُلِّ امْرِئٍ مَا نَوَى”
“बेशक तमाम अमलों का दारोमदार नीयत पर है और हर शख़्स के लिए वही है जिस की वह नीयत करता है।” [बुखारी, मुस्लिम- हदीस-1907, रावी उमर बिन् खत्ताब रज़ि.]
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“مَنْ أَتَى فِرَاشَهُ وَهُوَ يَنْوِى أَنْ يَقُومَ فَيُصَلِّى مِنَ اللَّيْلِ فَغَلَبَتْهُ عَيْنُهُ حَتَّى يُصْبِحَ كُتِبَ لَهُ مَا نَوَى وَكَانَ نَوْمُهُ صَدَقَةً عَلَيْهِ مِنْ رَبِّهِ “
” जो शख़्स रात को उठकर नमाज़ पढ़ने की नीयत से सोए, किन्तु उस पर नींद ग़ालिब आ जाए यहाँ तक कि सुबह हो जाए, तो उसके लिए वही लिखा जाएगा जिसकी उसने नीयत की हो, और उसकी नींद उसके रब की ओर से उसके लिए सदक़ा होगी।” [नसाई, इब्न माजा: अबू दरदा रज़ियल्लाहु अन्हु, सहीह अल-जामी: 5941]
2- वज़ू के बाद ज़िक्र करना
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“مَا مِنْكُمْ مِنْ أَحَدٍ يَتَوَضَّأُ فَيُبْلِغُ أَوْ فَيُسْمِعُ الْوَضُوءَ ثُمَّ يَقُولُ أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُ اللَّهِ وَرَسُولُهُ إِلَّا فُتِحَتْ لَهُ أَبْوَابُ الْجَنَّةِ الثَّمَانِيَةُ يَدْخُلُ مِنْ أَيُّهَا شَاءَ”
” तुम में से जो शख़्स अच्छी तरह वुज़ू करे फिर कहे ‘मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अलावा कोई मअ्बूद नहीं और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल हैं तो उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाएंगे वह जिस में से भी चाहे दाख़िल हो।” [सहीह मुस्लिम- 234, उमर बिन् खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु, सहीह जामेअ्-5803]
3- मिस्वाक करना
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“السَّوَاكُ مَطْهَرَةٌ لِلْفَمِ مَرْضَاةٌ لِلرَّبِّ”
“मिस्वाक मुँह की पाकीज़गी और रब्ब की खुशनूदी का ज़रिया है।” [अहमद, सहीह, सहीह अल्-जामेअ्: 3695)]
4- रास्ते से तकलीफ़ देने वाली चीजों को हटाना
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“الْإِيْمَانُ بِضْعٌ وَسَبْعُونَ أَوْ بِضْعٌ وَسِتُونَ. شُعْبَةً فَأَفْضَلُهَا قَوْلُ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَدْنَاهَا إِمَاطَةُ الْأَذَى عَنْ الطَّرِيقِ وَالْحَيَاءُ شُعْبَةٌ مِنَ الْإِيمَانِ”
“ईमान की सतर से ज्यादा साठ से ज़्यादा शाख़ें हैं, इनमें सबसे अफज़ल’ला इलाह इल्लल्लाह ‘कहना और सब से अदना रास्ते से तकलीफ देने वाली चीज़ों को हटाना है और हया ईमान की एक शाख़ है।” [मुस्लिम: 35, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु. (सहीह: 2800)]
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“لَقَدْ رَأَيْتُ رَجُلًا يَتَقَلَّبُ فِي الْجَنَّةِ فِي شَجَرَةٍ قَطَعَهَا مِنْ ظَهْرِ الطَّرِيقِ كَانَتْ تُؤْذِي النَّاسَ”
“मैंने एक शख़्स को देखा जो जन्नत में तफरीह कर रहा था इस वजह से कि इस ने बीच सड़क से एक दरख़्त को काट दिया था जो लोगों के तकलीफ देता था।” [मुस्लिम हदीस-1914 ,अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु (सहीह अल्-जामेअ्: 5134)]
5-अज़ान का ज़वाब देना
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“إِذَا سَمِعْتُمُ الْمُؤَذِّنَ فَقُولُوا مِثْلَ مَا يَقُولُ ثُمَّ صَلُّوا عَلَى فَإِنَّهُ مَنْ صَلَّى عَلَى صَلَاةً صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ بِهَا عَشْرًا ثُمَّ سَلُوا اللَّهَ لِيَ الْوَسِيلَةَ فَإِنَّهَا مَنْزِلَةٌ فِي الْجَنَّةِ لَا تَنْبَغِي إِلَّا لِعَبْدِ مِنْ عِبَادِ اللَّهِ وَأَرْجُو أَنْ أَكُونَ أَنَا هُوَ فَمَنْ سَأَلَ لِي الْوَسِيلَةَ حَلَّتْ لَهُ الشَّفَاعَةُ“
