तक़वियतुल ईमान
तक़वियतुल ईमान
﷽
इलाही तेरा शुक्र है कि तूने हमको अनेक उपहार प्रदान किए हैं और तूने हमको अपना सत्य धर्म बताया, सीधे मार्ग पर चलना सिखाया, एकेश्वरवादी (मुव्वहिद) बनाया , अपने प्रिय मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के समुदाय (उम्मती) में से बनाया, उनका लाया हुआ धर्म और उनका उपदेश सीखने की कामना दी और तूने हमें उन एकेश्वरवादी धर्म पालकों से प्रेम करने की क्षमता प्रदान की जो दूसरों को आप का मार्ग बताते हैं और आप के पथ पर चलते हैं।
ऐ मेरे पालनहार हमारी तरफ से अपने प्रिय मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के परिवार पर, आपके साथियों पर तथा आप के सभी प्रतिनिधियों पर अपनी दया और कृपा की वर्षा कर । हमें भी आप के अज्ञापालन करने वालों में सम्मिलित कर ले, और इस्लामी जीवन व्यतीत करने की क्षमता प्रदान कर और इस्लाम तथा एकेश्वरवाद (तौहीद) पर हमें मौत दे, और आप का अनुसरण करने वालों में हमारी भी गणना कर ले। आमीन
दास और उपासना
ज्ञात होना चाहिए कि सभी मनुष्य अल्लाह के दास हैं। दास का कार्य है उपासना करना, जो दास उपासना न करे वह दास नहीं । मूल उपासना अल्लाह पर दृढ़ विश्वास करना और ईमान को शुद्ध रखना है, इस लिए कि जिसके ईमान में कोई खोट और गड़बड़ हो तो उसकी कोई भी उपासना कबूल नहीं होगी और जिसका ईमान शुद्ध है उसकी थोड़ी उपासना भी सम्माननीय है। अतः हर मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह ईमान को दुरुस्त करने की प्रयत्न करे और ईमान शुद्ध करने को अन्य तमाम वस्तुओं पर प्राथमिकता दे ।
वर्तमानकाल में मुसलमानों की स्थिति
इस समय लोग धार्मिक बातों में विभिन्न राहों पर चल रहे हैं । कुछ लोग बाप दादा की रीतियों को अपनाते हैं, कुछ लोग महापुरुषों के तरीकों को अच्छा समझते हैं, कुछ लोग मूर्ख मियाँ मोलवियों तथा तुच्छ धार्मिक विद्वानों की ऐसी बातों को प्रमाण बनाते हैं जिनको उन्हों ने अपनी बुद्धि स्फूर्ति से उत्पन्न किया है, और कुछ लोग धार्मिक बातों में अपनी बुद्धि द्वारा हस्तक्षेप करते हैं ।
सब से बेहतर राह
इन में बेहतरीन राह यही है कि कुरआन और हदीस को मूल आधार मान कर इन्हीं दोनों को प्रमाण बनाया जाये । धार्मिक बातों में इनके विरुद्ध अपनी बुद्धि को हस्तक्षेप करने का अवसर न दिया जाये और इन्हीं दोनों चश्मों (श्रोतों) से आत्मा को सैराब किया जाये। महापुरुषों (बुजुर्गों) की जो बातें, मोलवियों और धार्मिक विद्धानों की जो नीतियाँ और बिरादरी की जो रस्में (परम्परायें) कुरआन तथा हदीस के अनुकूल हों उन्हें मान लिया जाये और जो इन के प्रतिकूल हों उन्हें छोड़ दिया जाए ।
एक गलत विचार का खण्डन
लोगों में जो यह बात मशहूर है कि कुरआन और हदीस का समझना बड़ा कठिन है, इन दोनों को समझने के लिये बहुत बड़े ज्ञान और अधिक विद्या की जरुरत है, हम जाहिल लोग किस तरह समझ सकते हैं और किस तरहइन के अनुसार अमल कर सकते हैं, इन पर अमल तो केवल वली और बुजुर्ग ही कर सकते हैं, हम में वह ताकत कहाँ जो अल्लाह और रसूल की बातें समझ सकें, हमारे लिए तो जो कुछ हम कर रहे हैं यही काफी है। परन्तु यह विचार गलत है, क्योंकि अल्लाह तआला ने फर्माया कि कुरआन पाक की बातें बहुत साफ और स्पष्ट हैं।
ملے وَلَقَدْ أَنزَلْنَا إِلَيْكَ وَايَاتٍ بَيِّنَاتٍ وَمَا يَكْفُرُ بِهَا إِلَّا الْفَاسِقُونَ ) (البقرة (٩٩)
अर्थः- बेशक हमने आप पर साफ साफ (स्पष्ट) आयतें ( श्लोक) उतारी हैं इन का इनकार केवल फासिक् ( पथभ्रष्ट) ही करते हैं ।
अर्थात कुरआन की बातों और आयतों का समझना कुछ भी मुश्किल नहीं, परन्तु इन पर अमल करना मुश्किल है, क्योंकि मनको किसी की अज्ञापालन बुरी लगती है, इसी लिए नाफर्मान लोग इन को नहीं मानते ।
रसूल क्यों आये ?
कुरआन और हदीस को समझने के लिए अधिक ज्ञान और बुद्धि की जरुरत नहीं, क्योंकि रसूल मूर्खों को सीधा मार्ग दिखाने के लिए, जाहिलों को समझाने के लिए और अज्ञानों को ज्ञान सिखाने के लिए आये थे। अल्लाह तआला का शुभ कथन है।
هُوَ الَّذِي بَعَثَ فِي الْأُمِّيِّنَ رَسُولاً مِّنْهُمْ يَتْلُوا عَلَيْهِمْ وَآيَاتِهِ، وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَإِن كَانُوا مِن قَبْلُ لَفِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ ( ) (…)
अर्थ : वह अल्लाह ऐसा है कि जिसने अनपढ़ों में उन्हीं में से (चुन् कर) एक रसूल भेजा, जो उन पर उसकी आयतें पढ़ता है और उन को (शिर्क तथा कुफ्र से) पाक करता है तथा उन्हें किताब (कुरआन) और बुद्धि (हदीस) की शिक्षा देता है , यद्यपि वह लोग इस से पहले खुली गुमराही में थे ।
अर्थात अल्लाह तआला की यह बड़ी नेमत है कि उसने ऐसा रसूल भेजा कि जिसने निश्चिन्तों को सचेत, अपवित्रों को पवित्र किया, अज्ञानों को ज्ञानी, मूर्खी को बुद्धिमान वनाया और पथभ्रष्टों को सीधा मार्ग दिखाया। इस आयत को सुनने और समझने के बाद अब भी अगर कोई व्यक्ति यह कहने लगे कि कुरआनका समझना आलिमों (ज्ञानियों) का और इस पर अमल करना बुजुर्गों (महा पुरुषों) का ही काम है तो निस्सन्देह उसने इस आयत का इनकार किया और अल्लाह तआला की इस अजीम (विशाल) नेमत की नाक़द्री की, बल्कि यह कहना चाहिये कि अज्ञानी उसकी बातें समझ कर ज्ञानी हो जाते हैं और पथभ्रष्ट उसके पथ पर चल कर बुजुर्ग (महापुरुष) बन जाते हैं।
एक उदाहरण
उपरोक्त बातों को उदाहरणार्थ यूँ समझो कि एक माहिर वैद्य है और एक व्यक्ति किसी बड़े रोग में ग्रस्त है। एक दयालु आदमी उस रोगी से कहता है कि तुम फलाँ वैद्य ( हकीम ) के पास जाकर अपना इलाज (चिकित्सा) करालो, इस पर वह रोगी जवाब देता है कि उस के पास जाना और उस से इलाज (उपचार) कराना बड़े बड़े तन्दुरुस्तों और निरोगियों का काम है, मैं तो गम्भीर रोगी हूँ भला मैं किस तरह उस के पास जाकर इलाज करा सकता हूँ। तो क्या आप ऐसे रोगी को पागल न समझेंगे ? क्योंकि मूर्ख उस माहिर वैद्य की हिक्मत (विद्या) को नहीं मानता । इस लिए कि वैद्य तो रोगियों ही के इलाज के लिए होता है, जो तन्दुरुस्तों और निरोगियों का इलाज करे वह वैद्य कैसे हुआ ? इस उदाहरण का खुलासा (सारांश) यह है कि अज्ञानी, अशिक्षित और पापी को भी कुरआन तथा हदीस के समझने और धार्मिक नियमों पर दृढ़ पूर्वक अमल करने की वैसे ही जरुरत है जैसे एक ज्ञानी और शिक्षित को । अतः हर खास व आम का फर्ज (दायित्व) है कि कुरआन तथा सुन्नत ही की खोज में लगा रहे। उन्हीं को समझने की प्रयास करे, उन्हीं पर अमल करे और उन्हीं के साँचे में अपना ईमान ढाले ।
तौहीद (एकेश्वरवाद) और रिसालत (ईश्दूतत्व)
ज्ञात होना चाहिए कि ईमान के दो भाग हैं। (१) अल्लाह तआला को अल्लाह मानना । (२) रसूल को रसूल समझना । अल्लाह को अल्लाह मानने का मत्लब् यह है कि उसके साथ किसी को शरीक न किया जाए और रसूल को रसूल समझने का मतलब यह है कि उन्हींके पथ पर चला जाये । प्रथम भाग तौहीद है और दूसरा भाग सुन्नत¹ की पैरवी (अनुसरण ) है।
तौहीद का प्रतिकूल शिर्क है और सुन्नत ‘ का प्रतिकूल बिदअत् ² है। हर मुसलमान का फर्ज है कि तौहीद पर मज़बूती के साथ कायम रहे, रसूल की सुन्नत पर अमल करे, तौहीद और सुन्नत को सेने से लगाये रखे, शिर्क तथा बिद्युत् से बचता रहे। इस लिए कि शिर्क और बिदअत् यह दोनों ऐसे पाप हैं जो ईमान को नष्ट कर देते हैं, दूसरे पाप केवल पुण्य (नेकी) में बाँधा डालते हैं। अतः होना यह चाहिये कि जो आदमी मोवहूहिद् (एकेश्वरवादी ) और सुन्नत का अनुसरण करने वाला हो, शिर्क तथा बिद्अत से दूर भागता हो और उसके साथ रहने से तौहीद तथा इत्तिबाए सुन्नत का शौक़ पैदा होता हो, तो उसी को अपना पीर और गुरु समझना चाहिए ।
इसी कारण कुछ आयतें और हदीसें जिनमें तौहीद तथा सुन्नत को अपनाने का और शिर्क तथा बिदअत की बुराई का वर्णन है, इस संक्षिप्त पुस्तिका में जमा कर दिया गया है और उन आयतों तथा हदीसो का अनुवाद साधारण हिन्दी भाषा में किया गया है ताकि खास व आम (साधारण जन एंव विशेष जन) सभी प्रकार के लोग इससे लाभ उठा सकें और जिनको अल्लाह तआला चाहे सीधी राह पर आ जायें । अल्लाह करे हमारी (लेखक) प्रयास मुक्ति का साधन हो ।
¹ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कथन, कर्म, समर्थन और पूर्ण जीवन पद्धति को सुन्नत कहते हैं।
² धर्म में नया तरीका, नया नियम और नई चीज़ उत्पन्न करने को बिदअत कहते हैं।
इस किताब का नाम तक्वियतुल् ईमान है, इस में सात अध्याय हैं।
प्रथम अध्याय
तौहीद तथा शिर्क के बयान में सर्वप्रथम यह ज्ञात होना चाहिए कि अधिकांश लोगों में शिर्क फैला हुआ है और तौहीद लुप्त है। अधिकतम लोग ऐसे हैं जो अपने आप को मुसलमान कहते हैं और ईमान का दावा भी करते हैं परन्तु तौहीद और शिर्क का फर्क न जानने के कारण शिर्क में ग्रस्त होते हैं। इस लिए सब से पहले तौहीद और शिर्क का अर्थ समझना चाहिए, ताकि कुरआन और हदीस से उनकी भलाई तथा बुराई मालूम हो सके ।
शिर्क के विभिन्न रूप
ज्ञात होना चाहिए कि अधिकतम लोग कठिन समय में पीरों को, वलियों को, फकीरों को, पैग़म्बरों को, इमामों को, शहीदों को, फरिश्तों को और परियों को पुकारते हैं, उन्हीं से प्रार्थना और विनति करते हैं, उन्ही की मिन्नतें मानते हैं आवश्यकता की पूर्ति के लिए उनको भेंट और चढ़ावा चढ़ाते हैं, उनके लिए बलिदान करते हैं, उन्हीं के नाम पर नज़र व नियाज़ चढ़ाते हैं और बीमारियों से बचने के लिए अपने बेटों को उनकी ओर सम्बोधित करते हैं। कोई अपने बेटे का नाम अब्दुन्नबी कोई अली बख्श, कोई हुसैन बख़्श, कोई मदार बख़्श, कोई सालार बख़्श, कोई गुलाम मुहीयुद्दीन, कोई गुलाम मुईनुद्दीन रखता है,क्योंकि इस का अर्थ यह होता है कि जिन की तरफ यह मन्सूब है उन्हीं के दास हैं और उन्हीं के दान प्रदान किए हुए हैं। हालांकि सभी अल्लाह के दास है और सब कुछ उसी का दान प्रदान किया हुआ है।और सन्तान के जीवित रहने के लिए कोई किसी के नाम की चोटी रखता है, कोई किसी के नाम की वद्धी पहनाता है, कोई किसी के नाम पर कपड़े पहनाता है, कोई किसी के नाम की बेड़ी डालता है, कोई किसी के नाम पर जानवर भेंट चढ़ाता है। कोई संकट में किसी की दोहाई देता है और कोई किसी की कसम खाता है। सारांश यह कि जो कुछ ग़ैर-मुस्लिम अपनी मूर्तियों के साथ करते हैं वही सव कुछ यह झूठे मुसलमान वलियों, नबियों, इमामों, शहीदों , फरिश्तों तथा परियों के साथ करते हैं, इस के बावजूद मुसलमान होने का दावा भी करते हैं। सुब्हानल्लाह यह हैं वर्तमानकाल के मुसलमान जिन्हें देख कर ग़ैर-मुस्लिम भी शर्मा जाए । सच फरमाया अल्लाह तआला ने सूरः यूसुफ में ।
وَمَا يُؤْمِنُ أَكْثَرُهُم بِاللَّهِ إِلَّا وَهُم مُّشْرِكُونَ (2))
अर्थ : उन में से अधिकतम लोग जो अल्लाह पर ईमान लाते हैं, वे शिर्क भी करते हैं। (सूरह यूसुफ) आयत ६० )
दावा ईमान का और काम शिर्क के
अर्थात अधिकतम लोग जो ईमान का दावा करते हैं वे शिर्क में ग्रस्त होते हैं, फिर यदि कोई उन से कहे कि तुम दावा तो ईमान का करते हो, परन्तु काम शिर्क का कर रहे हो, इस प्रकार इन दोनों विभिन्न राहों को क्यों मिला रहे हो ?
तो वे यह जवाब देते हैं कि हम तो शिर्क नहीं करते हैं बल्कि नबियों तथा वलियों से प्रेम करते हैं और उन के अकीदतमन्द हैं। शिर्क तो तब होता जब हम उन्हें अल्लाह के बराबर समझते, परन्तु हम उनको ऐसा नहीं समझते हैं। हम तो उन को अल्लाह का दास और उसी का पैदा किया हुआ (मखलूक) समझते हैं, किन्तु उन में अधिकार की यह शक्ति (जिसे हम समझते हैं) अल्लाह ने उन को प्रदान की है। इस प्रकार यह लोग उसी की इच्छा से संसार में अपना अधिकार लागू करते हैं और उसी की इच्छा से संसार में तसर्राफ करते हैं। अतः उनको पुकारना अल्लाह ही को पुकारना है और उन से मदद मांगना अल्लाह ही से मदद मांगना है, यह लोग अल्लाह के प्रिय बन्दे हैं जो चाहें करें, यह लोग अल्लाह के दरबार में हमारे लिए सिफरिश ( अनुशंसा करने वाले तथा वकील हैं, हमारे और अल्लाह के दरमियान माध्यम है। उनके मिलने से अल्लाह मिल जाता है और उनको पुकारने से अल्लाह की कुरबत् ( निकटता) प्राप्त होती है, जितना हम उन्हें मानेंगे उसी प्रकार से हम अल्लाह के निकट होते जायेंगे ।सन्तान को इनकी ओर सम्बोधित करने से शिर्क लाज़िम् आता है, इस प्रकार की और बहुत सी फजूल बातें, खुराफात ( प्रलाप) बकी जाती हैं।
कुरआन का निर्णय
इस प्रकार की बातों का कारण यह है कि यह लोग कुरआन और हदीस को छोड़ बैठे हैं, धार्मिक बातों में बुद्धि को हस्तक्षेप का अवसर देते हैं, किस्से कहानियों के पीछे लगे हुए हैं और गलत् रस्मों, तुच्छ रीतियों को प्रमाण बनाते हैं। यदि उन के पास कुरआन तथा हदीस का ज्ञान
होता तो उनको मालूम हो जाता कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने भी मुशरिक लोग (बहुदेववादी) इसी प्रकार के प्रमाण परस्तुत किया करते थे। अतः अल्लाह तआला ने उन पर अपना क्रोध प्रकट किया और उन्हें झूठा बताया । सूरः यूसुफ में अल्लाह तआला फरमाते हैं।
وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هَؤُلَاءِ شُفَعَتُؤُنَا عِندَ اللَّهِ قُلْ أَتُنَبِّئُونَ اللَّهَ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي السَّمَوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴾ (واس ٠١٨)
अर्थ : वे अल्लाह को छोड़ कर ऐसे लोगों की उपासना करते हैं जो उन को न हानि पहुँचा सकते न लाभ और कहते हैं कि यह लोग अल्लाह के यहाँ हमारे सिफारशी हैं। हे नबी आप कह दीजिए कि तुम अल्लाह को ऐसी बांत बता रहे हो जिसे वह आसमान एंव जमीन में नहीं जानता । (अर्थात जिसकी कोई हकीकत नहीं वह उनके शरीकों से स्वच्छन्द
और पवित्र है। (सूरह यूनुस आयत १८)
अल्लाह के अतिरिक्त कोई कादिर (शक्तिशाली) नहीं
अर्थात मुशरिक (बहुदेववादी) लोग जिन को पुकारते हैं और जिन की उपासना करते हैं वे बिल्कुल् शक्तिहीन हैं। उन में न किसी को लाभ पहुँचाने की क्षमता है और न हानि पहुँचाने की और उन का यह कहना कि अल्लाह तआला के पास ये हमारी सिफारिश (अनुशंसा) करेंगे, तो यह गलत धारणा और तुच्छ विचार है क्योंकि अल्लाह ने यह बात बताई नहीं, फिर क्या तुम अल्लाह से अधिक ज्ञान रखते हो और आसमान तथा जमीन की बातों को अल्लाह से अधिक जानते हो ? जो तुम कहते हो कि वे हामरे सिफारशी होंगे । मालूम हुआ कि सम्पूर्ण आकाश एंव पृथ्वी में कोई किसी का ऐसा सिफरिशी (अनुशंसायी) नहीं है कि अगर उसको माना जाए अथवा पुकारा जाए तो वह लाभ पहुँचायेगा यदि न माना जाये तो हानि पहुँचायेगा, बल्कि अम्बिया एंव अवलिया की सिफारिश भी अल्लाह ही के अधिकार में है। उनको पुकारने या न पुकारने से कुछ नहीं होता और यह भी ज्ञात हुआ कि यदि कोई किसी को अनुशंसा ( सिफारिश) का अधिकारी समझकर पूजे या उसे पुकारे या उस से फरियाद
करे तो वह भी मुशरिक हो जाता है। अल्लाह तआला ने सूरः जुमर में फरमायाः –
أَلَا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ أوْلِيَاءَ مَا نَعْبُدُهُمْ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَىٰ إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ فِي مَا هُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ هُوَ كَذِبٌ كَفَّارٌ ) (هم ..
