एकमात्र प्रभु अल्लाह का आश्रय लेना आवश्यक है

एकमात्र प्रभु अल्लाह का आश्रय लेना आवश्यक है

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

अल्लाह तआला अपने अलावा किसी को पुकारने से मना फरमाते हुये अपने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से फरमायाः

 وَلَا تَدْعُ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَ فَإِن فَعَلْتَ فَإِنَّكَ إِذَا مِنَ الظَّالِمِينَ  [يونس : ١٠٦]

“और अल्लाह को छोड़ कर ऐसी चीज़ को मत पुकारो, जो न तुम को कोई नफा पहुँचा सके और न ही कोई नुकसान पहुँचा सके। फिर अगर ऐसा किया तो तुम इस हालत में ज़ालिमों में से हो जाओगे।” [यूनुसः 106]

और एक दूसरे मक़ाम पर फ़रमायाः
وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّن يَدْعُوا مِن دُونِ اللَّهِ مَن لَّا يَسْتَجِيبُ لَهُ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ وَهُمْ عَن دُعَائِهِمْ غَافِلُونَ * وَإِذَا حُشِرَ النَّاسُ كَانُوا لَهُمْ أَعْدَاءً وَكَانُوا بِعِبَادَتِهِمْ كَافِرِينَ [الأحقاف : ٦،٥]     

और उस से बढ़ कर गुमराह और कौन होगा जो अल्लाह के सिवा ऐसों को पुकारता है, जो क़ियामत तक उसकी पुकार का जवाब न दे सकें, बल्कि उनके पुकारने से वह बिल्कुल ग़ाफ़िल (बे ख़बर) हों। और जब लोगों को एकट्ठा किया जायेगा तो यह उनके दुशमन हो जायेंगे और उनकी इबादत से साफ इंकार कर जायेंगे। [अल्-अहक़ाफः 5-6]

अल्लाह ने एक दूसरी जगह इरशाद फरमायाः

وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا [الجن: ١٨]
“और यह कि मस्जिदें सिर्फ अल्लाह ही के लिए ख़ास हैं, पस अल्लाह के साथ किसी और को न पुकारो।” [अल्-जिन्न : 18]

कुरआन मजीद में उक्त विषय संबंधी आयतें बहुत ज़्यादा हैं।

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अल्लाह तआला ने सब को छोड़ कर सिर्फ उसी से माँगने और उसी को पुकारने का हुक्म दिया है। जैसाकि फरमायाः
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ  [غافر : ٦٠]
“और तुम्हारे रब का हुक्म (लागू हो चुका) है कि मुझ से दुआ करो, मैं तुम्हारी दुआवों को कबूल करूँगा। यकीन करो कि जो लोग मेरी इबादत से तकब्बुर करते हैं वे जल्द ही रुस्वा हो कर जहन्नम में पहुँच जायेंगे।” [ग़ाफिरः 60]

और एक दूसरी जगह फरमायाः
وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ فَلْيَسْتَجِيبُوا لِي وَلْيُؤْمِنُوا بِي لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ [البقرة: ١٨٦]
“और जब मेरे बंदे मेरे बारे में आप से सवाल करें तो कह दें कि मैं बहुत ही करीब हूँ, हर पुकारने वाले की पुकार को जब कभी भी मुझे पुकारे मैं कबूल करता हूँ, इस लिए लोगों को भी चाहिए कि वह मेरी बात मानें और मुझ पर ईमान रखें, यही उनकी भलाई का कारण (बाइस) है।” [अल्-बक़रह-186]
और एक दूसरे मकाम पर यूँ फ़रमायाः
أَمَّن يُجِيبُ الْمُضْطَرَّ إِذَا دَعَاهُ وَيَكْشِفُ السُّوءَ وَيَجْعَلُكُمْ خُلَفَاءَ الْأَرْضِ أَءِ لَهُ مَعَ اللَّهِ قَلِيلًا مَّا تَذَكَّرُونَ ﴾ [النمل : ٦٢]

“बेबस की पुकार को जबकि वह पुकारे कौन कबूल करके तकलीफ को दूर कर देता है, और तुम्हें धरती का ख़लीफा बनाता है? क्या अल्लाह के साथ दूसरा कोई इबादत के लायक है? तुम बहुत कम नसीहत हासिल करते हो।” [अन्-नम्ल- 62]
अर्थात क्या अल्लाह के साथ कोई और है जो इसके करने पर कादिर (सक्षम) है? तो जवाब यह है कि नहीं कोई नहीं है, बल्कि इस विषय में वह अकेला तथा अद्वितीय है।
अल्लाह तआला ने मज़ीद इरशाद फरमायाः
قُلْ أَمَرَ رَبِّي بِالْقِسْطِ ۖ وَأَقِيمُوا وُجُوهَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ ۚ كَمَا بَدَأَكُمْ تَعُودُونَ [الأعراف: ٢٩]
“आप कहिये कि मेरे रब ने मुझे इंसाफ का हुक्म दिया है, और हर सज्दा के वक़्त अपने चेहरे को सीधी दिशा में कर लो, और उसके (अल्लाह के) लिए दीन को ख़ालिस करके उसे पुकारो, उस ने जैसे तुम को शुरू में पैदा किया उसी तरह फिर पैदा होगे।” [अल्-आ’राफः 29]

नीज़ दूसरी जगह उसका फरमान हैः
هُوَ الْحَيُّ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ فَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ ۗ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ  [غافر: ٦٥]
“वह ज़िंदा है जिसके सिवाय कोई सच्चा माबूद नहीं, तो तुम इखलास से उसी की इबादत करते हुये उसे पुकारो, सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है जो सारी दुनिया का रब है।” [ग़ाफ़िरः 65]

एक और मकाम पर इरशाद हैः
ادْعُوا رَبَّكُمْ تَضَرُّعًا وَخُفْيَةً ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ (*) وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا وَادْعُوهُ خَوْفًا وَطَمَعًا ۚ إِنَّ رَحْمَتَ اللَّهِ قَرِيبٌ مِّنَ الْمُحْسِنِينَ (*)[الأعراف: ٥٥-٥٦]

तुम लोग अपने रब से दुआ किया करो गिड़गिड़ा करके भी और चुपके चुपके भी, वह हद से बढ़ने वालों से महब्बत नहीं करता है। और धरती में सुधार के बाद बिगाड़ न पैदा करो, और डर व उम्मीद के साथ उसकी इबादत करो, बेशक अल्लाह की रहमत नेक लोगों से करीब है।” [अल्-आ’राफः 55-56]

अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, उन्हों ने कहाः मैं एक दिन (सवारी पर) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पीछे (बैठा हुआ) था। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः
يا غلام إني أعلمك كلمات‏:‏ ‏”‏احفظ الله يحفظك، احفظ الله تجده تجاهك، إذا سألت فاسأل الله ، وإذا استعنت فاستعن بالله، واعلم‏:‏ أن الأمة لو اجتمعت على أن ينفعوك بشيء، لم ينفعوك إلا بشيء قد كتبه الله لك، وإن اجتمعوا على أن يضروك بشيء، لم يضروك بشيء إلا بشيء قد كتبه الله عليك؛ رفعت الأقلام، وجفت الصحف‏

ऐ लड़के ! मैं तुझे चंद (अहम) बातें बतलाता हूँ (उन्हें याद रख): तू अल्लाह के (अह्काम) की हिफाज़त कर, अल्लाह तेरी हिफाज़त फ़रमायेगा। तू अल्लाह के (हुकूक) का ख़्याल रख, तू उसे अपने सामने पायेगा (यानी उसकी हिफाज़त और मदद तेरे साथ रहेगी)। जब तू सवाल करे तो सिर्फ अल्लाह से कर।और जब तू मदद चाहे तो सिर्फ अल्लाह से मदद तलब कर। और यह बात जान ले कि अगर सारी उम्मत भी जमा हो कर तुझे कुछ नफा पहुँचाना चाहे, तो वह तुझे इस से ज़्यादा कुछ नफा नहीं पहुँचा सकती जो अल्लाह ने तेरे लिए लिख दिया है। और अगर वह तुझे कुछ नुकसान पहुँचाने के लिए जमा हो जाये, तो इस से ज़्यादा कुछ नुक्सान नहीं पहुँचा सकती जो अल्लाह ने तेरे लिए लिख दिया है। कलम उठा लिये गये और सहीफे खुश्क हो गये।” इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है और कहा हैः यह हदीस हसन सहीह है]

