दीन में बिद्अत और ईद मीलादुन्नबी का उत्सव
दीन में बिद्अत और ईद मीलादुन्नबी का उत्सव
﷽
हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :
बिद्अत अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है बिना पूर्व उदाहरण के ईजाद कर ली गई चीज़।
शरीअत की इस्तिलाह में धर्म में गढ़ लिया गया ऐसा तरीका जो शरीअत की समानता (बराबरी) करता हो। इस प्रकार बिअत सुन्नत के विरूद्ध और सुन्नत के विपरीत है।
इस्लामी भाईयो ! आप की सेवा में बिद्अत के बारे में कुछ नुसूस प्रस्तुत किये जा रहे हैं :
१. इर्बाज़ बिन सारियह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हों ने कहा कि : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:
“तुम में से जो आदमी मेरे बाद ज़िन्दा रहे गा वह बहुत अधिक इख़्तिलाफ (मतभेद) देखेगा, अतः तुम मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायत याफ्ता (पथप्रदर्शित ) खुलफा-ए-राशिदीन की सुन्नत को दृढ़ता से थाम लो और उसे दाँतों से जकड़ लो। तथा धर्म में नयी ईजाद कर ली गयी चीज़ों (यानी बिद्अतों) से बचो, क्योंकि हर बिद्अत गुमराही (पथभ्रष्टता) है।“ (अहमद, तिर्मिज़ी, इब्ने गाजा, दारमी, हाकिम, इब्ने हिब्बान, तथा अल्बानी ने किताबुस्सुन्नह की तखरीज में इस सहीह कहा है]
२. जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हो ने कहा कि अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:
“जिसे अल्लाह तआला मार्गदर्शन प्रदान कर दे उसे कोई पथ-भ्रष्ट करने वाला नहीं, और वह जिसे पथ-भ्रष्ट कर दे उसे कोई मार्ग दर्शन करने वाला नहीं, और सर्वश्रेष्ठ बात अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल की किताब है, और सब से बेहतरीन तरीका मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीका है, और सब से बुरी बात धर्म में नयी ईजाद कर ली गई चीजें हैं, और धर्म में हर नयी ईजाद कर ली गई चीज़ बिद्अत है।” [मुस्लिम, बैहकी तथा बैहकी और नसाई के यहाँ सहीह सनद के साथ यह भी है कि { और हर गुमराही जहन्नम में ले जाने वाली है }
३. तथा आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि उन्हों ने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया
“जिसने हमारी इस शरीअत में कोई ऐसी चीज़ ईजाद की जिस का उस से कोई संबंध नही है तो वह मर्दूद (अस्वीकृत) है।” [बुखारी व मुस्लिम और मुस्लिम की एक रिवायत में है कि : “जिसने कोई ऐसा काम किया जो हमारी शरीअत के अनुसार नहीं है तो वह मर्दूद (अस्वीकृत) है।”
इब्ने हजर रहिमहुल्लाह “हर बिदअत गुमराही है” पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं : “हदीस का यह वाक्य शरीअत का एक काईदा (नियम) है, चुनाँचि हर बिद्अत गुमराही है, अतः वह शरीअत का हिस्सा नहीं हो सकती, क्योंकि शरीअत पूरी की पूरी हिदायत और मार्गदर्शन है। जहाँ तक आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस है तो वह जवामिउल-कलिम में से है (यानी कम शब्दों में अर्थ पूर्ण विस्तृत बात कहने की योग्यता अर्थात् गागर में सागर के समान है) और वह प्रत्यक्ष (ज़ाहिरी) आमाल की कसौटी है, और बिद्अती का अमल अस्वीकृत है, इसके बारे में विद्वानों के दो कथन हैं: प्रथम उसका अमल उसी के ऊपर लौटा दिया जाए गा (यानी उसे कबूल नहीं किया जायेगा) दूसरा: बिद्अती ने अल्लाह के हुक्म को रद्द कर दिया क्योंकि उसने अपने आप को अहकमुल हाकिमीन के समान (समवर्ती) बनाकर खड़ा कर दिया, और थर्म में ऐसी चीज़ को मश्रूअ (वैध) कर दिया जिसकी अल्लाह तआला ने अनुमति नही दी है।”
इस्लामी भाईयो ! आप की सेवा में बिअत के बारे में कुछ सहाबा के कथन प्रस्तुत किये जा रहे हैं :
अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया “पैरवी करो और बिद्अत ईजाद न करो, क्योंकि तुम पर्याप्त किये जा चुके हो।” (इसे तबरानी और दारमी ने सहीह इसनाद के साथ रिवायत किया है)