अर्थ : (सावधान ! केवल अल्लाह ही के लिए खलिस् उपासना है और वह लोग जिन्हों ने अल्लाह के आतिरिक्त अन्य लोगों को सहयोगी बना रख्खा है वे कहते हैं कि हम इनकी उपासना केवल इस लिए करते हैं ताकि वे हम को अल्लाह से निकट करदें । निस्सन्देह अल्लाह उनके बीच निर्णय करेगा जिसमें कि वे झगड़ा करते हैं। निस्सन्देह अल्लाह झूठे और कृतध्न को मार्गदर्शन नहीं करता । (सूरह जुमर आयत ३)
अल्लाह के अतिरिक्त कोई सहयोगी नहीं
अर्थात सच्ची बात तो यह है कि अल्लाह बन्दे से बहुत ही निकट है, परन्तु इस आस्था को छोड़ कर झूठी बात बनाई कि अम्बिया, अवलिया और नेक लोग (स्वालिहीन) हमें अल्लाह से निकट कर देंगे और उन को अपना सहयोगी समझा और अल्लाह की इस नेमत को कि वह बिना किसी माध्यम के सब की सुनता है और सब की कामनाएँ पूरी करता है ठुकरा दिया और दूसरों से प्रार्थना करने लगे कि वे उनकी कामनायें पूरी कर दें संकट टाल दें और फिर अफसोस की बात यह है कि गलत और तुच्छ तरीकों से अल्लाह की निकटता (कुरबत्) भी तलाश किया जाता है। भला ऐसे कृतध्नों और झूठों को कैसे मार्गदर्शन मिल सकता है। ये तो इस टेढ़ी राह पर जिस प्रकार चलेंगे उसी प्रकार सीधी राह से दूर होते जायेंगे ।
अल्लाह के सिवा कोई कारसाज (काम बनाने वाला) नहीं
उपरोक्त आयत से यह मालूम हुआ कि जो कोई किसी को नजातदहिन्दा (मुक्तिदाता) एवं हिमायती (सहयोगी) समझ कर पूजे, यद्यपि यही अकीदा रखकर की इस की पूजा से अल्लाह की कुरबत (नज़दीकी) प्राप्त होती है तो ऐसा आदमी मुशरिक, झूठा और अल्लाह की नेमत को ठुकरा देने वाला (कृतध्न-नाशुक्रा) है। अल्लाह तआला फरमाते हैं:
قُلْ مَنۢ بِيَدِهِۦ مَلَكُوتُ كُلِّ شَىْءٍۢ وَهُوَ يُجِيرُ وَلَا يُجَارُ عَلَيْهِ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ٨٨ ,سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ فَأَنَّىٰ تُسْحَرُونَ ٨٩
अर्थः आप कह दीजिए कि कौन है जिसके हाथ में हर चीज का अधिकार है और वह शरण देने वाला हो और उस के विरुद्ध कोई दूसरा शरण न दे सके, यदि तुम जानते हो तो बताओ ? इस के जवाब में वह यही कहेंगे कि यह सारी चीजें केवल अल्लाह के अधिकार में हैं। आप कह दीजिए फिर तुम कहाँ सनकी बने जारहे हो ? (सूरः अल्-मुमिनून,88-89) ।
अर्थात यदि मुशरिकों से पूछा जाये कि वह कौन है जिसका अधिकार सम्पूर्ण संसार में चलता है और जिसके अधीन में सभी चीजें हैं और जिसके विरुद्ध कोई भी खड़ा न हो सके और न उसका कोई प्रतिद्वन्दी हो ? तो वह भी इस प्रश्न के उत्तर में यही कहेंगे कि यह अल्लाह ही की शान ( महिमा) है । फिर अल्लाह को छोड़कर दूसरों को मानना केवल दीवानापन और गुमराही (पथभ्रष्टता) है। अतः इस आयत से यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह ने किसी को जगत में तसर्राफ करने की क्षमता और शक्ति नहीं प्रदान की है और न ही कोई किसी का हिमायती (सहयोगी) हो सकता है । इस के अतिरिक्त यह भी मालूम हुआ कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने के मुशरिक भी बुतों (मूर्तियों) को अल्लाह के बराबर नहीं मानते थे बल्कि उनको अल्लाह का पैदा किया हुआ (मखलूक) और उसका दास ही समझते थे और यह भी जानते थे कि इन में ईश्वरीय शक्तियाँ नहीं हैं परन्तु यही उनका उन्हें पुकारना, उन से प्रार्थना करना, उनकी मिन्नतें मानना भेंट चढ़ाना तथा उनको अपना वकील एंव सिफारिशी समझना ही उनका शिर्क था। अतः यह अच्छी तरह ज्ञात हो गया कि जो कोई किसी से ऐसा ही व्यवहार करे यद्यपि उसको अल्लाह का बन्दा, दास और मखलूक ही समझता हो तो वह और अबू जहल दोनों शिर्क में बराबर हैं
शिर्क की हकीकत (अर्थ)
इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि शिर्क केवल यही नहीं है कि किसी को अल्लाह के बराबर या उसको उसके मुकाबिले का माना जाए, बल्कि यह भी शिर्क है कि जो चीजें अल्लाह ने उपने लिए विशेष कर रखी हैं तथा जिनको अपने बन्दों पर उपासना के लक्षण ठहराये हैं उन्हें किसी अन्य के लिए करना जैसे किसी के लिए सजदा करना, किसी के नाम पर जानवर बलिदान करना, उसकी मिन्नत (विनय) मानना मुश्किल के समय तथा संकट में किसी अन्य को पुकारना, संकट में उसकी दोहाई देना, अल्लाह के सिवा किसी अन्य को हर स्थान पर उपस्थित एंव निरिक्षक (हाजिर व नाजिर समझना तथा उसके अन्दर ईश्वरीय शक्ति एंव ईश्वरीय अधिकार में से कुछ अंश साबित करना यह सब शिर्क के विभिन्न रूप हैं। सजदा केवल अल्लाह ही के लिए करना चाहिए, कुरबानी तथा बलिदान केवल अल्लाह ही के लिए विशेष हैं, मिन्नत केवल उसी की मानी जाए, केवल वही अल्लाह इल्म तथा देखने, सुनने के आधार से हर जगह हाजिर व नाजिर है (अर्थात अल्लाह तआला सर्वदर्शी, सर्वसाक्षी और सर्वज्ञानी होने की हैसियत से हर जगह हाजिर एंव उपस्थित है न कि जिस्म के साथ ।) । सारी चीजें, सभी प्राणी और सम्पूर्ण सृष्टि उसी के अधीन में हैं और हर तरह का अधिकार उसी को प्राप्त है। उपरोक्त उल्लेखित सभी गुण, विशेषताएँ (सिफात) केवल अल्लाह के लिए खास (विशेष) हैं, यदि इन में से कोई सिफत (गुण) अल्लाह के सिवा किसी दूसरे में मानी जाए तो यह शिर्क है। यद्यपि उसको अल्लाह से छोटा समझा जाए तथा उसे अल्लाह का पैदा किया हुआ सृष्टि और दास माना जाए । फिर इस विषय में नबी, वली, जिन्नात, शैतान, पीर, फकीर भूत परेत और परी आदि सब बराबर हैं। अर्थात कोई इस किसम का व्यवहार करेगा वह मुश्कि हो जाएगा और उसका यह काम शिर्क कहलाएगा । यही कारण है कि अल्लाह तआला ने बुत परस्तों ( मूर्तिपूजकों) की तरह यहूदियों और नसरानियों (जिविस क्रिश्चियन) पर भी अपना क्रोध तथा अभिशाप (लानत) प्रकट किया है हालाँकि वह मूर्तिपूजक न थे अल्बत्ता अवलिया, अम्बिया के साथ ऐसा ही व्यवहार रखते थे । अल्लाह तआला का कथन प्रमाण स्वरुप प्रस्तुत है।
اتَّخَذُوا أَحْبَارَهُمْ وَرُهْبَانَهُمْ أَرْبَابًا مِّن دُونِ اللَّهِ وَالْمَسِيحَ ابْنَ مَرْيَمَ وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا إِلَيْهَا وَاحِدًا لَّا إِلَهَ إِلَّا هُوَ سُبْحَانَهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ ) (همية (٢)
अर्थ (उन्हों ने अल्लाह के अतिरिक्त अपने मोलवियों और दरवेशों को रब (प्रतिपालक) बना लिया था, मरयम् के पुत्र ईसा को भी। हालाँकि उन्हें एक ही अल्लाह की उपासना का आदेश दिया गया था, जिसके सिवा कोई पूजनीय नहीं । जो मुश्श्रिकों के शिर्क से पवित्र और स्वच्छ है ।)) (सूरह तौबा आयत ३)
अर्थात वे अल्लाह को बड़ा मालिक समझते थे किन्तु अपने मोलवियों, धार्मिक विद्धानों तथा दरवेशों को अल्लाह से छोटा मालिक मानते थे। जब कि उनको इस का आदेश नहीं दिया गया था । अतः इस से उन पर शिर्क साबित हुआ । अल्लाह तो सब से निराला और पवित्र है, उसका कोई शरीक और साझीदार नहीं हो सकता । न छोटा न बड़ा, छोटे बड़े सब उसके सामने बेबस् (असमर्थ) दास हैं तथा इस बारे में सब एक जैसे हैं। अल्लाह तआला का इस बारे में शुभ कथन है।
إِن كُلُّ مَن فِي السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ إِلَّا ءَاتِي الرَّحْمَنِ عَبْدًا لَقَدْ أَحْصَهُمْ وَعَدَّهُمْ عَذَا (3) وَكُلُّهُمْ عَاتِيهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَرْدًا )) (مرام ٠١٠٠١٣)
अर्थ : (( आसमान और जमीन पर जितने भी लोग हैं सभी अल्लाह के सामने दास बन कर आने वाले हैं। निस्सन्देह अल्लाह ने उन सब को अपने अधीन में कर रखा है तथा एक एक करके उनको गिन रखा है और उन में से प्रत्येक को महाप्रलय के दिन उसके सामने अकेला आना होगा । )) (सूरह मरयम)
अर्थात इन्सान हो या फरिश्ता अथवा कोई भी हो सभी अल्लाह के दास और गुलाम हैं। अल्लाह के सामने आजिजू तथा बेबस (विनीत) हैं कोई बल् नहीं रखते और अल्लाह तआला हर एक में स्वयं अपना अधिकार जमाता है, किसी को किसी के अधिकार में नहीं देता। हर एक को उस के सामने हिसाब व किताब के लिए अकेला हाजिर होना है । वहाँ न कोई किसी का वकील होगा और न हिमायती ( सहयोगी ) । कुरआन मजीद में इस विषय की और भी सैकड़ों आयतें हैं लेकिन हमने नमूने के रुप में कुछ आयतें लिख दी हैं जिस व्यक्ति ने इन्हें समझ लिया वह इन्शाअल्लाह शिर्क और तौहीद को अच्छी तरह समझ जाएगा ।
दूसरा अध्याय
शिर्क की किस्में
अब यह जानना जरुरी है कि अल्लाह तआला ने कौन कौन सी चीजें अपनी जात (व्यक्तित्व) के लिए मखसूस ( विशेष) फरमाई हैं ताकि उनमें किसी को शरीक (साझी) न किया जाए । ऐसी चीजें तो बहुत अधिक हैं, परन्तु हम यहाँ कुछ चीजों को बयान करके कुरआन तथा हदीस से साबित करेंगे ताकि लोग उसी आधार पर दूसरी बातें भी स्वयं ही समझ लें।
१- इल्म (ज्ञान) में शिर्क करना
पहली चीज़ यह है कि अल्लाह तआला सुनने, देखने और ज्ञान रखने के आधार से हर जगह हाजिर व नाजिर (उपस्थित) है । उस का इल्म (ज्ञान) हर चीज़ को घेरे में लिए हुये है । (अर्थात कोई भी चीज़ उस के इल्म तथा ज्ञान से बाहर नहीं है वह हर चीज़ के विषय में हर समय खबर रखता है, चाहे वह चीज़ दूर हो या करीब, जाहिर (स्पष्ट) हो या पोशीदा (लुप्त), गायब हो या हाजिर, आसमानों में हो या ज़मीनों में, पहाड़ों की चोटियों पर हो या समुद्र के तह में यह केवल अल्लाह ही की महिमा है किसी और की महिमा नहीं। अब यदि कोई उठते बैठते अल्लाह के अतिरिक्त किसी दूसरे का नाम लिया करे या दूर व करीब से उसे पुकारे ताकि वह उसकी संकट टाल दे, या दुश्मन (शत्रु) पर उसका नाम लेकर हमला (आक्रमण ) करे या उसके नाम का ख़तम् पढ़े या उस के नाम का विर्द करे (अर्थात उसके नाम को जपे) या उसके स्वरुप की कल्पना करे और यह अकीदः (धारणा) रखे कि मैं जिस समय ज़बान से उसका नाम लेता हूँ या दिल में उसकी कल्पना करता हूँ या उसकी सूरत् का खयाल करता हूँ या उसकी कबर का ध्यान करता हूँ तो उसको खबर होजाती है तथा उससे मेरी कोई बात छुपी नहीं रह सकती और मेरे ऊपर जो स्थितियाँ गुज़रती हैं जैसे बीमारी तन्दुरुस्ती, खुशहाली बहाली, मरना जीना, दुख सुख उसको इन सब की हर वक्त ख़बर रहती है, जो बात मेरे मुंह से निकलती है वह उसे सुन लेता है और मेरे दिल की बातों, कामनाओं तथा विचारों से अवगत रहता है। इन तमाम बातों से शिर्क साबित हो जाता है। इस को ज्ञान में शिर्क करना कहते हैं, अर्थात अल्लाह तआला के ज्ञान के समान किसी अन्य के लिए ज्ञान साबित करना । निस्सन्देह ऐसा अकीदः रखने से आदमी मुशरिक हो जाता है, चाहे यह अकीदः नबियों और वलियों के बारे में रखे, चाहे पीर एवं इमाम के बारे में, चाहे किसी बड़े से बड़े इन्सान या मुकर्रब् से मुकर्रब् फरिश्ते के बारे में, चाहे उनका यह इल्म (ज्ञान) जाती (स्वकीय) या अल्लाह का प्रदान किया हुआ हर तरह से शिर्क साबित होता है ।
२ अधिकार में शिर्क करना ।
सारे जगत में इच्छानुसार हेर फेर तथा परिवर्तन करना, अधिकार जमाना आदेश जारी करना, अपनी इच्छा से मारना और जीवित रखना, रोजी में बृद्धि या कमी करना, निरोगी या रोगी बनाना, विजयी अथवा पराजित करना, प्रतिष्ठा (इज़्ज़त ) या पतन (जिल्लत) देना, मुरादें ( आशायें) पूरी करना, आवश्यकता की पूर्ति करना, संकट टाल देना, कष्ट निवारण करना और कठिन समय आने पर सहायता पहुँचाना यह सब कुछ अल्लाह ही की महिमा ( शान ) है अल्लाह के अतिरिक्त किसी की ऐसी महिमा (शान ) नहीं चाहे वह नबी, रसूल, फरिश्ता, वली, पीर, शहीद आदि ही क्यों न हो। यदि कोई अल्लाह के अतिरिक्त किसी के लिए इस प्रकार की शक्ति साबित करे और उस से अपनी मुरादें माँगे और इसी की पूर्ति के लिए उसके नाम की मिन्नत माने या कुरबानी करे और संकट में उसको पुकारे कि वह उसकी बलायें टाल दे तो ऐसा व्यक्ति मुशरिक हो जाता है और इस को अल्लाह के अधिकार में शिर्क करना कहते हैं। अर्थात अल्लाह के समान शक्ति तथा अधिकार किसी अन्य में मान लेना शिर्क है। चाहे इसे यूँ समझें कि यह शक्ति और अधिकार उनके अन्दर स्वयं पायी जाती हैं अथवा यह समझे कि अल्लाह तआला ने उन्हें यह शक्ति प्रदान की है। हर प्रकार से शिर्क साबित होता है।
३ – इबादत (उपासना) में शिर्क करना
अल्लाह तआला ने कुछ सम्मान के काम अपने लिए विशेष कर रखे हैं जिनको इबादत (उपासना) कहते हैं, जैसे सजदः, रुकूअ, हाथ बाँध कर खड़े होना, अल्लाह के नाम पर दान करना, उसके नाम का रोज़ा (सौम) रखना और उसके पवित्र घर काबा की जियारत (दर्शन) के लिए दूर दूर से आना और ऐसा रुप धारण करके आना कि लोग पहचान जायें कि ये काबा की ज़ियारत के लिए जा रहे हैं (अर्थात मीकात पर पहुँच कर इहराम बाँधना और इहराम की हालत में जिन चीज़ों के प्रयोग से मना किया गया है उन से बचना ।)
रास्ते में अल्लाह ही का नाम पुकारना, फुजूल बातों ( प्रलाप और मिथियाकथन) और शिकार से बचना और सुन्नत अनुसार जाकर उसके घर का तवाफ (परिक्रमा ) करना, काबा को किब्ला मानकर उसकी तरफ मुंह करके सजदा करना, उसकी तरफ कुरबानी के जानवर ले जाना 1 वहाँ मिन्नतें मानना, काबा पर गिलाफ चढ़ाना, उसके पास खड़े होकर दुआयें माँगना दीन व दुनिया की भलाइयाँ तलब् करना, हजरे अस्वद् को चूमना(हजरे अस्वद को इस अकीदे से चूमना चाहिए कि इस से केवल रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की इत्तिबाअ (अनुसरण) मकसूद है जैसा कि हजरत उमर रजियल्लाहु तआला अन्हु ने इस बारे में अपना विचार इस तरह व्यक्त किया था कि ( मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तू केवल एक पत्थर है तेरे अन्दर लाभ या हानी पहुँचाने की क्षमता नहीं है चूंकि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने तुझे बोसा दिया था इस लिए आप की इत्तिबाअ में मैं भी ऐसा कर रहा हूँ।)), काबा और उसके चारों तरफ बनी हुई मस्जिदे हराम में रौशनी का ब्यवस्था करना, उसमें खादिम (सेवक) बनकर रहना जैसे झाडू देना, रोशनी करना, फर्श बिछाना, हाजियों को पानी पिलाना, वुजू और गुस्ल (स्नान के लिए पानी का ब्यवस्था करना, जमज़म का पानी पवित्र और तबर्रुक् ( प्रसाद) समझ कर पीना, अपने घर परिवार या रिश्तेदारों को सौगात के रुप में देने के लिए ले जाना, उसके आस पास के दरख्तों को न काटना, वहाँ शिकार न करना यह सब काम अल्लाह तआला ने अपनी इबादत के लिए अपने बन्दों को बताये हैं।
फिर यदि कोई व्यक्ति किसी नबी को या वली को या पीर को या किसी के थान या चिल्ले को या किसी के मकान व निशान को या किसी के तबर्रक् व ताबूत को सजदा करे या रुकू करे या उसके लिए अथवा उसके नाम पर रोज़ा रखे या हाथ बाँधकर खड़ा होवे या चढ़ावा चढ़ाये या उनके नाम का झण्डा स्थापित करे या वापसी के समय उलटे पाँव चले या कबर (समाधि) को चूमे या कबरों, थानों,खानकाहों, दरबारों अथवा अन्य स्थानों की दर्शन के लिए दूर दूर से सफर करके जाये या वहाँ मुजावर बनकर बैठे या चिराग जलाये और रोशनी का इन्तिजाम करे या गिलाफ चढ़ाये या कबर पर चादर चढ़ाये या मूर्छल् झले या शामियाना ताने या उनकी चौखट का बोसा ले या वहाँ हाथ बाँध कर दुआयें माँगे या मुरादें माँगे या वहाँ सेवक बनकर रहे या उसके आस पास के जंगलों का अदब करे अतः इस किसिम का कोई भी काम करे तो उसने खुल्लम् खुल्ला शिर्क किया, इसको इबादत ( उपासना) मे शिर्क करना कहते हैं। अर्थात अल्लाह के समान किसी का सम्मान करना। चाहे यह समझे कि ये लोग स्वयं ही इस सम्मान के योग्य हैं अथवा यह समझे कि इन का इस प्रकार का सम्मान करने से अल्लाह तआला
प्रसन्न होता है तथा इन की सम्मान की बरकत से बलाएँ टल जाती हैं। अतः हर प्रकार से शिर्क साबित होता है।
४- स्वभाव (आदत) तथा दैनिक कामों में शिर्क
अल्लाह तआला नें अपने बन्दों को यह अदब सिखाया है कि वह संसारिक कामों में अल्लाह को याद रखें तथा उसका आदर, सम्मान करते रहें ताकि ईमान भी संवर जाये (दृढ़ रहे ) और कामों में बरकत (कल्याण) भी हो जैसे मुसीबत के समय अल्लाह की नजर (मिन्नत मान लेना और संकट में केवल उसी को पुकारना और काम प्रारम्भ करते समय बरकत के लिए उसी का नाम लेना और जब औलाद पैदा हो तो इस नेमत के शुक्रिया में उसके नाम पर जानवर जबह् करना (अर्थात अकीका करना) तथा औलाद का नाम अब्दुल्लाह अब्दुर्रहमान, इलाही बख़्श, अल्लाह दिया, अमतुल्लाह और अल्लाह दी रखना। खेती के पैदावार में से थोड़ा बहुत उस के नाम का निकालना, फलों में से कुछ फल उस के नाम का लिकालना, जानवरों में से कुछ
जानवर उसकी भेंट के लिए खास (निश्चित) करना और उसके नाम के जो जानवर बैतुल्लाह को ले जाये जायें उनका आदर करना अर्थात न उन पर लादना, न सवार होना (लेकिन अगर किसी के पास इस के सिवा दूसरी सवारी नहीं है तो ऐसी हालत में कुरबानी के जानवरों पर सवार होना दुरुस्त है और सामान लादना भी जायज है इस में कोई हरज नहीं है।) । खाने पीने और पहनने ओढ़ने में अल्लाह के हुकुम पर चलना, अर्थात जिन चीज़ों के प्रयोग करने का आदेश है केवल उन्हीं चीजों को प्रयोग करना और जिन चीजों को प्रयोग करने से मना किया गया है उन को प्रयोग न करना। दुनिया में गेरानी ( अकाल ) अर्जानी (विशालता), स्वास्थ्य रोग, जीत ( विजय) हार (पराजय), इज़्ज़त (प्रतिष्ठा) और जिल्लत ( पतन) दुःख सुख जो कुछ भी आदमी को पेश आता है सब को अल्लाह के अधिकार में समझना। हर काम का इरादा करते समय इन्शाअल्लाह कहना उदाहणार्थ यूँ कहना कि इन्शाअल्लाह हम फलाँ काम करेंगे और अल्लाह तआला के नाम को ऐसे आदर के साथ लेना कि जिस से उसका मालिक होना और स्वयं दास होना प्रकट होता हो जैसे यूँ कहना हमारा रब्, हमारा मालिक, हमारा खालिक, हमारा मअबूद आदि। यदि किसी वक्त क़सम् खाने की जरुरत पड़ जाये तो उसी के नाम की कसम खाना । ये तमाम बातें तथा इस किस्म की अन्य बातें अल्लाह तआला नें अपनी ताज़ीम (आदर सम्मान) के लिए मुकर्रर (नियुक्त ) फरमाए हैं। फिर जो कोई नबियों, वलियों, पीरों, इमामों तथा अन्य किसी का भी इस प्रकार का आदर सम्मान करे तो इस से शिर्क साबित हो जाता है। उदाहरणार्थ काम रुका हुआ हो या बिगड़ रहा हो उसको चालू करने या बनने के लिए कोई व्यक्ति अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की नज़र माने । औलाद का नाम अब्दुन्नबी, इमाम बख़्श, पीर बख़्श रखे । खेत और बाग की पैदावार में उनका हिस्सा निकाले, खेती बाड़ी, बाग आदि से जो कुछ फल् या गल्ला प्राप्त हो तो उस में से पहले उनकी नियाज़ करे फिर अपने काम में लाए । पशुओं (जानवरों में उन के नाम के जानवर खास करे और फिर उन जानवरों का आदर सम्मान करे, पानी से चारे से उन्हें न हटाये, लकड़ी से पत्थर से उन्हें न मारे। खाने, पीने पहनने में रस्म व रिवाज (रीतियों को प्रमाण बनाये जैसे यह कहे कि फलाँ फलाँ लोग फलाँ फलाँ खाना न खाएँ, फलाँ फलाँ कपड़ा न पहनें, बीबी (बीबी से मुराद हजरत फातमा ज़हरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा हैं।) की सह्नक् उन के (बड़ा पियाला) मर्द न खाएँ, लौंडी न खाए और जिस औरत ने दूसरा विवाह किया हो वह न खाए, शाह अब्दुल हक का तोशा हुक्का पीने वाला न खाये। दुनिया की भलाई बुराई को उनकी तरफ सम्बोधित करे जैसे यह कहे कि फलाँ आदमी उनकी लानत् तथा बद्दुआ (अभिशाप) के कारण पागल तथा दीवाना होगया, फलाने के ऊपर उन्हों ने अपना क्रोध प्रकट किया तो वह निर्धन हो गया और फलाने को उन्हों ने प्रदान किया तो वह धनवान बन गया और प्रतिष्ठा तथा माल व दौलत उसके पाँव चूम रहे हैं और फलाँ तारे की वजह से अकाल आया अथवा यह कहे कि फलाँ काम इस लिए नहीं पूरा हुआ क्योंकि उसे फलाने दिन या फलाने समय में प्रारम्भ किया गया था अथवा यह कहे कि अल्लाह और रसूल चाहेगा तो मैं आऊँगा या पीर चाहेगा तो यह बात बन जायेगी अथवा उसके लिए इस तरह की उपाधि नियुक्त करते हुए यूँ बोले, दाता, या दाता, बेपरवाह ग्ररीब नवाज़, या गरीब नवाज़, या गौस, मुश्किल कुशा, दस्तगीर, कुतबे आलम्, काज़ियुल् हाजात, मालिकुल् मुल्क, शाहन्शाह आदि । कसम खाने की जरुरत पड़ जाये तो नबी की या वली की या इमाम व पीर की या उन की कबरों की या अपनी जान की कसम खाये । अतः इस प्रकार की तमाम बातों से शिर्क साबित हो जाता है और इसे स्वभाव (आदत तथा दैनिक काम) में शिर्क करना कहते हैं। अर्थात जैसा आदर एवं सम्मान अल्लाह के लिए होना चाहिए वैसे ही दूसरों का आदर व सम्मान करना यह चीज़ शिर्क है। शिर्क की इन चारों किसमों का कुरआन और हदीस में स्पष्ट रुप से बयान आया है इस लिए आने वाले अध्यायों में हम ने इन को तफसील के साथ बयान कर दिए हैं।
तीसरा अध्याय
शिर्क की बुराई और तौहीद की खूबियाँ शिर्क माफ नहीं हो सकता
ان الله لا يغفر ان يشرك به ويغفر ما دون ذلك لمن يشاء ومن يشرك بالله فقد ضل ضللا بعيدا }
