क्या इस्लाम केवल मुसलमानों के लिए है?
क्या इस्लाम केवल मुसलमानों के लिए है?
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत कृपालु और दयावान है।
क़ुरआन में “ऐ लोगो!” (يَا أَيُّهَا النَّاسُ) का संबोधन बीस स्थानों पर आया है: दो बार सूरह अल-बक़रह में, चार बार सूरह अन-निसा में, एक बार सूरह अल-आराफ़ में, चार बार सूरह यूनुस में, चार बार सूरह अल-हज्ज में, एक बार सूरह लुक़मान में, तीन बार सूरह फ़ातिर में और एक बार सूरह अल-हुजुरात में।
जो व्यक्ति इन सभी आयतों पर विचार करेगा, वह पाएगा कि ये संबोधन समस्त मानवजाति के लिए हैं—चाहे वे ईमान वाले हों या इंकार करने वाले, नेक हों या बुरे। इन आयतों में लोगों को उन बातों पर चिंतन करने के लिए बुलाया गया है जो आख़िरत में उनके लिए लाभदायक होंगी। साथ ही उन्हें यह याद दिलाया गया है कि अल्लाह ही उनका पालनहार है और वे हर प्रकार से उसी के मोहताज हैं। इसका उद्देश्य यह है कि वे केवल अल्लाह की इबादत करें, उसके साथ किसी को साझी न ठहराएँ, और अपने दीन को पूरी निष्ठा और ख़ुलूस के साथ उसी के लिए समर्पित कर दें।
चूँकि यह संबोधन पूरी मानवजाति के लिए है और किसी विशेष समूह तक सीमित नहीं है, इसलिए यहाँ “ऐ लोगो!” कहा गया है, न कि “ऐ ईमान वालो!”।
कुरआन और सुन्नत के अनुसार, इस्लाम केवल मुसलमानों के लिए नहीं है, बल्कि यह पूरी इंसानियत के लिए अल्लाह का संदेश है। अल्लाह ने इस्लाम को इसलिए नहीं भेजा कि सिर्फ पहले से मुसलमान लोग ही इसे मानें, बल्कि ताकि हर इंसान अपने रब को पहचाने, उसकी इबादत करे और उसकी हिदायत को अपनाए।
साथ ही इस्लाम यह भी सिखाता है कि नबी मुहम्मद ﷺ के आने के बाद अल्लाह के यहां वही दीन (धर्म) स्वीकार है जो आप ﷺ लेकर आए।
इब्ने क़ुतैबा ने कहा : इस्लाम का मतलब है आज्ञाकारिता और अनुसरण में प्रवेश करना (यानी अल्लाह का आज्ञापालन करना और उसके प्रति समर्पित होना), इसी के समान इस्तिस्लाम का भी अर्थ है। अरबी भाषा में कहा जाता है : (سلم فلان لأمرك، واستسلم، وأسلم) यानी अमुक ने आपके आदेश का पालन किया, आज्ञाकारी हो गया और अपने आपको समर्पित कर दिया।” “ज़ादुल-मसीर” (1/267)
सभी रसूलों के अनुयायी अपने रसूलों के समय में मुसलमान थे। इस तरह यहूदी लोग मूसा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के समय में मुसलमान थे, और ईसाई लोग ईसा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के समय में मुसलमान थे। लेकिन जब नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भेजे गए और उन्होंने आपका इनकार किया, तो वे मुसलमान नहीं हैं।
सभी अंबिया (अलैहिमुस्सलाम) का धर्म एक है, अगरचे उनकी शरीयतें (कानून की व्यवस्था) अलग-अलग हैं। अल्लाह तआला ने फरमाया :
شَرَعَ لَكُمْ مِنَ الدِّينِ مَا وَصَّى بِهِ نُوحاً وَالَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَمَا وَصَّيْنَا بِهِ إِبْرَاهِيمَ وَمُوسَى وَعِيسَى أَنْ أَقِيمُوا الدِّينَ وَلا تَتَفَرَّقُوا فِيهِ
“उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया है, जिसका आदेश उसने नूह़ को दिया और जिसकी वह़्य हमने आपकी ओर की, तथा जिसका आदेश हमने इबराहीम तथा मूसा और ईसा को दिया, यह कि इस धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ।” [सूरतुश-शूरा : 13]
तथा अल्लाह ने फरमाया :
يَا أَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحاً إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ وَإِنَّ هَذِهِ أُمَّتُكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَأَنَا رَبُّكُمْ فَاتَّقُونِ