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अल्लाह तआला ने अपनी किताब कुरआने अज़ीम में बयान फ़रमाया है कि जो शख्स उसको छोड़ कर किसी और से माँगे तथा उसे पुकारे, तो वह कुफ़्र और शिर्क में वाके (पतित) हो जायेगा। जैसाकि उसका फरमान हैः
وَمَن يَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ لَا بُرْهَانَ لَهُ بِهِ فَإِنَّمَا حِسَابُهُ عِندَ رَبِّهِ ۚ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ [المؤمنون: ۱۱۷]
“और जो शख़्स अल्लाह के साथ किसी दूसरे देवता को पुकारे जिसका उसके पास कोई सुबूत नहीं तो उसका हिसाब उसके रब के ऊपर ही है। बेशक काफिर लोग कामयाबी से महरूम हैं।” [अल-मोमिनूनः 117]

और एक दूसरी जगह इरशाद फरमायाः
وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّن يَدْعُو مِن دُونِ اللَّهِ مَن لَّا يَسْتَجِيبُ لَهُ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ وَهُمْ عَن دُعَائِهِمْ غَافِلُونَ (*) وَإِذَا حُشِرَ النَّاسُ كَانُوا لَهُمْ أَعْدَاءً وَكَانُوا بِعِبَادَتِهِمْ كَافِرِينَ  [الأحقاف : ٥-٦]
“और उस से बढ़ कर गुमराह और कौन होगा जो अल्लाह के सिवा ऐसों को पुकारता है, जो कियामत तक उसकी पुकार का जवाब न दे सकें, बल्कि उनके पुकारने से वह बिल्कुल ग़ाफ़िल (बे ख़बर) हों। और जब लोगों को एकट्ठा किया जायेगा तो यह उनके दुशमन हो जायेंगे और उनकी इबादत से साफ इंकार कर जायेंगे।[अल्-अहक़ाफः 5-6}

और एक दूसरे मकाम पर फरमायाः
قُلْ إِنَّمَا أَدْعُوا رَبِّي وَلَا أُشْرِكْ بِهِ أَحَدًا [الجن: ٢٠]
“आप कह दीजिये कि मैं तो केवल अपने रब को ही पुकारता हूँ और उसके साथ किसी को साझीदार नहीं बनाता।” [अल्-जिन्न-20]

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अल्लाह तआला ने बयान फरमाया कि मख़लूक उसके नज़दीक कितने भी बड़े रुत्बे वाला बन जाये, वह सिर्फ वही चीजें कर सकती है जिस पर अल्लाह ने उसे कादिर तथा सक्षम बनाया है। और वे उसी के मुहताज हैं। नीज़ वह सब के सब बशर (मानव) हैं, उन्हें हर वह चीज़ लाहिक (आपतित) होती है जो एक बशर को लाहिक होती है। पस वह पानाहार करते (खाते पीते) हैं, बीमार होते हैं और मौत का मजा चखते हैं। अल्लाह तआला ने फरमायाः
يَتَأَيُّهَا النَّاسُ أَنتُمُ الْفُقَرَاءُ إِلَى اللَّهِ وَاللَّهُ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ [فاطر: ١٥]
“ऐ लोगो ! तुम अल्लाह के भिखारी हो, और अल्लाह ही बेनियाज़ (अमुखापेक्षी) तारीफ वाला है।” [फ़ातिरः 15]
और अल्लाह तआला ने मूसा (अलैहिस्सलाम) के बारे में फ़रमायाः
رَبِّ إِنِّي لِمَا أَنزَلْتَ إِلَيَّ مِنْ خَيْرٍ فَقِيرٌ  [ القصص : ٢٤] ….
“ऐ पालनहार ! तू जो कुछ भलाई मेरी तरफ उतारे मैं उसका मुहताज हूँ।” [अल्-क़सस-24]

और अल्लाह तआला ने इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के संबंध में इरशाद फरमायाः
وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ  [الشعراء: ٨٠]
“और जब मैं बीमार पड़ जाऊँ तो वही मुझे निरोग (शिफा अता) करता है।” [अश्-शुअरा: 80]

और अल्लाह तआला ने ईसा तथा उनकी माँ मरयम अलैहिमस्सलाम के मुतअल्लिक बयान फरमाया कि वह दोनों खाना खाते थे, जैसाकि इरशाद हैः
مَّا الْمَسِيحُ ابْنُ مَرْيَمَ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ الرُّسُلُ وَأُمُّهُ صِدِّيقَةٌ ۖ كَانَا يَأْكُلَانِ الطَّعَامَ ۗ انظُرْ كَيْفَ نُبَيِّنُ لَهُمُ الْآيَاتِ ثُمَّ انظُرْ أَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ  [المائدة: ٧٥]
“मरयम के बेटे मसीह सिर्फ पैगंबर होने के सिवाय कुछ भी नहीं, उस से पहले भी बहुत से पैगंबर हो चुके हैं, उसकी माँ एक पाक और सच्ची औरत थी, दोनों (माँ-बेटे) खाना खाया करते थे, आप देखिये कि हम किस तरह दलील उनके सामने पेश करते हैं, फिर गौर कीजिये कि वे किस तरह फिरे जाते हैं।” [अल्-माइदा : 75]

और एक दूसरी जगह इरशाद फरमायाः
قُلْ فَمَن يَمْلِكُ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا إِنْ أَرَادَ أَن يُهْلِكَ الْمَسِيحَ ابْنَ مَرْيَمَ وَأُمَّهُ وَمَن فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا…. [المائدة: ١٧] …..
“आप उन से कह दीजिये कि अगर अल्लाह मरयम के बेटे मसीह तथा उनकी माँ और धरती के सब लोगों को हलाक कर देना चाहे तो कौन है जो अल्लाह पर कुछ भी अख्तियार रखता हो।” [अल्-माइदा : 17]
और एक दूसरे मकाम पर फरमायाः
وَمَا أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِنَ الْمُرْسَلِينَ إِلَّا إِنَّهُمْ لَيَأْكُلُونَ الطَّعَامَ وَيَمْشُونَ فِي الْأَسْوَاقِ…. [الفرقان: ٢٠] ….

“हम ने आप से पहले जितने रसूल भेजे सब के सब खाना भी खाते थे और बाज़ारों में भी चलते फिरते थे।” [अल्-फुरक़ानः 20]
और अल्लाह तआला ने अपने प्यारे नबी मुहम्मद के संबंध में फरमायाः
إِنَّكَ مَيِّتٌ وَإِنَّهُم مَّيِّتُونَ… [الزمر : ٣٠]…
“बेशक खुद आपको भी मौत आयेगी और यह सब भी मरने वाले हैं।” [अज़्जुमरः 30]

अल्लाह ने एक दूसरी जगह इरशाद फरमायाः
وَلَا تَقُولَنَّ لِشَيْءٍ إِنِّي فَاعِلٌ ذَلِكَ غَدًا ۝  إِلَّا أَن يَشَاءَ اللَّهُ وَاذْكُر رَّبَّكَ إِذَا نَسِيتَ وَقُلْ عَسَى أَن يَهْدِيَنِ رَبِّي لِأَقْرَبَ مِنْ هَذَا رَشَدًا [الكهف: ٢٣-٢٤]
“और कभी किसी काम पर इस तरह न कहें कि मैं इसे कल करूँगा। लेकिन साथ ही इन शा अल्लाह (यानी अगर अल्लाह ने चाहा तो) कह लें, और जब भी भूलें अपने रब को याद कर लिया करें, और कहते रहें कि मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरा रब इस से भी ज़्यादा हिदायत के करीब की बात की हिदायत करेगा।”[ अल्-कहफ : 23-24]

एक और मकाम पर अल्लाह तआला ने फरमायाः
قُلْ إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ مِثْلُكُمْ يُوحَى إِلَى أَنَّمَا إِلَهُكُمْ إِلَهُ وَاحِدٌ فَمَن كَانَ يَرْجُوا لِقَاءَ رَبِّهِ فَلْيَعْمَلْ عَمَلًا صَالِحًا وَلَا يُشْرِكْ بِعِبَادَةِ رَبِّهِ أَحَدًا  [الكهف: ١١٠]
“आप कह दीजिये कि मैं तो तुम जैसा ही एक इंसान हूँ, (हाँ) मेरी तरफ वह्य की जाती है कि सब का माबूद सिर्फ एक ही माबूद है, तो जिसे भी अपने रब से मिलने की उम्मीद हो उसे चाहिये कि नेक काम करे और अपने रब की इबादत में किसी को भी शरीक न करे।” [अल्-कहफ : 110]