“जब तुम मुअज़्ज़िन को अज़ान देते हुए सूनो तो वही कहो जैसा कि मुअज़्ज़िन कह रहा है, फिर मुझ पर दरूद पढ़ो इसलिए कि मुझ पर जो एक मर्तबा दरूद पढ़ेगा अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल करेगा, फिर अल्लाह से मेरे लिए वसीला मांगो इसलिए कि जन्नत में एक मक़ाम है जो अल्लाह के बन्दों में से एक ही के लिए मुनासिब है और मैं उम्मीद करता हूँ कि वह मैं ही हूँ, तो जो भी मेरे लिए वसीला मांगेगा उस के लिए शफाअत वाजिब हो गयी ।” [मुस्लिम: 384, अब्दुल्लाह इब्न अम्र इब्न अल-आस रज़ियल्लाहु अन्हु, (सहीह अल्-जामेअ्: 613)]
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
जो आज़ान सुने और उसके बाद यह कहे
“اللَّهُمَّ رَبَّ هَذِهِ الدَّعْوَةِ التَّامَّةِ وَالصَّلَاةِ الْقَائِمَةِ آتِ مُحَمَّدًا وَالْوَسِيلَةَ وَالْفَضِيلَةَ وَابْعَثْهُ مَقَامًا مَحْمُودًا الَّذِي وَعَدْتَه”
“ऐ अल्लाह ! इस मुकम्मल दअ्वत और खड़ी होने वाली नमाज़ के रब्ब, तु मुह़्म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को वसीला और फज़ीलत दे और उन को पसन्दीदा मक़ाम पर भेज जिस का तुने उन से वादा किया है।” तो उसके लिए मेरी शफाअत् क़ियामत के रोज़ वाजिब हो जाएगी। [बुखारी: 589, जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हु) ,सहीह अल्-जामेअ्: 6423)]
6- तस्बीह तहमीद, तकबीर और तहलील
हज़रत अब्दुल्लाह बिन् अम्र रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“خَصْلَتَانِ لَا يُحْصِيْهِمَا عَبْدٌ إِلَّا دَخَلَ الْجَنَّةَ وَهُمَا يَسِيرٌ وَمَنْ يَعْمَلُ بِهِمَا قَلِيلٌ
يُسَبِّحُ الله أَحَدُكُم فِي دُبُرِ كُلِّ صَلَاةٍ عَشْرًا وَيَحْمَدُهُ عَشْرًا وَيُكَبِّرُهُ عَشْرًا
فَتِلْكَ خَمْسُونَ وَمِائَةٌ بِالنِّسَانِ وَأَلْفَ وَخَمْسُ مِائَةٍ فِي الْمِيزَانِ
وَإِذَا أَوَى إِلَى فِرَاشِهِ يُسَبِّحُ ثَلاثًا وَثَلاثِينَ وَيَحْمَدُ ثَلاثًا وَثَلاثِينَ وَيُكَبِّرُ أَرْبَعًا وَثَلَاثِينَ
فَتِلْكَ مِائَةٌ بِالنِّسَانِ وَأَلْفَ فِي الْمِيزَانِ
قَالَ رَسُولُ اللهِ : فَأَيُّكُم يَعْمَلُ فِي يَومٍ وَلَيْلَةِ الْفَينِ وَخَمْسُ مِائَةٍ سَيِّئَةٍ ؟ قالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَمَرو : وَرَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ يَعْقِدُهَا بِيَدِهِ
قَالَ : فَقِيلَ : يَا رَسُولَ اللَّهِ وَكَيْفَ لَا يُحْصِيهِمَا ؟
قال: يَأْتِي أَحَدَكُمُ الشَّيْطَانُ وَهُوَ فِي صَلَاتِهِ فَيَقُولُ اذْكُرْ كَذَا اذْكُرْ كَذَا
وَيَأْتِيهِ عِنْدَ مَنَامِهِ فَيُنِيمُهُ“
“दो आदतें ऐसी हैं जो कोई बन्दा उन्हें शुमार करेगा वह जन्नत में दाख़िल होगा और वह दोनों अमल करने वालों के लिए मामूली और आसान हैं, तुम में जो भी हर नमाज़ के बाद दस मर्तबा अल्लाह की तस्बीह बयान करे और दस मर्तबा उस की तहमीद करे और दस मर्तबा उस की तकबीर करे तो वह डेढ़ सौ होते हैं ज़बान पर और मीज़ान में पन्द्रह सौ होते हैं और जब अपने बिस्तर पर सोने जाए तो तैतीस (33) मर्तबा तस्बीह, तैतीस (33) मर्तबा तहमीद व चौतीस (34) मर्तबा अल्लाहु अकबर कहे तो ज़बान में सौ मर्तबा होते हैं और मीज़ान में हज़ार होते हैं।
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : ‘तुम में से कौन एक दिन एक रात में पच्चीस सौ गुनाह करता है ?'”