अर्थ : ( निस्सन्देह अल्लाह तआला अपने साथ शिर्क किए जाने को क्षमा नहीं करेगा और इस के अतिरिक्त जो चाहेगा। अथवा जिसके लिए चाहेगा क्षमा कर देगा और जिसने अल्लाह का शरीक ठहराया तो वह सीधे मार्ग से बहुत दूर भटक कर चला गया । ))
अर्थात अल्लाह की राह से भटकना यह भी है कि आदमी हलाल (वैध) हराम (वर्जित) में अन्तर न कर, चोरी बकारी में ग्रस्त हो जाए, नमाज़ रोज़ा छोड़ बैठे, बीवी बच्चों का हकू न अदा करे और माता पिता का सेवा सत्कार तथा आदर न करे। लेकिन जो शिर्क की दलदल् में फंस गया वह अन्तिम दर्जे का पथभ्रष्ट हो गया, क्योंकि वह ऐसे पाप में ग्रस्त हो गया जिसको अल्लाह तआला बिना तौबा कभी नहीं क्षमा करेगा और दूसरे गुनाहों को शायद अल्लाह तआला क्षमा करदे। इस आयत से यह ज्ञात हुआ कि शिर्क को क्षमा नहीं किया जायेगा उसकी जो सजा निश्चित है अवश्य मिलेगी और मुशरिक की सज़ा यह है कि वह सदेव नरक (जहन्नम्) में रहेगा, न उस से कभी निकाला जाएगा और न उस में कभी आराम तथा सुख पाएगा और शिर्क के अतिरिक्त अन्य पापों को अल्लाह तआला के यहाँ जो सजायें निश्चित हैं वे अल्लाह की इच्छा पर निर्भर हैं चाहे सज़ा दे और चाहे क्षमा करदे ।
एक उदाहरण
यह भी मालूम हुआ कि शिर्क से बड़ा कोई गुनाह नहीं । इस को निम्नलिखित उदाहरण से समझिए । उदाहरणार्थ बादशाह के यहाँ प्रजा के लिए हर प्रकार के दण्ड निश्चित हैं जैसे चोरी करना, डकैती, पहरा देते समय सोजाना, दरबार में देर से पहुँचना, लड़ाई के मैदान से भाग जाना और सरकार के पैसे पहुँचाने में कोताही करना आदि । इन सब अपराधों की सजायें निश्चित हैं परन्तु दण्ड देना बादशाह की इच्छा पर निर्भर है चाहे तो दण्ड दे और चाहे तो क्षमा कर दे। लेकिन कुछ अपराध ऐसे होते हैं जिन से विद्रोह प्रकट होते है जैसे किसी अमीर को या वजीर को या चौधरी को या जमीनदार को या रईस को बादशाह के होते हुए उसकी मौजूदगी में बादशाह बना दिया जाए या इन में से किसी के लिए ताज़ (मुकुट) या तख्त (सिंहांसन) बनाया जाये या इन में से किसी का सम्मान और आदर बादशाह की तरह की जाये या इन में से किसी के लिए एक जशन ( उत्सव) का दिन नियुक्त किया जाये और बादशाह की तरह नज़राना या उपहार (सौगात) पेश किया जाए। तो यह अपराध सारे अपराध से बड़ा है और इस अपराध की सज़ा अवश्य मिलनी चाहिये। जो बादशाह इस प्रकार के अपराधों की सजाओं से अचेतना प्रकट करे और ऐसे लोगों को दण्ड न दे तो उस के राज्य में कोताही पाई जाती है। इसी कारण बुद्धिमान लोग ऐसे बादशाह को असमर्थ (ना अल और बेगैरत) कहते हैं। लोगो सावधान हो जाओ और उस स्वाभिमानी मालिकुल् मुल्क गैरत्मन्द बादशाह (अल्लाह) से डर जाओ। जो अत्यन्त शक्तिशाली है। उसकी शक्ति का कोई सीमा नहीं है और वह प्रथम श्रेणी का गैरत् वाला है तो भला वह मुशरिकों को क्यों दण्ड न देगा और बिना दण्ड दिए क्योंकर छोड़ देगा ? अल्लाह तआला तमाम मुसलमानों पर दया तथा कृपा करे और उन्हें शिर्क जैसी भयंकर आफत् से बचा ले। आमीन
शिर्क सब से बड़ा अत्याचार है
अल्लाह तआला फरमाते हैं
على وَإِذْ قَالَ لُقْمَنُ لِابْنِهِ، وَهُوَ يَعِظُهُ يَبْنَى لَا تُشْرِكْ بِاللَّهِ إِنَّ الشَّرْكَ لَظُلْمٌ عَظِيمٌ ﴾ (سال ٠١٣)
अर्थ : (( जब लुकमान अलैहिस्सलाम ने (नसीहत करते समय) अपने बेटे से कहा बेटा अल्लाह के साथ शरीक न करना निःसन्देह शिर्क बहुत बड़ा अत्याचार है।))
अर्थात अल्लाह तआला ने लुकूमान अलैहिस्सलाम को बुद्धिमानी प्रदान की थी। उन्हों ने अपनी बुद्धि विवेक से मालूम किया कि किसी का हक किसी अन्य को दे देना बहुत बड़ा अन्याय तथा अत्याचार है फिर जिस ने अल्लाह का हक अल्लाह की मखलूक में से किसी को दे दिया तो उस ने बड़े से बड़े का हक लेकर हीन से हीन प्राणी को दे दिया क्योंकि अल्लाह सब से बड़ा है और सम्पूर्ण सृष्टि उसकी दास है जैसे कोई बादशाह का ताज (मुकुट) किसी नोकर चाकर के सर पर रखदे फिर इस से बड़ा अन्याय क्या हो सकता है? और यह अवश्य जान लेना चाहिए कि हर व्यक्ति चाहे वह बड़े से बड़ा इन्सान हो या मुर्काब् फरिश्ता उसकी हैसियत् अल्लाह की शान (महिमा) के आगे एक नोकर चाकर से भी हीन है। मालूम हुआ कि जिस तरह शरीअत् ने शिर्क को महापाप बताया है इसी प्रकार बुद्धि भी शिर्क को महापाप मानती है। सच्ची बात यही है कि शिर्क सब दोषों से बड़ा दोष है क्योंकि इन्सान में सब से बड़ा दोष यही है कि वह अपने बड़ों की बेअदबी करे और शिर्क अल्लाह की शान में बहुत बड़ी बेअदबी है ।
तौहीद ही मुक्ति का रास्ता है
अल्लाह तआला का इरशाद है।
وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رَّسُولٍ إِلَّا نُوحِيَ إِلَيْهِ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدُونِ ﴾ (الاحياء )
अर्थ : (( आप से पहले हम ने जो रसूल भी भेजा हम ने उसको यही वहय (प्रकाशना की कि मेरे अतिरिक्त कोई पूजनीय नहीं अतः मेरी ही पूजा करो । ))
अर्थात सभी रसूल अल्लाह के पास से यही आदेश लेकर आये कि केवल अल्लाह की उपासना की जाए और उसके अतिरिक्त किसी अन्य की उपासना न की जाए । मालूम हुआ कि तौहीद का आदेश और शिर्क से मनाही सभी शरीअतों में है इस लिए केवल यही मुक्ति का मार्ग है बाकी सभी राहें गलत् हैं।
अल्लाह तआला शिर्क से अप्रसन्न तथा बेपरवाह है
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُوْلُ اللهِ ﷺ قَالَ اللهُ تعالى (( أَنَا أَغْنَى الشَّرَكَاء عَنِ الشِّرْكِ مَنْ عَمِلَ عَمَلاً أَشْرَكَ فِيهِ مَعِي غَيْرِي تَرَكْتُهُ وَشِرْكَهُ وَأَنَا مِنْهُ بَرِى )) (مسلم)
अबू हुरैरः (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि अल्लाह तआला फरमाते हैं कि (मैं शरीकों में सब से अधिक शिर्क से बेपरवाह हूँ जिस ने कोई ऐसा काम किया जिस में उस ने मेरे साथ किसी अन्य को शरीक किया तो मैं उसको और उसके शरीक को `छोड़ देता हूँ और उस से बेज़ार (अप्रसन्न) हो जाता हूँ)) अर्थात जिस प्रकार अन्य लोग अपनी सम्मिलित चीजें आपस में बाँट लेते हैं मैं ऐसा नहीं करता क्योंकि मैं बेपरवाह हूँ जिस ने मेरे लिए कोई काम किया और उस में किसी अन्यको भी शरीक कर लिया तो मैं अपना हिस्सा भी नहीं लेता बल्कि पूरे का पूरा उसी के लिए छोड़ देता हूँ”। (कुछ हदीसों में इस तरह के भी शब्द हैं ( मैं शिर्क से अप्रसन्न हूँ, जिस के लिए उस ने यह काम किया है वही उस को बदला दे। ))
इस हदीस से यह मालूम हुआ कि जो आदमी अल्लाह के लिए कोई काम करे और वही काम किसी अन्य के लिए भी करे तो उस ने शिर्क किया और यह भी मालूम हुआ कि शिर्क करने वालों की उपासना जो अल्लाह के लिए की जाए वह भी अल्लाह के यहाँ मकबूल (स्वीकृत) नहीं है बल्कि अल्लाह तआला उस से अप्रसन्न होता है।
अजल (अनादिकाल) में तौहीद का वचन लेना, अल्लाह तआला फरमाते हैं।
ملے وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي ءَادَمَ مِن ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَى أَنفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى شَهِدْنَا أَن تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَذَا غَافِلِينَ ) أَوْ تَقُولُوا إِنَّمَا أَشْرَكَ ءَابَاؤُنَا مِن قَبْلُ وَكُنَّا ذُرِّيَّةً مِّنْ بَعْدِهِمْ أَفَتِّهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ الْمُبْطِلُونَ ) (الأعراف (۱۷۲-۱۷۲)
अर्थ: (( और (उस समय को याद करो) जब तेरे रब ने आदम नबी की पीठ से उनकी औलाद को निकाला और उन से यह वचन लिया (और उन से पूछा क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ ? उन्हों ने कहा क्यों नहीं हम गवाह हैं (कि तू हमारा रब है) और यह वचन हमने इस लिए लिया तथा इक़रार करवाया ताकि कयामत के दिन तुम कहीं यह न कहने लगो कि हम इस बात से गाफिल (अनभिज्ञ थे या यह न कहने लगो कि हम से पहले हमारे बाप दादों ने शिर्क किया था और हम तो केवल उनकी औलाद थे (जो) उन के बाद (पैदा हुए) तो क्या तू उन पथभ्रष्टों के बदले हमें नष्ट कर देगा ? ।))
أَخْرَجَ أَحْمَدُ عَنْ أَبِي بْنِ كَعْبٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ فِي تَفْسِيرِ قَوْلِ اللَّهِ عَزَّوَجَلَّ { وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ } قَالَ جَمَعَهُمْ فَجَعَلَهُمْ أَزْوَاجاً (ارواحاً) ثُمَّ صَوَّرَهُمْ فَاسْتَنْطَقَهُمْ فَتَكَلِّمُوا ثُمَّ أَخَذَ عَلَيْهِمُ الْعَهْدَ وَالْمِيثَاقَ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوْا بَلَى قَالَ فَإِنِّي أُشْهِدُ عَلَيْكُمُ السَّمَاوَاتِ السَّبْعَ وَالْأَرْضِينَ السَّبْعَ وَأُشْهِدُ عَلَيْكُمْ أَبَاكُمْ آدَمَ أَنْ تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ لَمْ نَعْلَمْ بِهَذَا اعْلَمُوا أَنَّهُ لا إِلَهَ غَيْرِى وَلَا رَبِّ غَيْرِي وَلَا تُشْرِكُوا بِى شَيْئًا إِنِّي سَأُرْسِلُ إِلَيْكُمْ رُسُلِي يُذَكِّرُونَ عَهْدِى وَمِيْثَاقِي وَأَنزُلُ عَلَيْكُمْ كُتُبِى قَالُوا شَهِدْنَا بِأَنَّكَ رَبُّنَا وَإِلهُنَا لَا رَبِّ لَنَا غَيْرُكَ وَلَا إِلَهَ لَنَا غَيْرُكَ فَأَقَرُّوا بِذَلِكَ وَرَفَعَ عَلَيْهِمْ آدَمَ عَلَيْهِ السَّلَامُ يَنْظُرُ إِلَيْهِمْ فَرَأَى الْغَنى وَالْفَقِيْرَ وَحَسَنَ الصُّوْرَة وَدُونَ ذلِكَ فَقَالَ رَبِّ لَوْلاً سويْتَ بَيْنَ عِبَادِكَ ؟ قَالَ (( إِنِّي أَحْبَبْتُ أَنْ أَشْكَرَ )) وَرَأَى الْأَنْبِيَلَ فِيهِمْ مِثْلَ سُرُجٍ عَلَيْهِمُ النُّوْرُ وَحُصُوا بِمِيْنَاقِ آخَرَ فِي الرِّسَالَةِ والنُّبُوَّة وَهُوَ قَوْلُهُ تَبَارَكَ وَتَعَالَى { وَ إِذْ أَخَذْنَا مِنَ النَّبِيِّينَ مِيثَاقَهُمْ } إِلَى قَوْلِهِ تَعَالَى { عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ } { وَإِذْ أَخَذْنَا مِنَ النَّبِيِّينَ مِيثَاقَهُمْ وَمِنْكَ وَمِن نُوحٍ وَإِبْرَاهِيمَ وَمُوسَى وَ عِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ }
उबै बिन काब (रजि) ने इस आयत } واذ أحد ربُّك من بني آدم की तफ्सीर में फरमाया कि अल्लाह तआला ने आदम की औलाद को इकठ्ठा किया फिर उनकी अलग अलग टोली बनाई, फिर उनके रुप बनाए, फिर उनको बोलने की शक्ति प्रदान की तो वह बोलने लगे फिर उन से दृढ़ प्रतिज्ञा एवं वचन लिया और उन पर स्वयं उन्हीं को गवाह बनाकर फरमाया (( क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ ? उन्हों ने उत्तर दिया निःसन्देह आप हमारे रब हैं। फिर अल्लाह तआला ने फरमाया मैं तुम्हारे ऊपर सातों आसमानों और सातों ज़मीनों को गवाह बनाता हूँ और तुम्हारे बाप आदम को भी ताकि तुम क्यामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि हम इस बात से बेखबर थे, तो अच्छी तरह जान लो और यकीन कर लो कि मेरे सिवा कोई दूसरा मअबूद (पूजनीय) नहीं है और न मेरे सिवा कोई रब है मेरे साथ किसी को शरीक न करना, मैं तुम्हारे पास अपने रसूल भेजता रहूँगा जो तुम्हें मेरा
यह वचन और मेरी प्रतिज्ञा याद दिलाते रहेंगे और तुम पर अपनी किताबें भी उतारूँगा । सब ने उत्तर दिया कि हम तुझे वचन दे चुके हैं और तुझसे यह प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि केवल आप ही हमारे रब और माबूद ( पूजनीय) हैं। आप के सिवा न कोई हमारा रब है और न आप के सिवा कोई हमारा मबूद है। अतः उन्हों ने इस बात (तौहीद) का इकार किया और उन पर अल्लाह तआला ने आदम अलैहिस्सलाम को बुलन्द किया तो वह अपनी सम्पूर्ण औलाद को अपनी आँखों से देख रहे थे। उन्हों ने देखा कि उन में धनवान भी हैं और निर्धन भी, सुन्दर भी हैं और कुरुप भी तो सवाल किया (ऐ हमारे रब तूने इन सब को एक समान क्यों नहीं बनाया ? )) अल्लाह तआला ने फरमाया ( मैं पसन्द करता हूँ कि मेरा शुक्र किया जाए ))
हजरत आदम अलैहिस्सलाम ने देखा कि उन लोगों में अम्बियाए किराम भी हैं वह चिरागों की तरह प्रकाशमान हैं और उन के चेहरों पर नूर है। अम्बियाए किराम से अल्लाह तआला ने रिसालत व नुबूव्वत् ( ईश्दूतत्तव ) के विषय में भी वचन लिया इस से मुराद वह प्रतिज्ञा है जिस का बयान कुरआन में यूँ आया है। (( और वह समय भी था जब हमने सभी पैगम्बरों से वचन लिया आप से (अर्थात हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से) और नूह से और मूसा से और मरयम के बेटे ईसा से )) (मुस्नद अहमद हदीस न० = २१५५२ पेज न०=१५६१ )
शिर्क प्रमाण नहीं बन सकता
हजरत उबै बिन काब ने उपरोक्त उल्लेखित आयत की तफसीर (ब्याख्या) में फरमाया कि अल्लाह पाक ने आदम की सम्पूर्ण औलाद को एक जगह इकठ्ठा किया फिर उन्की अलग अलग टोली बनाई जैसे पैगम्बरों को, औलिया को, शहीदों को, नेक लोगों को फरमाँबरदारों को, नाफरमानों को अतः सब को अलग अलग किया। इसी तरह यहूदियों को, ईसाइयों को,मुशरिकों को, काफिरों को और हर एक धर्म वाले को अलग अलग किया फिर जिसको जो सूरत (रुप) दुनिया में आने के बाद देनी थी उसी सूरत में उसे वहाँ प्रकट किया। किसी को खूबसूरत किसी को बदसूरत, किसी को आँखों वाला किसी को अन्धा (नेत्रहीन), किसी को बोलने वाला और किसी को गूँगा बनाया, और किसी को लंगड़ा। फिर उन सब को उस समय बोलने की क्षमता प्रदान की और उन सब से प्रश्न किया (क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ ? सब ने यह वचन दिया कि तू हमारा रब है फिर उन से यह प्रतिज्ञा ली कि मेरे सिवा अन्य को हाकिम और मालिक न समझना और मेरे सिवा किसी को अपना मबूद न मानना । इस तरह सब ने इसका (अल्लाह तआला की वहद्दानियत का ) वचन दिया और इकार किया और अल्लाह तआला ने इस बात पर आदम अलैहिस्सलाम, सातों आसमानों और सातों जमीनों को गवाह बनाया और फरमाया कि तुम्हारे इस वचन और प्रतिज्ञा को याद दिलाने के लिए हमारे पैगम्बर आयेंगे और अपने साथ आसमानी किताबें भी लायेंगे। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अलग अलग अनादि काल (मानव जीवन के चार भाग हैं पहला भाग आलमे अरवाह (अनादि काल ) कहलाता है यह समय आदम अलैहिस्सलाम के पैदा होने से जमीन पर उतारे जाने तक को कहते हैं। दूसरे भाग को आलमे दुनिया कहते हैं जो माँ के पेट से पैदा होने से मरने तक के समय पर बोला जाता है। तीसरा भाग है आलमे बरज़खू यह मरने के बाद से शुरु होकर कयामत आने तक के समय पर बोला जाता है। चौथा भाग है आलमे आखेरत जो कयामत कायम होने से ले कर हमेशा तक के लिए बोला जाता है।) में तौहीद का इक़रार और शिर्क से इनकार कर आया है। इस लिए शिर्क की बातों में किसी को प्रमाण नहीं बनाना चाहिए, न पीर को, न शैख को, न बाप दादा को, न बादशाह को, न मोलवी को और न बुजुर्ग को ।
एक गलत विचार का खण्डन तथा उत्तर
यदि कोई व्यक्ति यह सोचे कि संसार में आकर हमें वह वचन और प्रतिज्ञा याद नहीं रहा अब अगर हम शिर्क करें तो हमारी पकड़ न होगी क्योंकि भूल में पकड़ नहीं तथा भूली बात का क्या प्रमाण ? तो यह विचार गलत है इस लिए कि मनुष्य को बहुत सी बातें स्वयं याद नहीं रहतीं परन्तु मोतबर (विश्वास पात्र) लोगों के कहने से और याद दिलाने से विश्वास कर लेता है। जैसे किसी को अपना जन्म दिन याद नहीं फिर लोगों से सुनकर विश्वास कर लेता है और जरुरत पड़ने पर अन्य लोगों को बतलाता भी है कि मेरा जन्म फलाँ दिन, फलाँ तारीख और फलाँ सन् को हुआ । इसी तरह किसी को अपनी माँ के पेट से पैदा होना याद नहीं होता परन्तु लोगों ही से सुनकर यकीन कर लेता है और अपनी माँ ही को माँ समझता है किसी अन्य को माँ नहीं समझता। फिर यदि कोई अपनी माँ का हकू अदा न करे किसी अन्य को अपनी माँ बताये तो सारे आदमी उस पर थूकेंगे और उसे दुष्ट समझेंगे और यदि वह यह उत्तर दे कि भले लोगो मुझे तो अपना पैदा होना याद नहीं कि जिसकी वजह से मैं इसको अपनी माँ समझूँ , तुम लोग अकारण मुझे बुरा समझ रहे हो। तो सब लोग ऐसे व्यक्ति को निम्न स्तर का तुच्छ और बड़ा बेअदब समझेंगे । मालूम हुआ कि जब आम लोगों के कहने से इन्सान को बहुत सी बातों का यकीन हो जाता है तो फिर पैगम्बरों की तो शान ही बड़ी है उनके बताने से किस तरह यकीन नहीं आ सकता ?
रसूलों और आसमानी किताबों के मूल उपदेश मालूम हुआ कि तौहीद को ग्रहण करने के विषय में और शिर्क से बचने के बारे में अनादिकाल (आलमे अरवाह) में प्रत्येक व्यक्ति को अलग अलग सचेत कर दिया गया है और अच्छी तरह चेतावनी दे दी गई है। सारे पैगम्बर उसी वचन को याद दिलाने और उसी प्रतिज्ञा की नवीकरण के लिए भेजे गये थे। एक लाख चौबिस हजार (पैगम्बरों की यह संख्या जईफ हदीस पर आधारित है।) पैगम्बरों का शुभ सन्देश तथा उपदेश और आसमानी किताबों की शिक्षा इसी एक बिन्दु पर केन्द्रित है कि खबरदार तौहीद में कोई खलल् (गड़बड़ी) न आने पाए और शिर्क से बहुत दूर भागो । अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य को अपना हाकिम, शासक और अधिकारी न समझो। बल्कि प्रत्येक स्थिति में निम्नलिखित हदीस को अपने सामने रखो ।
(( عَنْ مُعَاذِ بْنِ جَبَلِ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ لِي رَسُولُ الله لا تُشْرِكْ بِاللَّهِ شَيْئًا وَإِنْ قُتِلْتَ وَ حُرِّقْتَ )) (أحمد)
हजरत मुआज बिन जबल (रजि) से रिवायत है कि मुझ से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि (अल्लाह के साथ किसी चीज़ को शरीक न कर चाहे तुझे मार डाला जाए या जला दिया जाए ।
अर्थात अल्लाह के सिवा किसी अन्य को अपना मञ्जूद ( पूजनीय ) न बना और इस बात की परवाह न कर कि , कोई जिन्न या शैतान तुझे सताएगा । जिस तरह मुसलमानों को जाहिरी (प्रत्यक्ष) मुसीबतों तथा बलाओं पर सन्तोष करना चाहिये इसी तरह बातिनी (गुप्त) तक्लीफों ( अर्थात जिन्न भूत आदि के कष्ट पहुँचाने पर भी ) सनतोष तथा धेर्य से काम लेना चाहिए। उन से डर कर और भयभीत होकर अपने दीन तथा ईमान को नहीं बिगाड़ना चाहिए । बल्कि यह अकीदा (धारणा) रखना चाहिए और यह विश्वास होना चाहिए कि वास्तव में हर चीज़ चाहे तलीफ हो या आराम अल्लाह ही के अधिकार में है परन्तु वह कभी कभी ईमान वालों की आजमाइश् करता है । ( अर्थात परिक्षा लेता है) मोमिन को उसके ईमान अनुसार परिक्षा में डाला जाता है। कभी बुरों के हाथों से नेकों को तक्लीफें पहुँचाई जाती हैं ताकि पक्के सच्चे मोमिनों और मुनाफिकों (कप्टाचारियों में अन्तर हो जाए। अतः जिस तरह जाहिर में कभी नेक लोगों को बुरे लोगों से और मुसलमानों को काफिरों से तथा अल्लाह के इरादे और इच्छा से तक्लीफें पहुँच जाती हैं और वह सब्र (सन्तोष ) ही से काम लेते हैं, तक्लीफों से घबराकर ईमान नहीं बिगाड़ते । इसी प्रकार कभी कभी नेक लोगों को जिन्नों और शैतानों से, अल्लाह की इच्छा और. इरादे से तक्लीफ पहुँच जाती है तो इस पर भी सब्र एवं सन्तोष से काम लेना चाहिए और उनके अन्दर कोई अधिकार, क्षमता और शक्ति नहीं मानना चाहिए ।
उपरोक्त उल्लेखित हदीस से मालूम हुआ कि यदि कोई व्यक्ति शिर्क से अप्रसन्न हो कर दूसरों को मानना छोड़ दे और उनकी नज़ व नियाज़ (भेंट चढ़ाना, उपहार भेजना ) की घृणा करे और गलत रीतियों (रस्मों) को मिटाये फिर इस राह में उसके धन् माल, अवलाद अथवा जान को हानि पहुँच जाए या कोई शैतान उसे किसी पीर, फकीर, वली, शहीद के नाम से सताने लगे तो वह यह समझले कि अल्लाह पाक मेरे ईमान की परिक्षा ले रहा है। इस लिए सन्तोष करे और अपने दीन व ईमान पर मजबूती (दृढ़ पूर्वक) के साथ जमा रहे । याद रखो जिस तरह अल्लाह पाक जालिमों को ढील देकर फिर उन्हें पकड़ता है और मजूलूमों (जिन पर अत्याचार किया जाता हो) को उन के हाथ से छुटकारा दिलाता है। इसी प्रकार ज़ालिम जिन्नों को भी समय आने पर पकड़ेगा और तौहीद परस्तों को उन के जुलम से बचायेगा ।
عن ابن مسعود رضى الله عنه قال : قال رجل يا رسول الله أي الذنب أكبر عند الله قال (( ان تدعوا لله ندا وهو خلقك )) (متفق عليه )
अब्दुल्लाह इब्ने मस्ऊद (रजि) से रिवायत है कि एक व्यक्ति ने प्रश्न किया कि ऐ अल्लाह के रसूल सब से बड़ा गुनाह कौन्सा है ? रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ( तू किसी को अल्लाह के समान समझकर पुकारे हालाँकि अल्लाह ही ने तुझे पैदा किया है।)) (बुखारी तथा मुस्लिम )