बल्कि अल्लाह तआला ने ख़बर दी है कि बाज़ नबीयों को उनकी कौम ने कत्ल कर डाला। जैसाकि उसका फरमान हैः
أَفَكُلَّمَا جَاءَكُمْ رَسُولٌ بِمَا لَا تَهْوَىٰ أَنفُسُكُمُ اسْتَكْبَرْتُمْ فَفَرِيقًا كَذَّبْتُمْ وَفَرِيقًا تَقْتُلُونَ … [البقرة: ٨٧]…
“लेकिन जब कभी तुम्हारे पास रसूल वह चीज़ लाये जो तुम्हारी तबीअतों के खिलाफ थीं, तुम ने फौरन तकब्बुर किया, फिर कुछ को तुम ने झुटला दिया और कुछ को कत्ल कर दिया।” [अल्-बक़रह : 87]

चुनाँचि हम जिस नतीजे पर पहुँचते हैं वह यह कि दुआ व पुकार और इबादत व उपासना केवल अल्लाह ही के लिए होगी, क्योंकि वही अकेला रब है जो हर चीज़ पर कादिर है, मख़लूक में से कोई भी तमाम चीज़ों पर कादिर नहीं है। जैसाकि अल्लाह तआला ने फरमायाः
إِنَّ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ عِبَادٌ أَمْثَالُكُمْ ۖ فَادْعُوهُمْ فَلْيَسْتَجِيبُوا لَكُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ [الأعراف : ١٩٤]
“हकीकत में तुम अल्लाह को छोड़ कर जिनको पुकारते (इबादत करते) हो वह भी तुम ही जैसे बंदे हैं, पस तुम उनको पुकारो, फिर उनको चाहिये कि वे तुम्हारा कहना कर दें अगर तुम सच्चे हो।” [अल्-आ’राफः 194]

और एक दूसरी जगह अल्लाह तआला ने फरमायाः
يَا أَيُّهَا النَّاسُ ضُرِبَ مَثَلٌ فَاسْتَمِعُوا لَهُ ۚ إِنَّ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَن يَخْلُقُوا ذُبَابًا وَلَوِ اجْتَمَعُوا لَهُ ۖ وَإِن يَسْلُبْهُمُ الذُّبَابُ شَيْئًا لَّا يَسْتَنقِذُوهُ مِنْهُ ۚ ضَعُفَ الطَّالِبُ وَالْمَطْلُوبُ  [الحج : ٧٣]
“ऐ लोगो ! एक मिसाल दी जा रही है, ज़रा ध्यान से सुनो, अल्लाह के सिवाय तुम जिन जिन को पुकारते रहे हो वे एक मक्खी तो पैदा नहीं कर सकते अगर सारे के सारे जमा हो जायें, बल्कि अगर मक्खी उन से कोई चीज़ ले भागे यह तो उसे भी उस से छीन नहीं सकते। बड़ा कमज़ोर है माँगने वाला और बहुत कमज़ोर है जिस से माँगा जा रहा है।”[ अल्-हज्ज : 73]
और एक दूसरे मकाम पर इरशाद फरमायाः
وَالَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا [الفرقان : ٦٥]
“और जो यह दुआ करते हैं कि ऐ हमारे रब ! हम से जहन्नम का अज़ाब दूर ही रख क्योंकि उसका अज़ाब चिमट जाने वाला है।” [अल्-फुरक़ानः 65]

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अल्लाह तआला ने ख़बर दी है कि सारे अम्बिया व पैग़म्बर और उसके नेक बंदे, बल्कि उसके फरिश्ते भी अपने तमाम उमूर (विषय) तथा अपने मुख्तलिफ हालात में सिवाय अल्लाह के किसी और को नहीं पुकारते थे। अतः उनकी इक्तिदा और पैरवी करना हम पर वाजिब है। पस अल्लाह तआला ने अपने नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) के बारे में फ़रमाया जब कि वह मछली के पेट में थेः
وَذَا النُّونِ إِذ ذَّهَبَ مُغَاضِبًا فَظَنَّ أَن لَّن نَّقْدِرَ عَلَيْهِ فَنَادَىٰ فِي الظُّلُمَاتِ أَن لَّا إِلَٰهَ إِلَّا أَنتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنتُ مِنَ الظَّالِمِينَ فَاسْتَجَبْنَا لَهُ وَنَجَّيْنَاهُ مِنَ الْغَمِّ ۚ وَكَذَٰلِكَ نُنجِي الْمُؤْمِنِينَ  [الأنبياء : ۸۷، ۸۸]
“और मछली वाले (यूनुस) को (याद करो) जब कि वह नाराज़ हो कर चल दिया और समझता था कि हम उसे न पकड़ सकेंगे। आख़िर में उस ने अंधेरों के अंदर से पुकारा कि इलाही ! तेरे सिवाय कोई सच्चा माबूद नहीं, तू पाक है, बेशक मैं ही ज़ालिमों में से हूँ।” [अल्-अम्बियाः 87-88]
और अल्लाह तआला ने अपने नबी ज़करीया (अलैहिस्सलाम) के बारे में फरमायाः
وَزَكَرِيَّا إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُ رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْدًا وَأَنتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَ ۝ فَاسْتَجَبْنَا لَهُ وَوَهَبْنَا لَهُ يَحْيَىٰ وَأَصْلَحْنَا لَهُ زَوْجَهُ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَيَدْعُونَنَا رَغَبًا وَرَهَبًا ۖ وَكَانُوا لَنَا خَاشِعِينَ [الأنبياء : ٨٩-٩٠]

“और ज़करीया को (याद करो) जब उस ने अपने रब से दुआ की कि ऐ मेरे रब! मुझे अकेला न छोड़, तू सब से अच्छा वारिस है। तो हम ने उसकी दुआ कबूल कर ली और उसे यह्या अता किया, और उनकी पत्नी को उनके लिए सुधार दिया। यह बुजुर्ग लोग नेक कामों की तरफ जल्दी करते थे, और हमें रग़बत और डर के साथ पुकारते थे, और हमारे सामने आजिज़ी (विनम्रता) करने वाले थे।” [अल्-अम्बियाः 89-90]
और अल्लाह तआला ने अपने नबी अय्यूब (अलैहिस्सलाम) के संबंध में फ़रमाया जिस समय उन्हों ने अपने रब को पुकारते हुये कहाः
وَأَيُّوبَ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُ أَنِّي مَسَّنِيَ الضُّرُّ وَأَنتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ ۝ فَاسْتَجَبْنَا لَهُ فَكَشَفْنَا مَا بِهِ مِن ضُرٍّ ۖ وَآتَيْنَاهُ أَهْلَهُ وَمِثْلَهُم مَّعَهُمْ رَحْمَةً مِّنْ عِندِنَا وَذِكْرَىٰ لِلْعَابِدِينَ [الأنبياء : ٨٣-٨٤]
और अय्यूब (की उस हालत को याद करो) जबकि उस ने अपने रब को पुकारा कि मुझे यह रोग लग गया है, और तू सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाला है। तो हम ने उसकी सुन ली और जो दुख उन्हें था उसे दूर कर दिया, और उसे उसका परिवार अता किया, बल्कि उसे अपनी ख़ास रहमत से उनके साथ वैसे ही और दिये, ताकि इबादत करने वालों के लिए नसीहत का सबब हो। [अल्-अम्बियाः 83-84]

एक दूसरी जगह अल्लाह ने यूँ फ़रमायाः

الَّذِينَ يَحْمِلُونَ الْعَرْشَ وَمَنْ حَوْلَهُ يُسَبِّحُونَ بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَيُؤْمِنُونَ بِهِ وَيَسْتَغْفِرُونَ لِلَّذِينَ آمَنُوا رَبَّنَا وَسِعْتَ كُلَّ شَيْءٍ رَّحْمَةً وَعِلْمًا فَاغْفِرْ لِلَّذِينَ تَابُوا وَاتَّبَعُوا سَبِيلَكَ وَقِهِمْ عَذَابَ الْجَحِيمِ  ۝ رَبَّنَا وَأَدْخِلْهُمْ جَنَّاتِ عَدْنٍ الَّتِي وَعَدتَّهُمْ وَمَن صَلَحَ مِنْ آبَائِهِمْ وَأَزْوَاجِهِمْ وَذُرِّيَّاتِهِمْ ۚ إِنَّكَ أَنتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ [غافر: ۷-۸]