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं “हर बिद्अत गुमराही है, अगर लोग उसे अच्छा ही क्यों न समझें।” (इसे दारमी ने सहीह इसनाद के साथ रिवायत किया है)
तथा अब्दुल्लाह बिन मसूऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने मस्जिद में बैठे हुए उन लोगों का खण्डन किया जिन में से हर एक के हाथ में कंकरियाँ थीं, और उनके बीच में एक आदमी था जो कहता था सौ बार अल्लाहु अक्बर कहो तो वो लोग अल्लाहु -अक्बर कहते थे, फिर कहता कि सौ बार ला-इलाहा इल्लल्लाह कहो तो वो लोग सौ बार ला-इलाहा इल्लल्लाह कहते थे, वह कहता कि सौ बार सुब्हानल्लाह कहो तो वो लोग सौ बार तस्बीह पढ़ते। इस पर इब्ने मसूऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा : “उस ज़ात की कसम जिसके हाथ में मेरी जान है! तुम लोग एक ऐसी मिल्लत (रास्ते) पर हो जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मिल्लत से अधिक हिदायत वाला है, या गुमराही का द्वार खोलने वाले हो।” उन्हों ने कहा हमारा इरादा तो केवल भलाई का है, तो आप ने फरमाया: “कितने भलाई के चाहने वाले हैं जो उसे कदापि नहीं पा सकते।” (इसे दारमी और अबू नुऐम ने सहीह इसनाद के साथ रिवायत है)
और यह है उम्मत के सलफ (पूर्वज) का बिद्अत के खतरे की समझ :
चुनाँचि दारूल हिजरत (मदीना के इमाम मालिक रहिमहुल्लाह फरमाते हैं:
“जिसने इस्लाम में कोई बिद्अत ईजाद की जिसे वह अच्छा समझता है, तो उस ने यह गुमान किया कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अल्लाह का संदेश पहुँचाने में खियानत से काम लिया, क्योंकि अल्लाह तआला फरमाता है कि :
الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الإِسْلَامَ دِيناً )
“आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमतें सम्पूर्ण कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम थर्म को पसन्द कर लिया।” (सूरतुल-माईदाः3)
अतः जो चीज़ उस दिन धर्म न थी वह आज धर्म नही बन सकती।”
तथा इमाम शाफेई रहिमहुल्लाह ने फरमाया: “जिस ने (धर्म में) किसी चीज़ को अच्छा समझा, उसने शरीअत गढ़ी।”
तथा इमाम अहमद रहिमहुल्लाह ने फरमाया “हमारे निकट सुन्नत के सिद्धांत यह हैं कि अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा जिस तरीके पर थे उसको दृढ़ता से थाम लिया जाये और उनका अनुसरण किया जाये, तथा बिद्अत को छोड़ दिया जाये और हर बिद्अत गुमराही है।”
बिद्अत का खतरा :
1. बिद्अत करने वाले का अमल उसके ऊपर लौटा दिया जाये गा (यानी उसे कुबूल नहीं किया जायेगा।)
2. जब तक वह अपनी बिद्अत पर अड़ा हुआ है, उसकी तौबा कबूल नहीं होती।
3. वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हौज़ पर आने को नहीं पाये गा।
4. उसे कियामत के दिन तक उसकी बिद्अत पर अमल करने वालों का गुनाह मिले गा।
5. बिद्अती आदमी मल्ऊन (अल्लाह की दया से दूर और धिक्कारा हुआ) है।
6. बिद्अती आदमी अल्लाह से दूर ही होता रहता है।
7. बिद्अत सुन्नत को मुर्दा कर देती (मिटा देती) है।
8. बिद्अत तबाही व बर्बादी (विनाश) का कारण है।
9. बिद्अत कुफ्र की डाक (सूचक) है।
10. बिद्अत ऐसे मतभेद और इख़्तिलाफ का द्वार खोलती है जो किसी प्रमाण पर आधारित न होकर मन की इच्छाओं पर आधारित होता है।
11. बिद्अतों के मामले को महत्व न देना और उसे साधारण समझना गुनाहों, नाफरमानियों और अवज्ञा पर निष्कर्षित होता है।
बिद्अत को अच्छा ठहराने वालों के सन्देहों का खण्डनः
1. “जिस काम को मुसलमान अच्छा समझें वह अल्लाह के निकट भी अच्छा है, और जिसे मुसलमान बुरा समझें वह अल्लाह के निकट भी बुरा है।”