अर्थात जिस प्रकार अल्लाह को (उसके देखने, सुनने, जानकारी रखने के आधार से हाजिर व नाजिर समझा जाता है और हर प्रकार का तसर्रुफ् (अधिकार) केवल उसी को प्राप्त है यह मान कर हर संकट में उसे पुकारा जाता है । इसी प्रकार अल्लाह के सिवा किसी अन्य के अन्दर यही ईश्वरीय गुण (अर्थात ज्ञान, शक्ति, अधिकार, विद्या) मान कर पुकारना सब से बड़ा गुनाह है। इस लिए कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी में भी आवश्यकता पूर्ति की शक्ति, कामनायें पूरी करने और हर जगह हाजिर व नाजिर रहने की क्षमता नहीं है। दूसरे यह कि जब हमारा पैदा करने वाला अल्लाह है तो हमें अपने संकट वाले समय में उसी को पुकारना चाहिए किसी अन्य से हमारा क्या वास्ता ? जैसे कोई किसी बादशाह का गुलाम हो चुका हो तो वह अपनी हर जरुरत अपने बादशाह ही के पास ले जायेगा उसे दूसरे बादशाहों से क्या वास्ता ? किसी नोकर चाकर का तो जिक्र ही क्या है और यहाँ तो कोई दूसरा मौजूद ही नहीं है जो अल्लाह के मुकाबिले का हो फिर किसी अन्य को आवश्यकता पूर्ति के लिए पुकारना मूर्खता नहीं है तो और क्या है।
तौहीद ही मुक्ति का माध्यम है
عَنْ أَنَسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ قَالَ اللَّهُ عَزَّ وَجَل (( يَا ابْنَ آدَمَ إِنَّكَ لَوْ لَقِيتَنِي بِقُرَابِ الْأَرْضِ خَطَايَا ثُمَّ لَقِيتَنِي لَا تُشْرِكْ بِي شَيْئًا لَأَتَيْتُكَ بِقُرَابِهَا مَغْفِرَةٌ )) ( رواه الترمذي)
अर्थ : ( हजरत अनस् (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह तआला का फरमान है (ऐ आदम के पुत्र यदि तू दुनिया भर के गुनाह साथ लेकर मुझ से मिले किन्तु मेरे साथ किसी चीज़ को शरीक न ठेहराया हो तो मैं दुनिया भर की वख़्शिश ( क्षमा) के साथ तुम से मिलूँगा।)) ( तिर्मिज़ी, अहमद )
इस हदीस से मालूम हुआ कि तौहीद की बरकत से सारे गुनाह क्षमा कर दिए जाते हैं (नोट- हदीस का उद्देश्य शिर्क का भयंकर हानि स्पष्ट करना है। इस से यह नहीं समझना चाहिए कि शिर्क से बचने के पश्चात गुनाह करने से कोई हरज नहीं । गुनाह तो गुनाह ही है और इसका क्षमय होना अल्लाह की इच्छा, क्षमायाचना, प्रायश्चित्त पर निर्भर है। यहाँ शिर्क जैसे महापाप और अन्य पापों के बीच अन्तर करना मसूद है। यदि कोई आदमी शिर्क की हालत में मर गया और सच्चे दिल से तौबा नहीं किया तो ऐसा आदमी सदेव के लिए नरक में जाएगा। नरक से कभी नहीं निकाला जाएगा क्योंकि अल्लाह तआला ने स्वर्ग (जन्नत) को मुशरिक के लिए हराम कर दिया है। इस के विरुद्ध वह आदमी कि जिसने शिर्क नहीं किया या शिर्क को छोड़कर सच्चे दिल् से तौबा कर लिया और तौहीद को दृढ पूर्वक थाम लिया परन्तु इस के अतिरिक्त कुछ अन्य गुनाह भी किए हैं तो अब ये अल्लाह की इच्छा पर निर्भर है वह चाहेगा तो क्षमा करके जन्नत् में दाखिल करेगा या कुछ सजा देकर अन्त में सदेव के लिए जन्नत में दाखिल करदेगा ।) जिस प्रकार शिर्क के कारण सारी नेकियाँ नष्ट हो जाती हैं। वास्तविक बात भी यही है कि जब मनुष्य शिर्क से बिल्कुल् पवित्र और स्वच्छ होगा और उसका यह अकीदा होगा कि अल्लाह के सिवा कोई मालिक नहीं, उसकी पकड़ से भाग कर नहीं बच सकता, अल्लाह तआला के नाफरमानों (पापियों को कोई पनाह (शरण) देने वाला नहीं, उसके आगे सब बेबस ( असमर्थ) हैं, उसके आदेश का कोई उलङ्घन नहीं कर सकता, उसके अतिरिक्त किसी की सहायता काम नहीं आ सकती और कोई किसी की सिफारिश (अनुशंसा ) उस की अनुमति के बिना न कर सकेगा। इन धारणाओं के ग्रहण कर लेने और हृदय में अंकित हो जाने के पश्चात उस से जितने भी गुनाह होंगे बतकाजाए बशरीयत् (मानव प्राकृति के कारण ) होंगे या भूल चूक से फिर उन गुनाहों के बोझ से दबा जा रहा होगा, गुनाहों से घृणा करेगा, दुखी और लज्जित होगा, अल्लाह की पकड़ से भयभीत होगा और अल्लाह से क्षमायाचना करेगा तो निस्सन्देह ऐसे व्यक्ति पर अल्लाह की दया और कृपा होती है फिर जिस प्रकार उस से पाप होंगे उसी अनुसार उसकी यह हालत् बढ़ेगी और इसी प्रकार अल्लाह की दया भी बढ़ती जायेगी ।यह बात याद रखो कि पापी मुव्वहिद, परहेजगार ( सकर्मी ) मुशरिक से हजार दर्जा बेहतर है जैसे दोषी प्रजा विद्रोही तथा चापलोस (धूर्त) प्रजा से हजार दर्जा बेहतर है क्योंकि पहला अपने दोष पर लज्जित है और दूसरा अपनी धूर्तता और विद्रोही पर अभिमानी है।
चौथा अध्याय
अल्लाह तआला के ज्ञान में शिर्क करने की घृणा इस अध्याय में उन आयतों तथा हदीसों का बयान है जिन से अल्लाह तआला के ज्ञान में शिर्क करने की बुराई साबित होती है । अल्लाह तआला का शुभ कथन है।
وَعِندَهُ مَفَاتِحُ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَا إِلَّا هُوَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْبَرِ وَالْبَحْرِ وَمَا تَسْقُطُ مِن وَرَقَةٍ إِلَّا يَعْلَمُهَا وَلَا حَبَّةٍ فِي ظُلُمَاتِ الْأَرْضِ وَلَا رَطْبٍ وَلَا يَابِسٍ إِلَّا فِي كِتَابٍ مُّبِينٍ ﴾ (السلم )
अर्थ : अल्लाह ही के पास गैब (परोक्ष) की कुन्जियाँ हैं केवल वही उनको जानता है और जो कुछ जल स्थल में है उसे भी जानता है। जो भी पत्ता गिरता है उसे भी जानता है। जमीन के (नीचे या ऊपर अंधेरों में कोई दाना ऐसा नहीं और कोई सूखी या गीली चीज़ ऐसी नहीं जो लौहे महफूज में लिखी हुई न हो। (सूरह अल्अन्आम ५९ )
अर्थात अल्लाह पाक ने मनुष्य को जाहिरी (प्रत्यक्ष तथा स्पष्ट ) चीजें मालूम करने के लिए कुछ साधन प्रदान किए हैं जैसे आँख देखने के लिए, कान सुनने के लिए, नाक सूँघने के लिए, ज़बान चखने के लिए, हाथ पकड़ने तथा टटोलने के लिए, पाव चलने के लिए और बुद्धि सोचने समझने के लिए प्रदान की है। फिर ये चीजें मनुष्य के अधिकार में दे दी है ताकि अपनी इच्छा अनुसार इन से काम ले सके, जब देखने को मन चाहा तो आँख खोल दी न चाहा तो बन्द करली। इसी पर प्रत्येक अंगों (अवयव) को क्रियास (अनुमान) कर लीजिए ।
अर्थात अल्लाह तआला ने मनुष्य को इन जाहिरी चीज़ों के मालूम करने की कुन्जियाँ दे दी हैं और जिसके हाथ में कुन्जी होती है ताला उसी के अधिकार में होता है जब चाहे खोले और जब चाहे न खोले। इसी तरह जाहिरी चीज़ों का मालूम करना मनुष्य के अधिकार में है जब चाहे मालूम करे और जब चाहे न करे । गैब (परोक्ष) का ज्ञान केवल अल्लाह को है उपरोक्त उल्लेखित बातों के विरुद्ध गैब का मालूम करना मनुष्य के अधिकार में नहीं है। गैब की कुन्जियाँ अल्लाह तआला ने अपने पास रखी है। किसी नबी, वली, फरिश्ता या किसी भी निकटतम् से निकटतम् प्राणी को भी परोक्ष विद्या या गैब के मालूम करने की शक्ति अल्लाह ने नहीं प्रदान की है। कि जब चाहें अपनी इच्छा से गैब की बात मालूम करलें और जब चाहें न करें। बल्कि अल्लाह तआला अपनी इच्छा से कभी किसी को जितनी बात चाहता है बता देता है, परन्तु यह गैब की बात बता देना केवल अल्लाह की इच्छा पर निर्भर है किसी की इच्छा पर नहीं । रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ अनेकों बार ऐसा अवसर पड़ा कि आप को किसी गैबी बात के जानने की इच्छा हुई परन्तु वह बात आप को मालूम न हो सकी फिर जब अल्लाह का इरादा हुआ तो ऐक क्षण में बता दी ।
उदाहरणार्थ : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के समय में मुनाफिकों (कपटाचारियों) ने हजरत आइशा ( रजि) पर तोहमत् (दोषारोपण) लगाया और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इस से बड़ा दुःख हुआ, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कई दिनों तक बहुत छान बीन की परन्तु कोई वास्तविक बात न मालूम हो सकी और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बहुत शोक एवं चिन्ता में रहे फिर जब अल्लाह तआला की इच्छा हुई तो वहूह्य (ईश्वाणी) भेज कर बता दिया कि वे मुनाफिक् झूठे हैं और आइशा सिद्दीका (रजि) पाकदामन् (पवित्र) हैं। अतः एक मुसलमान मोवहिद् (एकेशवरवादी) का यह अकीदा होना आवश्यक है कि गैब के खज़ानों की कुन्जियाँ अल्लाह तआला ने अपने पास ही रखी हैं और उसने वह कुन्जियाँ किसी के हाथ में नहीं दी हैं और न ही उन गैब के खज़ानों का किसी को खज़ानची बनाया है। किन्तु वह स्वयं अपने हाथ से ताला खोलकर उस में से जितना जिसको चाहे प्रदान करदे कोई उसका हाथ नहीं पकड़ सकता ।
इल्मे गैब (परोक्ष विद्या) का दावा करने वाला झूठा है
उपरोक्त उल्लेखित आयत से मालूम हुआ कि जो व्यक्ति यह दावा करे कि मैं ऐसा इल्म (विद्या) जानता हूँ जिस के माध्यम से गैब की बातें मालूम कर लेता हूँ और भविषय की बातें बता सकता हूँ तो ऐसा व्यक्ति बड़ा झूठा है इस लिए कि वह उलूहियत् (खुदाई तथा ईश्वरत्तव ) का दावा करता है। यदि कोई व्यक्ति किसी नबी या वली या जिन्न या फरिश्ते या इमाम या बुजुर्ग या पीर या शहीद या नजूमी (ज्योतिषी ) या रम्माल या जफ्फार या फाल खोलने वाला या भविष्यवक्ता या पन्डित या भूतप्रेत को ऐसा जाने और उस के बारे में इस किसिम का विश्वास रखे तो वह मुशरिक् हो जाता है और उपरोक्त आयत का इनकार करने वाला भी ।
एक सन्देह का निवारण
यदि कभी किसी समय संयोग से किसी नजूमी ( ज्योतिषी) आदि की बात ठीक भी निकल जाए तो इस से उन की गैबदानी (परोक्ष ज्ञानी) साबित नहीं होती क्योंकि उन की अधिकतम बातें गलत ही होती हैं। अर्थात मालूम हुआ कि इल्मे गैब (परोक्ष विद्या) उन के अधिकार में नहीं । वास्तविक बात भी यही है कि उन की अटकल् बाज़ी कभी कभी ठीक निकल जाती है और अधिकतम गलत होती हैं, परन्तु पैग़म्बरों पर जो ईश्वरीय आदेश (वय) अवतरित होती है वह कभी गलत नहीं होती और वह उन के अधिकार में नहीं है बल्कि अल्लाह पाक जब चाहता है जो कुछ चाहता है अपनी इच्छानुसार बता देता है उन की अपनी इच्छा से वह्य अवतरित नहीं होती। अल्लाह तआला फरमाते हैं :-
قُل لَّا يَعْلَمُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ الْغَيْبَ إِلَّا اللَّهُ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ ) (النمل (٠٦٥)
अर्थ (( हे नबी आप कह दें कि जितने प्राणी आसमान और जमीन में हैं गैब नहीं जानते केवल अल्लाह ही उसे जानता है । बल्कि वे तो यह भी नहीं जानते कि वे कब उठाये जायेंगे । (सूरह नमल ६५)
अर्थात गैब का जानना किसी के बस की बात नहीं है चाहे वह बड़े से बड़ा इन्सान या फरिश्ता ही क्यों न हो । इसका प्रमाण यह है कि दुनिया जानती है कि क्यामत ( महा प्रलय) आएगी परन्तु यह कोई नहीं जानता कि वह कब आएगी । यदि हर चीज़ के विषय में जानकारी प्राप्त कर लेना उन के अधिकार में होता तो कयामत के आने की तारीख भी मालूम कर लेते ।
गैब केवल अल्लाह ही जानता है
إِنَّ اللَّهَ عِندَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْأَرْحَامِ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَّاذَا تَكْسِبُ غَدًا وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضِ تَمُوتُ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ ( ) (ص .)
अर्थ : (( निस्सन्देह अल्लाह ही के पास क्यामत की खबर है, वही बारिश बरसाता है और जो कुछ मादा के पेट में है वही जानता है और यह कोई नहीं जानता कि वह कल क्या कमाएगा ? और यह कोई नहीं जानता कि वह किस जगह मरेगा । बेशक अल्लाह सर्व ज्ञानी और बहुत अधिक ख़बर रखने वाला है। (सूरह
लुकमान ३४)
अर्थात गैब की बातों की ख़बर केवल अल्लाह ही को है उस के सिवा कोई गैबदान (परोक्ष ज्ञानी नहीं। कयामत की ख़बर और उसका आना लोगों में बहुत प्रसिद्ध है तथा विश्वासनीय, वास्तविक और यकीनी भी है किन्तु उस के आने की निश्चित समय और तारीख किसी को नहीं मालूम । फिर अन्य चीज़ो के विषय में क्या ख़बर हो सकती है जैसे जीतना (विजय) हारना (पराजय) तन्दुरुस्ती, बीमारी तथा इस प्रकार की अन्य बातों का किसी को जानकारी नहीं। ये बातें न तो कयामत की तरह प्रसिद्ध हैं और न यकीनी हैं इसी तरह बारिश होने की किसी को खबर नहीं कि कब होगी हालाँकि बारिश होने का मौसम (ऋतु) भी निश्चित तथा नियुक्त है और प्रायः (अक्सर) उसी मौसम में बारिश होती भी है और अधिकांश लोगों को वर्षा की इच्छा भी होती है। इस लिए यदि उसके निश्चित समय को जानने का कोई साधन होता तो कोई न कोई अवश्य उसकी जानकारी प्राप्त कर लेता। फिर जो चीजें ऐसी हैं कि न उन का कोई मौसम नियुक्त है और न सम्पूर्ण सृष्टि की इच्छा समान रुप से सम्मिलित होती है जैसे किसी व्यक्ति की मृत्यु और जीवन या सन्तान का होना अथवा न होना या धनवान तथा निर्धन होना या विजय प्राप्त करना अथवा प्राजय होना तो इन चीजों की भला किसी को क्या ख़बर हो सकती है ? इसी प्रकार जो मादा के पेट में है उसको भी कोई नहीं जान सकता कि एक है या एक से अधिक, नर है या मादा (नोट- किसी व्यक्ति के हृदय में यह आशंका उत्पन्न हो सकता है कि आजकल नई टेकनालोजी आ गई है और विभिन्न ऐसी मशीनें बन गई है जिन के द्वारा यह पता चल जाता है कि पेट में नर है या मादा इसी तरह पूर्ण अपूर्ण के विषय में भी पता लग जाता है तो इस आशड्डा का उत्तर यह है कि मशीनों द्वारा नर या मादा के बारे में उस समय पता चलता है जब नर या मादा का विषेश चिहन उत्पन्न हो जाता है परन्तु कुरआन का चैलेन्ज तो शुरु से लेकर अन्त तक के लिए है। जिस क्षण में मादा गर्भधारण करती है उस समय से लेकर नर या मादा का विषेश चिहन उत्पन्न होने से पूर्व कोई नहीं पता लगा सकता और कुरआन का यह चैलेन्ज सभी गर्भवती प्राणीयों के बारे में है चाहे मनुष्य हो या जानवर या अन्य कोई प्राणी। इसी तरह कुरआन का चैलेन्ज विस्तार पूर्वक जानने के बारे में है जैसे यह कोई नहीं पता लगा सकता कि मादा के पेट में जो बच्चा है उसके कान में सुनने की शक्ति है कि नहीं, या उसकी आँख में देखने की शीक्त है कि नहीं या उसकी ज़बान में बोलने की क्षमता है कि नहीं या वह किस क्षण में माँ के पेट से बाहर आएगा, वह जिन्दा पैदा होगा कि मुर्दा, वह बुद्धिमान
होगा कि बुद्धिहीन, वह अक्लमन्द होगा कि पागल, वह नेक होगा कि बुरा, धनवान होगा या निर्धन इस प्रकार की बहुत सी बातें गर्भ के सम्बन्ध में अल्लाह के अतिरिक्त कोई भी नहीं मालूम कर सकता और कुरआन का चैलेन्ज इन सब बातों के बारे में है।), पूर्ण है या अपूर्ण, खूबसूरत है या बदसूरत जब इन बातों को कोई नहीं मालूम कर सकता तो फिर अन्य चीजें जो मनुष्य के अन्दर छुपी हुई हैं जैसे विचार, इच्छा, इरादे, भावनाएँ, कामनाएँ तथा विश्वास (ईमान) एवं नेफाक इन को क्योंकर मालूम कर सकता है ? और इसी प्रकार जब कोई स्वयं यह नहीं जानता कि कल वह क्या करेगा तो दूसरों का हाल कैसे जान सकता है और मनुष्य जब अपने मरने की जगह नहीं जानता तो फिर मरने का दिन या समय कैसे जान सकता है। अर्थात अल्लाह के अतिरिक्त भविष्य की कोई भी बात कोई मनुष्य अपनी क्षमता से नहीं जान सकता । मालूम हुआ कि गैबदानी का दावा करने वाले सब झूठे हैं। कफ, कहानत, रमल, नुजूम, जफर, फालें निकालना सब झूठ, छल, धूर्तबाज़ी और शैतानी जाल हैं। मुसलमानों को इन के जाल में कभी नहीं फँसना चाहिए ।
पुकार केवल अल्लाह ही सुन सकता है , अल्लाह तआला ने सूरह अहूकाफ में फरमाया
وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّن يَدْعُوا مِن دُونِ اللَّهِ مَن لَّا يَسْتَجِيبُ لَهُ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ وَهُمْ عَن دُعَائِهِمْ غَافِلُونَ ﴾ (الاستاد …)
अर्थ : (( उस से अधिक गुमराह (पथ भ्रष्ट) कौन होगा जो अल्लाह के अतिरिक्त ऐसे लोगों को पुकारता है जो क्यामत तक भी उस की बात का जवाब न दे सकेंगे बल्कि वे उसकी पुकार ही से बे ख़बर हैं।)) (सूरह अल्अह्काफ ५) अर्थात शिर्क करने वाले निम्नस्तर के मूर्ख और बुद्ध हैं कि अल्लाह जैसे कादिर (सर्वशक्तिमान) एवं सर्वज्ञानी को छोड़ कर दूसरों को पुकारते हैं जो न तो उन की पुकार को सुनते हैं और न किसी आवश्यक्ता की पूर्ति की उन में क्षमता है यदि कयामत तक वे उन्हें पुकारते रहें तो वह कुछ नहीं कर सकते। इस आयत से ज्ञात हुआ कि जो लोग बुजुर्गों और नेक लोगों को दूर से पुकारते हैं और उन्हें पुकार कर यह कहते हैं कि या हजरत आप दुआ करदें कि अल्लाह तआला हमारी आवश्यकता पूरी कर दे यह भी शिर्क है अगरचे लोग यह समझते हैं कि हमने कोई शिर्क नहीं किया। इस लिए कि उनसे अपनी जरुरत नहीं माँगी है बल्कि दुआ करवाया है तो यह विचार गलत है इस लिए कि अगर यह दुआ करवाने के कारण शिर्क नहीं साबित होता है परन्तु गायब् (अनुपस्थित व्यक्ति को पुकारने के कारण शिर्क साबित हो रहा है। इस लिए कि पुकारने वाले ने उनके विषय में यह अकीदा रखा हुआ है कि वे दूर अथवा करीब से बराबर सुन लेते हैं। हालाँकि यह केवल अल्लाह की महिमा है और अल्लाह तआला ने इस आयत में फरमाया है कि अल्लाह के अतिरिक्त जो भी प्राणी हैं वे पुकारने वालों की पुकार से गाफिल् हैं।
लाभ तथा हानि का मालिक अल्लाह है
قُل لَّا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ وَلَوْ كُنتُ أَعْلَمُ الْغَيْبَ لَاسْتَكْثَرْتُ مِنَ الْخَيْرِ وَمَا مَسَّنِيَ السُّوءُ إِنْ أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ) ( )
अर्थ : (( हे नबी आप कह दीजिए मुझे अपने लिए लाभ या हानि का कोई अधिकार नहीं परन्तु अल्लाह जो कुछ चाहे और यदि मैं गैब जानता होता तो बहुत सी भलाइयाँ इकठ्ठा कर लेता (अर्थात अपनी सुरक्षा का सामान पहले से कर लेता ) और मुझे कोई तकलीफ न पहुँचती । मैं तो केवल ईमान वालों को डराने वाला और खुशखबरी सुनाने वाला हूँ।
अर्थात हमारे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सारे अम्बिया के सरदार हैं । आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम द्वारा बड़े बड़े मोजज़े (चमत्कार) अल्लाह की दया तथा कृपा से प्रकट हुए और लोगों ने आप से धर्म की बातें सीखीं । लोगों को आप की अनुसरण और आप के पथ पर चलने से महानता मिली । अल्लाह तआला ने आप से फरमाया कि आप लोगों के सामने अपना हाल साफ साफ बयान कर दें कि मुझे न तो कुछ ईश्वरीय शक्ति प्राप्त है और न ही मैं गैबदान (परोक्ष ज्ञानी) हूँ। मेरी क्षमता और अधिकार का हाल यह है कि मैं अपनी जान तक के लिए लाभ या हानि का मालिक नहीं हूँ तो दूसरों को भला क्या लाभ एवं हानि पहुँचा सकूँगा । यदि गैब का जानना मेरे अपने अधिकार में होता तो हर काम का परिणाम पहले मालूम कर लेता । यदि लाभदायक होता तो उसको हाथ लागाता और यदि हानिकारक होता तो काहेको उस में हाथ डालता । गैबदानी (परोक्ष ज्ञानी) केवल अल्लाह की शान (महिमा) है और मैं तो केवल पैगम्बर हूँ और पैगम्बर का काम केवल इतना होता है कि वह बुरे कामों के परिणाम से सूचित कर दे और नेक कामों पर शुभ सूचना सुना दे और यह उपदेश भी उन्हीं के लिए लाभदायक होती है जिन के हृदय में यकीन (विश्वास) हो और हृदय में विश्वास डालना मेरा काम नहीं यह केवल अल्लाह ही के अधिकार में है।
अम्बिया का मुख्य काम
उपरोक्त उल्लेखित आयत से यह ज्ञात हुआ कि अम्बिया तथा अवलिया में बड़ाई तथा महानता यही है कि वे अल्लाह का मार्ग बताते हैं, दीन पर चलना सिखाते हैं, अच्छे कामों की तरफ लोगों को बुलाते हैं और बुरे कामों से मना करते हैं। अल्लाह तआला ने उनकी बातों, उपदेश और निमन्त्रण में तासीर (प्रभाव) रखी है और बहुत से लोग उनकी उपदेश और निमन्त्रण से सीधे मार्ग पर आ जाते हैं। इस के अतिरिक्त उन्हें कोई महानता और ईश्वरीय शक्ति नहीं प्रदान की गई है और न ही अल्लाह ने उनको जगत में अधिकार चलाने की कोई क्षमता दी है कि जिसको चाहें मार डालें, लड़का या लड़की दे दें या संकट दूर कर दें या मुरादें (आशाएँ) पूरी कर दें या विजय एवं पराजय दे दें या धनवान या निर्धन कर दें या किसी को बादशाह बना दें या किसी को फकीर बना दें या किसी को अमीर या वज़ीर बना दें या किसी के हृदय में ईमान डाल दें या किसी का ईमान छीन लें या किसी रोगी को स्वस्थ बना दें अथवा किसी का स्वस्थ छीन लें। यह केवल अल्लाह ही की शान ( महिमा) है और अल्लाह के अतिरिक्त हर छोटा बड़ा यह काम करने से असमर्थ है और असमर्थ होने में सब बराबर हैं।
अम्बिया गैबदान (परोक्ष ज्ञानी) नहीं
इसी तरह यह महानता भी उन्हें प्राप्त नहीं है कि अल्लाह तआला ने गैब की कुन्जियाँ प्रदान कर दी हो कि वे जब चाहें. किसी के हृदय की बात उनकी इच्छाएँ और कामनायें मालूम कर लें या जिस गैबी बात के विषय में चाहें अपनी क्षमता और शक्ति से उसे मालूम कर लें कि फलाँ के यहाँ सन्तान होगी या नहीं ब्यापार में लाभ होगा या नहीं। लड़ाई में विजय होगा या पराजय । इन बातों में सब छोटे बड़े एक समान बेखबर, अचेत तथा अनभिज्ञ हैं।
इल्मे गैब के विषय में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का आदेश
أَخْرَجَ الْبُخَارِي عَنِ الرَّبِيعِ بِنْتِ مُعَوِّدَ بْنِ عَفْرَاءَ قَالَتْ جَاءَ النَّبِيُّ ﷺ فَدَخَلَ حِيْنَ بُنِي عَلَى فَجَلَسَ عَلَى فِرَاشِي كَمَجْلِسِكَ مِنِّي فَجَعَلَتْ جُوَيْرِيَاتٌ لَنَا يَضْرِبْنَ بِالدُّفْ وَيَنْدُبْنَ مَنْ قُتِلَ مِنْ آبَائِي يَوْمَ بَدْرٍ إِذْ قَالَتْ إِحْدَاهُنَّ وَفِيْنَا نَبِيُّ يَعْلَمُ مَا فِي غَدٍ فَقَالَ دَعِي هَذَا وَقُوْلِي بِالَّذِي كُنْتِ تَقُولِينَ )) { صحيح بخاری؛ كتاب النكاح ؛ بـــــاب ضرب الدف في النكاح والوليمة؛ حديث رقم ٥١٤٧ }