“ऐ रसूलो! पाक चीज़ों में से खाओ तथा अच्छे कर्म करो। निश्चय मैं उससे भली-भाँति अवगत हूँ, जो तुम करते हो। और निःसंदेह यह तुम्हारा समुदाय (धर्म) एक ही समुदाय (धर्म) है और मैं तुम सबका पालनहार (पूज्य) हूँ। अतः मुझसे डरो।” [सूरतुल-मूमिनून : 51-52]
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया:
“أَنَا أَوْلَى النَّاسِ بِعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ ، وَالْأَنْبِيَاءُ إِخْوَةٌ لِعَلَّاتٍ ، أُمَّهَاتُهُمْ شَتَّى وَدِينُهُمْ وَاحِدٌ “
“मैं इस दुनिया और आख़िरत में मरयम के बेटे ईसा (अलैहिस्सलाम) के सबसे अधिक निकट हूँ। नबी आपस में सौतेले भाई (एक पिता से, अलग-अलग माताओं से) की तरह हैं; उनकी माताएँ अलग हैं, लेकिन उनका दीन (धर्म) एक ही है।” [सहीह बुख़ारी हदीस-3443, सहीह मुस्लिम हदीस-2365]
कुरआन बताता है कि इस्लाम का संदेश पूरी इंसानियत के लिए है
अल्लाह तआला फरमाता है रसूलुल्लाह (ﷺ) से कि आफ कह दीजिए:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنِّي رَسُولُ اللَّهِ إِلَيْكُمْ جَمِيعًا
“हे लोगो! निश्चय ही मैं तुम सबकी ओर अल्लाह का रसूल हूँ।“
[सूरह अल्-आराफ, आयत-158]
इस आयत में अल्लाह ने पूरी इंसानियत को संबोधित किया है, केवल मुसलमानों को नहीं।
एक और जगह अल्लाह फरमाता है:
وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِّلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا
“और हमने आप (ﷺ) को समस्त मानवजाति के लिए शुभ सूचना देने वाला और चेतावनी देने वाला बनाकर भेजा है।“
[सूरह सबा, आयत-28]
और अल्लाह फरमाता है:
وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ
और हमने आप (मुहम्मद ﷺ) को समस्त संसारों (सारे जहानों) के लिए केवल रहमत (दयालुता और कृपा) बनाकर भेजा है।
[सूरह अल्-अम्बिया, आयत- 107]
और अल्लाह फरमाता है:
هَٰذَا بَلَاغٌ لِّلنَّاسِ
“यह समस्त लोगों के लिए एक संदेश है।“
[सूरह इब्राहिम, आयत-52]
इन आयतों से स्पष्ट होता है कि कुरआन का संदेश पूरी मानवता के लिए है।
- नबी मुहम्मद ﷺ पूरी दुनिया के लिए भेजे गए
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
وَكَانَ النَّبِيُّ يُبْعَثُ إِلَى قَوْمِهِ خَاصَّةً وَبُعِثْتُ إِلَى النَّاسِ عَامَّةً
“…पहले प्रत्येक नबी केवल अपनी कौम की ओर भेजे जाते थे, लेकिन मुझे समस्त मानवजाति की ओर भेजा गया है।“
[सहीह बुख़ारी हदीस-335, सहीह मुस्लिम, हदीस-521]
इस हदीस से स्पष्ट होता है कि नबी मुहम्मद ﷺ का संदेश किसी एक जाति, देश या समुदाय तक सीमित नहीं है।
- इस्लाम सभी नबियों का दीन रहा है
इस्लाम यह नहीं सिखाता कि केवल मुहम्मद ﷺ ही इस्लाम लेकर आए। बल्कि सभी नबियों ने लोगों को अल्लाह की बंदगी और उसकी आज्ञाकारिता की ओर बुलाया।
इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बारे में क़ुरआन में है कि उन्होंने ने फरमाया :
أَسْلَمْتُ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ
“मैं संसारों के पालनहार के सामने समर्पित हो गया हूँ।“
[सूरह अल्-बक़रह, आयत-131]
मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम के लोगों से फरमाया :
إِن كُنتُمْ آمَنتُم بِاللَّهِ فَعَلَيْهِ تَوَكَّلُوا إِن كُنتُم مُّسْلِمِينَ
“अगर तुम वास्तव में अल्लाह पर ईमान लाए हो, तो उसी पर भरोसा करो, यदि तुम सच्चे मुसलमान (आज्ञाकारी) हो।“
[सूरह यूनुस, आयत-84]
ईसा (अलैहिस्सलाम) के हवारियों ने फरमाया :
آمَنَّا وَاشْهَدْ بِأَنَّنَا مُسْلِمُونَ..