अब्दुल्लाह इब्न अम्रो रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने हाथ से गिरह बना रहे थे।
अब्दुल्लाह इब्न अम्रो रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं , कहा गया : “ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) किस तरह एक शख़्स इस तरह इन दोनों अमलों का एहतिमाम नहीं कर सकता ?
आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : “शैतान तुम्हारे पास नमाज़ की हालत में तुम्हारे पास आता है और कहता है , फलां चीज़ याद करो, फलां चीज़ याद करो और उसके पास सोने के वक़्त आता है ओर उसे सुला देता है।“
[अबू दाऊद, सहीह तर्ग़ीब : 606]
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ مَرَّ بِهِ وَهُوَ يَغْرِسُ غَرْسًا فَقَالَ يَا أَبَا هُرَيْرَةَ مَا الَّذِي تَغْرِسُ قُلْتُ غِرَاسًا لِي قَالَ أَلَا أَدُلُّكَ عَلَى غِرَاسٍ خَيْرٍ لَكَ مِنْ هَذَا قَالَ بَلَى يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ قُلْ سُبْحَانَ اللَّهِ وَالْحَمْدُ لِلَّهِ وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَاللَّهُ أَكْبَرُ يُغْرَسْ لَكَ بِكُلِّ وَاحِدَةٍ شَجَرَةٌ فِي الْجَنَّةِ
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उनके पास से गुजरे जब वह एक पौधा लगा रहे थे, तो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा “ऐ अबू हुरैरा ! तुम किसके लिए पौधा लगा रहे हो ?”
मैं ने कहा ‘अपने लिए’,
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा ” क्या मैं तुम को ऐसे पौधे की तरफ न ले जाऊँ जो तुम्हारे लिए इससे बेहतर हो ?” अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कहा ‘ऐ अल्लाह के रसूल ! क्यों नहीं’ तो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया “कहो अल्लाह पाक है और तमाम तारीफ अल्लाह के लिए है, और अल्लाह के अलावा कोई मअबूद नहीं और अल्लाह सब से बड़ा है, तो तुम्हारे लिए जन्नत में हर एक के बदले एक दरख़्त लगाया जाएगा।” [इब्न माजा, सहीह अल्-जामेअ्,हीदस-2613]
7.कुरान पढ़ा जाए
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“مَنْ قَرَأَ حَرْفًا مِنْ كِتَابِ اللهِ فَلَهُ بِهِ حَسَنَةٌ وَالْحَسَنَةُ بِعَشْرِ أَمْثَالِهَا لا أَقُولُ الَم حَرْفٌ وَلَكِنْ أَلِفٌ حَرْفٌ وَلَامٌ حَرْفٌ وَمِيمٌ حَرْفٌ”
“जो अल्लाह की किताब से एक हरफ पढ़ेगा तो उस के लिए एक नेकी है और उसके मिस्ल दस नेकियाँ हैं, मैं यह नहीं कहता कि अलिफ लाम मीम एक हरफ है बल्कि अलिफ एक हरफ और लाम एक हरफ और मीम एक हरफ है ।[तारीख़ लिल् बुखारी, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-6469]
8- सुन्नत-ए-मुअक्कदा
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
مَنْ صَلَّى فِي يَوْمٍ وَلَيْلَةٍ ثِنْتَيْ عَشْرَةَ رَكْعَةً بُنِيَ لَهُ بَيْتٌ فِي الْجَنَّةِ
أَرْبَعًا قَبْلَ الظَّهْرِ وَرَكْعَتَيْنِ بَعْدَهَا
وَرَكْعَتَيْنِ بَعْدَ الْمَغْرِبِ
وَرَكْعَتَيْنِ بَعْدَ الْعِشَاءِ
وَرَكْعَتَيْنِ قَبْلَ صَلَاةِ الْفَجْرِ
जो शख़्स एक दिन एक रात में बारह रकअतें नमाज़ अदा करेगा, उसके लिए जन्नत में एक घर बनाया जाएगा।