अर्थ :- इमाम बुखारी (रह) ने रबी बिन्ते मोअव्वज बिन अफ्रा द्वारा यह हदीस नकल की है कि रबी फरमाती हैं कि जिस समय हमारी (रबीअ की शादी हुई तो रुखुसती के समय रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मेरे घर आये और मेरे बिस्तर पर बैठ गए फिर हमारी कुछ छोकरियों ने डफली बजा बजा कर बद्र नामी युद्ध में मारे गए शहीदों की प्रशंसा में गीत गाने लगीं। इसी बीच एक छोकरी ने अपनी गीत में यह भी कह दिया कि ( हमारे बीच एक ऐसा नबी है जो भविष्य की बात भी जानता है )) किन्तु जब आप ने यह सुना तो फरमाया यह कहना छोड़ दे और जो पहले कह रही थी वही कहती रह ।)) (बुखारी )
अर्थातः रबीअ मदीना की अनसार समुदाय की एक नारी का नाम था उनकी शादी तथा रुखसती के अवसर पर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तशरीफ लाये थे फिर उनके पास बैठे इतने में छोकरियाँ कुछ गीत गाने लगीं उन में से किसी ने आपकी प्रशंसा में यह भी कहा कि उन को अल्लाह तआला ने ऐसा सम्मान दिया है कि वह भविष्य की बातें भी जानते हैं परन्तु रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उसे मना किया और फरमाया यह बात मत कह और जो कुछ तू पहले गाती थी वही गाती रह् ।
(नोट-अफरा रजियल्लाहु तआला अन्हा हज़रत औफ मोअव्वज़ और मुआज रजियल्लाहु तआला अन्हुम् की माँ का नाम है। हजरत अफरा (रजि) के ६ बेटे थे जो सब के सब बद्र नामी युद्ध में शरीक हुए। उन में से दो बद्र के युद्ध में शहीद हो गए थे। मोआज और मोअव्वज ने मिलकर अबू जहल को मारा था।)
इस हदीस से ज्ञात हुआ कि किसी बड़े से बड़े मनुष्य के बारे में यह अकीदा नहीं रखना चाहिए कि वह गैबदान है और यह जो शायर (कवि) लोग अल्लाह के रसूल की प्रशंसा अथवा अम्बिया, अवलिया, पीरों, बुजुर्गों की प्रशंसा बयान करते हैं और सीमा पार कर जाते हैं उनकी प्रशंसा में जमीन आसमान के कुलाबे मिलाते हैं और उनकी ने प्रशंसा में अल्लाह के समान गुण बयान करते हैं और जब उनको इस गलत काम से रोका जाए तो कहते हैं कि ” कविता में तो मुबालगा (अत्युक्ति) हो ही जाता है ” तो उनका यह उत्तर ग़लत् है। इस लिए कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) इस प्रकार की कविता अपनी प्रशंसा में मदीना के अन्सार की छोकरियों को गाने की अनुमति नहीं दी। इस लिए कोई भी बुद्धिमान इस प्रकार की कविता कहे या सुनकर पसन्द करे यह तो बहुत दूर की बात है।
हजरत आइशा (रजि) का कथन परोक्ष विद्या के विषय में
عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا قَالَتْ مَنْ أَخْبَرَكَ أَنْ مُحَمَّداً يَعْلَمُ الْخَمْسَ الَّتِي قَالَ اللَّهُ تَعَالَى { إِنَّ اللَّهَ عِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ ..} فَقَدْ أَعْظَمَ الْفَريَّة . رواه الترمذى مطولا ؛ كتاب التفسير تفسير سورة النجم ؛ حديث رقم ۳۲۹۰
अर्थ :
हजरत आइशा (रजि) ने फरमाया जिस ने तुम्हें ख़बर दी कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उन पाँच बातों को जानते थे जिन की अल्लाह तआला ने इस आयत إِنَّ اللَّهَ عِنْدَهُ عِلْمٌ{ } السَّاعَةِ में खबर दी है तो उस ने बड़ा और विशाल बुहतान बाँधा (अर्थात दोषारोपण किया) (बुखारी )
अर्थात : वह पाँच बातें जो सूरह लुकुमान के अन्त में उल्लेखित हैं तथा उनकी ब्याख्या इस अध्याय के प्रारम्भ में गुज़र चुकी है कि सम्पूर्ण गैब की बातें सब इन्हीं पाँच चीज़ों में सम्मिलित हैं । अतः जो व्यक्ति यह कहे कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) गैब की सब बातें जानते थे तो उस ने बड़ा भारी दोषारोपण किया और ऐसा व्यक्ति मुशरिक और झूठा है।
عَنْ أُمِّ الْعَلَاءِ الْأَنْصَارِيَّةِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ وَاللَّهِ لَا أَدْرِى وَأَنَا رَسُولُ اللَّهِ مَا يُفْعَلُ بِي وَلَا بِكُمْ )) (صحيحبخارى ؛ كتاب التعبير ؛ باب العين الجارية في المنام حديث رقم (۷۰۱۸)
अर्थ : उम्मे अला (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया (अल्लाह की कसम मुझे मालूम नहीं हालाँकि मैं अल्लाह का रसूल हूँ कि मेरे साथ क्या मामिला होगा और तुम्हारे साथ क्या होगा ? )) (बुखारी)
अर्थात : अल्लाह तआला अपने बन्दों से दुनिया में या कबर में या आखिरत में जो मामिला करेगा उसका हाल किसी को भी मालूम नहीं न नबी को न वली को । न अपना हाल मालूम न दूसरों का हाल मालूम और यदि कुछ बातें अल्लाह ने किसी नबी या रसूल को वह्य या इल्हाम (ईश्वरीय संकेत) द्वारा बताई हैं कि फलाने का परिणाम अच्छा अथवा बुरा है वह संक्षिप्त रुप की बातें हैं और संक्षिप्त ज्ञान है उस से अधिक जान लेना अथवा उनका विस्तार पूर्वक विवरण मालूम करना उन के अधिकार से बाहर है।
पाँचवाँ अध्याय
अल्लाह के अधिकारों में शिर्क करने की बुराई इस अध्याय में उन आयतों तथा हदीसों का बयान है जिन से अल्लाह के अधिकार में शिर्क करने की बुराई साबित होती है । अल्लाह तआला ने सूरह मूमिनून में फरमाया :
قُلْ مَنْ بِيَدِهِ، مَلَكُوتُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ تُجِيرُ وَلَا تُجَارُ عَلَيْهِ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ سَيَقُولُونَ لِلَّهِ قُلْ فَأَنَّى تُسْخَرُونَ ﴾ (الموسون (4)
अर्थ (( हे नबी आप लोगों से प्रश्न करें कि कौन ऐसा है जिस के हाथ में हर चीज़ का अधिकार हो ? और वह शरण भी देता हो और उस के विरुद्ध कोई शरण न दे सकता हो । यदि तुम जानते हो तो बताओ कौन ऐसा है ? इस के उत्तर में वे (मक्का के बहुदेववादी। यही कहेंगे कि सब कुछ अधिकार अल्लाह ही के लिए है। आप कह दीजिए फिर कहाँ सनके जा रहे हो? )) (सूरह मूमिनून ८८-८९)
अर्थात : जिस मुश्क् िसे भी पूछा जाए कि ऐसी शान ( महिमा) किसकी है कि जिस के अधिकार में हर चीज़ है जो चाहे करे कोई उसका हाथ पकड़ने वाला न हो, उसके आदेशानुसार न चलने वाले को कहीं शरण न मिल सके तथा उसके विरुद्ध किसी का सहयोग काम न आए ? तो प्रत्येक यही उत्तर देगा कि ऐसी शान तो केवल अल्लाह ही की है। तो फिर दूसरों से मुरादें माँगना सनक् और पागलपन् हुआ ।
इस आयत से यह ज्ञात हुआ कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के समय में काफिर भी इस बात को मानते थे कि अल्लाह के बराबर और उसका प्रतिद्वन्दी कोई नहीं। कोई उसके समकक्ष में नहीं आ सकता। परन्तु अपने बुतों (मूर्तियों) को अल्लाह के दरबार तक पहुँचाने के लिए अपना वकील, शिफारसी और माध्यम समझकर पूजते थे और उनसे माँगते तथा प्रार्थना करते थे इसी कारण वे मुशरिक और काफिर हुए । इस लिए आज भी यदि कोई व्यक्ति इस संसार में किसी प्राणी के लिए ईश्वरीय अधिकार साबित करे और उसे अपना वकील ही समझे या यह अकीदा रखे कि अल्लाह ने अपना सम्पूर्ण अधिकार अथवा उसमें से कुछ भाग किसी को दे दिया है तो ऐसा व्यक्ति मुशरिक हो जाएगा यद्यपि उसे अल्लाह के बराबर न समझता हो और उसके अन्दर अल्लाह के समान शक्ति न साबित करता हो ।
लाभ तथा हानि का मालिक केवल अल्लाह है
قُلْ إِنِّي لَا أَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا رَشَدًا قُلْ إِنِّي لَن تُحِيرَني مِنَ اللَّهِ أَحَدٌ وَلَنْ أَجِدَ مِن دُونِهِ مُلْتَحَدًا (لمن (٢٢)
अर्थ : (( हे नबी आप कह दीजिए कि निस्सन्देह मैं तुम्हारे लिए किसी लाभ या हानि पहुँचाने का मुझे अधिकार नहीं है । आप कह दें कि मुझे अल्लाह के क्रोध से कोई कदापि बचा नहीं सकता और उसके अतिरिक्त मैं कहीं शरण नहीं पा सकता है। (सूरह जिन्न २१-२२)
अर्थात : यह रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तरफ से एक विज्ञापन है और अल्लाह तआला ने अपने रसूल को आदेश दिया कि वह लोगों को सुना दें कि मैं तुम्हारे लाभ तथा हानि पर कुछ भी अधिकार नहीं रखता और मेरे अनुयायी (उम्मती ) होने के कारण कहीं तुम लोग अभिमानी बनकर यह विचार करके सीमा से आगे मत बढ़ना कि हमारा पाया मजबूत है हमारा वकील प्रबल है और हमारा सिफारिशी ( अनुशंसायी) बड़ा प्रिय है। हम जो चाहें करें वह हमें अल्लाह के अजाब (यातना) से बचा लेगा। क्योंकि मैं तो स्वयं डरता हूँ और अल्लाहके अतिरिक्त कहीं कोई पनाहगाह नहीं जानता तो फिर दूसरों को क्या बचा सकूँगा? इस आयत से मालूम हुआ कि जो लोग नबियों, रसूलों , वलियों, पीरों, बुजुर्गों पर भरोसा करके अल्लाह को भूल जाते हैं और अल्लाह के आदेशों का पालन नहीं करते हैं कुरआन व सुन्नत से विमुख हो जाते हैं ऐसे लोग निस्सन्देह पथ भ्रष्ट और गुमराह हैं। इस लिए कि सारे रसूलों और नबियों के सरदार, सारे वलियों में सर्वोच्च वली और सारे पीरों के पीर अल्लाह के रसूल रात दिन अल्लाह से डरते और भयभीत रहते थे तो भला किसी अन्य का कहना ही क्या है ? अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा रोजी देने वाला नहीं। अल्लाह तआला सूरःनहल में फरमाते हैं।
وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَهُمْ رِزْقًا مِّنَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ شَيْئًا وَلَا يَسْتَطِيعُونَ ) (صل )
अर्थ : (( और ये लोग अल्लाह को छोड़कर ऐसों की उपासना करते हैं जो आसमान व ज़मीन से उनके लिए रोजी पहुँचाने में कुछ भी अधिकार नहीं रखते हैं और न ही उनके अन्दर रोज़ी पहुँचाने की शक्ति है।)) (सूरह नहल ६३ ) अर्थात ये बहुदेववादी अल्लाह के समान कुछ ऐसे लोगों का सम्मान करते हैं जो एकदम असमर्थ हैं जिन के पास कोई अधिकार, शक्ति और क्षमता नहीं। रोज़ी पहुँचाने में उनका कोई दखल (हस्तक्षेप) नहीं। न आसमान से पानी बरसा सकें और न ज़मीन से कुछ उगा सकें उनको किसी भी प्रकार की शक्ति नहीं ।
साधारण वर्ग के कुछ लोग जो यह कहते हैं कि अम्बिया अवलिया को तथा पीरों फकीरों को संसार में तसर्रफ ( परिवर्तन) का अधिकार और शक्ति तो प्राप्त है किन्तु अल्लाह तआला ने भाग्य में जो लिख दिया है उस पर वे सन्तुष्ट हैं उसके आदर से ये दम नहीं मारते, वर्ना यदि वे चाहें तो एक क्षण में संसार को उलट पलट दें। तो इस प्रकार की सारी बातें गलत हैं बल्कि वास्तव में न किसी काम में उनका हस्तक्षेप है और न ही इस प्रकार के तसर्रफ की शक्ति और क्षमता है।
केवल अल्लाह को पुकारो
अल्लाह तआला ने सूरह यूनुस् में फरमाया ।
وَلَا تَدْعُ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَ فَإِن فَعَلْتَ فَإِنَّكَ إِذَا مِّنَ الظَّالِمِينَ ) (يوس (١٠)
अर्थ : (( और अल्लाह को छोड़कर ऐसों को मत पुकार जो तुझको न लाभ पहुँचा सके और न हानि, फिर यदि तूने ऐसा किया तो निस्सन्देह तू ज़ालिमों (अत्याचारों) में से हो जाएगा।)) (सूरह यूनुस १०६ )
अर्थातः सर्व शक्तिमान अल्लाह के होते हुए ऐसे असमर्थ लोगों को पुकारना जो किसी भी प्रकार का लाभ या हानि नहीं पहुँचा सकते वास्तव में सरासर जुल्म (अत्याचार ) है। क्योंकि सब से महान और सर्व शक्तिमान हस्ती का पद इस प्रकार के हीन और असमर्थ लोगों को दिया जा रहा है।
सूरह सबा में अल्लाह तआला फरमाते हैं।
قُلِ ادْعُوا الَّذِينَ زَعَمْتُم مِّن دُونِ اللَّهِ لَا يَمْلِكُونَ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ وَمَا لَهُمْ فِيهِمَا مِن شِرْكِ وَمَا لَهُ مِنْهُم مِّن ظَهِيرٍ وَلَا تَنفَعُ الشَّفَاعَةُ عِندَهُ إِلَّا لِمَنْ أَذِنَ لَهُ حَتَّى إِذَا فُرْعَ عَن قُلُوبِهِمْ قَالُوا مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ قَالُوا الْحَقَّ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ ( ) ( )
अर्थ : (( आप फरमा दीजिए कि उन्हें पुकारकर देखो तो सही, जिनको तुमने अल्लाह के अतिरिक्त पूजनीय बना रखा है। वे तो आसमानों और जमीन में एक कण तथा पाई भर अधिकार नहीं रखते और न ही उन दोनों में उनका कोई साझेदारी है और न तो उन में से कोई अल्लाह का सहयोगी है। और उस के पास किसी की सिफरिश काम नहीं आएगी परन्तु जिस को वह अनुमति दे दे। यहाँ तक कि जब उनके दिलों से घबराहट दूर हो जाती है तो वे पूछते हैं कि तुम्हारे रब ने क्या फरमाया ? तो वे उत्तर देते हैं कि सत्य ही फरमाया है (नोट- इस का अर्थ यह है कि सिफारिश करने वाले और जिनके लिए सिफारिश की जाने वाली है दोनों सिफारिश की अनुमति के प्रतीक्षा में व्याकुल थे। जब अनुमति मिल गई तो फिर वह एक दूसरे से सवाल करते थे कि तुम्हारे रब ने क्या फरमाया ? अर्थात क्या अनुमति मिल गई? यह एक डर और भय की स्थिति है जिस से सभी दोचार होंगे) और वही सब से महान तथा सर्वोच्च है। अल्लाह तआला की आज्ञा के बिना कोई सिफारिश करने के लिए मुँह नहीं खोल सकता ।
अर्थात संकट के समय किसी से मुराद माँगना और जिस से मुराद माँगी है उसका मुराद को पूरी कर देना कई प्रकार है । जिस से मुराद माँगी है वह स्वयं मालिक हो या उसका साझीदार हो या उसका मालिक पर दबाव (प्रभाव) हो जैसे बादशाह बड़े बड़े वज़ीरों या अमीरों का कहना दब् कर मान लेता है क्योंकि वे उसके सहयोगी हैं तथा उसके दरबार के सदस्य होते हैं उनके अप्रसन्न होने से साम्राज्य बिगड़ सकता है । या वह मालिक से सिफारिश करे और मालिक को उसकी सिफारिश माननी ही पड़ती है, चाहे दिल से माने या न माने जैसे राजकुमारी या रानी से बादशाह को मोहब्बत होती है और उनके प्रेम वश राजा उनकी सिफारिश रद नहीं कर सकता चार व नाचार उनकी सिफारिश स्वीकार कर लेता है।
अब विचार कीजिए कि लोग अल्लाह तआला को छोड़कर जिन जिन को पुकारते हैं और उन से मुरादें माँगते हैं न तो वे आसमान व जमीन में एक कण के मालिक हैं और न ही कुछ उनका साझा है और न ही अल्लाह के राज्य के सदस्य एवं सहयोगी हैं कि उन से दब कर अल्लाह तआला उनकी बात मान ले और न बिना अल्लाह की अनुमति के वह सिफारिश
के लिए मुँह खोल सकते हैं कि न चाहते हुए भी उस से कुछ दिला दें । बल्कि उसके दरबार में उनका तो यह हाल है कि, जब वह कुछ आदेश देता है तो भय से अपनी होश खो बैठते हैं फिर सम्मान तथा भय के कारण पुनः पूछने की हिम्मत ( सहसा) नहीं होती । बल्कि आपस में एक दूसरे से पूछते हैं कि रब ने क्या आदेश दिया? और जब उस बात की जाँच कर लेते हैं तो केवल मान लेने और तस्दीक (पुष्टि) करने की बात होती है वहाँ बात काटने या पलटने का क्या सवाल तथा किसी की वकालत् या सहयोग देने की किसी को क्या हिम्मत ?
शफाअत् (सिफारिश) की किसमें
यहाँ एक बात बहुत ही महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है कि अधिकतम लोग अम्बिया और अवलिया की सिफारिश पर नाजाँ (गौरवयुक्त) हैं और शफाअत् का गलत अर्थ समझ कर अल्लाह को भूल गए हैं। अतः शिफाअत की हकीकत् समझ लेना चाहिए । तो शफाअत् कहते हैं सिफारिश या अनुशंसा को और सिफारिश कई प्रकार की होती है।
शफाअते विजाहत् सम्भव नहीं
जैसे बादशाह की दृष्टि में चोर की चोरी साबित हो जाए और कोई वज़ीर या अमीर उसकी सिफारिश करके सज़ा से बचा ले। बादशाह तो राज्य विधानानुसार दण्ड देना चाहता था परन्तु वज़ीर से दबकर उसे छोड़ देता है । बादशाह यह विचार करके कि इस वज़ीर को अप्रसन्न नहीं करना चाहिए, क्योंकि राज्य का यह महान सदस्य है इस को नाराज़ करने से राज्य में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाएगी और क्रोध को पी जाना लाभदायक है, चोर को क्षमा कर देता है । इस प्रकार की सिफारिश को शफाअते विजाहत कहा जाता है। अर्थात वज़ीर की मान मर्यादा, प्रतिष्ठा और शिशटाचार के कारण उसकी बात मानी गई। तो इस प्रकार की सिफारिश अल्लाह के दरबार में कभी भी नहीं हो सकती और यदि कोई किसी नबी या वली को तथा इमाम एवं शहीद को अथवा किसी फरिश्ते या पीर को अल्लाह के दरबार में इस प्रकार का सिफारिशी समझे तो वह निम्नस्तर का मुशरिक और बड़ा मूर्ख है। उसने इलाह ( माबूद) का अर्थ समझा नहीं और शहन्शाह (बादशाहों का बादशाह) जगत स्वामी अल्लाह के सम्मान, आदर, प्रतिष्ठा, शिष्टाचार तथा शक्ति को कुछ नहीं पहचाना । उस शहन्शाह की तो यह शान है कि यदि चाहे तो “कुन्” ( होजा) शब्द से करोड़ों नबी, वली, जिन्न, फरिश्ते, जिब्रईल और हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बराबर एक क्षण में पैदा करदे और एक क्षण में सम्पूर्ण जगत अर्श से फर्श तक उलट पलट कर रख दे तथा एक अन्य जगत इस स्थान पर बना दे। उसके तो इरादे ही से हर चीज़ पैदा हो जाती है, उसे साधन अथवा सामग्री की आवश्यकता नहीं। यदि हजरत आदम से लेकर क़ियामत तक के तमाम मनुष्य और जिन्न सब के सब जिबरील तथा नबी के समान ईश्भक्त बन जायें तो अल्लाह के साम्राज्य में इनके कारण कोई शोभा न बढ़ेगी और यदि सारे लोग शैतान व दज्जाल बन जायें तो उसके साम्राज्य की शोभा कुछ भी न घटेगी। वह अल्लाह प्रत्येक अवस्था में तमाम बड़ों का बड़ा और तमाम बादशाहों का बादशाह है। न कोई उसका कुछ बिगाड़ सके और न बना सके ।
शफाअते मोहब्बत् (प्रेम अनुशंसा) भी सम्भव नहीं
दूसरे प्रकार की सिफारिश यह है कि राजकुमारों, राजकुमारियों रानियों अथवा बादशाह के प्रियतमों में से कोई उस चोर की सिफारिश करने वाला बनकर उठ खड़ा हो और चोर को सजा न देने दे और बादशाह उसके प्रेम से लाचार और विवश होकर उसे नाराज़ न करना चाहे और उस चोर का अपराध क्षमा कर दे। इस को प्रेम अनुशंसा ( शफाअते मोहब्बत् ) कहा जाता है। अर्थात बादशाह ने उसके प्रेम के कारण विवश हो कर सिफारिश स्वीकार करली और यह सोच कर कि एक बार क्रोध पी जाना एवं एक चोर को क्षमा कर देना उस शोक से अच्छा है जो उस प्रियतम के रूठ जाने से मुझको होगी। इस प्रकार की सिफारिश भी अल्लाह के दरबार में सम्भव नहीं । यदि कोई किसी नबी या वली को किसी पीर या फरिश्ते को इस प्रकार का सिफारिश करने वाला समझे तो वह भी पक्का मुशरिक और मूर्ख है। वह शहन्शाह, जगत स्वामी अपने बन्दों पर कितना ही कृपा एवं दया करे तथा बन्दों को कितना ही प्रदान करे किसी को हबीब (हबीब की उपाधि (पद, खेताब) हमारे अन्तिम नबी हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मिली है। हबीब का अर्थ है प्रियतम) किसी को खलील (खलील की उपाधि हजरत इबराहीम अलैहिस्सलाम को मिली है। खलील का अर्थ होता है (मित्र)।) किसी को कलीम (कलीम की उपाधि हजरत मूसा अलैहिस्सलाम को मिली है। कलीम का अर्थ है जिससे अल्लाह ने बात की हो, हजरत मूसा अलैहिस्सलाम से अल्लाह तआला ने तूर नामक पहाड़ी पर बात की थी इसी कारण आपको कलीम कहते हैं।) और किसी को रूहुल्लाह (रुहुल्लाह की उपाधि हजरत ईसा अलैहिस्सलाम को मिली है। आप अल्लाह की माहिमा से बिना बाप के पैदा हुए थे इस लिए रुहुल्लाह कहे गए।) और किसी को रसूले करीम, मकीन, रूहुल्कुदुस और रसूले अमीन (रसूले करीम मकीन, रुहुलकुद्स तथा रुहुल्अमीन की उपाधि हजरत जिबरील अलैहिस्सलाम को मिली है। जो अल्लाह की तरफ से सन्देशवाहक का काम करते थे और यही हजरत जिबरील अलैहिस्सलाम है जो हमारे नबी पर कुरआन और वहय लेकर आते थे।) का उपाधि प्रदान करे। परन्तु मालिक तो मालिक है और दास, दास ही है। हर एक का अपना पद और स्थान है जिस से वह आगे नहीं बढ़ सकता। दास जिस तरह उसकी दया एवं कृपा से प्रभावित होकर प्रसन्नता से भूमता है, इसी तरह उसके भय से भी उसका पित्ता पानी हो जाता है।
तीसरे प्रकार की सिफारिश यह है कि चोर की चोरी तो साबित हो गई किन्तु वह पेशावर चोर नहीं है और चोरी को अपना धन्धा नहीं बनाया है बल्कि दुर्भाग्य से मन की दुर्भावना में आकर यह अपराध कर बैठा इस लिए उस पर लज्जित भी है। लज्जा के कारण पानी पानी है, शर्म से सर झुका हुआ है, दिन रात दण्ड का भय उसे खाए जा रहा है बादशाह के बनाए हुए नियमों को सर आँखों पर रखता है और स्वयं अपने आप को अपराधी तथा दण्डनीय समझता है और बादशाह से भाग कर किसी वजीर या अमीर की शरण नहीं ढूँढता है तथा उसके विरुद्ध किसी का सहयोग नहीं चाहता और रात दिन बादशाह का मुँह तक रहा है कि बादशाह महोदय के यहाँ से इस अपराधी के सम्बन्ध में क्या आदेश जारी किया जाता है? तो उसकी यह दुर्दशा देख कर बादशाह के दिल में उस पर दया आ जाता है और उस के इस अपराध को क्षमा कर देना चाहता है । परन्तु राज्य विधान का विचार करते हुए बिना किसी कारण के क्षमा नहीं करता है ताकि लोगों के दिलों में विधान का सम्मान घट न जाए। अब कोई वज़ीर या अमीर बादशाह का इशारा पाकर सिफारिश के लिए खड़ा हो जाता है और बादशाह उस वज़ीर की मान मर्यादा बढ़ाने के लिए जाहिर में उसकी सिफारिश के नाम पर उस चोर का अपराध माफ कर देता है। वजीर ने चोर की सिफारिश इस लिए नहीं की कि वह उसका सम्बन्धी, रिश्तेदार या मित्र है या उस को सहयोग देने का उस ने जिम्मा ले लिया था । बल्कि केवल बादशाह का इशारा पाकर सिफारिश के लिए खड़ा हुआ है। क्योंकि वह तो बादशाह का वज़ीर है न कि चोरों का सहयोगी । इस प्रकार की सिफारिश को शफाअत बिल्इज्न कहा जाता है अर्थात अल्लाह की तरफ से अनुमति मिलने के पश्चात सिफारिश करना । इस प्रकार की सिफारिश अल्लाह के दरबार में होगी और कुरआन तथा हदीस में जिस नबी या वली की शफाअत का बयान आया है वह यही शफाअत् है ।