प्रथम : तो यह हदीस नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से शुद्ध रूप से प्रमाणित है ही नहीं, बल्कि यह अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु का कथन है। और किसी सहाबी का कथन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन का विरोधक नहीं हो सकता। और यदि इसे सहीह मान लिया जाए तो इसका मतलब यह होगा कि जिसे सभी मुसलमान अच्छा समझें वह इज्मा है, और इज्माञ् हुज्जत यानी दलील और प्रमाण है, और जो बिद्अतों को अच्छा समझता है उसके लिए इस में कोई दलील व हुज्जत नहीं है, और वह इज्माअ जो सिद्धांतिक रूप से मान्य है उस से मुराद किसी ज़माने में अल्ले-इल्म (धर्म-शास्त्रियों) का इज्माअ (सर्वसहमति) है।
और इसमें कोई सन्देह नहीं कि मुकल्लिद लोग अहले-इल्म में से नहीं हैं, और इन बिद्अतों को करने वाले अधिकतर लोग मुकुल्लिदीन में से हैं।
2. उमर रज़ियल्लाहु अन्हु का कथन “यह कितनी अच्छी बिद्अत है।”
यह कथन तरावीह की नमाज़ के बारे में है जो कि सुन्नत है, चुनांचि जब उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने इसे जमाअत के साथ पढ़ने का आदेश दिया, जबकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फर्ज़ होने के डर से एक इमाम के पीछे जमाअत के साथ पढ़ना छोड़ दिया था, तो उस समय उन्हों ने यह बात कही जिसका अरबी भाषा में यह अर्थ हुआ कि ऐसा काम जो किसी पिछले नमूना पर नहीं है, चुनाँचि वह अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़माना में नहीं थी, या उसका मतलब यह है कि उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने जब मस्जिद में चिराग (रौशनी) की व्यवस्था कर दी और लोग तरावीह की नमाज़ के लिए एकत्र हुए तो उन्हों ने अपने इस अमल को एक नया काम देखा; यानी मस्जिद में चिराग की व्यवस्था को, तो उस समय उन्हों ने फरमाया “यह कितनी अच्छी बिअत है (यानी यह नया काम कितना अच्छा है)। तथा उमर रज़ियल्लाहु अन्हु खुलफा-ए-राशिदीन में से हैं जिनके कथन से दलील पकड़ी जा सकती है जब वो कुन या हदीस की मुखालफत न करें।
3. “जिस आदमी ने इस्लाम में कोई अच्छा तरीका जारी किया, तो उसे उसका अज्र व सवाब और उसके बाद उस पर अमल करने वालों का भी अज्र व सवाब मिलेगा जबकि उनके अज्र में कोई कमी नहीं होगी…
इस हदीस के पीछे एक कहानी है, जो यह है कि मुज़र कबीले के कुछ लोग पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमम के पास आये, जो नंगे शरीर, नंगे पैर, चित्ती-दार (थारी-दार) चादर या जुब्बा पहने हुए थे, उनकी दुर्दशा को देख कर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के चेहरे का रंग बदल गया, चुनाँचि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बिलाल को हुक्म दिया तो उन्हों ने अज़ान दी और इकामत कही, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़ पढ़ाई, फिर खुत्बा दिया जिस में लोगों को सदक़ा करने पर उभारा। चुनाँचि एक आदमी एक थैली लेकर आया जिसे उसका हाथ उठाने से असमर्थ हो रहा था, और उसे लाकर रसूल सल्लल्लसहु अलैहि व सल्लम के सामने रख दिया, फिर लोग एक के बाद एक सदक़ा करने लगे यहाँ तक कि खाने और कपड़े के दो ढेर लग गए, तब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:
“जिस आदमी ने इस्लाम में कोई अच्छा तरीका जारी किया, तो उसे उसका अज्र व सवाब और उसके बाद उस पर अमल करने वालों का भी अज्र व सवाब मिले गा जबकि उनके अज्र में कोई कमी नहीं होगी…”
तो इस हदीस में सुन्नत जारी करने से मुराद यह है कि उस सहाबी ने खर्च करने की सुन्नत को बड़ी दानशीलता के साथ ज़िन्दा किया, यह अर्थ नहीं है कि उसने सदका करने की सुन्नत जारी की या ईजाद की।
4. परंपरा
यानी लोगों में कुछ बिद्अतों की परंपरा चली आ रही है, जिन से वो परिचित हैं और उन्हें बड़ी श्रद्धा और आस्था के साथ करते चले आ रहे हैं, क्योंकि ये उनकी परंपरायें हैं जिन पर उन्हों ने अपने बाप-दादा को पाया है, और ठीक यही सन्देह मुशरिकों का भी था जिसके कारण उन्हों ने हक को मानने से इन्कार कर दिया :
إِنَّا وَجَدْنَا آبَاءَنَا عَلَى أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَى آثَارِهِم مُّقْتَدُونَ ﴾ [الزخرف: ٢٣]