“हम ईमान लाए और गवाही दीजिए कि हम अल्लाह के आज्ञाकारी और समर्पित हैं।“
[सूरह अल्- मायदा, आयत-111]
इन आयतों से पता चलता है कि सभी नबियों का मूल संदेश एक ही था — केवल अल्लाह की इबादत करना और उसी के सामने झुकना।
- क्या कुरआन केवल मुसलमानों से बात करता है?
नहीं। कुरआन में मुसलमानों, यहूदियों, ईसाइयों, मुश्रिकों (शिर्क़ करने वालों), मुनाफिकों (दोहरे चरित्र वाले, कपटी) और पूरी मानवता को संबोधित किया गया है। अल्लाह तआला क़ुरआन में फरमाता है :
قُلْ يَا أَيُّهَا الْكَافِرُونَ
“कह दीजिए: ऐ इनकार करने वालो!”
[अल-काफिरून, आयत-1]
और:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ اعْبُدُوا رَبَّكُمُ
“हे लोगो! अपने पालनहार की इबादत करो।“
[सूरह अल्-बक़रह, आयत-21]
यदि इस्लाम केवल मुसलमानों के लिए होता, तो कुरआन बार-बार पूरी इंसानियत को संबोधित न करता।
उलेमा की राय
- सामान्य अर्थ में इस्लाम सभी नबियों का दीन था, शरीअत के कुछ नियम अलग-अलग हो सकते थे। लेकिन तौहीद (केवल अल्लाह की इबादत) सभी नबियों की दावत का आधार था।
- नबी मुहम्मद ﷺ के आने के बाद सच्चा इस्लाम वही है जो आप ﷺ लेकर आए।
- पहले के नबियों के मानने वाले अपने समय में मुसलमान थे, लेकिन अब लोगों पर मुहम्मद ﷺ की पैरवी करना आवश्यक है क्योंकि अल्लाह के यहां इस्लाम के अलावा कोई दीन स्वीकार नहीं है।अल्लाह तआला फरमाता है:إِنَّ الدِّينَ عِندَ اللَّهِ الْإِسْلَامُ
“निःसंदेह अल्लाह के निकट स्वीकार्य दीन इस्लाम ही है।“
[आले-इमरान, आयत-19]
यहाँ अल्लाह तआला हमें बता रहा है कि इस्लाम के अलावा कोई भी धर्म उसे स्वीकार्य नहीं है, जिसका अर्थ है अल्लाह के प्रति समर्पण करना, उसके अधीन और उसका आज्ञाकारी होना, अकेले उसी की इबादत करना, और उस पर और उसके रसूलों पर और जो कुछ वे अल्लाह की ओर से लाए हैं, उसपर ईमान लाना। प्रत्येक रसूल के लिए एक शरीयत और एक तरीक़ा होता है, यहाँ तक कि अल्लाह ने उनमें से मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर इस कड़ी को समाप्त कर दिया। अतः आपको सभी लोगों के लिए रसूल बनाकर भेजा, इसलिए अल्लाह तआला उसके बाद किसी से भी आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए इस्लाम के अलावा कोई और धर्म स्वीकार नहीं करेगा।
पिछले नबियों का अनुसरण करने वाले सभी ईमानवाले सामान्य अर्थ में मुसलमान थे, और वे अपने इस्लाम के आधार पर जन्नत में प्रवेश करेंगे। यदि उनमें से कोई नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के नबी बनाए जाने का ज़माना पाता है, तो उससे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का अनुसरण करने के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं किया जाएगा।
क़तादा रज़ियल्लाहु अन्हु ने उक्त आयत की व्याख्या करते हुए कहा : “इस्लाम का अर्थ है यह गवाही देना कि अल्लाह के अलावा कोई भी इबादत के योग्य नहीं, और जो कुछ आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के पास से लेकर आए हैं, उसका इक़रार करना, और वह अल्लाह का वह धर्म है जिसे उसने अपने लिए निर्धारित किया और जिसके साथ उसने अपने रसूलों को भेजा, और जिसकी ओर उसने अपने मित्रों को निर्देशित किया। वह इसके अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं करेगा और केवल इसी के द्वारा प्रतिफल देगा।”
अबुल-आलियह रहिमहुल्लाह ने कहा : “इस्लाम का मतलब है सिर्फ़ अल्लाह के प्रति सच्ची भक्ति, और केवल उसी की इबादत करना जिसका कोई साझी नहीं।” “तफ़सीर अत-तबरी” (6/275)
और अल्लाह ही बेहतर इल्म रखने वाला है।