और वह यह हैं : ज़ुहर से पहले चार रकअत और उसके बाद दो रकअतें।
और मग़रिब की नमाज़ के बाद दो रकअतें।
और इशा की नमाज़ के बाद दो रकअतें।
और फज्र की नमाज़ से पहले दो रकअतें
[तिर्मिज़ी, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-6362]
9- चाश्त की नमाज़
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“يُصْبِحُ عَلَى كُلِّ سُلَامَى مِنْ أَحَدِكُمْ صَدَقَةٌ فَكُلُّ تَسْبِيحَةٍ صَدَقَةٌ وَكُلُّ تَحْمِيدَةٍ صَدَقَةٌ وَكُلُّ تَهْلِيلَةٍ صَدَقَةٌ وَكُلُّ تَكْبِيرَةٍ صَدَقَةٌ وَأَمْرٌ بِالْمَعْرُوفِ صَدَقَةٌ وَنَهْي عَنْ الْمُنْكَرِ صَدَقَةٌ وَيُجْزِءُ مِنْ ذَلِكَ رَكْعَتَانِ يَرْكَعُهُمَا مِنْ الضُّحَى”
“तुम से हर एक पर सुबह के वक़्त हर जोड़ पर सदक़ा करना है , लिहाज़ा हर तस्बीह सदक़ा है, हर तहमीद सदक़ा है और हर तहलील सदक़ा है और तकबीर सदक़ा है और भलाई का हुक्म देना सदक़ा है और मुन्कर से रोकना भी सदक़ा है और इन तमाम के लिए दो रकअतें जो चाश्त के वक़्त पढ़ते हो काफी होती हैं ।” [मुस्लिम 720, अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु, सहीह, 8097 ]
10. मुसलमानों के ऐब (कमियों) को छिपाना
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“وَمَنْ سَتَرَ مُسْلِمًا سَتَرَهُ اللَّهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ”
“जो किसी मुसलमान के ऐब को छुपाएगा, अल्लाह क़ियामत के रोज़ उस के ऐब को छुपाएगा।” [सहीह बुखारी, हदीस-2310. सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-6707]
11. लोगों को तालीम (शिक्षा) दिया जाए ।
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“مَنْ دَلَّ عَلَى خَيْرٍ فَلَهُ مِثْلُ أَجْرٍ فَاعِلِهِ”
“जो किसी भलाई की तरफ रहनुमाई कर दे तो उस के लिए उस पर अमल करने वाले के बराबर सवाब है। ” [मुस्लिम, हदीस-1893, अबू मसऊद अल्-अन्सारी रज़ियल्लाहु अन्हु , सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-2239]
12 – रोज़ादार को इफ्तार का कराना
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“مَنْ فَطَرَ صَائِمًا كَانَ لَهُ مِثْلُ أَجْرِهِ غَيْرَ أَنَّهُ لَا يَنْقُصُ مِنْ أَجْرِ الصَّائِمِ شَيْئًا”
“जो किसी रोज़ादार को इफ्तार कराए तो उस के लिए उसी के बराबर सवाब है जबकि रोज़ादार के सवाब से कुछ कमी नहीं की जाएगी ।” [अहमद, ज़ैद बिन् ख़ालीद रज़ियल्लाहु अन्हु, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-6415]
13- मजलिस (सभा) का कफ्फारा
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“مَنْ جَلَسَ فِي مَجْلِسٍ فَكَثُرَ فِيهِ لَغَطُهُ فَقَالَ قَبْلَ أَنْ يَقُومَ مِنْ مَجْلِسِهِ ذَلِكَ : سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ أَسْتَغْفِرُكَ وَأَتُوبُ إِلَيْكَ إِلَّا غُفِرَ لَهُ مَا كَانَ فِي مَجْلِسِهِ ذَلِكَ”