सीधा मार्ग
प्रत्येक मनुष्य पर अनिवार्य है कि वह अल्लाह ही को पुकारे, उसी से हर वक्त डरता रहे, उसी से विनय करता रहे, उसी के आगे अपने पापों का इकार करते हुए क्षमायाचना करता रहे, उसी को अपना मालिक और सहयोगी समझे । अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य को शरण देने वाला न समझे और कभी किसी की सहायता एवं सहयोग पर भरोसा न करे। क्योंकि हमारा रब बड़ा ही क्षमाशील तथा अत्यन्त कृपालु एवं दयालु है। वह अपनी दया, कृपा और अनुकम्पा से सब बिगड़े काम बना देगा, अपनी करुणा से सारे गुनाहों को क्षमा कर देगा और जिस को चाहेगा अपनी इच्छा से आप का सिफारिशकर्ता बना देगा । जिस तरह आप अपनी हर आवश्यकता उसी को सौंपते हो उसी तरह यह आवश्यकता भी उसी को सौंप दो कि वह जिस को चाहे आप का सिफारिशकर्ता बना कर खड़ा कर दे। किसी की सहायता, सहयोग तथा समर्थन पर कभी भी भरोसा न करो । बल्कि उसी को अपनी सहायता के लिए पुकारो, हकीकी मालिक को कभी न भूलो । उसके बनाए हुए धर्मविधान का सम्मान तथा आदर करो और इस के विरुद्ध रीतियों, परम्पराओं को ठुकरादो । धार्मिक नियमों को छोड़कर रीतियों, परम्पराओं को ग्रहण कर लेना बड़ा भयंकर अपराध है, सम्पूर्ण नबी, वली इस से घृणा करते हैं, वे कदापि ऐसे लोगों के सिफारिशकर्ता नहीं बनते जो रस्मवरिवाज रीतियों को न छोड़ें और धार्मिक विधान तथा इस्लामी नियमों को नष्ट भ्रष्ट करें, बल्कि वे उलटे उनके शत्रु बन जाते हैं और उन पर अपना क्रोध प्रकट करते हैं। क्योंकि उनकी महानता यही थी कि वे अल्लाह की प्रसन्नता को बीवी, बच्चों, मुरीदों, शागिर्दो नौकर चाकर और यार दोस्तों की प्रसन्नता पर प्राथमिक्ता देते थे और जब ये लोग अल्लाह की प्रसन्नता के विरुद्ध कोई काम करते थे तो ये उन के दुशमन बन जाते थे । तो भला अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य को पुकारने वालों में क्या गुण तथा महत्व है कि बड़े बड़े लोग उन के सहयोगी बनकर अल्लाह तआला की इच्छा के विरुद्ध उन के तरफ से झगड़ें ? ऐसा कदापि नहीं होगा बल्कि वे तो उन के शत्रु हैं। अल्लाह के लिए प्रेम और अल्लाह ही के लिए दुश्मनी इन की शान है। वे तो अल्लाह की इच्छा के अधीन हैं। जिस तरफ उसकी इच्छा होगी उसी तरफ झुकेंगे ।
عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ : كُنْتُ خَلْفَ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ يَوْمًا فَقَالَ يَا غُلامُ احْفَظِ اللَّهُ يَحْفَظْكَ احْفَظِ اللَّهُ تَجِدْهُ تُجَاهَكَ ؛ وَإِذَا سَأَلْتَ فَاسْأَلِ الله ؛ وَإِذَا اسْتَعَنْتَ فَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ ؛ وَاعْلَمْ أَنْ الْأُمَّةَ لَوِ اجْتَمَعَتْ عَلَى أَنْ يَنْفَعُوكَ بِشَيْءٍ لَمْ يَنْفَعُوكَ إِلَّا بِشَيْءٍ قَدْ تقوية الإيمان كتَبَهُ اللَّهُ لَكَ ؛ وَلَوِ اجْتَمَعُوا عَلَى أَنْ يَضُرُّوكَ بِشَيْءٍ لَمْ يَضُرُّوكَ إِلَّا بِشَيْءٍ قَدْ كَتَبَهُ اللَّهُ عَلَيْكَ ؛ رُفِعَتِ الْأَقْلَامُ وَجَفْتِ الصُّحُفُ ) سنن ترمذى ؛ أبواب صفة القيامة ؛ حديث رقم ٢٥٢١ )
अर्थ :- हजरत अब्दुल्लाह इबने अब्बास (रजि) ने कहा कि ऐक दिन मैं रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पीछे (सवारी पर) था, आप ने फरमाया कि ” ऐ बच्चे अल्लाह को याद रख, अल्लाह तुझे याद रखेगा। अल्लाह को याद रख, उसको अपने सामने पाएगा। और जब तू सवाल करे तो अल्लाह ही से सवाल कर, और जब सहायता माँगे तो अल्लाह ही से माँग और यकीन करले कि यदि तमाम लोग मिलकर तुझे कुछ लाभ पहुँचाने पर एकत्रित हो जाएँ तो इतना ही लाभ पहुँचा सकेंगे जो अल्लाह ने तेरे लिए लिख दिया है। और यदि सब मिलकर हानि पहुँचाने पर एकत्रित हो जाएँ तो इतना ही हानि पहुँचा सकेंगे जो तेरे लिए अल्लाह ने लिख दिया है। कलम उठा लिए गए और किताबें सूख गईं । (तिर्मिज़ी हदीस न० २५२१)
अर्थात : अल्लाह तआला हकीकी शहन्शाह है। वह संसारिक बादशाहों की तरह अभिमानी नहीं कि कोई प्रजा कितना ही झक् मारे, चाहे जितनी विनय करे परन्तु घमन्ड के मारे उसकी ओर ध्यान ही नहीं करते । यही कारण है कि प्रजा बादशाह के अतिरिक्त अन्य वज़ीरों, अमीरों का माध्यम ढूंढते हैं ताकि इन्हीं के माध्यम से उनकी विनय तथा फरयाद स्वीकार हो जाए । किन्तु अल्लाह की यह शान नहीं, वह तो बड़ा ही कृपालु तथा दयालु है, उस तक पहुँचने के लिए किसी की वकालत या माध्यम की जरुरत नहीं, कि अल्लाह तआला को वकील के सिफारिश करने के पश्चात विनय तथा फरयाद करने वाले के बारे में ख़याल आए । बल्कि वह तो प्रत्येक का खयाल रखता है। सब को याद रखता है, सब की विनय सुन रहा है, सब को देख
रहा है, वह स्वयं सब की विनय सुनता है, चाहे कोई सिफारिश करे या न करे । वह पवित्र तथा सर्व श्रेष्ठ है और उसका दरबार दुनिया के बादशाहों के समान नहीं है कि प्रजा वहाँ पहुँच ही न सकें और उसके अमीर एवं वज़ीर ही प्रजा पर शासन करें और प्रजा को इनका आदेश अवश्य मानना पड़े और इन्हीं को वकील तथा सिफारिशकर्ता बनाना पड़े। परन्तु अल्लाह
तआला ऐसा नहीं है बल्कि वह अपने बन्दों से बहुत निकट है, एक मामूली से मामूली आदमी भी यदि अपने हृदय से उसकी ओर ध्यान करे तो उसी स्थान पर उसी क्षण उसे अपने सम्मुख पाएगा। अल्लाह के दरबार में अपनी गुफ्लत् तथा लापरवाही के पर्दा के अतिरिक्त और कोई पर्दा नहीं ।
अल्लाह सब से निकट है
यदि कोई अल्लाह से दूर है तो केवल अपनी गुफ्लत् के कारण दूर है, वर्ना अल्लाह सब से निकट है। फिर जो कोई किसी नबी या वली को इस लिए पुकारता है कि वे उसको अल्लाह तआला से निकट कर दें, तो यह नहीं समझता कि नबी, वली तो फिर भी उस से दूर हैं, अल्लाह तआला तो उस से बहुत निकट है। इस की मिसाल यूँ समझो कि बादशाह का एक दास है जो बादशाह के निकट अकेला हो और बादशाह उसकी विनय, फरयाद तथा दरखास्त सुनने के लिए ध्यान पूर्वक तैयार हो फिर भी वह दास किसी वज़ीर या अमीर को आवाज़, देकर पुकारे और उस से कहे कि तू मेरी तरफ से मेरी बात विनय या मेरी दरखास्त बादशाह तक पहुँचा दे, तो ऐसे दास के बारे में आप का क्या विचार है ? स्पष्ट है कि यह दास या तो अन्धा है या दीवाना तथा पागल् । रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि हर व्यक्ति अल्लाह ही से माँगे और संकट में उसी से सहायता चाहे और यह विश्वास करले कि भाग्य का लिखा कभी नहीं मिट सकता । यदि सम्पूर्ण जगत के सभी छोटे बड़े मिलकर किसी को कोई लाभ या हानि पहुँचाना चाहें तो उससे अधिक नहीं हो सकता जितना अल्लाह ने लिखा है। भाग्य से बाहर कोई कार्य नहीं हो सकता ।
उपरोक्त उल्लेखित हदीस से यह ज्ञात हुआ कि भाग्य को बदलने की किसी में शक्ति एवं क्षमता नहीं है। जिस के भाग्य में सन्तान नहीं उसे कोई बड़ा से बड़ा वली या नबी या पीर सन्तान नहीं दे सकता और जिस की आयु पूरी हो चुकी है तो उसकी आयु में कोई बृद्धि नहीं कर सकता । फिर यह कहना कि अल्लाह ने अपने वलियों को तक़दीर बदल देने की शक्ति प्रदान की है, गलत है और इस प्रकार की सारी बातें असत्य हैं। बात केवल यह है कि अल्लाह तक़दीर की दो किसमें हैं पहली ” तकदीर मुब्रम् ” (अर्थात जिसके बारे में अन्तिम निर्णय हो चुका हो। यह किसी सूरत में नहीं बदलती। दूसरी ” तक़दीर मुअल्लक अर्थात परिवर्तन योग्य। और इस के बारे में भी अल्लाह तआला के यहाँ लिखा जा चुका है कि फलाँ आदमी की फलाँ तक़दीर फलां दुआ करने से बदल जाएगी। इसी तकदीर मुअल्लक के बारे में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फरमान है لايزد القضاء الا الدعاءअर्थात तक़दीर नहीं बदलती मगर केवल दुआ से ।
तआला कभी अपने हर बन्दे की दुआ कबूल फरमाता है और अम्बिया, अवलिया की अधिकतम दुआएँ कबूल फरमाता है । दुआ की तौफीक भी वही देता है, और कबूल भी वही करता है, दुआ करना और उसके पश्चात मुरादों का पूरा हो जाना दोनों बातें तकदीर में लिखी हुई हैं दुनिया का कोई काम तक़दीर से बाहर नहीं। किसी में तक़दीर बदलने की शक्ति नहीं चाहे वह छोटा हो या बड़ा, नबी हो या वली हाँ अल्लाह से दुआ माँगे बस उसे इतनी ही ताकत है । फिर उस मालिक ही को यह अधिकार है चाहे तो अपनी कृपा से उसे स्वीकार करले और चाहे तो अपनी हिकमत के आधार पर स्वीकार न करे । केवल अल्लाह पर भरोसा कीजिए ।
ﷺ : إِنَّ مِنْ عَنْ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ قال : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ قَلْبِ ابْنِ آدَمَ بِكُلِّ وَادٍ شُعْبَةٌ ، فَمَنِ اتَّبَعَ قَلْبُهُ الشُّعَبَ كُلِّهَا ، لَمْ يُبَالِ اللَّهُ بِأَيِّ وَادٍ أَهْلَكَهُ ، وَمَنْ تَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ كَفَاهُ التَّشَقَّبَ . سنن ابن ماجة ؛ كتاب الزهد ؛ باب اليقين والتوكل حديث رقم ٤١٦٦ وهذا الحديث ضعيف)
अर्थ :- अम्र बिन आस (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि ( मनुष्य के हृदय के लिए प्रत्येक मैदान में एक मार्ग है। फिर जिस ने अपने हृदय को तमाम राहों के पीछे लगा दिया तो अल्लाह तआला इसकी परवाह न करेगा कि उसे किस मैदान में तबाह व बरबाद कर दे और जो व्यक्ति सभी राहों को छेड़कर केवल अल्लाह पर भरोसा करेगा अल्लाह तआला उसके लिए तमाम मैदानों की ओर भटकने से बचा लेगा और ऐसे व्यक्ति का निरीक्षक बन जाएगा । (इबने माजा (नोटः यह हदीस जईफ है। देखिए शैख अल्बानी (रह) की किताब जईफ इब्ने माजा ) अर्थात जब मनुष्य को किसी वस्तु की खोज अथवा आवश्यकता होती है या किसी कष्ट एवं संकट में पड़ जाता है तो उस के हृदय में भावनाएँ उठती हैं और उसका ध्यान तथा मन चारों तरफ दौड़ता है कि फलाँ नबी को या फलाँ वली को या फलाँ इमाम को या फलाँ पीर को या फलाँ बाबा को या फलाँ शहीद को या फलाँ परी को पुकारना चाहिए । या फलाँ ज्योतिषी से या फलाँ रम्माल से या फलाँ काहिन (भविष्यवक्ता) से या जफ्फार से पूछा जाए। या फलाँ मोलवी से फाल खुलवाई जाए। इस प्रकार जो मनुष्य प्रत्येक भावना के पीछे पड़ा रहता है तो अल्लाह तआला उस से अपनी मान्यता तथा कृपा एवं दया की दृष्टि फेर लेता है और उसको अपने मुखलिस् (सच्चे) और प्रिय बन्दों में शुमार नहीं करता और ऐसा व्यक्ति अल्लाह के प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, निर्देशन तथा उपदेश की राहों से दूर हो जाता है और इसी प्रकार अपनी उन्हीं भावनाओं तथा विचारों के पीछे दौड़ते दौड़ते बरबाद हो जाता है। कोई दहरिया ( नास्तिक) बन जाता है, कोई मुल्हि (धर्म भ्रष्ट) कोई गुम्राह (पथभ्रष्ट) कोई मुश्क् िऔर कोई शरीअत् का इनकार करने वाला हो जाता है। परन्तु इस के विरुद्ध जो व्यक्ति केवल अल्लाह पर भरोसा करता है किसी दुर्भावना और ग़लत् विचार के पीछे नहीं पड़ता तो अल्लाह तआला ऐसे व्यक्ति को अपने मक्बूल (प्रिय) बन्दों में शामिल कर लेता है और ऐसे व्यक्ति पर अपनी हिदायत (मार्ग दर्शन )की राहें खोल देता है तथा उसके हृदय को ऐसी शान्ति एवं सुख प्रदान करता है कि जो अनेक भावनाएँ रखने वालों को कभी नहीं मिल सकता। जिसके भाग्य में जो कुछ लिखा है वह उसे मिलकर रहेगा, परन्तु अनेक भावनाओं के पीछे पड़ने वाला मुफत में शोक (ग़म्) उठाता है और अल्लाह पर भरोसा करने वालों को शान्ति, सुख, आराम अल्लाह की तरफ से उपहार तथा वरदान में मिल जाता है।
عَنْ أَنَسِ الله قَالَ : قَالَ رَسُوْلُ اللَّهِ ﷺ : لِيَسْتَلْ أَحَدُكُمْ رَبَّهُ حَاجَتَهُ كُلْهَا حَتَّى يَسْأَلَهُ الْمِلْحَ وَحَتَّى يَسْأَلُهُ شِسْعَ نَعْلَهُ إِذَا انْقَطَعَ . ( سنن ترمذى ؛ أبواب الدعوات ؛ )
अर्थ : (( हजरत अनस् (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि ( प्रत्येक मुसलमान को अपने रब से अपनी सारी जरुरतें माँगनी चाहिएँ। यहाँ तक कि नमक भी उसी से माँगे और जूते का तस्मा (डोरी या फीता ) जब टूट जाए तो वह भी उसी से माँगे।)) (तिर्मिज़ी )
अर्थात अल्लाह तआला को दुनिया के बादशाहों के समान न समझो कि बड़े बड़े काम तो वे स्वयं करते हैं और छोटे छोटे कार्य नौकरों चाकरों जैसे अन्य लोगों को सौंप देते हैं इस कारण लोगों को छोटे छोटे कामों में इन्हीं से अनुरोध करना पड़ता है । परन्तु अल्लाह के यहाँ ऐसा निज़ाम ( विधान) नहीं है बल्कि वह ऐसा सर्वशक्तिमान है कि स्वयं ही एक क्षण में छोटे बड़े करोड़ों काम ठीक कर देता है और उस के राज्य में किसी की शक्ति नहीं चलती और कोई भागीदार भी नहीं है। इस लिए छोटी से छोटी चीज़ उसी से माँगना चाहिए क्योंकि उस के अतिरिक्त छोटी बड़ी कोई भी चीज़ कोई नहीं दे सकता ।
रिशतेदारी काम नहीं आ सकती ।
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ اللهِ قَالَ : لَمَّا نَزَلَتْ { وَأَنْذِرْ عَشِيرَتَكَ الْأَقْرَبِينَ} دَعَا النَّبِيُّ ﷺ قَرَابَتَهُ فَعَمَّ وَخَصَّ فَقَالَ : يَا بَنِي كَعْبِ ابْنِ لُوَى أَنْقِذُوا أَنْفُسَكُمْ مِّنَ النَّارِ فَإِنِّي لَا أَمْلِكُ لَكُمْ مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ؛ أَوْ قَالَ فَإِنِّي لَا أُغْنِي عَنْكُمْ مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ، وَيَا بَنِي مُرَّةَ بْنِ كَعْبٍ أَنْقِذُوا أَنفُسَكُمْ مِّنَ النَّارِ ؛ فَإِنِّي لَا أُغْنِي عَنْكُمْ مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ؛ وَيَا بَنِي عَبْدِ شَمْسٍ أَنْقِذُوا أَنْفُسَكُمْ مِّنَ النَّارِ ؛ فَإِنِّي لَا أُغْنِي عَنْكُمْ مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ؛ وَيَا بَنِي عَبْدِ مَنَافِ أَنْقِذُوا أَنْفُسَكُمْ مِّنَ النَّارِ ؛ فَإِنِّي لَا أُغْنِي عَنْكُمْ مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ، وَيَا بَنِي هَاشِمٍ أَنْقِذُوا أَنْفُسَكُمْ مِّنَ النَّارِ ؛ فَإِنِّي لَا أَغْنى عَنْكُمْ مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ؛ وَيَا بَنِي عَبْدِ الْمُطَّلِبِ أَنْقِذُوا أَنْفُسَكُمْ مِّنَ النَّارِ ؛ فَإِنِّي لَا أُغْنِي عَنْكُمْ مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ؛ وَيَا فَاطِمَةُ أَنْقِذِي نَفْسَكِ مِنَ النَّارِ ؛ سَلِيْنِي مَا شِئْتِ مِنْ مَّالِي فَإِنِّي لَا أُغْنِى عَنْكَ مِنَ اللَّهِ شيئاً . ( صحيح بخاري كتاب التفسير : حديث رقم ٤٧٧١ و صحيح مسلم : كتاب الإيمان : حديث رقم ٣٤٨ )
अर्थ : (( हजरत अबुहुरैरा (रजि) ने फरमाया जब आयत } وَأَنْذِرْ عَشِيْرَتَكَ الْأَقْرَبَيْنَ{ -अपने करीबी रिश्तादारों को डराओ ) उतरी तो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने रिश्तेदारों को बुलाकर फरमाया कि ” ऐ काब बिन लुवै की औलाद ! अपनी जानों को जहन्नम की आग से बचाओ, मैं अल्लाह के अज़ाब से तुम्हारे कुछ काम न आ सकूँगा । ऐ मुरी बिन काब की औलाद ! अपनी जानों को आग से बचाओ, मैं अल्लाह के अज़ाब से तुम्हारे कुछ काम न आ सकूँगा । ऐ अब्दे शम्स की औलाद ! अपनी जानों को आग से बचाओ मैं अल्लाह के अज़ाब से तुम्हारे कुछ काम न आ सकूँगा । ऐ अब्दे मनाफ की औलाद ! अपनी जानों को जहन्नम की आग से बचाओ, मैं अल्लाह के अज़ाब से तुम्हारे कुछ काम न आ सकूँगा। ऐ हाशिम् की औलाद ! अपनी जानों को जहन्नम की आग से बचाओ, मैं अल्लाह के अज़ाव से तुम्हारे कुछ काम न आ सकूँगा। ऐ अब्दुल् मुत्तलिब ! की औलाद अपनी जानों को आग से बचाओ, मैं अल्लाह के अज़ाब से तुम्हारे कुछ काम न आ सकूँगा । ऐ फातिमा ( रजि) अपनी जान को जहन्नम के अज़ाब से बचा ले, तुम्हारी जो इच्छा हो मुझ से मेरा माल लेले, क्योंकि मैं अल्लाह के अज़ाब से तुम्हारे कुछ काम नहीं आऊँगा । ( बुखारी )
अर्थात जो लोग किसी बुजुर्ग (महा पुरुष) के रिश्तेदार होते हैं, उन्हें बुजुर्गों की सहायता का भरोसा होता है और इसी कारण वे अभिमानी बनकर निडर हो जाते हैं। इसी लिए अल्लाह तआला ने अपने प्रिय पैगम्बर से फरमाया कि वह अपने रिश्तेदारों को सचेत कर दें। आप ने प्रत्येक को , यहाँ तक कि अपनी लाडली पुत्री फातिमा को भी साफ साफ बता दिया कि रिश्तेदारी का निभाना केवल उसी चीज़ में सम्भव है जो इन्सान के अपने अधिकार में है। परन्तु अल्लाह तआला के यहाँ का मामिला मेरे अधिकार से बाहर है वहाँ किसी की भी सहायता नहीं कर सकता और किसी का भी वकील नहीं बन सकता। प्रत्येक आदमी प्रलय के दिन के लिए अपनी अपनी तैयारी कर ले और जहन्नम से बचने की आज ही तदबीर (उपाय) कर ले। मालूम हुआ कि किसी बुजुर्ग की रिश्तेदारी अल्लाह तआला के यहाँ काम आने वाली नहीं। जब तक इन्सान स्वयं नेक अमल न करे बेड़ा पार होना कठिन है। मेरे अधिकार में मेरा माल है इस में से जो तुम्हारी इच्छा चाहे ले लो मैं इस के देने में कन्जूसी नहीं कर सकता ।
छठवाँ अध्याय
उपासना में शिर्क करने की बुराई उपासना का अर्थ
उपासना उन तमाम कामों को कहा जाता है जिनको अल्लाह तआला ने अपनी आदर तथा सम्मान के लिए नियुक्त फरमाकर बन्दों को सिखाए हैं। यहाँ हमें यह बताना है कि अल्लाह तआला ने अपनी ताजीम (आदर तथा सम्मान ) के लिए कौन कौन से काम बताए हैं ? ताकि अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए वह काम न किए जाएँ और शिर्क से बचा जाए ।
उपासना केवल अल्लाह ही के लिए है
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَى قَوْمِهِ إِنِّي لَكُمْ نَذِيرٌ مُّبِينٌ (3) أَن لَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ أَلِيمٍ (هود ٠٢٦٠٠٢٥)
अर्थ : (( और निःसन्देह हम ने नूह अलैहिस्सलाम को उन की कौम की तरफ भेजा ताकि वह इस बात का घोषणा करदें कि मैं तुम को इस बात से साफ साफ डराता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की उपासना न करो, मुझे तुम पर प्रलय के दिन के दुखदायी यातना का डर है। )) (सूरह हूद २५२६)
अर्थात : मुसलमानों और काफिरों के बीच झगड़ा तथा सङ्घर्ष हजरत नूह अलैहिस्सलाम के समय से आरम्भ हुआ है और आज तक चला आ रहा है। अतःअल्लाह के नेक बन्दे उसी समय से यही प्रचार प्रसार करते आऐ हैं कि अल्लाह के आदर तथा सम्मान की तरह किसी अन्य का सम्मान नहीं होना चाहिए तथा जो काम उसके सम्मान के लिए नियुक्त हैं उन्हें अन्य लोगों के लिए न कीजिए ।
सजदा केवल अल्लाहके लिए जायज (वैध) है । अल्लाह तआला सूरह फुस्सिलत् में फरमाते हैं।
وَمِنْ وَآيَاتِهِ الَّيْلُ وَالنَّهَارُ وَالشَّمْسُ وَالْقَمَرُ لَا تَسْجُدُوا لِلشَّمْسِ وَلَا لِلْقَمَرِ وَاسْجُدُوا لِلَّهِ الَّذِي خَلَقَهُنَّ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ ) (اسلت (۰۳۷)
अर्थः (( मत सजदा करो सूर्य को न चाँद को बल्कि अल्लाह को सजदा करो जिस ने उन को पैदा किया है यदि तुम उसी के बन्दे बनना चाहते हो।)) (सूरह फुस्सिलत ३७)
इस आयत से मालूम हुआ कि इस्लाम धर्म में यही आदेश है कि सजदा केवल अल्लाह को करना चाहिए। किसी अन्य मखलूक (सृष्टि) को सजदा न किया जाए। चाहे वह चाँद सूर्य हों या नबी वली हों या जिन्न तथा फरिशते हों । परन्तु यदि कोई यह कहे कि भूतपूर्व धर्मों में मख्लूक् (प्राणी ) को भी सजदा करना जायज़ था। उदाहरण के लिए फरिश्तों ने हजरत आदम अलैहिस्सलाम को और हजरत याकूब अलैहिस्सलाम ने हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम को सजदा किया था। इस लिए अगर हम भी किसी बुजुर्ग (महा पुरुष) को उन के सम्मान के लिए सजदा करें तो क्या हरज है ? याद रखो इस से शिर्क साबित हो जाता है और ईमान का सत्यानास हो जाता है। हजरत आदम अलैहिस्सलाम के धर्म विधान में बहनों से विवाह करना जायज् था । फिर इस तरह का प्रमाण देने वाले यदि इसे प्रमाण समझकर अगर अपनी बहनों से विवाह करलें तो क्या हरज है ? परन्तु इस्लाम धर्म में ऐसा करना हराम (वर्जित) है। क्योंकि बहनें सदेव के लिए हराम हैं जिन से शादी करना किसी भी सूरत में जायज नहीं है।