“हम ने अपने बाप-दादा को एक डगर पर पाया, और हम तो उन्हीं के पद चिन्हों (नक्शे कदम) की पैरवी करने वाले हैं।” (सूरतुज़-जुखरूफ : 23)
और इस्लामी दृष्टि कोण से जमाअत से मुराद बाहुल्यता नहीं है, बल्कि जमाअत से मुराद वे लोग हैं जो सुन्नत के अनुसार हों, चाहे उनकी संख्या थोड़ी ही क्यों न हो, पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
“इस्लाम की शुरूआत अजनबियत की हालत में हुई है (यानी शुरू में इसके मानने वाले थोड़े थे) और फिर निकट ही उसी अजनबियत की हालत पर लौट आये गा जैसाकि उसका आरम्भ हुआ था, तो शुभ सूचना है उन अजनबी लोगों के लिए।” पूछा गया : ऐ अल्लाह के पैग़म्बर वह कौन लोग हैं? आप ने फरमाया :
“जो लोग उस समय सुधार का काम करेंगे जब कि लोगों में बिगाड़ पैदा हो जायेगा।” (यह एक सहीह हदीस है)
तथा इब्ने मसूऊद रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं “जमाअत वह है जो हक के अनुकूल (मुताबिक) हो अगरचे तुम अकेले ही क्यों न हो।”
बिद्अतों के जन्म लेने के कारण :
1. पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पाक सुन्नत और हदीस शरीफ के नियमों से अनभिग होना, इस प्रकार कि सहीह (विशुद्ध रूप से प्रमाणित) और ज़ईफ (अशुद्ध) हदीस के बीच कोई अन्तर न करना, जिसके कारण ज़ईफ और मौजू (मनगढ़त ) त) हदीसों की भरमार हो जाती है, उदाहरण के तौर पर नूरे-मुहम्मदी की बिद्अत एक मनगढ़त हदीस (ऐ जाबिर ! सब से पहले अल्लाह ने तेरे नबी के नूर को पैदा किया) पर आधारित है, तथा मख्लूकात को मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कारण पैदा किए जाने की बिदअत का आधार एक झूठ गढ़ ली गई हदीस (अगर आप, अगर आप न होते तो मैं अफलाक को पैदा न करता) है, और इस हदीस के गढ़ने वाले से यह बात लुप्त हो गई कि अगर मख्लूक न होती तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पैग़म्बर बनाकर भेजे ही न जाते, जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है :
وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ ﴾ [الأنبياء : ١٠٧].
“हम ने आप को सर्व संसार के लिए रहमत करूणा बनाकर भेजा है।” (सूरतुल अम्बियाः 107)
2. लोगों का जाहिल लोगों को अपना सरदार और अगुवा बना लेना जो उन्हें शिक्षा और फत्वा देते हैं और अल्लाह के दीन के बारे में बिना ज्ञान के अपना मुँह खोलते हैं।
3. ऐसी रीतियाँ और परंपरायें जिनका शरीअत में कोई प्रमाण नहीं, और न ही बुद्धि उन्हें स्वीकारती है, जैसेकि मीलादुन्नबी और मातम इत्यादि की बिद्अतें ।
4. अईम्मा-ए-किराम के बारे में गलतियों से मा’सूम होने का अकीदा रखना, और मशाईख को इस तरह तद्दुस (पवित्रता) का मर्तबा दे देना मानो कि वो नबियों के रूत्वे को पहुँचे हुए हैं।
5. मुताशाबेह (अस्पष्ट) आयतों और हदीसों के पीछे पड़ना और उन्हें स्पष्ट और सुदृढ़ (शंकारहित) आयतों की तरफ न लौटाना।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जयन्ती :
प्रथम घटना: इसे सर्व प्रथम चौथी शताब्दी हिजरी में फातिमी खुलफा ने काहिरा में अविष्कार किया, वो दरअसल उबैदी लोग हैं और उनका फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा से कोई संबंध नहीं है, वो लोग ज़िन्दीक (अधर्मी) हैं जो राफिज़ी होने का प्रदर्शन करते थे जबकि प्रोक्ष रूप से मात्र काफिर थे। उन्हों ने छः जयन्तियों का अविष्कार किया था, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जयन्ती, अली रज़ियल्लाहु अन्हु की जयन्ती, फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा की जयन्ती, हसन और हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा की जयन्ती, और वर्तमान खलीफा की जयन्ती। फिर अफज़ल बिन अमीरूल जैश ने इन्हें निरस्त कर दिया, लेकिन फिर आमिर बि-अहकामिल्लाह फातिमी के द्वारा 524 हिजरी में पुनः इन्हें आरम्भ कर दिया गया जबकि लोग लगभग इन्हें भुला चुके थे। तथा इरबल नामी नगर में मीलादुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सर्व प्रथम अविष्कार मलिक मुज़फ्फर अबू सईद कौकबूरी ने सातवीं शताब्दी हिजरी में किया, और आज तक उस पर अमल होता चला आ रहा है।