अर्श के उठाने वाले और उसके आस-पास के फरिश्ते अपने रब की तस्बीह तारीफ के साथ-साथ करते हैं और उस पर ईमान रखते हैं, और ईमान वालों के लिए इस्तिग़फार करते हैं, (कहते हैं कि) ऐ हमारे रब! तू ने हर चीज़ को अपनी रहमत और इल्म से घेर रखा है, तो तू उन्हें माफ कर दे जो माफ़ी माँगें और रास्ते की पैरवी करें, और तू उन्हें जहन्नम के अज़ाब से बचा ले। ऐ हमारे रब ! तू उन्हें हमेशा रहने वाली जन्नतों में ले जा, जिनका तू ने उन से वादा किया है, और उनके बाप दादों, और बीवीयों और औलाद में से (भी) उन सब को जो नेक हैं। बेशक तू ज़बरदस्त और हिक्मत वाला है।” [ग़ाफिरः 7-8]

इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मर्वी (वर्णित) है, उन्हों ने कहाः बद्र के दिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यूँ दुआ फरमाईः
اللَّهُمَّ إِنِّي أَنْشُدُكَ عَهْدَكَ وَوَعْدَكَ، اللَّهُمَّ إِنْ شِئْتَ لَمْ تُعْبَدُ» البخاري (2915)
“ऐ अल्लाह! मैं तेरे अहद व पैमान और वादा का वास्ता देता हूँ, अगर तू चाहे (कि यह काफिर ग़ालिब हूँ तो मुसलमानों के ख़त्म हो जाने के बाद) तेरी इबादत न होगी।”
इस पर अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का हाथ थाम लिया और कहाः

बस कीजिये (ऐ अल्लाह के रसूल!)। उसके बाद आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) (अपने ख़ीमे से) बाहर तशरीफ लाये, तो आपकी जुबाने मुबारक पर यह आयत थीः
سَيُهْزَمُ الْجَمْعُ وَيُوَلُّونَ الدُّبُرَ [القمر: ٤٥]
“जल्द ही कुफ़्फ़ार की जमाअत को हार होगी और यह पीठ फेर कर भाग निकलेंगे।” [अल्-क़मरः 45] (सहीह बुख़ारीः 4856)

हाफ़िज़ इब्ने हजर अस्कलानी ने कहाः तबरानी में हसन सनद के साथ है, अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद फरमाते हैं कि हम ने कोई ऐसा इलतिजा करने वाला नहीं पाया जो अपनी गुम शुदा चीज़ की इलतिजा कर रहा हो, और वह मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की इलतिजा से ज़्यादा सख़्त हो जब आप बद्र के दिन अपने रब से इन शब्दों में इलतिजा कर रहे थेः
«اللَّهُمَّ إِنِّي أَنْشُدُكَ مَا وَعَدَّتِنِي
“ऐ अल्लाह ! तेरे मुझ से किये गये वादा का वास्ता दे कर मैं तुझ से इलतिजा करता हूँ। [फत्हुल बारीः ७/२२५}
और सुनन नसाई (१०३६७) में है, अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद फ़रमाते हैं कि बद्र के दिन जब हमारी मुडभेड़ हुई, तो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नमाज़ में खड़े हो गये। पस मैं ने आपको देखा कि आप एक हक़दार के अपने हक के लिए इलतिजा करने से कहीं ज़्यादा अपने रब से इलतिजा करते हुये कह रहे थेः
«اللَّهُمَّ إِنِّي أَنْشُدُكَ وَعْدَكَ وَعَهْدَكَ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مَا وَعَدْتَنِي اللَّهُمَّ إِنْ تُهْلِكُ هَذِهِ الْعِصَابَةَ لا تُعْبَدْ فِي الأَرْضِ ثُمَّ الْتَفَتَ إِلَيْنَا كَأَنَّ شُقَّةَ وَجْهه الْقَمَرُ، فَقَالَ: هَذِهِ مَصَارِعُ الْقَوْمِ الْعَشِيَّةَ»

“ऐ अल्लाह! मैं तेरे अहद व पैमान और वादा का वास्ता देता हूँ। ऐ अल्लाह मैं तुझ से वह चीज़ माँगता हूँ जिसका तू ने मुझ से वादा किया है। ऐ अल्लाह ! अगर तू इस मुट्ठी भर जमाअत को हलाक कर देगा तो धरती पर तेरी इबादत नहीं की जायेगी।” फिर आप हमारी तरफ मुड़े तो ऐसा लगा गोया आपके चेहरे का टुकड़ा चाँद है।

फिर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)ने फरमायाः
“आज ही यह जगह कौम (कुरैश) के पछाड़े जाने की जगह होगी।”
और तबरानी (१०२७०) में अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) से मर्वी है, उन्हों ने कहाः
اللَّهُمَّ إِنِّي أَنْشُدُكَ مَا وَعَدْتَنِي اللَّهُمَّ إِنَّكَ إِنْ تُهْلِكَ هَذِهِ الْعِصَابَةَ لَا تُعْبَدُ كَأَنَّمَا أَنْظُرُ إِلَى مَصَارِعِ الْقَوْمِ عَشِيَّةً.. ثُمَّ الْتَفَتَ كَأَنَّ وَجْهَهُ الْقَمَرُ ، فَقَالَ:
“ऐ अल्लाह! मैं तेरे वादा का वास्ता देता हूँ। ऐ अल्लाह ! अगर तू इस मुट्ठी भर जमाअत को हलाक कर देगा तो तेरी इबादत नहीं की जायेगी।” फिर आप मुड़े तो गोया आपका चेहरा चाँद है। फिर आप ने फरमायाः “गोया कि मैं आज कौम (कुरैश) के पछाड़े जाने की जगह देख रहा हूँ।”

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पूरी काइनात (विश्व) तथा उस में पाई जाने वाली तमाम चीजें अल्लाह ही के लिए हैं, उसी के हाथ में हैं और उसी के ज़ेरे तसर्राफ व तदबीर (उसी के क़ब्ज़े तथा परिचालना के आधीन) हैं। तब तो फिर अल्लाह ही की ज़ात ऐसी है जिसे पुकारा जाना चाहिये, क्योंकि मुल्क उसी का मुल्क है, मख़लूक उसी की मख़लूक है और हुक्म उसी का हुक्म है। जैसाकि अल्लाह तआला ने फरमायाः
الرَّحْمَنُ عَلَى الْعَرْشِ اسْتَوَى لَهُ مَا فِي السَّمَوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَمَا تَحْتَ الثَّرَى [ طه : ٥ – ٦]
“जो रहमान है, अर्श पर कायम है। जिसकी मिल्कियत आसमानों तथा ज़मीन और इन दोनों के दरमियान और धरती की सतह से नीचे हर चीज़ पर है।” [ताहाः ५-६]

और एक मकाम पर अल्लाह तआला ने फरमायाः
يَعْلَمُ مَا يَلِجُ فِي الْأَرْضِ وَمَا يَخْرُجُ مِنْهَا وَمَا يَنزِلُ مِنَ السَّمَاءِ وَمَا يَعْرُجُ فِيهَا ۖ وَهُوَ مَعَكُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ [الحديد : ٤]
“वह जानता है उस चीज़ को जो ज़मीन में जाये, और जो उस से निकले, और जो आसमान से नीचे आये और जो चढ़ कर उस में जाये, और जहाँ कहीं तुम हो वह तुम्हारे साथ है, और जो तुम कर रहे हो अल्लाह देख रहा है।” [फातिरः ४]

नीज़ और एक मकाम पर फरमायाः
إِن تَدْعُوهُمْ لَا يَسْمَعُوا دُعَاءَكُمْ وَلَوْ سَمِعُوا مَا اسْتَجَابُوا لَكُمْ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ يَكْفُرُونَ بِشِرْكِكُمْ وَلَا يُنَبِّئُكَ مِثْلُ خَبِيرٍ ﴾ [فاطر: ١٤]
अगर तुम उन्हें पुकारो तो वे तुम्हारी पुकार सुनते ही नहीं, और अगर (मान लिया कि) सुन भी लें तो फरयाद रसी नहीं करेंगे, बल्कि क़ियामत के दिन तुम्हारे इस शिर्क का साफ इंकार कर जायेंगे, और आपको कोई भी (अल्लाह तआला) जैसा जानकार ख़बरें न देगा। [फातिरः 14]