वास्तव में बात यह है कि बन्दे को अल्लाह का आदेश मानना चाहिए । अल्लाह के आदेश को बिना सङ्कोच हृदयगमन करके स्वीकार कर लेना चाहिए और यह प्रमाण नहीं पेश करना चाहिए कि पहले लोगों के लिए तो यह आदेश नहीं था फिर हम पर क्यों लागू किया गया ? ऐसी बातों से आदमी काफिर (नास्तिक) हो जाता है। इस विषय को इस उदाहरण से समझो कि एक बादशाह के यहाँ एक मुद्दत तक एक नियम पर अमल होता रहा । फिर बादशाह ने किसी हिकमत के पेशे नजर उसे मन्सूख (समाप्त) करके उसकी जगह दूसरा नियम बना दिया। तो अब इस नए कानून पर अमल जरुरी है। अब अगर कोई यह कहने लगे कि हम तो पहले ही कानून को मानेंगे, नए कानून को नहीं मानते तो ऐसा कहने वाला विद्रोह होगा और विद्रोही की सजा जेलखाना है। इसी तरह अल्लाह के आदेशों का उलङ्घन करने वाले विद्रोहों के लिए जहन्नम है।अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य को पुकारना शिर्क है ।अल्लाह तआला ने सूरह जिन्न में फरमाया ।
وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا وَأَنَّهُ لَا قَامَ عَبْدُ اللَّهِ يَدْعُوهُ كَادُوا يَكُونُونَ عَلَيْهِ لِبَدًا قُلْ إِنَّمَا أَدْعُوا رَبِّي وَلَا أُشْرِكُ بِهِ أَحَدًا ( ) ( )
अर्थः (और बेशक मस्जिदें अल्लाह ही की है। अतः अल्लाह के साथ किसी अन्य को न पुकारो । और जब अल्लाह का बन्दा उसकी इबादत तथा प्रार्थना के लिए खड़ा होता है तो करीब था कि वे ठठ् के ठठ् उस पर झुक् पड़ें । आप फरमा दें कि मैं तो अपने रब ही को पुकारता हूँ और उसके साथ किसी अन्य को शरीक नहीं बनाता ।))
अर्थात जब कोई अल्लाह का बन्दा पवित्र हृदय से अल्लाह तआला को पुकारता है और उस से प्रार्थना एवं विन्ति करता है तो मूर्ख लोग यह समझने लगते हैं कि यह तो बड़ा पहुँचा हुआ वली है, बड़ा महान है, गौस एवं कुतुब् है , यह जिस को चाहे दे दे और जिस से जो चाहे छीन ले । इसी आशा में उस के पास ठठ् के ठठ् एकत्रित होकर भीड़ लगा देते हैं कि यह मेरी बिगड़ी बना देगा । अब इस बन्दे का फर्ज (दायित्व) है कि सच्ची बात बयान कर दे कि ” आड़े वक़्त (संकट में अल्लाह तआला ही को पुकारना चाहिए । लाभ और हानि की आशा अल्लाह ही से करनी चाहिए । क्योंकि इस प्रकार का व्यवहार एवं सम्बन्ध अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य से करना शिर्क है, मैं शिर्क तथा शिर्क करने वाले से अप्रसन्न हूँ। फिर यदि कोई यह चाहे कि इस प्रकार का व्यवहार मुझ से करे और मैं उस से प्रसन्न रहूँ यह कभी भी सम्भव नहीं । और देना लेना अल्लाह का काम है। वही देता है और वही लेता है मेरे हाथ में कुछ नहीं। वही मेरा और तुम्हारा रब है। इस लिए आओ हम सभी तमाम झूठे माबूदों को छोड़कर केवल एक अल्लाह को पुकारें जो सच्चा एवं अकेला पूजनीय है।
इस आयत से मालूम हुआ कि हाथ बाँधकर खड़ा होना उसको पुकारना तथा उसका नाम जपना उन्हीं कामों में से है जिन को अल्लाह तआला ने केवल अपने सम्मान के लिए विशेष कर रखे हैं, अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य से ऐसा सम्बन्ध तथा व्यवहार रखना शिर्क है।
अल्लाह के शआइर (कर्मकाण्ड) का सम्मान अल्लाह तआला सूरह हज में फरमाते हैं।
وَأَذِن فِي النَّاسِ بِالْحَجِ يَأْتُوكَ رِجَالاً وَعَلَى كُلِّ ضَامِرٍ يَأْتِينَ مِن كُلِّ فَجٍّ عَمِيقٍ لِيَشْهَدُوا مَنَافِعَ لَهُمْ وَيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ فِي أَيَّامٍ مَّعْلُومَاتٍ عَلَى مَا رَزَقَهُم مِّنْ بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْبَابِسَ الْفَقِيرَ ثُمَّ لْيَقْضُوا تَفَثَهُمْ وَلْيُوفُوا نُذُورَهُمْ وَلْيَطَّوَّفُوا بِالْبَيْتِ الْعَتِيقِ (المع ٠٢٧-٠٢١)
अर्थ : (आप लोगों में हज करने की घोषणा कर दें। लोग तेरे पास पैदल चलकर तथा दुबले पतले ऊँटों पर सवार होकर दूर दूर से यात्रा करके चले आयेंगे । ताकि अपने लाभ की जगहों पर आ पहुँचें और कुरबानी के ( निश्चित) दिनों में अल्लाह तआला ने चौपायों में से जो पशु उन्हें प्रदान किए हैं उन पर अल्लाह का नाम लें। (अर्थात कुरबानी करें। फिर उस में से स्वयं खाओ और बहाल फकीर को भी खिलाओ। फिर उन्हें चाहिए कि अपना मैल कुचैल साफ करें और अपनी मिन्नतें पूरी करें तथा प्राचीन घर (काबा) का तवाफ (परिक्रमा) करें।)) (सूरह हज्ज २७ २८ २९)
अर्थात : अल्लाह तआला ने कुछ जगहें अपने सम्मान के लिए निश्चित कर रखे हैं। जैसे काबा, अरफात, मुजूदलिफा, मिना सफा, मरवा, मकामे इब्राहीम, मस्जिदे हराम, पूरा मक्का बल्कि पूरा हरम् । लोगों के दिलों में इन स्थानों की ज़ियारत (सन्दर्शन) का ऐसा शौक ( अभिलाषा) पैदा कर दिया है कि लोग दुनिया के कोने कोने से सिमट् कर, चाहे सवार होकर चाहे पैदल बैतुल्लाह ( काबा) की ज़ियारत के लिए दूर दूर से आएँ । यात्रा का कष्ट उठाकर इहराम की दो चादरें पहन कर एक निश्चित रुप धारण करके वहाँ पहुँचें और अल्लाह तआला के नाम पर वहाँ पशुओं को बलिदान करें और हृदय में अल्लाह का जो सम्मान भरा हो वहाँ पहुँच कर अच्छी तरह प्रकट करें । काबा के द्वार के सामने रो रो कर बिलक् बिलक् कर दुआएँ माँगें । फिर कोई बैतुल्लाह (काबा) का परदा थामकर रो रो कर अल्लाह से दुआएँ माँग रहा है, कोई ऐतिकाफ में बैठकर रात दिन अल्लाह की इबादत में व्यस्त है, कोई कुरआन की तिलावत् (पाठ) कर रहा है, कोई नवाफिल में मशग़ुल है, कोई काबा का परिक्रमा कर रहा है। इसी प्रकार हर आदमी विभिन्न प्रकार की इबादतों में व्यस्त रहता है । बहर हाल यह सब काम अल्लाह तआला के सम्मान में किए जाते हैं और अल्लाह उन से प्रसन्न होता है और उनको दुनिया तथा आखिरत का लाभ होता है। अतः इस प्रकार के काम अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के सम्मान में नहीं करना चाहिए क्योंकि ये हराम तथा शिर्क हैं । किसी कब्र (समाधि) की जियारत के लिए या किसी थान या चिल्ला या खानकाह या दरबार या दरगाह पर दूर दराज़ सें यात्रा का कष्ट उठाकर आना और मैले कुचैले होकर वहाँ पहुँचना, वहाँ जाकर जानवरों की कुरबानी करना, मन्नतें पूरी करना, किसी घर, कब्र समाधि, दरबार, चिल्ले या थान का परिक्रमा (तवाफ) करना, उस के आस पास के जंगल का अदब (आदर करना (अर्थात वहाँ शिकार न करना, वहाँ के पेड़ों का न काटना, घास न उखाड़ना, और न काटना ) तथा इस प्रकार के दूसरे अन्य काम करना और इन से दुनिया व आख़िरत की भलाइयों का अशा करना सब शिर्क है। इन से बचना आवश्यक है ।
अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के नाम पर प्रसिद्ध करके छोड़ी गई चीज़ भी हराम है ।
قُل لَّا أَجِدُ فِي مَا أُوحِيَ إِلَيَّ مُحَرَّمًا عَلَى طَاعِمٍ يَطْعَمُهُ إِلَّا أَن يَكُونَ مَيْتَةً أَوْ دَمًا مَّسْفُوحًا أَوْ لَحْمَ خِنزِيرٍ فَإِنَّهُ رِجْسٌ أَوْ فِسْقًا أُهِلَّ لِغَيْرِ اللَّهِ بِهِ، فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاغِ وَلَا E عَادٍ فَإِنَّ رَبَّكَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ) م )
अर्थ (( आप फरमा दीजिए कि मैं इस वहय में (कुरआन में ) जो मुझ पर अवतरित हुई है, कोई चीज़ जिसे खाने वाला खाए, हराम नहीं पाता, किन्तु वह चीज़ जो मुरदार हो या बहने वाला खून (रक्त) है या सूअर का गोश्त (माँस) है क्योंकि यह नापाक (अपवित्र) अथवा पाप की चीज़ है कि उसे अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के नाम पर प्रसिद्ध कर दिया गया हो। और यदि कोई व्यक्ति मजबूर हो जाए, न तो नाफरमानी करे और न हद् (सीमा) से बाहर निकले तो तुम्हारा रब बख़्शने वाला मेहरबान है ।)) (सूरह अल्-अन्आम १४५)
अर्थात जिस प्रकार सूअर्, खून (रक्त) तथा मुरदार हराम एवं अपवित्र हैं इसी प्रकार वह जानवर भी अपवित्र तथा हराम हैं जो पाप का रूप धारण कर रहा हो जैसे कोई जानवर अल्लाह के नाम के अतिरिक्त किसी अन्य के ना पर विशेष एवं प्रसिद्ध कर दिया जाए तो यह जानवर भी हराम तथा अपवित्र है।
इस आयत से ज्ञात हुआ कि जो जानवर किसी मखलूक (सृष्टि) के नाम पर विशेष एवं प्रसिद्ध कर दिया जाए वह हराम तथा अपवित्र है। उदाहरणार्थ यह कह दिया जाए कि यह सय्यद् अहमद कबीर की गाय है, यह शैख सहू का बकरा है इत्यादि । इस आयत में इस बात का बयान नहीं कि वह जानवर तभी हराम होगा जब ज़ब्ह करते समय उस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य का नाम लिया जाए बल्कि केवल अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के नाम पर विशेष तथा प्रसिद्ध करने से ही वह जानवर हराम तथा अपवित्र हो गया और ऐसा करने वाला मुशरिक् कहलाएगा । यदि कोई भी जानवर हो मुर्गी हो या बकरी, ऊँट हो या गाय छोटा पशु हो या बड़ा, कोई छोटी चीज़ हो या बड़ी यहाँ तक कि एक मक्खी किसी मखूलूक (सृष्टि) के नाम का कर दिया जाए, चाहे वली के नाम हो या नबी के नाम, बाप दादा के नाम का हो या पीर अथवा शैख के नाम का हो तो वह एकदम हराम तथा अपवित्र है और नाम करने वाला मुशरिक है ।
शासनाधिकार केवल अल्लाह के लिए है
अल्लाह तआला हजरत यूसुफ् अलैहिस्सलाम का वाकिआ बयान करते हुए फरमाते हैं कि उन्हों ने जेल के साथियों से फरमाया ।
يَنصَاحِبَي السِّجْنِ وَأَرْبَابٌ مُّتَفَرِّقُونَ خَيْرٌ أَمِ اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ مَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِهِ إِلَّا أَسْمَاء سَمَّيْتُمُوهَا أَنتُمْ وَءَابَاؤُكُم مَّا أَنزَلَ اللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَانٍ إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ أَمَرَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ ) است (1)
अर्थ (( ऐ जेल के साथियो क्या अलग अलग अनेक मालिक अच्छे हैं या एक शक्तिशाली अल्लाह ? और अल्लाह के अतिरिक्त जिन जिन की तुम पूजा करते हो वे केवल ऐसे नाम हैं जिनको तुमने और तुम्हारे बाप दादों ने रख लिए हैं , अल्लाह तआला ने उसका कोई प्रमाण नहीं उतारा है, केवल अल्लाह का आदेश चलेगा। उस ने तो यही आदेश दिया है कि केवल उसी की पूजा की जाए और यही ठोस धर्म है परन्तु अधिकतम लोग नहीं जानते हैं।)) (सूरह यूसुफ ३९= ४०)
एक दास के लिए कई मालिकों का होना कष्टदायक तथा हानिकारक है। यदि उस दास का केवल एक ही मालिक हो जो सर्व शत्तिमान हो तो क्या ही अच्छा है ! अतः मालिक एक ही है और वह केवल अल्लाह की जात है जो मनुष्य की सारी मुरादें, कामनाएँ, आशाएँ पूरी करता है और उसके सारे बिगड़े काम बना देता है। उस के सामने झूठे मालिकों की कोई हैसियत तथा वास्तविकता नहीं बल्कि वे केवल तुच्छ भावनाएँ तथा विचार हैं, लोगों ने अपने मन से गढ़ लिया है कि वर्षा करना किसी अन्य के अधिकार में है, अनाज पैदा करना किसी और का काम है, सन्तान कोई और देता है, स्वास्थ कोई और, फिर स्वयं ही उनके नाम रख लेते हैं कि फलाने काम के अधिकारी का नाम यह है और फलाने का यह फिर स्वयं ही उनको मानते हैं और उन कामों के अवसर पर उन को पुकारते हैं । फिर इस प्रकार एक समय बीत जाने के बाद आहिस्ता आहिस्ता यह बात प्रचलित हो जाती है और रीति तथा परम्परा बन जाती है।
असल दीन
असल दीन यही है कि अल्लाह के आदेश पर चला जाए और उसके आदेश के आगे हर आदेश को ठुकरा दिया जाए । परन्तु अधिकतम लोग इस राह से भटक गए हैं और अपने पीरों, इमामों और बुजुगों की रीतियों और आदेशों को अल्लाह के आदेश तथा कथन से उत्तम और बढ़कर समझते हैं।
मनगढ़न्त रीतियाँ तथा परम्पराएँ शिर्क हैं
उपरोक्त उल्लेखित आयत से ज्ञात हुआ कि किसी की राह व रसम्, रीति एवं परम्परा को न मानना और केवल अल्लाह तआला ही का आदेश, उपदेश तथा कानून मानना उन चीजों में से है जिन को अल्लाह तआला ने अपने सम्मान के लिए विशेष कर रखा है। अब अगर कोई यही व्यवहार तथा मामिला किसी मखलूक से करेगा तो पक्का मुशरिक होगा ।(नोट-अर्थ यह है कि अल्लाह के आदेश के अतिरिक्त किसी अन्य का आदेश प्रमाण नहीं बन सकता। जो व्यक्ति अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के आदेश या उपदेश तथा राह व रसम् को प्रमाण समझे तो उस पर शिर्क साबित हो जाता है। यदि मृत्यु से पहले पहले उसने सच्ची तौबा न की तो वह सदेव के लिए नरक में जाएगा ।)
अल्लाह का आदेश बन्दों तक केवल रसूल ही के माध्यम से पहुंचा है। फिर यदि कोई किसी इमाम या मुज्तहिद् या गौस एवं कुतुब् या मोलवी एवं मुल्ला या पीर एवं मशाइख या बाप दादा या किसी बादशाह वा वज़ीर या पादरी एवं पन्डित की बात को या उनकी रीतियों को अल्लाह तथा रसूल के फरमान से बढ़कर समझे और कुरआन एवं हदीस के मुकाबले में अपने पीर एवं गुरु, मशाइख् एवं इमामों की बातें को प्रमाण बनाए या नबी को यूँ समझे कि शरीअत् (धर्म शास्त्र या धर्म विधान) स्वयं उन्हीं के आदेश तथा उपदेश हैं अपनी इच्छा से जो मन में आता था कह देते थे और उस का मानना उनकी उम्मत पर अनिवार्य हो जाता था। तो ऐसे अकीदे और ऐसी बातों से शिर्क साबित हो जाता है। बल्कि अकीदा यह होना चाहिये कि असल हाकिम अल्लाह तआला है और नबी केवल लोगों को अल्लाह का आदेश बताने वाला होता है । अतः जो बात कुरआन एवं हदीस के अनुकूल हो उसे मान लिया जाए और जो बात कुरआन तथा हदीस के प्रतिकूल हो उसे ठुकरा दिया जाए ।
लोगों को अपने आदर तथा सम्मान के लिए सामने खड़ा रखना मना है ।
((عَنْ مُعَاوِيَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ : مَنْ سَرَّهُ أَنْ يَتَمَثَّلَ لَهُ الرِّجَالُ قِيَامًا فَلْيَتَبَوَّأْ مَقْعَدَهُ مِنَ النَّارِ )) (سنن ترمذى ، أبواب الادب ، حديث رقم (٢٧٦٠)
अर्थ :- (( हजरत मुआविया (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि (जो व्यक्ति इस बात से प्रसन्न हो कि लोग उस के सामने चित्र की तरह खड़े रहैं तो ऐसा व्यक्ति जहन्नमी है।)) (तिर्मिज़ी) अर्थात जो व्यक्ति यह चाहता हो कि लोग उस के सामने उसके आदर तथा सम्मा में चित्र की तरह हाथ बाँधकर खड़े रहें, न हिलैं जुलै, न इधर उधर देखें ओर न बोलें चालें बल्कि बुत् बने हुए खड़े रहैं तो ऐसा व्यक्ति जहन्नमी है । क्योंकि वह उलूहियत् (खुदाई) का दावा कर रहा है इस आधार पर कि जो आदर तथा सम्मान के कार्य अल्लाह की जात के लिए विशेष हैं वही अपने लिए चाहता है। नमाज़ में नमाज़ी हाथ बाँधकर चुप चाप इधर उधर देखे बगैर खड़े होते हैं और इस तरह खड़ा होना केवल अल्लाह की जात के लिए विशेष है। मालूम हुआ कि किसी के सामने आदर एवं सम्मान के उद्देश्य से खड़ा होना ना जायज तथा शिर्क
बुतों (मूर्तियों) और थानों की पूजा शिर्क है।
(( عَنْ ثَوْبَانَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ ﷺ : لا تَقُوْمُ السَّاعَةُ حَتَّى تَلْحَقَ قَبَائِلَ مِنْ أُمَّتِي بِالْمُشْرِكِينَ وَحَتَّى يَعْبُدُوا الأوثان )) ( سنن ترمذى ، أبواب الفتن ، حديث رقم ٢٢٢٤)
अर्थ:- (हजरत सौवान (रजि) कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम् ने फरमाया ( क्यामत उस समय तक नहीं आ सकती जब तक कि मेरी उम्मत के अनेक कबीले (समुदाय) मुशरिक से न जा मिलें और मूर्ति पूजा न करने लगें । ))
अर्थातः – बुत् (मूर्ति) दो तरह के होते हैं। (१) किसी के नाम की चित्र या रूप या मूर्ति बनाकर पूजा जाए इस को अरबी में सनम् (मूर्ति) कहा जाता है। (२) किसी थान या पेड़ या पत्थर या लकड़ी या काग़ज् को किसी के नाम का नियुक्त करके पूजा जाए तो इसको अरबी में वसन् (थान) कहते हैं।
नकली या असली कबर (समाधि) चिल्ला, कबर का रूप, छड़ी, किसी के नाम की लाठी, ताज़िया, अलम्(वह झण्डा जो करबला के शहीदों की याद में ताजिया के साथ निकालते हैं।), शद्दा इमाम कासिम् एवं शैख अब्दुल्कादिर जीलानी की मेंहदी इमाम का चबूतरा और उस्ताद, गुरु एवं पीरों के बैठने के स्थान ये सब वसन् में दाखिल् (सम्मिलित) हैं। इसी प्रकार शहीद के नाम का ताक, निशान (चिन्ह) और तोप जिस पर बकरा चढ़ाया जाता है तथा इसी प्रकार वह स्थान जो रोगों के नाम से प्रसिद्ध हैं जैसे सतीला, मसानी, भवानी, काली, कालिका और ब्राही (नोट-ये ग़ैर-मुस्लिमों की विभिन्न देवियाँ हैं सतीला चेचक् की देवी है, चेचक निकलने पर इस बीमारी से मुक्ति के लिए इस देवी की पूजा की जाती है। मसानी :- ग़ैर-मुस्लिम धारणा अनुसार सतीला की सात बहनें थीं जिन में से एक का नाम मसानी था, उसे खसरा की देवी समझा जाता था। भवानी और कालिका भी ग़ैर-मुस्लिमों की विभिन्न देवियाँ हैं। ब्राही ग़ैर-मुस्लिम आस्था अनुसार बीमारियों की एक देवी का नाम है जिस की पूजा की जाती है ताकि बीमारियाँ दूर हो जाएँ । सम्भव है कि किसी के दिल में यह प्रश्न उत्पन्न हो कि शाह शहीद ने ग़ैर-मुस्लिमों की रीतियों का वर्णन क्यों किया ? उत्तर यह है कि ये रीतियाँ ग़ैर-मुस्लिमों का अनुसरण करते हुए अनेक स्थानों पर मुसलमानों ने भी ग्रहण कर लिया था ।) आदि के नाम से कुछ स्थान प्रसिद्ध कर दिए गए हैं ये सब वसन् हैं ।
सनम् और वसन् दोनों की पूजा से शिर्क साबित हो जाता है। अल्लाह के नबी ने सूचित किया है कि जो मुसलमान कयामत के करीब मुश्क् िहो जायेंगे उनका शिर्क इसी प्रकार का होगा ।
अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए बलिदान करने वाले व्यक्ति पर अल्लाह की लानत् (अभिशाप) अवतरित होती है।
عن ابي الطفيل أن علي رضي الله عنه أخرج صحيفة فيها : لعن الله من ذبح لغير الله )) ( صحيح مسلم، کتاب الاضاحی ، حدیث رقم (۱۹۷۸)
हजरत अबुत्तुफैल् (रजि) से रिवायत है कि हजरत अली ( रजि) ने एक किताब निकाली जिस में यह हदीस थी कि (( जिस ने अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के नाम पर जानवर ज़ब्ह (बलिदान) किया तो ऐसे व्यक्ति पर अल्लाह की लानत् (अभिशाप) नाज़िल् होती है।)) (मुस्लिम)
अर्थात जो व्यक्ति अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के नाम पर जानवर ज़ब्ह करे वह मल्ऊन है। हजरत अली (रजि) ने एक कापी में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम् की कई हदीसें लिख रखी थीं उन में यह हदीस भी थी । मालूम हुआ कि जानवर अल्लाह ही का नाम लेकर ज़ब्ह करने से हलाल होता है। अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के नाम पर जानवर ज़ब्ह करना शिर्क है और जानवर भी हराम हो जाता है। इसी प्रकार वह जानवर भी हराम होता है जो अल्लाह के सिवा किसी अन्य के नाम पर विशेष तथा प्रसिद्ध कर दिया गया हो चाहे उस पर अल्लाह का नाम भी लिया. गया हो ।
क़ियामत की निशानियाँ
عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا قَالَتْ : سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ يَقُولُ : لا يَذْهَبُ الْيْلُ وَالنَّهَارُ حَتَّى تُعْبَدَ اللَّاتُ وَالْعُزَّى ، فَقُلْتُ يَارَسُوْلَ الله إن كُنتُ لَأَظُنُّ حِيْنَ أَنْزَلَ اللهُ {هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَى وَدِيْنِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّيْنِ كُلِّهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكِينَ } أَنَّ ذلِكَ تاما ، قَالَ إِنَّهُ سَيَكُونُ مِنْ ذلِكَ مَا شَاءَ اللَّهُ ، ثُمَّ يَبْعَثُ اللَّهُ رِيحًا طَيِّبَةً فَتَوَفَّى كُلِّ مَنْ كَانَ فِي قَلْبِهِ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِّنْ خَرْدَلٍ مِنْ إِيْمَانِ ، فَيَبْقَى مَنْ لَا خَيْرَ فِيْهِ فَيَرْجِعُوْنَ إِلَى دِيْنِ آبَائِهِمْ )) ( صحيحمسلم ، كتاب الفتن ، حديث رقم (۲۹۰۷)
अर्थ :- (( हजरत आइशा (रजि) ने फरमाया कि मैं ने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से सुना आप फरमा रहे थे कि ( दिन रात समाप्त न होंगे (अर्थात क्यामत उस समय तक न आएगी ) जब तक कि लात एवं उज़्ज़ा की पूजा पुनः न शुरु हो जाए। मैं ने कहा ऐ अल्लाह के रसूल ! जब अल्लाह तआला ने यह आयत ” अल्लाह ने अपना रसूल मार्गदर्शन एवं सच्चे धर्म के साथ भेजा ताकि इस्लाम धर्म को तमाम धर्मों से ऊँचा करदे चाहे बहुदेव वादियों को बुरा ही क्यों न लगे उतारी थी तो मुझे पक्का विशवास यही था कि प्रलय के दिन तक दीन ऊँचा रहेगा। यह सुनकर आप ने फरमाया कि जब तक अल्लाह तआला को मन्जूर होगा दीन ऊँचा रहेगा फिर अल्लाह तआला एक पवित्र एवं स्वच्छ हवा (पवन) भेजेगा वह हर उस आदमी की जान निकाल लेगी जिस के दिल में राई के दाने के बराबर भी ईमान होगा। फिर केवल बुरे लोग रह जाएँगे और अपने बाप दादा के दीन की ओर लोट जाएँगे । (अर्थात बाप दादों की मुशरिकाना रीतियों पर चलेंगे )