यह जयन्तियाँ तीन सर्वश्रेष्ठ शताब्दियों के सलफ सालेहीन के अमल से साबित नहीं है, और न ही अईम्मा-ए-अरबा (चारों सुप्रसिद्ध इमामों के अमल से ही साबित है, बल्कि इन्हें ज़िन्दीकों और जाहिलों (गंवार लोगों) ने तीन सर्व श्रेष्ठ शताब्दियों के बाद ईजाद किया है, अतः यह अल्लाह के धर्म में एक बिद्अत है। तथा आप एक मुशरिक को सदा अल्लाह सुब्हानहु व तआला को कलंकित करते हुए और एक बिद्अती आदमी को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कलंकित करते हुए पायें गे।
शैख सालेह बिन फौज़ान हफिज़हुल्लाह फरमाते हैं “लोगों ने जो घृणित बिद्अतें ईजाद कर ली हैं उन में से एक रबीउल अव्वल के महीने में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जन्म-दिवस का यादगार (स्मरणोत्सव मनाना है, और वो लोग इस उत्सव को मनाने में भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं :
उन में से कुछ ऐसे हैं जो इस दिन मात्र एकत्र होकर जन्म-कथा पढ़ते हैं, या उसमें भाषण दिये जाते और इस अवसर पर (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सराहना में ना’तें) कसीदे पेश किए जाते हैं।
– कुछ लोग खाना और हलवा वगैरह बनाकर उपस्थित लोगों को पेश करते हैं।
उन में से कुछ लोग इस उत्सव को मस्जिदों में मनाते हैं और कुछ लोग इस मजलिस को घरों में सजाते हैं।
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उपर्युक्त चीज़ों पर बस नहीं करते हैं, बल्कि उनका यह उत्सव हराम और अवैध चीज़ों पर आधारित होता है, जैसे कि मर्दों और औरतों का इख़्तिलात, नाच, गाना, या शिर्क वाले काम जैसेकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से फर्याद चाहना, आपको पुकारना, तथा आप के द्वारा दुश्मनों पर विजय मांगना वगैरह। इस में कोई सन्देह नहीं कि यह अपनी सभी किस्मों और विभिन्न रूपों, तथा इसके करने वालों के विभिन्न उद्देशों (मकासिद) के बावजूद एक हराम (अवैध) बिद्अत है जो सर्वश्रेष्ठ शताब्दियों के एक लम्बे समय बाद ईजाद की गई है।
एक मुसलमान के लिए योग्य यह है कि वह सुन्नतों को जीवित करे, बिअतों को मिटाये और किसी काम को करने लिए कदम न उठाये यहाँ तक कि उसके बारे में अल्लाह का हुक्म जान ले।
इस बिद्अत के मनाने के समर्थक ऐसे सन्देहों का सहारा लेते हैं जो मकड़ी के जाले से भी अधिक कमज़ोर हैं, इन सन्देहों को निम्न बिन्दुओं में सीमित किया (समेटा) जा सकता है :
1. उनका यह दावा करना कि इसमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान है :
इसके उत्तर में हम कहें गे कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान (ता’ज़ीम) आप की ताबेदारी, आप के आदेश का पालन और आपकी निषिध चीज़ों से बचाव करने और अल्लाह के वास्ते आप से महब्बत करने में है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान बिआत व खुराफात और ना-फरमानियों के द्वारा नहीं होता, और आपके जन्म का यादगारोत्सव मनाना इसी घृणित और अवैध प्रकार से संबंधित है; क्योंकि यह अवज्ञा (नाफरमानी) है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सब से अधिक टूट कर महब्बत करने वाले सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम हैं,
जैसाकि उऱवा बिन मस्ऊद ने कुरैश से कहा था “ऐ मेरी कौम के लोगो ! अल्लाह की कसम मैं किस्रा और कैसर (फारिस एंव रूम के बादशाह) तथा अन्य गादशाहों के दरबारों में गया हूँ, पर मैं ने किसी बादशाह को नहीं देखा कि उसके मानने वाले उसकी इस तरह ता’ज़ीम करते हों जिस तरह मुहम्मद के साथी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ता’ज़ीम करते हैं, अल्लाह की कसम उनका सम्मान करते हुए वे लोग उनकी तरफ निगाह भर कर देखते भी नहीं।” इस सम्मान के बावजूद उन्हों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस को उत्सव और त्योहार का अवसर नहीं बनाया, यदि यह वैध और नेकी का काम होता तो वे लोग इसे न छोड़ते।