और एक दूसरी जगह अल्लाह तआला ने इरशाद फरमायाः
اللهُ الصَّمَدُ [ الإخلاص : ٤]
“अल्लाह बेनियाज़ (अमुखापेक्षी) है।”[ अल्-इखलासः २}
अस्समद‘ यानी वह ज़ात जिसके मुहताज सारा विश्व अपनी तमाम ज़रूरतों में हो।

अल्लाह तआला ने अपने नबीयों और रसूलों के बारे में बयान फ़रमाया कि उन्हों ने बसा औकात अपने बाज़ मसायल में अल्लाह से इलतिजा की, मगर वह कबूल नहीं की गई और उनका मन्शा पूरा नहीं हुआ। जैसाकि अल्लाह तआला ने अपने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के संबंध में फ़रमायाः
إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ [ القصص : ٥٦]
“आप जिसे चाहें हिदायत नहीं दे सकते, बल्कि अल्लाह ही जिसे चाहे हिदायत देता है। हिदायत पाये लोगों को वही अच्छी तरह जानता है।” [अल्-क़ससः 56]

और एक दूसरे मकाम पर यूँ फरमायाः
اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِن تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَن يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ… [التوبة : ٨٠]
“आप इनके लिए इस्तिग़फार (माफी तलब) करें या न करें, अगर आप सत्तर मरतबा भी इनके लिए इस्तिग़फ़ार करें तो भी अल्लाह उन्हें हरगिज़ माफ नहीं करेगा।” [अत्-त्तौबाः 80]
एक दूसरी जगह अल्लाह तआला ने फरमायाः
مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَن يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَىٰ مِن بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُمْ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ  [التوبة: ١١٣]

“नबी और दूसरे मु’मिनों को इजाज़त नहीं कि मुशरिकीन के लिए माफी की दुआ माँगें अगरचे वे रिश्तेदार ही हों, इस बात के वाज़ेह (स्पष्ट) हो जाने के बाद कि यह लोग जहन्नमी हैं।” [अत्तौबाः 113]

और अल्लाह तआला ने इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बारे में इरशाद फरमायाः
وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ إِبْرَاهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَن مَّوْعِدَةٍ وَعَدَهَا إِيَّاهُ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُ أَنَّهُ عَدُوٌّ لِّلَّهِ تَبَرَّأَ مِنْهُ ۚ إِنَّ إِبْرَاهِيمَ لَأَوَّاهٌ حَلِيمٌ  [التوبة : ١١٤]

“और इब्राहीम का अपने बाप के लिए माफी की दुआ करना वह सिर्फ वादा के सबब से था जो उन्हों ने उस से कर लिया था, फिर जब उन पर यह बात वाज़ेह हो गई कि वह अल्लाह का दुशमन है, तो वह उस से बरी (बेज़ार) हो गये, हकीकत में इब्राहीम बड़े नरम दिल बुर्दबार (सहन करने वाले) थे।” [अत्तौबाः 114]
और यह बात विदित (मालूम) है कि अल्लाह तआला ने इस विषय में इब्राहीम की दुआ कबूल नहीं फरमाई। और अल्लाह तआला ने नूह (अलैहिस्सलाम) के बारे में फरमायाः
وَنَادَىٰ نُوحٌ رَّبَّهُ فَقَالَ رَبِّ إِنَّ ابْنِي مِنْ أَهْلِي وَإِنَّ وَعْدَكَ الْحَقُّ وَأَنتَ أَحْكَمُ الْحَاكِمِينَ ۝  قَالَ يَا نُوحُ إِنَّهُ لَيْسَ مِنْ أَهْلِكَ ۖ إِنَّهُ عَمَلٌ غَيْرُ صَالِحٍ ۖ فَلَا تَسْأَلْنِ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ ۖ إِنِّي أَعِظُكَ أَن تَكُونَ مِنَ الْجَاهِلِينَ ۝ قَالَ رَبِّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَسْأَلَكَ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ ۖ وَإِلَّا تَغْفِرْ لِي وَتَرْحَمْنِي أَكُن مِّنَ الْخَاسِرِينَ  [هود : ٤٥-٤٧]
“और नूह ने अपने रब को पुकारा और कहा कि ऐ मेरे रब! मेरा बेटा तो मेरे घर वालों में से है, और बेशक तेरा वादा बिल्कुल सच्चा है, और तू तमाम हाकिमों से बेहतर हाकिम है। अल्लाह ने कहाः ऐ नूह ! बेशक वह तेरे घराने से नहीं है, उसके काम बिल्कुल ही नापसंदीदा है, तुझे हरगिज़ वह चीज़ न माँगनी चाहिये जिसका तुझे तनिक भी इल्म न हो, मैं तुझे नसीहत करता हूँ कि तू जाहिलों में से अपना शुमार कराने से दूर रह।
नूह ने कहाः ऐ मेरे रब! मैं तेरी ही पनाह चाहता हूँ इस बात से कि तुझ से वह चीज़ माँगूँ जिसका मुझे इल्म ही न हो, अगर तू मुझे माफ नहीं करेगा और तू मुझ पर रहम न करेगा तो मैं घाटा उठाने वालों में हो जाऊँगा।” [हूदः 45-47}
तो भला अल्लाह के अलावा दूसरों को कैसे पुकारा जा सकता है?!
जंगे उहुद के मन्ज़र (दृश्य) को याद कीजिये कि उस में सहाबये किराम रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की क्रियादत (नेतृत्व) में मुशरिकीन के साथ लड़ाई करते हुये उन पर गलबा हासिल करना चाह रहे थे, और इसके लिए हर मुम्किन वसायेल व ज़राये’ भी अपनाये (माध्यम अबलंबन किये) थे, लेकिन इसके बावुजूद सफलता के अंतिम सीमा (कामयाबी के आख़िरी हद) तक न पहुँच सके। अल्लाह तआला ने इस से मुतअल्लिक सूरह आलि इम्रान में बहुत सारी आयतें नाज़िल फरमाई, जिन में मुसलमानों के लिए तालीम व तरबियत (शिक्षा तथा दीक्षा) है उस विषय के कारण जो उन पर दर पेश (आपतित) हुआ। और सिफ़्फ़ीन युद्ध में अली बिन अबी तालिब के साथ जो हुआ उस पर भी ग़ौर कीजिये कि उन्हों ने विपक्ष दल (मुखालिफ जमाअत) पर गुलबा हासिल करने के लिए भर पूर कोशिश की, लेकिन इसके बावुजूद उनका मनशा पूरा नहीं हुआ।

हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की हालत पर भी ग़ौर कीजिये कि (मैदाने करबला में) वह और उनके बाज़ घर वाले अपने नफ़्स तथा अपने घर वालों की तरफ से दिफा करते हुये लड़ते रहे, मगर न वह खुद अपने आपको बचा सके और न ही उनके घर वालों ने उनको बचा पाया। अतः कहाँ हैं वह लोग जो अल्लाह को छोड़ कर अली और हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा को पुकारते हैं, जो न अपने नफ़्सों को बचाने में और न अपने परिवार की हिफाज़त करने में या अल्लाह की कुज़ा व कुद्र को और उसके साबिक फैसले को फेरने में सफल हो सके । और यह अक़्ल द्वारा विदित ऐसा विषय है कि कोई भी शख़्स इस से जुदा नहीं हो सकता, और ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उसका दिफा तथा खंडन करना असंभव है।
बेशक अली और हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा शिद्दत और कठिनाई की हालतों में अपने रब की पनाह में आते थे और उसी को पुकारते थे। लिहाज़ा उन से महब्बत करने के दावे दारों पर वाजिब है कि वह भी उसी रास्ते पर चलें जिस पर वह चलते थे और उन्ही के तरीके की इत्तिबा तथा पैरवी करें।
अफासोस कि कुछ लोग मस्जिदे हराम में का’बा के पास होते हुये भी जब खड़े होने का इरादा करते हैं, तो यह कह कर पुकारते हैंः या अली (ऐ अली)। बाज़ उलमा ने उनकी यह पुकार सुन कर उन से पूछाः अगर आप किसी के घर में हूँ और उस घर से आपको किसी चीज़ की ज़रूरत पड़े, तो आप उस घर के पड़ोसी के पास जायेंगे या उसी घर वाले से मांगेंगे? उन से इसके अलावा कोई भी जवाब न बन सका मगर यही कहाः मैं उस घर वाले ही से माँगूंगा। तो ग़ौर कीजिये – अल्लाह आप में बरकत दे कि वह इसका दिफा न कर सका और हक को मान लिया। इसी लिए अल्लाह तआला ने फरमायाः
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ يَدْعُونَ يَبْتَغُونَ إِلَىٰ رَبِّهِمُ الْوَسِيلَةَ أَيُّهُمْ أَقْرَبُ وَيَرْجُونَ رَحْمَتَهُ وَيَخَافُونَ عَذَابَهُ ۚ إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ كَانَ مَحْذُورًا  [الإسراء : ٥٧]
“जिन्हें यह लोग पुकारते हैं वे खुद अपने रब की नज़दीकी की तलाश में रहते हैं कि उन में से कौन ज़्यादा करीब हो जाये, वे खुद उसकी रहमत की उम्मीद रखते हैं और उसके अज़ाब से डरते हैं, (बात भी यही है कि) तेरे रब का अज़ाब डरने की चीज़ है।” [अल्-इस्राः 57]
मिसाल के तौर पर एक और मिसाल जिसे सब लोग समझते हैं- पेश कर रहा हूँ। मान लें कि अल्लाह ने एक आदमी को मालदार बनाया और उसे बहुत ज़्यादा माल धन से नवाज़ा हो। और वह साहिबे औलाद भी हो। वह हमेशा अपने बच्चों से यह कहेः ऐ मेरे बच्चो ! जब भी तुम्हें माल-धन, रूप्ये-पैसे, खाने-पीने और लिबास-पोशाक वगैरा की ज़रूरत पड़े तो मुझ से कहना। लेकिन बच्चे अपने वालिद से न माँग कर पड़ोसीयों से माँगने लगे। तो क्या उनका यह फे’ल अक़्ल के मुताबिक है या ऐसी बेवकूफी है जो अक़्ल के मुखालिफ है? यह तो मख़लूक से मुतअल्लिक बात है, तो फिर अल्लाह – जिसके लिए बहुत ऊँची मिसाल है- को छोड़ कर गैरों से सवाल करना और उनको पुकारना क्योंकर जायज़ हो सकता है?!

अतः बंदा पर वाजिब है कि वह अपनी ज़रूरतों को पूरी करने और परेशानीयों को दूर करने में अपने उस रब और मालिक की तरफ रुजू करे जो उसका ख़ालिक, सैयद, आका और मौला है। बाज़ लोग गैरुल्लाह को पुकारने के जवाज़ में अम्बिया अलैहिमुस्सलाम के मो ‘जेज़ात से दलील लेते हैं, और मिसाल के तौर पर पेश करते हैं कि मूसा पत्थर पर मारते तो उस से पानी का चश्मा फूट जाता। और ईसा मुद्दों को ज़िंदा कर देते तथा पैदाइशी अंधे और कोढ़ के बीमार को ठीक कर देते। उनके इस शुबहे (संशय) के रद में यह चंद बातें मुलाहज़ा फ़रमायेंः
अम्बिया अलैहिमुस्सलाम के मो’जिज़ात उनकी अपनी तरफ से नहीं बल्कि वह तो अल्लाह तआला की तरफ से थे। अल्लाह तआला ने फरमायाः
وَرَسُولًا إِلَىٰ بَنِي إِسْرَائِيلَ أَنِّي قَدْ جِئْتُكُم بِآيَةٍ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ أَنِّي أَخْلُقُ لَكُم مِّنَ الطِّينِ كَهَيْئَةِ الطَّيْرِ فَأَنفُخُ فِيهِ فَيَكُونُ طَيْرًا بِإِذْنِ اللَّهِ ۖ وَأُبْرِئُ الْأَكْمَهَ وَالْأَبْرَصَ وَأُحْيِي الْمَوْتَىٰ بِإِذْنِ اللَّهِ… [آل عمران: ٤٩].
“और वह बनी इस्राईल की तरफ रसूल होगा कि मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की निशानी लाया हूँ, मैं तुम्हारे लिए परिंदे की शक्ल की तरह मिट्टी का परिंदा बनाता हूँ, फिर उस में फूंक मारता हूँ तो वह अल्लाह के हुक्म से परिंदा बन जाता है, और अल्लाह के हुक्म से मैं पैदाइशी अंधे को और कोढ़ी को अच्छा कर देता हूँ और मुर्दों को ज़िंदा कर देता हूँ।” [आलि इम्रानः 49]

लिहाज़ा बंदे पर वाजिब है कि वह उसी अल्लाह से माँगे जिस ने अम्बिया किराम अलैहिमुस्सलाम को इन मो’जिज़ात से नवाज़ा। अम्बिया किराम अलैहिमुस्सलाम अल्लाह तआला ही से माँगते थे – जैसाकि आयतों में गुज़र चुका है। लिहाज़ा ऐ इंसान ! तेरे लिए ज़रूरी है कि तू उनकी इक़्तिदा और पैरवी (अनुसरण) कर, क्योंकि वे बेहतरीन आदर्श और नमूना हैं।
गैरुल्लाह से माँगने और उनको पुकारने की हुर्मत (निषिद्धता) के सिलसिले में साबिक दलीलें बिल्कुल वाज़ेह हैं, बल्कि उन उमूर (विषयों) में भी जिन में इंसान को कुदरत हासिल है उचित तथा बेहतर यह है कि तुम सब से पहले अपने रब से शुरू करो।
अबू जाफर मुहम्मद अल्बाकि रहिमहुल्लाह से बयान किया जाता है कि उन्हों ने कहाः जिस शख़्स को किसी मख़लूक की भी ज़रूरत पेश आये, तो वह अल्लाह तआला ही से शुरू करे।

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जहाँ अल्लाह तआला ने अपने बंदों को अकेला उसी को पुकारने का हुक्म दिया है और दूसरों को पुकारने से मना फरमाया है, वहीं वह अपने बंदों से पसंद फरमाता है कि वे सिर्फ उसी को पुकारें, उसी से मदद माँगें और अपने तमाम मामले में तथा मुख़्तलिफ उमूर (विभिन्न विषयों) में उसी की पनाह में आयें और उसी का सहारा लें।
क्योंकि दुआ अल्लाह की पसंदीदा इबादत है। चुनांचि जो शख़्स अपने रब को पुकारता है वह ऐसी चीज़ करता है जो उसके नज़दीक पसंदीदा हो और उस तक करीब कर देने वाली हो। और इसकी दलील वह अज़ीम हदीसे कुदसी है जिस में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः
يَنْزِلُ رَبُّنَا تَبَارَكَ وَتَعَالَى كُلَّ لَيْلَةٍ إِلَى السَّمَاءِ الدُّنْيَا حِينَ يَبْقَى ثُلُثُ اللَّيْلِ الآخِرُ يَقُولُ : مَنْ يَدْعُونِي، فَأَسْتَجِيبَ لَهُ ، مَنْ يَسْأَلُنِي فَأُعْطِيَهُ، مَنْ يَسْتَغْفِرُنِي فَأَغْفَرَ لَهُ». [البخاري : ١١٥٢ ، ومسلم: ٧٥٩]

“हमारा रब तबारक व तआला हर रात जब रात का आख़िरी तीसरा पहर बाकी रहता है आसमाने दुनिया पर नाज़िल होता है, और यह फरमाता हैः कौन मुझे पुकारे कि मैं उसकी पुकार को कबूल कर लूँ? कौन मुझ से माँगे कि मैं उसकी झोली भर दूँ? कौन है जो मुझ से माफी माँगे कि मैं उसको माफ कर दूँ। [बुख़ारीः 1152, मुस्लिमः 759]
अल्लाह तआला के इस करम पर गौर कीजिये कि वह हर रात अपने बंदों को बुलाता है कि वे उस से माँगें और उसको पुकारें, हालाँकि वह उन से बेनियाज़ है।
लिहाज़ा बंदा को चाहिये कि वह रब के इस अज़ीम करम को ग़नीमत समझते हुये उस से बकसरत दुआ करे और उस से माँगे। इसके नतीजे में वह अपने दिल में कुशादगी, नफ़्स में राहत व इतमीनान और ईमान में ज़्यादती महसूस करेगा। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः
وَاسْأَلُوا اللَّهَ مِن فَضْلِهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا [النساء : ٣٢]…
“और अल्लाह से उसका फ़ज़्ल माँगो, बेशक अल्लाह हर चीज़ का जानकार है।” [अन्-निसा : 32]