“जो किसी मजलिस में बैठे और उस में वह ज़्यादा लग़्ज़िश करे तो उस मजलिस से उठने से पहले कहे : सुब्हानक अल्लाहु्म्म व बिहम्दिक अश्हदु अन्-ला इलाह इल्ला अन्त अस्तग़फिरूक व अतूबू इलैक (ऐ अल्लाह ! तू पाक है और तमाम तारीफ तेरे लिए है मैं गवाही देता हूँ कि नहीं कोई माबूद सिवाए तेरे, मैं तुझसे मग़्फिरत चाहता हूँ और मैं तुझ से तौबा करता हूँ) तो उस ने जो कुछ उस मजलिस में बात चीत की थी उस से उस की मग़फिरत कर दी जाती है। [तिर्मीज़ी, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-6192]
14. आयतुल कुर्सी को सोने से पहले पढ़ना चाहिए।
وَقَالَ الشَّيْطَانُ لِأَبِي هُرَيْرَةَ
إِذَا أَوَيْتَ إِلَى فِرَاشِكَ فَاقْرَأْ آيَةَ الْكُرْسِيِّ مِنْ أَوَّلِهَا حَتَّى تَخْتِمَ الْآيَةَ
اللهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ “
وَقَالَ لِي لَنْ يَزَالَ عَلَيْكَ مِنْ اللَّهِ حَافِظٌ وَلَا يَقْرَبَكَ شَيْطَانٌ حَتَّى تُصْبِحَ
وَكَانُوا أَحْرَصَ شَيْءٍ عَلَى الْخَيْرِ
فَقَالَ النَّبِيُّ: أَمَا إِنَّهُ قَدْ صَدَقَكَ وَهُوَ كَذُوبٌ
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि शैतान ने उन से कहा:
“जब आप सोने जाएं तो आयत अल-कुरसी को शुरू से अंत तक पढ़ें।“
“اللهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ”
और (शैतान ने ) मुझसे (अबू हुरैरा से) कहा अल्लाह तुम्हारे लिए मुहाफिज़ मुकर्रर कर देगा, और शैतान तुम्हारे क़रीब भी नहीं आएगा यहाँ तक कि सुबह हो जाए। और सहाबा ख़ैर के ज़्यादा हरीस थे, तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया “सूनों ! उसने तुमसे सच कहा हालांकि वह झूठा है।” [बुख़ारी, हदीस-3101]
15. सोने के आदाब (तरीके)
बराअ् इब्न आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया :
“إِذَا أَتَيْتَ مَضْجَعَكَ فَتَوَضَّأَ وُضُوءَكَ لِلصَّلَاةِ
ثُمَّ اضْطَجِعْ عَلَى شِقْكَ الْأَيْمَنِ
ثُمَّ قُلْ اللَّهُمَّ أَسْلَمْتُ وَجْهِي إِلَيْكَ
وَفَوَّضْتُ أَمْرِي إِلَيْكَ
وَالْجَأْتُ ظَهْرِي إِلَيْكَ
رَغْبَةً وَرَهْبَةً إِلَيْكَ
لا مَلْجَا وَلَا مَنْجَا مِنْكَ إِلَّا إِلَيْكَ اللَّهُمَّ آمَنْتُ بِكِتَابِكَ الَّذِي أَنْزَلْتَ
وَبِنَبِيِّكَ الَّذِي أَرْسَلْتَ فَإِنْ مُتَّ مِنْ لَيْلَتِكَ فَأَنْتَ عَلَى الْفِطْرَةِ
وَاجْعَلْهُنَّ آخِرَ مَا تَتَكَلَّمُ بِهِ”
“जब तुम सोने चलो तो नमाज़ की तरह वुज़ू करो फिर दाहिने पहलू पर लेट जाओ, फिर कहो : ‘ऐ अल्लाह ! मैंने अपना चेहरा तेरी जानिब कर दिया है और अपने मामलात तेरे हवाले कर दिये हैं, और मैं ने अपने आप को तेरी जानिब रग़बत करते हुए और ख़ौफ के साथ पनाह में दे दिया है , तेरे अलावा कोई पनाह नहीं और न ही कोई नज़ात का ज़रिया मगर तेरी ही जानिब, ऐ अल्लाह ! मैं तेरी किताब पर ईमान लाता हूँ जैसे तुने नाज़िल किया है और तेरे नबी पर जिसे तुने भेजा है,’
(फिर रसूलु्ललाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया) अगर तुम उस रात में वफात (मौत) पा गए तो तुम फितरत इस्लाम पर मरोगे, ” फिर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हिदायत देते हुए फरमाया “तुम इन्ही कलिमात को अपने आख़िरी कलिमात बनाओ” (यानि ये दुआ बिल्कुल आख़िर में पढ़ो सोने से पहले)।“ [सहीह बुख़ारी, हदीस-244, सहीह अल्-जामेअ् हदीस-276]
Source: शैख़ अबू ज़ैद ज़मीर हफिज़हुल्लाह के उर्दू ख़िताब आसान नेकियाँ से लिया गया