2. इस बात से हुज्जत पकड़ना कि बहुत से देशों में अधिकांश लोगों का यही अमल है।
इसका उत्तर यह है कि हुज्जत और प्रमाण उस चीज़ के अन्दर है जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित है, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सामान्य रूप से बिद्अतों से मुमानियत साबित है, और यह भी उन्हीं में से एक है।
और लोगों का अमल अगर दलील के खिलाफ हो तो वह हुज्जत नहीं बन सकता, अगरचे अधिकतर लोग उसी के समर्थक हों (जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है:)
وَإِن تُطِعْ أَكْثَرَ مَن فِي الْأَرْضِ يُضِلُّوكَ عَن سَبِيلِ اللهِ ﴾ [الأنعام: ١١٦]
“और अगर आप धरती पर बसने वालों की बहुमत की बात मानें गे तो वे आप को अल्लाह के रास्ते से भटका दें गे।” (सूरतुल अन्आम : 116)
जब कि अल्लाह की तारीफ है कि हर ज़माना में ऐसे लोग निरंतर मौजूद रहे हैं जो इस बिद्अत का खण्डन करते रहे हैं और इसकी व्यर्थता को स्पष्ट करते रहे हैं, अतः हक (सत्य) स्पष्ट हो जाने के बाद जो इस बिद्अत को जीवित करने पर निरंतर अड़ा रहा उसके अमल में कोई हुज्जत नहीं।
इस अवसर का उत्सव मनाने का जिन लोगों ने खण्डन किया है उन में शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्यह अपनी किताब (इकूक्तिज़ाउस्सिरातिल मुस्तकीम) में, इमाम शातिबी (अल-ऐतिसाम) में और इब्नुल-हाज्ज (अल मख़ल) में हैं, और शैख ताजुद्दीन अली बिन उमर अल्लखमी ने इसके इन्कार में अलग से एक किताब ही लिखी है,
तथा शैख मुहम्मद बिन बशीर सहसवानी भारतीय ने अपनी किताब (सियानतुल इन्सान) में इसका खण्डन किया है, सैयद मुहम्मद रशीद रज़ा ने इस बाबत एक विशिष्ट पत्रिका लिखी है, और शैख मुहम्मद बिन इब्राहीम आलुश्शैख ने भी इसके बारे में एक विशिष्ट पत्रिका लिखी है, तथा समाहतुश्शैख इब्ने बाज़ ने भी इसका खण्डन किया है,
इनके अतिरिक्त अन्य लोग भी हैं जो हर साल इस बिद्अत के खण्डन में पत्रिकाओं और मैगज़ीनों के पन्नों में बराबर उस समय लिखते रहते हैं जिस समय इस बिद्अत को किया जाता है।
3. वो लोग कहते हैं मीलाद का समारोह करने में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के यादगार को ज़िन्दा और ताज़ा करना है।
इसके उत्तर में हम कहेंगे कि जब हम अल्लाह तआला के बताये हुए तरीके के अनुसार अज़ान व इकामत, खुत्बों, नमाज़ों, तशहुद और दरूद में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जिक्र करते हैं, और जब आप की सुन्नत (हदीसें) पढ़ते हैं और उस चीज़ की पैरवी करते हैं जिसे आप लेकर आये हैं तो इस से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की
याद ज़िन्दा और ताज़ा होती रहती है, और यह एक स्थायी अमल है जो हमेशा दिन और रात जारी रहता है, साल में केवल एक बार नहीं आता।
4. कभी-कभार वो कहते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म का स्मरणोत्सव मनाने का ईजाद एक इन्साफ पसन्द विद्वान बादशाह ने अल्लाह का तक़र्रुब हासिल करने के उद्देश्य से किया है!
इस का उत्तर यह है कि बिद्अत को किसी भी व्यक्ति से स्वीकार नहीं किया जाये गा, और मक्सद का अच्छा होना किसी बुरे काम को वैध (सत्य) नहीं ठहरा सकता, और उसके विद्वान और इन्साफ पसन्द होने का मतलब यह नहीं होता है कि वह ग़लतियों से मा’सूम (पाक व पवित्र) था।
5. उनका यह भी कहना है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्मोत्सव समारोह का मनाना एक अच्छी बिद्अत है; क्योंकि इस से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वजूद पर अल्लाह तआला का शुक्र अदा करने का प्रदर्शन होता है!