और अबू ज़र गिफारी रिवायत करते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने रब तआला से बयान किया कि रब ने फरमायाः
يَا عِبَادِي إِنِّي حَرَّمْتُ الظُّلْمَ عَلَى نَفْسِي، وَجَعَلْتُهُ بَيْنَكُمْ مُحَرَّمًا، فَلَا تَظَالَمُوا، يَا عِبَادِي كُلُّكُمْ ضَالٌّ إِلا مَنْ هَدَيْتُهُ، فَاسْتَهْدُونِي أَهْدِكُمْ، يَا عِبَادِي كُلُّكُمْ جَائِعٌ إِلَّا مَنْ أَطْعَمْتُهُ، فَاسْتَطْعِمُونِي أَطْعِمْكُمْ، يَا عِبَادِي! كُلُّكُمْ عَارِ إِلَّا مَنْ كَسَوْتُهُ، فَاسْتَكْسُونِي أَكْسُكُمْ …» [رواه مسلم : ٢٦٦٠]
“ऐ मेरे बंदो! मैं ने अपने नफ़्स पर जुल्म को हराम करार दिया है, और मैं ने उसे तुम्हारे दरमियान भी हराम किया है, लिहाज़ा तुम एक दूसरे पर जुल्म मत करो। ऐ मेरे बंदो ! तुम सब गुमराह हो सिवाय उनके जिन्हें मैं हिदायत से नवाज़ दूँ, चुनांचि तुम मुझ से हिदायत तलब करो, मैं तुम्हें हिदायत दूँगा। ऐ मेरे बंदो ! तुम सब भूके हो सिवाय उनके जिनको मैं खाना अता कर दूँ, लिहाज़ा तुम मुझ ही से खाना माँगो, मैं तुम्हें खिलाऊँगा। ऐ मेरे बंदो ! तुम सब बरहना (नंगे) हो सिवाय उनके जिनको मैं पोशाक पहना दूँ, तो तुम मुझ ही से पोशाक माँगो, मैं तुम्हें पहनाऊँगा।” [मुस्लिमः 2660]
सईद बिन अब्दुल अज़ीज़ रहिमहुल्लाह फरमाते हैंः अबू इदरीस ख़ौलानी जब यह हदीस बयान करते तो अपने दोनों ज़ानों के बल बैठ जाते। और अबू हुरैरा से रिवायत है, उन्हों ने कहाः रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः
إِنَّهُ مَنْ لَمْ يَسْأَلِ اللَّهَ يَغْضَبْ عَلَيْهِ». [الترمذي: ٣٦٥٧، وابن ماجه: ٣٨٥٣]
“जो अल्लाह तआला से नहीं माँगता अल्लाह उस पर गुस्सा हो जाता है।” तिर्मिज़ीः 3657, इब्नु माजाः3753]

बाज़ अहले इल्म ने इस हदीस को मज़बूत (शक्तिशाली) कहा है, (मगर हकीकत यह है कि इस हदीस में ज़ा’फ (कमज़ोरी तथा दूर्बलता) है। लेकिन किताब व सुन्नत की दीगर दलीलें इसके मा’ना (अर्थ) की गहावी देती हैं। पस वह शख़्स जो अल्लाह तआला से सिरे से माँगता ही नहीं, यहाँ तक कि अपने ख़ास कामों के लिए भी नहीं, तो बेशक अल्लाह उस पर नाराज़ और गुस्सा होता है, क्योंकि उस ने अल्लाह को अपना रब और इलाह (माबूद) नहीं ठहराया। दुआ की बाज़ किस्में वाजिब हैं, जैसेः अल्लाह तआला से हिदायत तलब करना। क्योंकि अल्लाह ने तालीम दी कि बंदा यूँ कहेः

اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ [الفاتحة: ٦]
“हमें सीधी (और सच्ची) राह दिखा।”
और अल्लाह तआला से मग़फिरत तलब करना जैसे दो सज्दों के दरमियान की दुआये मग़फिरत।
और बाज़ शायरों ने इस मफहूम को अपने शे’र में कुछ यूँ पिरोया हैः
اللَّهُ يَغْضَبُ إِنْ تَرَكْتَ سُؤَالَهُ
وَبُنَيَّ آدَمَ حِينَ يُسْأَلُ يَغْضَبُ
(العزالة للخطابي : (٥٨) وهي للخزيمي)
यानी अल्लाह नाराज़ होता है अगर आप उस से माँगना छोड़ दें, और बनी आदम का हाल यह है कि जब उस से माँगा जाता है तो वह नाराज़ हो जाता है।

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जिस तरह कुरआन व हदीस की दलीलें इस बात पर दलालत करती हैं कि जिन चीज़ों के करने पर सिवाय अल्लाह के कोई कादिर नहीं है, वह चीजें गैरुल्लाह से माँगना भी नाजायज़ और हराम है, ठीक इसी तरह इस पर इंसानी फितरत (मानव प्रकृति) भी दलालत करती है। क्योंकि अल्लाह तआला ने बंदों को इस फितरत पर पैदा फ़रमाया है कि वे कठिनाई तथा परेशानी के वक़्त और सख्ती तथा मुसीबत की हालत में उसी की तरफ रुजू करें और उसी से माँगें। और इस विषय में कोई भेदाभेद नहीं है यानी इस में मुस्लिम और गैर मुस्लिम दोनों बराबर हैं। जैसाकि अल्लाह तआला ने मुशरिकीन के बारे में फरमायाः
هُوَ الَّذِي يُسَيِّرُكُمْ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ ۖ حَتَّىٰ إِذَا كُنتُمْ فِي الْفُلْكِ وَجَرَيْنَ بِهِم بِرِيحٍ طَيِّبَةٍ وَفَرِحُوا بِهَا جَاءَتْهَا رِيحٌ عَاصِفٌ وَجَاءَهُمُ الْمَوْجُ مِن كُلِّ مَكَانٍ وَظَنُّوا أَنَّهُمْ أُحِيطَ بِهِمْ ۙ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ لَئِنْ أَنجَيْتَنَا مِنْ هَٰذِهِ لَنَكُونَنَّ مِنَ الشَّاكِرِينَ [يونس : ٢٢]
“वह (अल्लाह) ऐसा है जो तुम्हें थल और जल (खुशकी और समंदरों) में चलाता है, यहाँ तक कि जब तुम कश्ती में होते हो, और वह कश्तीयाँ लोगों को मुवाफिक हवा के ज़रीये लेकर चलती है, और वह लोग उन से खुश होते हैं, उन पर एक तूफानी हवा का झोंका आता है और हर तरफ से लहरें उठती हैं और वह समझते हैं कि (बुरे) आ घिरे, (उस वक़्त) सभी ख़ालिस ईमान और अकीदा के साथ अल्लाह ही को पुकारते हैं कि अगर तू इस से बचा ले तो हम ज़रूर (तेरे) शुक गुज़ार बन जायेंगे।” [यूनुसः 22]
और एक दूसरी जगह अल्लाह तआला ने उन्ही मुशरिकीन के बारे में फरमायाः
وَإِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فِي الْبَحْرِ ضَلَّ مَن تَدْعُونَ إِلَّا إِيَّاهُ ۖ فَلَمَّا نَجَّاكُمْ إِلَى الْبَرِّ أَعْرَضْتُمْ ۚ وَكَانَ الْإِنسَانُ كَفُورًا[الإسراء: ٦٧]
“और समंदर में मुसीबत पहुँचते ही जिन्हें तुम पुकारते थे सब गुम हो जाते हैं, सिर्फ वही (अल्लाह) बाकी रह जाता है, फिर जब वह तुम्हें खुश्की की तरफ महफूज़ ले आता है तो तुम मुँह फेर लेते हो, इंसान बहुत ही नाशुका है।” [अल्-इस्राः 67]