इसका उत्तर यह दिया जाये गा कि है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है: “जिसने हमारी इस शरीअत में कोई ऐसी चीज़ ईजाद की जिस का उस से कोई संबंध नही है तो वह मर्दूद (अस्वीकृत) है।” बिअतों में से कोई भी चीज़ अच्छी नहीं तथा उस से यह भी कहा जाये गा कि तुम्हारे गुमान के अनुसार इस शुक्र को अदा करने में छठी शताब्दी हिजरी तक विलम्ब क्यों हो गया, चुनाँचि सहाबा, ताबईन और उनके बाद आने वाले लोगों ने, जो कि सर्वश्रेष्ठ ज़माने के लोग हैं, इस मीलाद समारोह का आयोजन नहीं किया, जबकि वो लोग भलाई के काम पर और शुक्र की अदायगी के बड़े इच्छुक थे
और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अत्यन्त महब्बत करने वाले थे, तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि जिन्हों ने मीलाद की बिद्अत ईजाद की है ये उन (सहाबा व ताबईन) से अधिक हिदायत याफता और उनसे अधिक अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल का शुक्र अदा करने वाले थे? कभी नहीं और कदापि नहीं।
6. उनका यह कथन भी है कि मीलादुन्नबी का स्मरणोत्सव मनाना आप की महब्बत का सूचक है, इस प्रकार यह आप की महब्बत का एक प्रदर्शन है और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म की महब्बत का प्रदर्शन करना वैध (मश्रू) है।
इसके उत्तर में हम कहें गे कि इस में कोई शक नहीं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की महब्बत हर मुसलमान पर उसकी जान, बाल-बच्चों, मात-पिता और समस्त लोगों की महब्बत से कहीं बढ़कर अनिवार्य है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि हम इसमें ऐसी चीज़ गढ़ लें जो हमारे लिए वैध नहीं है, बल्कि आप की महब्बत का तकाज़ा यह है कि
आप का आज्ञा पालन और पैरवी की जाए, क्योंकि यह आप की महब्बत का सबसे महान प्रदर्शन है, जैसाकि कहा गया है:
अगर तुम्हारी महब्बत सच्ची होती, तो तुम अवश्य उनकी पैरवी करते। क्योंकि महब्बत करने वाला अपने महबूब की पैरवी करने वाला होता है।
अतः आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की महब्बत, आपकी सुन्नत को ज़िन्दा करना, उसे मज़बूती से थामे रहना, और उसके मुखालिफ सभी बातों और कामों से दूर रहना है, और इसमें कोई सन्देह नहीं कि आप की सुन्नत के खिलाफ हर चीज़ एक घृणित बिद्अत और प्रत्यक्ष अवज्ञा है, और इसी में से आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैदाइश का यादगार मनाना भी है, क्योंकि यह बिद्आत में से है।
और आदमी की नीयत का अच्छा होना दीन में बिद्अत ईजाद करने को वैध नहीं ठहरा सकता; क्योंकि दीन दो सिद्धांतों पर आधारित है इख्लिास और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी। अल्लाह तआला का फरमान है :
بَلَى مَنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَلَهُ أَجْرُهُ عِندَ رَبِّهِ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا
هُمْ يَحْزَنُونَ ﴾ [البقرة: ١١٢]
“सुनो! जिसने अपने चेहरे को अल्लाह के सामने झुका दिया (आज्ञा पालन किया) और वह नेक करने वाला (भी) है, तो उसी के लिए उसके रब के पास अज्र (पुण्य) है, और उन पर न कोई डर होगा और न वो लोग शोक ग्रस्त हों गे।” (सूरतुल बकरा :112)
चेहरे को झुकाने का मतलब अल्लाह के लिए इख़्लास अपनाना, और एहसान का मतलब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी और आपकी सुन्नत का इत्तिबा करना है।” शैख फौज़ान की बात समाप्त हुई। (अल-बयान पत्रिका)
ईद-मीलादुन्नबी कई कारणों से बातिल है :
1. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि जब आप मदीना आये और वहाँ लोगों की कई ईदें (त्योहार, उत्सव) थीं, तो उन्हें आप ने बातिल (खण्डित) घोषित कर दिया, आप ने फरमाया: “हम मुसलमानों की ईद : ईदुल-फित्र और ईदुल अज़हा है।”
2. शरीअत के नुसूस बिद्अत से रोकते हैं और उसे गुमराही (पथ भ्रष्टता) का नाम देते हैं: (और हर बिद्अत गुमराही (पथ भ्रष्टता) है)