इंसान तो इंसान हैवानात भी फितरी तौर पर अपने रब और ख़ालिक की ओर रुजू करते हैं। अल्लाह तआला ने सुलैमान (अलैहिस्सलाम) के हुदहुद (परिंदे) के बारे में फरमायाः के
فَمَكَثَ غَيْرَ بَعِيدٍ فَقَالَ أَحَطتُ بِمَا لَمْ تُحِطْ بِهِ وَجِئْتُكَ مِن سَبَإٍ بِنَبَإٍ يَقِينٍ ۝ إِنِّي وَجَدتُّ امْرَأَةً تَمْلِكُهُمْ وَأُوتِيَتْ مِن كُلِّ شَيْءٍ وَلَهَا عَرْشٌ عَظِيمٌ ۝ وَجَدتُّهَا وَقَوْمَهَا يَسْجُدُونَ لِلشَّمْسِ مِن دُونِ اللَّهِ وَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ فَصَدَّهُمْ عَنِ السَّبِيلِ فَهُمْ لَا يَهْتَدُونَ  [النمل: ٢٢-٢٤]
कुछ ज़्यादा वक़्त नहीं बीता था कि (आ कर) उस ने कहाः मैं ऐसी चीज़ की ख़बर लाया हूँ कि तुझे उसकी ख़बर ही नहीं, मैं सबा की एक सच्ची ख़बर तेरे पास लाया हूँ। मैं ने देखा कि उनकी बादशाहत एक औरत कर रही है, जिसे हर तरह की चीज़ से कुछ न कुछ अता किया गया है और उसका सिंहासन भी बड़ा अज़ीम है।
मैं ने उसे और उसकी कौम को अल्लाह को छोड़ कर सूरज को सज्दा करते हुये पाया, शैतान ने उनके काम उन्हें भले करके दिखा कर सच्चे रास्ते से रोक दिया है, इस लिए व हिदायत पर नहीं आते। [अन्-नम्लः 22-24]

पस गौर कीजिये कि इस परिंदे ने गैरुल्लाह से लौ लगाने और उसकी तरफ रुजू करने वालों का कैसे इंकार तथा खंडन किया। और ऐसा इसी सबब से कि यह एक फितरत है जिस पर अल्लाह तआला ने तमाम मख़लूकात को चाहे वह इंसान हो जिन्नात, बोलने वाला हो या न बोलने वाला सबको पैदा फ़रमाया।

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जिस तरह शरीअत और फितरत इस पर दलालत करती हैं, उसी तरह अक़्ल भी दलालत करती है जैसाकि बात गुज़र चुकी है। पस इंसान अपनी अक़्ल से जानता है कि यह पुकारे जाने वाले भी मख़लूक और बशर होने में उसी के मिस्ल हैं। फिर अल्लाह को छोड़ कर उन से मदद माँगना, उन से इल्तिजा करना, उन से शिफा तथा रिज़्क वगैरा तलब करना क्योंकर जायज़ हो सकता है। अल्लाह तआला ने अपने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बारे में फरमायाः

قُلْ إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يُوحَىٰ إِلَيَّ أَنَّمَا إِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۖ فَمَن كَانَ يَرْجُو لِقَاءَ رَبِّهِ فَلْيَعْمَلْ عَمَلًا صَالِحًا وَلَا يُشْرِكْ بِعِبَادَةِ رَبِّهِ أَحَدًا [الكهف: ١١٠]
“आप कह दीजिये कि मैं तो तुम जैसा ही एक इंसान हूँ, (हाँ) मेरी तरफ वह्य की जाती है कि सब का माबूद सिर्फ एक ही माबूद है, तो जिसे भी अपने रब से मिलने की उम्मीद हो उसे चाहिये कि नेकी के काम करे और अपने रब की इबादत में किसी को भी शरीक न करे।” [अल्-क़हफः 110]

और एक दूसरी जगह इरशाद फरमायाः
قَالَتْ لَهُمْ رُسُلُهُمْ إِن نَّحْنُ إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَمُنُّ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ ۖ وَمَا كَانَ لَنَا أَن نَّأْتِيَكُم بِسُلْطَانٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ  [إبراهيم: ١١]

“उनके पैग़म्बरों ने उन से कहा कि यह तो सच है कि हम तुम जैसे इंसान हैं, लेकिन अल्लाह अपने बंदों में से जिस पर चाहता है अपनी कृपा करता है, अल्लाह के हुक्म के बिना हमारी ताकत नहीं कि हम कोई मोजिज़ा तुम्हें ला दिखायें, और ईमान वालों को केवल अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिये।” [ इब्राहीमः 11]

और एक दूसरे मक़ाम पर फरमायाः
إِنَّ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ عِبَادٌ أَمْثَالُكُمْ ۖ فَادْعُوهُمْ فَلْيَسْتَجِيبُوا لَكُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ  [الأعراف: ١٩٤]
“हकीकत में तुम अल्लाह को छोड़ कर जिनको पुकारते (इबादत करते) हो वह भी तुम ही जैसे बंदे हैं, तो तुम उनको पुकारो, फिर उनको चाहिये कि वह तुम्हारा कहना कर दें, अगर तुम सच्चे हो।” [अल्-आराफः 194]

यहाँ तक कि वह चीजें बंदे जिनके करने पर कादिर और सक्षम हैं उन में भी मख़लूक को छोड़ कर ख़ालिक ही से माँगना और सवाल करना चाहिये। मगर अफ़सोस कि बाज़ लोग जब बीमारी के शिकार होते हैं तो झाड़ फेंक करने वाले के पास जाते हैं। हालाँकि उनके लिए उचित यही था कि वे खुद शुरू में अपने ऊपर दम करते। क्योंकि अल्लाह के फ़ज़्ल व करम से हर मुसलमान सूरह फातिहा, नास, फलक, आयतुल कुर्सी और दीगर सूरतें तथा आयतें पढ़ कर अपने ऊपर दम करने पर कादिर हैं। और यह बात पोशीदा नहीं कि इंसान जब खुद अपने ऊपर दम तथा झाड़ फूँक करेगा तो वह उस में कोशां (प्रयत्न शील) रहेगा, और अल्लाह से गहरा रब्त (संबंध) रखते हुये दिल लगी के साथ पढ़ेगा। और यह कबूल होने के ज़्यादा करीब है। चुनांचि कितने ऐसे शख़्स हैं जिन्हों ने खुद बखुद अपने ऊपर दम किये और अल्लाह तआला ने उन्हें शिफा से नवाज़ा। बल्कि बाज़ ऐसे लोग भी नज़र आते हैं जो अपने नफ़्स के लिए दुआ के विषय में भी दूसरों से कहते हैं। हालाँकि हमारे रब का फरमान हैः
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ [غافر : .٦]
“और तुम्हारे रब का हुक्म (लागू हो चेका) है कि मुझ से दुआ करो मैं तुम्हारी दुआओं को कबूल करूँगा।”[ग़ाफिरः 60]
और एक दूसरी जगह इरशाद हैः
وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ فَلْيَسْتَجِيبُوا لِي وَلْيُؤْمِنُوا بِي لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ ﴾ [البقرة : ١٨٦]
“और जब मेरे बंदे मेरे बारे में आप से सवाल करें तो कह दें कि मैं बहुत करीब हूँ, हर पुकारने वाले की पुकार को जब कभी भी वह मुझे पुकारे मैं कबूल करता हूँ, इस लिए लोगों को भी चाहिये कि वह मेरी बात मानें और मुझ पर ईमान रखें, यही उनकी भलाई का कारण (बाइस) है।” [अल्-बक़रह : 186]
अबुल अब्बास अहमद बिन अब्दुल हलीम रहिमहुल्लाह ने फरमायाः दुनियावी ज़रूरतें जिनका अंजाम देना ज़रूरी नहीं है, मुलतः किसी मख़लूक से उसका सवाल करना न वाजिब है और न मुस्तहब। बल्कि अल्लाह तआला ही से माँगने, उसी से उम्मीद करने और उसी पर तवक्कुल करने का ही हुक्म है।

बगैर किसी सख़्त ज़रूरत के मख़लूक से माँगना और उस से सवाल करना अस्ल में हराम है। बल्कि ज़रूरत के वक़्त भी गैरुल्लाह को छोड़ कर अल्लाह पर तवक्कुल करना बेहतर है। अल्लाह तआला ने फरमायाः
فَإِذَا فَرَغْتَ فَانصَبُ وَإِلَى رَبِّكَ فَأَرْغَب ﴾ [الشرح : ٧-٨]
“पस जब तू फारिग़ हो तो इबादत में मेहनत कर, और (गैरुल्लाह को छोड़ कर सिर्फ) अपने रब ही की तरफ दिल लगा।” [अश्-शरह 7-8]

और अल्लाह ही बेहतर इल्म वाला है।

स्रोत : अब्दुल्लाह बिन् अब्दुर्रहमान अस्सआद की किताब “एक मात्र प्रभू अल्लाह का आश्रय लेना आवश्यक है