3. और इसी कारण आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जाहिलियत (अज्ञानता काल) के लोगों की ईदों (त्योहारों) को व्यर्थ घोषित कर दिया।
4. यह इस्लाम के दुश्मन राफिज़ियों की ईजाद की हुई बिद्अत है, ये लोग अहले बिद्अत और कब्रों पर कुब्बे और मस्जिदें बनाने वाले लोग हैं।
5. सलफ सालेहीन में से किसी एक ने भी इस बिद्अत को नहीं किया है, जबकि वो लोग सबसे परिपूर्ण ईमान वाले और कुन व हदीस के नुसूस को सबसे अधिक समझने वाले थे, और कोई भी चीज़ जिसे धर्म समझ कर किया जाए और उस का ज्ञान किसी सलफ के यहाँ मौजूद न हो तो वह धर्म नहीं है, बल्कि धर्म में बिना दलील के ईजाद कर ली गई
एक बिद्अत है।
मीलादुन्नबी का समारोह करने वाले लोग :
1. एक वर्ग उन लोगों का है जिन का उद्देश्य बिद्अत फैलाना और उसके लिए अत्यन्त संघर्ष करना है, ये लोग ज्ञान वाले और नेक व परहेज़गार लोग नहीं होते हैं, बल्कि उनके बारे मे सुन्नत के अन्दर और जुमुआ व जमाअत की नमाज़ और नेकी के कामों में हाज़िर होने में कोताही करना मशहूर है, उनके अन्दर चुस्ती और फुर्ती केवल बिद्अतों के वक़्त पैदा होती है, जबकि उनके अधिकतर लोगों को पता होता है कि वह बिअत पर हैं, किन्तु वो उस पर अड़े होते हैं।
2. दूसरा वर्ग आम गंवार लोगों का है जो यह आस्था रखते हैं कि वह एक वैध इबादत और नेकी का काम है, और ऐसे लोगों के पीछे चल रहे होते हैं जो उन्हें गुमराही के गढे की तरफ हाँक कर ले जाते हैं।
3. तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो शह्वत के पुजारी हैं क्योंकि उन्हें मीलाद के समारोह में खान-पान और औरतों का इख्तिलात आदि प्राप्त हो जाता है।
शैख सालेह अल-फौज़ान हफिज़हुल्लाह फरमाते हैं सारांश यह है कि मीलादुन्नबी का स्मरणोत्सव मनाने की सभी किस्में और शक्लें एक घृणित बिद्अत हैं, मुसलमानों पर अनिवार्य है कि वो इस बिद्अत से और इसके अलावा अन्य बिद्अतों से लोगों को रोकें, और सुन्नतों को जीवित करने और उन पर दृढ़ता से जम जाने में व्यस्त हों, तथा इस बिद्अत का प्रसार व प्रचार करने और इसकी हिमायत करने वालों से थोखा न खायें; क्योंकि ये लोग सुन्नतों को जीवित करने से अधिक ध्यान बिद्अतों के जीवित करने पर देते हैं, बल्कि कभी कभार सुन्नतों पर बिल्कुल ही ध्यान नहीं देते, और जिस आदमी का यह हाल हो उसकी तक्लीद करना और उसके पीछे चलना जाईज़ नहीं है, अगरचे इस वर्ग के लोग ही अधिक संख्या में हैं, बल्कि केवल सुन्नत के मार्ग पर चलने वाले सलफ सालेहीन और उनका अनुसरण करने वालों की पैरवी की जाये गी, चाहे उनकी संख्या थोड़ी ही क्यों न हो; क्योंकि हक लोगों के द्वारा नहीं जाना जाता है बल्कि लोग हक के द्वारा पहचाने जाते हैं।
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया है :
“तुम में से जो आदमी मेरे बाद ज़िन्दा रहे गा वह बहुत अधिक इख़्तिलाफ (मतभेद) देखे गा, अतः तुम मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायत याफ्ता (पथप्रदर्शित ) खुलफा-ए-राशिदीन की सुन्नत को दृढ़ता से थाम लो और उसे दाँतों से जकड़ लो।और धर्म में नयी ईजाद कर ली गयी चीज़ों (यानी बिद्अतों) से बचो, क्योंकि हर बिद्अत गुमराही (पथभ्रष्टता) है।”
इस हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमारे लिए यह स्पष्ट कर दिया है कि हम मतभेद के समय किसकी बात मानें और परैवी करें, तथा यह भी स्पष्ट कर दिया कि सुन्नत के खिलाफ हर काम और कथन बिद्अत है और हर बिद्अत गुमराही है। (अल-बयान पत्रिका)
अल्लाह तआला सभी लोगों को उस चीज़ की तौफीक दे जिसे वह पसन्द करता और राजी होता है, अल्लाह तआला से दुआ है कि हमें, हमारे माता-पिता और सभी मुसलमानों को क्षमादान प्रदान कर दे, और अल्लाह तआला की दया एंव शांति अवतरित हो हमारे ईश्दूत मुहम्मद पर, तथा आपकी संतान और साथियों पर।
स्रोत: अब्दुल अजीज बिन सालिम अल-उमर की किताब जिसका हिन्दी अनुवाद अताउर्रहमान जियाउल्लाह साहब ने किया है।