अर्थात हजरत आइशा (रजि) ने सूरह तौबा वाली इस आयत से यह समझा था कि दीने इस्लाम कयामत तक ऊँचा रहेगा। आपने फरमया कि ऊँचा उस समय तक रहेगा जब तक अल्लाह को मन्जूर होगा फिर अल्लाह पाक एक पाकीज़ा हवा चलायेगा जिस से सब नेक लोग, जिन के दिलों में थोड़ा सा भी ईमान होगा मर जायेंगे और केवल बेदीन (अधर्मी) बाकी रह जायेंगे। कुरआन व सुन्नत की पैरवी नहीं करेंगे बल्कि बाप दादों की रीतियों की ओर लपकेंगे । फिर जो मुरिकों का मार्ग अपनाएगा अवश्य मुशरिक् हो जाएगा । मालूम हुआ कि आखिरी ज़माने में पुराना शिर्क भी फैल जाएगा । आज मुसलमानों के दरमियान नया तथा पुराना हर किसिम का शिर्क मौजूद है। आप की पेशीनगोई (भविष्यवाणी) सामने आ चुकी है।
मुसलमान नबी, वली, इमाम, शहीद के साथ शिर्क का व्यवहार कर रहे हैं। इसी प्रकार पुराना शिर्क भी फैल रहा है । बहुत सारे मुसलमान काफिरों तथा मुशरिक की रीतियों पर चल रहे हैं उदाहरणार्थ पण्डित से तकदीर या भविष्य का हाल पूछना, फाल खोलवाना, बुरी फाल लेना, फलाँ समय को बेहतर और फलाँ को मन्हूस समझना, सतीला और मसानी को पूजना, हनुमान, नोना चमारी (नोट-लोना या नोनाः चमारी (चमाइन्) बंगाल की प्रसिद्ध जादूगर्नी थी।) और कलुवा पीर को पुकारना। होली, दीवाली, नौ रोज़ और महरजान (नोट-नौ रोज और महरजान पारसियों की ईदों के नाम हैं।) के तिहवारों को मनाना, चाँद का बुर्ज अकरब् में दाखिल होने को मन्हूस समझना आदि। ये सारी रीतियाँ ग़ैर-मुस्लिमों और मुशरिकों की हैं जो मुसलमानों में फैली हुई हैं । मालूम हुआ कि मुसलमानों में शिर्क का द्वार इस कारण खुलेगा कि वे कुरआन एवं हदीस को छोड़कर बाप दादा की बनाई हुई रीतियों को अपनाएँगे ।
थान पूजा तुच्छ लोगों का काम है।
(( عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ يَخْرُجُ الدَّجَّالُ فِي أُمَّتِي فَيَمْكُثُ أَرْبَعِينَ لَا أَدْرِي : أَرْبَعِينَ يَوْمًا أَوْ ارْبَعِينَ شَهْرًا أَوْ أَرْبَعِينَ عَامًا ( فَيَبْعَثُ اللَّهُ عِيسَى بْنَ مَرْيَمَ كَأَنَّهُ عُرْوَةُ بْنُ مَسْعُوْدٍ فَيَطْلُبُهُ فَيُهْلِكُهُ ، ثُمَّ يَمْكُتُ النَّاسُ سَبْعَ سِنِينَ ، لَيْسَ بَيْنَ اثْنَيْنِ عَدَاوَةٌ ، ثُمَّ يُرْسِلُ اللَّهُ رِيحًا بَارِدَةً مِنْ قِبَلِ الشَّامِ فَلَا يَبْقَى عَلَى وَجْهِ الْأَرْضِ أَحَدٌ فِي قَلْبِهِ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ مِنْ خَيْرٍ أَوْ إِيْمَانِ إِلَّا قَبَضَتْهُ حَتَّى لَوْ أَنْ أَحَدَكُمْ دَخَلَ فِي كَبِدِ جَبَلٍ لَدَخَلَتْهُ عَلَيْهِ حتَّى تَقْبِضَهُ ، قَالَ سَمِعْتُهَا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ قَالَ : فَيَبْقَى شِرَارُ النَّاسِ فِي خِفَّةِ الطَّيرِ وَأَحْلامِ السَّبَاعِ ، لَا يَعْرِفُونَ مَعْرُوفًا وَلَا ينكِرُونَ مُنْكَرًا ، فَيَتَمَثَّلَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ فَيَقُولُ : أَلَا تَسْتَحِيبُوْنَ ؟ فَيَقُولُونَ فَمَا تَأْمُرُنَا ؟ فَيَأْمُرُهُمْ بِعِبَادَةِ الْأَوْثَانِ ، وَهُمْ فِي ذَلِكَ دار رِزْقُهُمْ حَسَنٌ عَيْشُهُمْ )) ( صحيح مسلم ، كتاب الفتن ، حديث رقم ٢٩٤٠)
अर्थ :- (( हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया (मेरी उम्मत में दज्जाल जाहिर होगा और चालीस (दिन, महीने या साल) ठहरेगा, फिर अल्लाह तआला उरवा बिन् मस्ऊद (रजि) के रूप में हजरत ईसा अलैहिस्सलाम को भेजेगा। आप उसको तलाश करके मार डालेंगे। फिर सात साल तक लोग ऐसी आराम व चैन की जिन्दगी गुजारेंगे कि किसी दो आदमियों के दरमियान कोई दुश्मनी और कटुता नहीं होगी। फिर अल्लाह तआला शाम देश की ओर से शीतल पवन भेजेगा और इस धरती पर उस समय जिस के दिल में एक राई के दाने के बराबर (अर्थात एक कण के समान भी कोई भलाई या ईमान होगा तो उसको वह हवा अल्लाह के आदेश से मार डालेगी। यहाँ तक कि तुम में से कोई व्यक्ति यदि किसी पहाड़ के गुफा में घुस जाएगा तो वह हवा उसके पीछे घुसकर उसे मार डालेगी )) हजरत अब्दुल्लाह (रजि) फरमाते हैं कि यह बात मैं ने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से स्वयं सुनी है। फिर आप ने फरमाया कि (नेक लोगों की मृत्यु के पश्चात ) फिर केवल बुरे लोग जो मूर्खता में परिन्दों की तरह और दरिन्दों की तरह फाड़ खाने वाले रह जाएँगे (नोट-अर्थात लोग उदण्डता और अपराध फैलाने तथा बेहयाई बकारी करने में परिन्दों की तरह तेज रफ्तार जब कि अत्याचार एवं रक्तपात में हिंसक पशुओं की तरह निडर होंगे ।) न अच्छी बात को अच्छी समझेंगे और न बुरी बात को बुरी। फिर मनुष्य के भेष में शैतान उन के पास आकर कहेगा तुम्हें शर्म नहीं आती तुम मेरी बात क्यों नहीं मानते ? वे पूछेंगे आप हमें क्या आदेश देते हैं ? अतः वह उन्हें थानों, मूर्तियों की पूजा का आदेश देगा और वे उन्हीं कामों में मगन् होंगे और उन्हें अधिक रोज़ी विस्तार रुप से मिल रही होगी और ज़िन्दगी आराम से गुज़र रही होगी ।)) ( मुस्लिम )
अर्थात आखिरी ज़माने में ईमानदार लोग ख़तम हो जाएँगे केवल बेईमान और मूर्ख लोग रह जाएँगे जो दूसरो का माल हड़प् करेंगे और बेहया व बेशरम् बन कर घूमेंगे, भलाई एवं बुराई में कुछ भी अन्तर न समझेंगे। फिर शैतान एक बुजुर्ग आदमी की शकल में आकर उन्हें समझाएगा कि देखो बेदीनी बड़ी बुरी बात है, दीनदार बनो। अतः उसके कहने सुनने समझाने बुझाने से उनके अन्दर दीन का शौक पैदा होगा। परन्तु कुरआन एवं हदीस पर नहीं चलेंगे बल्कि अपनी बुद्धि से दीनी बातें तराशेंगे और शिर्क में गिरफ्तार हो जाएँगे । किन्तु इस अवस्था में उनकी रोज़ी में बहुत अधिक वृद्धि होगी और ज़िन्दगी बड़े सुख चेन तथा आराम से गुज़र रही होगी। वह समझेंगे कि हमारी राह दुरुस्त है, अल्लाह तआला हम से प्रसन्न है इसी कारण हमारी हालत् संवर गई है यह सोचकर और अधिक शिर्क में डूवेंगे। इस लिए मुसलमानों को अल्लाह से डरना चाहिए कि वह कभी ढील देकर भी पकड़ता है। अधिकांश ऐसा होता है कि इन्सान शिर्क में ग्रस्त होता है और अल्लाह के अतिरिक्त अन्य से मुरादें माँगता है फिर भी अल्लाह तआला उसकी परिक्षा के लिए उसकी मुरादें पूरी कर देता है। परन्तु वह इन्सान यह सोचता है कि मैं सच्ची राह पर हूँ वर्ना मुरादें पूरी न होतीं । अतः मुरादों के मिलने तथा न मिलने को आधार मत बनाओ। और अल्लाह के सच्चे दीन अर्थात तौहीद को मत छोड़ो ।
(( عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ عَه قَالَ : قَالَ رسولُ الله لا تَقُومُ السَّاعَةُ حَتَّى تَضْطَرِبَ أَلْيَاتُ نِسَاءِ دُوسٍ حَولَ ذِي الْخَلَصَةِ )) ( صحيحبخاری ، برقم ٧١١٦ وصحيح مسلم برقم (٢٩٠٦)
अर्थ :- (( हजरत अबू हुरैरा (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि क्यामत उस वकत तक नहीं आएगी जब तक कि जुल्खलसा बुत् (मूर्ति) के चारों तरफ दौस समुदाय की औरतों के चूतड़ न हिलने लगें ।)) ( अर्थात जुल्खलसा नामक मूर्ति का परिक्रमा करेंगी ) ( बुखारी तथा मुस्लिम )
अरब में एक समुदाय ऐसा था जिस को दौस कहा जाता था । शिर्क तथा कुफ्र के ज़माने में उनका एक बुत् था जिसको
जुल्खलसा कहा जाता था। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के जीवन काल ही में उस को तोड़ दिया गया था। आप ने भविष्यवाणी की कि जब क्यामत् करीब होगी तो लोग उस बुत् को फिर मानने लगेंगे और दौस समुदाय की महिलायें उसका परिक्रमा करेंगी जिस के कारण उन के चूतड़ हिलेंगे । मालूम हुआ कि बैतुल्लाह (काबा) के अतिरिक्त किसी अन्य घर का तवाफ करना शिर्क और काफिरों तथा मुशरिकों की रीति एवं परम्परा है।
सातवाँ अध्याय
रस्म व रिवाज में शिर्क करने की घृणा ।
इस अध्याय में उन आयतों तथा हदीसों का बयान है जिन से यह साबित होता है कि जिस तरह इन्सान संसारिक कामों में विभिन्न प्रकार से अल्लाह तआला का आदर एवं सम्मान करता है ऐसा व्यवहार अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के साथ न किया जाए ।
शैतान की चाल
إِن يَدْعُونَ مِن دُونِهِ إِلَّا إِنَثًا وَإِن يَدْعُونَ إِلَّا شَيْطَانًا مَّرِيدًا لَّعَنَهُ اللَّهُ وَقَالَ لِأَتَّخِذَنَّ مِنْ عِبَادِكَ نَصِيبًا مَفْرُوضًا وَلَأُضِلَّتُهُمْ وَلَأُمَنِيَنَّهُمْ وَلَا مُرَنَّهُمْ فَلَيُبَتِكُنَّ وَاذَانَ الْأَنْعَامِ وَلَا مُرَنَّهُمْ فَلَيُغَيِّرُنَّ خَلْقَ اللَّهِ وَمَن يَتَّخِذِ الشَّيْطَانَ وَلِيًّا مِن دُونِ اللَّهِ فَقَدْ خَسِرَ ملے خُسْرَانًا مُّبِينًا يَعِدُهُمْ وَيُمَنِّيهِمْ وَمَا يَعِدُهُمُ الشَّيْطَانُ إِلَّا غُرُورًا ) الا .
अर्थः- (ये मुशरिक अल्लाह को छोड़कर औरतों को पुकारते हैं और वास्तव में ये केवल सरकश् (उदण्ड) शैतान को ही पुकारते हैं। जिस पर अल्लाह ने लानत की है और उस ने यह कह रखा है कि तेरे बन्दों में से एक निश्चित भाग मैं ले कर रहूँगा । (अर्थात उन्हें अपना ताबेदार बना लूँगा ) और मैं उन्हें पथभ्रष्ट करता रहूँगा और उन्हें तुच्छ भावनाओं में डाल दूँगा। और उन्हें मैं आदेश दूँगा तो वह जानवरों के कान काट डालेंगे और मैं उन्हें आदेश दूँगा तो अल्लाह के बनाए हुए रुप को बदल डालेंगे । और जो अल्लाह को छोड़कर शैतान को मित्र बनाएगा वह अत्यन्त घाटे में पड़ गया। शैतान उन को (झूठा) वचन देता है और सब्ज़ बाग दिखाता है और वास्तव में शैतान उन से वादा करके केवल धोखा दे रहा है। ऐसे लोगों का ठेकाना जहन्नम् है और जहन्नम से वे निकल कर भाग नहीं सकते हैं।)) (सूरह निसा ११७ )
अर्थातः- जो लोग अल्लाह के अतिरिक्त अन्य लोगों को पुकारते हैं वे अपने विचार में नारियों को पुकारते हैं। कोई तो हजरत बीबी को कोई बीबी आसिया को, कोई बीबी उतावली को, कोई लाल परी को कोई सियाह परी को, कोई सतीला को कोई मसानी को और कोई काली को पुकारते हैं। यह सब केवल भावनाएँ हैं वर्ना इनकी हकीकत कुछ भी नहीं । न कोई नारी न कोई नर केवल तुच्छ भावनाएँ और शैतानी दुर्भावना है जिस को पूज्य ठहरा लिया गया है। और जो कभी कभी बोलता है और कभी कोई लीला भी दिखा देता है तो वह शैतान है जो लोगों को अपने जाल में फँसाने के लिए ऐसी चालें चलता है। वास्तव में मुश्श्रिकों की सम्पूर्ण उपासनाएँ शैतान के लिए हो रही हैं। ये अपने विचार अनुसार नज़ व नियाज़ तथा भेंट उपहार नारियों को देते हैं परन्तु वास्तव में उसे शैतान उचक लेता है। उन्हें इन बातों से न धार्मिक लाभ मिलता है और न संसारिक, क्योंकि शैतान तो अल्लाह के दरबार से भगाया हुआ है इस कारण उस से दीनी लाभ तो होने से रहा । फिर यह तो मानव का शत्रु है उन का कब भला चाहेगा ? बल्कि यह तो अल्लाह के सामने कह चुका है कि मैं तेरे बहुत से बन्दों को अपना बन्दा बना लूँगा। उन को ऐसा पथभ्रष्ट करूँगा और उन की अकलें ऐसी मारूँगा कि अपने ही विचारों, भावनाओं को मानने लगेंगे और मेरे नाम के जानवर नियुक्त करेंगे। और उन पर मेरे लिए भेंट चढ़ाने का निशान (चिन्ह) लगायेंगे।
उदाहणार्थ उस का कान चीर डालेंगे या काट डालेंगे या उसके गले में पट्टा ( नाड़ा) डालेंगे। माथे पर मेंहदी लगा देंगे, सेहरा बाँधेंगे, मुँह के अन्दर पैसा रख देंगे। मतलब यह कि किसी भी जानवर पर इस बात का कोई भी चिन्ह लगा दीजिए कि यह फलाने की भेंट है तो इन्हीं उपरोक्त उल्लेखित शिर्क वाले कार्य में सम्मिलित है। शैतान यह भी कह आया है कि मेरे प्रभाव तथा मेरे सिखाने पढ़ाने से लोग अल्लाह तआला की बनाई हुई शकल एवं रुप को बिगाड़ डालेंगे । कोई किसी के नाम की चोटी रख लेगा, कोई किसी के नाम पर नाक या कान छेदवा लेगा, कोई दाढ़ी मुँडवाएगा कोई भँव और पलकें साफ करके फकीरी जताएगा। ये सब शैतानी बातें हैं और इस्लाम के विरुद्ध हैं। अतः जिस ने अल्लाह जैसे कृपालु तथा दयालु को छोड़कर शैतान जैसे दुशमन की राह पकड़ी तो उस ने स्पष्ट धोखा खाया । क्यों किं पहली बात तो यह है कि शैतान हमारा दुश्मन है और दूसरी बात यह है कि उस में भ्रम डालने के अतिरिक्त कोई शक्ति नहीं । कुछ झूठे वचन देकर और सब्ज़ बाग दिखा कर आदमी को बहला देता है कि फलाने को मानेंगे तो यह होगा और फलाने को मानोगे तो यूँ होगा और लम्बी लम्बी कामनाएँ जताता है। कि यदि इतने पैसे हों तो ऐसा बाग तैयार हो जाएगा, एक सुन्दर भवन बन जाएगा । परन्तु ये तो हाथ नहीं लगते और ये कामनाएँ पूरी भी नहीं होतीं इस लिए आदमी घबरा कर अल्लाह तआला को भूलकर अल्लाह के अतिरिक्त अन्य की तरफ दोड़ने लगता है और होता वही है जो अल्लाह ने भाग्य में लिख दिया है।
किसी के मानने या न मानने से कुछ नहीं होता। बल्कि यह सब केवल शैतानी भ्रम और उसकी मक्कारी, छल् फ्रेब एवं धोखा बाज़ी है । इन बातों का परिणाम यह होता है कि आदमी शिर्क में ग्रस्त होकर जहन्नमी बन जाता है।
सन्तान के विषय में शिर्क की रीतियाँ
* هُوَ الَّذِي خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍ وَاحِدَةٍ وَجَعَلَ مِنْهَا زَوْجَهَا لِيَسْكُنَ إِلَيْهَا فَلَمَّا تَغَشَّهَا حَمَلَتْ حَمْلاً خَفِيفًا فَمَرَّتْ بِهِ فَلَمَّا أَثْقَلَت دَعَوَا اللَّهَ رَبَّهُمَا لَبِنْ ءَاتَيْتَنَا صَالِحًا لَّنَكُونَنَّ مِنَ الشَّكِرِينَ فَلَمَّا وَاتَنهُمَا صَالِحًا جَعَلَا لَهُ شُرَكَاءَ فِيمَا ءَاتَنهُمَا فَتَعَالَى اللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ ) (الأعراف (۱۸۹-۱۹۰)
अर्थः- (( उस ने तुम को एक जान से पैदा किया और उस से उस की बीवी पैदा की, ताकि उस से चैन पाए । फिर जब उस ने उस से सम्भोग कर लिया तो उसको गर्भ रह गया । वह उसे उठाये चलती फिरती रही, फिर जब भारी हो गई तो दोनों ने अपने रब को पुकारा कि यदि तू हमें नेक सन्तान देगा तो हम तेरे शुक्र गुज़ार होंगे। फिर जब अल्लाह ने उन को नेक बच्चा दिया तो उस बच्चे में अल्लाह का शरीक बनाने लगे। उन के शिर्क से अल्लाह स्वच्छ तथा उच्च है।)) (सूरह अल्आराफ १८९-१९०)
अर्थात शुरु में भी अल्लाह ही ने मनुष्य को पैदा किया था तथा उसी ने पत्नी भी प्रदान किया और पति पत्नी में प्रेम दिया । परन्तु मनुष्य का हाल यह है कि जब जब सन्तान की आशा हुई तो दोनों पति एवं पत्नी मिलकर अल्लाह से प्रार्थना एवं विनति करने लगे कि यदि तन्दुरुस्त और नेक बच्चा तू हमें प्रदान कर दे तो हम तेरा बहुत ही उपकार मानेंगे और तेरे शुक्र गुज़ार होंगे। परन्तु जब अल्लाह ने इच्छानुसार बच्चा प्रदान कर दिया तो अल्लाह को छोड़कर अन्य लोगों को मानने लगते हैं और उन के लिए भेंट उपहार देने लगते हैं। कोई बच्चा को किसी की कबर ( समाधि) पर ले जाता है कोई किसी के थान पर, कोई किसी के मज़ार पर कोई किसी के उर्स में, कोई किसी की चोटी रखता है, कोई किसी की बद्धी पहनाता है, कोई किसी की बेड़ी डालता है, कोई किसी का फकीर बनाता है कोई नबी बख़्श नाम रखता है, कोई अली बख़्श, कोई इमाम बख़्श, कोई पीर बख़्श, कोई सतीला बख़्श, कोई गंगा दास, कोई जमुना दास आदि ।
खेती बाड़ी में भी शिर्क हो सकता है
وَجَعَلُوا لِلَّهِ مِمَّا ذَرَأَ مِنَ الْحَرْثِ وَالْأَنْعَامِ نَصِيبًا فَقَالُوا هَذَا لِلَّهِ بِزَعْمِهِمْ وَهَذَا لِشُرَكَابِنَا فَمَا كَانَ لِشُرَكَابِهِمْ فَلَا يَصِلُ إِلَى اللَّهِ وَمَا كَانَ لِلَّهِ فَهُوَ يَصِلُ إِلَى شُرَكَابِهِمْ سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ ) (اسم (۱۳)
अर्थ :- (( और ये मुशरिक लोग उन चीजों में से जो अल्लाह ने पैदा की हैं, अर्थात खेती और जानवरों में से अल्लाह के लिए एक भाग विशेष कर चुके हैं। और अपने विचार से कहते हैं कि यह तो अल्लाह का है और ये हमारे शरीकों का। फिर जो उन के शरीकों का है वह अल्लाह को नहीं पहुंचता और जो अल्लाह का है वह उन के शरीकों को मिल जाता है । ये जो अपने मन मानी निर्णय कर रहे हैं बहुत ही बुरा है। (अल्अन्आम १३६)
अर्थात तमाम अनाज, गल्ले और जानवर अल्लाह ही ने पैदा किए हैं फिर मुशरिक लोग जिस तरह उन में से अल्लाह तआला की नियाज़ निकालते हैं वैसे ही अल्लाह के अतिरिक्त अन्य के लिए भी निकालते हैं। जब कि अल्लाह के अतिरिक्त अन्य की नियाज़ में जो आदर तथा सम्मान करते हैं वह अल्लाह की नियाज़ में नहीं बजा लाते ।
चौपायों में भी शिर्क हो सकता है ।
وَقَالُوا هَذِهِ أَنْعَمْ وَحَرْثُ حِجْرٌ لَّا يَطْعَمُهَا إِلَّا مَن نَشَاءُ بِزَعْمِهِمْ وَأَنْعَمُ حُرِّمَتْ ظُهُورُهَا وَأَنْعَامٌ لَّا يَذْكُرُونَ E اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهَا افْتِرَاء عَلَيْهِ سَيَجْزِيهِم بِمَا كَانُوا يَفْتَرُونَ ﴾ (القلم (۱۳)
अर्थ (( और वह अपने मन मानी कहते हैं कि यह जानवर और खेती अछूती है, इसे कोई न खाए सिवाए उस के जिसे हम चाहें । कुछ जानवरों की सवारी मना है और कुछ जानवरों पर अल्लाह का नाम नहीं लेते। ये सब अल्लतह पर इल्ज़ाम (दोषारोपण) है वह उन के दोषारोपण की शीघ्र ही सज़ा देगा।)) (अल्अन्आम १३८)
अर्थात लोग केवल अपने विचार एवं मन से कह देते हैं कि फलाँ चीज़ अछूती है उसको केवल फलाँ आदमी खा सकता है और फलाँ नहीं खा सकता। कुछ जानवरों पर लादते नहीं और सवारी भी नहीं करते कि यह फलों की नियाज का जानवर है इस का आदर एवं सम्मान करना चाहिए । और कुछ जानवरों को अल्लाह के अतिरिक्त अन्य के नाम पर विशेष तथा नियुक्त कर देते हैं कि इन कामों से अल्लाह प्रसन्न होगा और मुरादें पूरी कर देगा। परन्तु उन के ये विचार तथा कार्य तुच्छ एवं झूठे हैं जिन की वे अवश्य सजा पाएँगे ।
مَا جَعَلَ اللَّهُ مِنْ بَحِيرَةٍ وَلَا سَابِبَةٍ وَلَا وَصِيلَةٍ وَلَا حَامٍ وَلَكِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَأَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ ) (الساندة (١٠٣)
अर्थ (अल्लाह ने न बहीरा को न साइबा को न वसीला को और न हाम को जायज़ किया है, परन्तु काफिर झूठी बातें अल्लाहके जिम्मा लगाते हैं और अधिकतम बुद्धिहीन हैं ।))
जो जानवर किसी के नाम से विशेष कर देते तो उस का कान चीर देते थे और उस को बहीरा कहते थे । साँड को साइबा कहा जाता था। जिस जानवर के बारे में यह मिन्नत मानी जाती कि यदि उस को नर बच्चा पैदा हुआ तो उस को नियाज़ में दे दिया जाएगा। फिर उस के नर और मादा दोनों बच्चे पैदा होते तो नर को भी नियाज़ में न देते और न मादा को। इन दोनो बच्चों को वसीला कहा जाता था। और जिस जानवर से दस बच्चे पैदा हो जाते थे उस पर सवार होना और लादना छोड़ देते थे। उस को हामी कहा जाता था। अल्लाह तआला ने फरमाया कि ये सब बातें अल्लाह की तरफ से नहीं बल्कि मन गढ़न्त हैं। मालूम हुआ कि किसी जानवर को किसी के नाम का ठहरा देना और उस पर चिन्ह लगा देना और यह निश्चित कर देना कि फलाँ की नियाज़ गाय है, फलाँ की बकरी और फलाँ की नियाज़ मुर्गा है। ये सब शिर्क की रीतियाँ हैं और इस्लाम धर्म के विरुद्ध हैं।
हलाल एवं हराम में अल्लाह पर दोषारोपन करना
وَلَا تَقُولُوا لِمَا تَصِفُ أَلْسِنَتُكُمُ الْكَذِبَ هَذَا حَلَالٌ وَهَذَا حَرَامٌ لِتَفْتُرُوا عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ إِنَّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَ ) (هل (1)
अर्थ ( किसी चीज़ को अपनी ज़बान से झूठ मूठ न कह दिया करो कि यह हलाल है और यह हराम है ताकि अल्लाह पर बुहतान बाँधो । और अच्छी तरह समझ लो कि अल्लाह तआला पर बुहतान बाज़ी करने वाले सफलता प्राप्त नहीं कर सकते । )) (अन्-नहल ११६)
अथार्त अपनी तरफ से और अपने मन मानी किसी भी चीज़ को हलाल एवं हराम न बनाओ, यह केवल अल्लाह ही की शान (महिमा) है। और इस तरह मन मानी कह देने से अल्लाह तआला पर झूठ बाँधना है। यह सोचना तथा विचार करना कि यदि फलाँ काम इस प्रकार किया जाएगा तो ठीक हो जाएगा, वर्ना उस में गड्बड़ हो जाएगी, ग़लत है । क्योंकि अल्लाह तआला पर दोषारोपण कर के मनुष्य सफलता नहीं प्राप्त कर सकता। मालूम हुआ कि यह अकीदा कि मुहर्रम् में पान न खाया जाए, लाल कप्पड़े न पहने जाएँ, हज़रत बीबी की सह्नक् मर्द न खाएँ । उन की नियाज़ में फलाँ फलाँ तरकारियों का होना जरुरी है मिस्सी भी हो, हिना भी हो। इस को लौंडी, पहले पति की मृत्यु या तेलाक के बाद दूसरा निकाह कर लेनी वाली महिला, नीच कौम और बङ्कार न खाए । शाह अब्दुल्हक् साहब का नियाज़ हलुवा ही है, उस को बड़े यत्तियात से बनाओ, और हुक्का पीने वाले को न खिलाओ । शाह मदार की नियाज़ मालीदा ही है। बू अली कलन्दर की नियाज़ सिवय्याँ और अस्हाबे कहफ् की नियाज़ गोश्त रोटी है। शादी के अवसर पर फलाँ फलाँ, मौत एवं गमी के अवसर पर फलाँ फलाँ रस्मों को करना जरुरी है। शौहर की मौत के बाद न शादी करो, न शादी में बैठो, न अचार डालो । फलाँ आदमी नीला कपड़ा और फलाँ लाल कपड़ा न पहने । ये सब बातें शिर्क हैं। मुशरिक् अल्लाह की शान में हस्तक्षेप करते हैं और अपनी अलग शरीअत गढ़ रहे हैं।
तारों तथा नक्षत्रों में तासीर (प्रभाव ) मानना शिर्क है ।
(( عَنْ زَيْدِ بن خالد الجهني رضي الله عنه قال : صَلِّي بِنَا رَسُولُ اللَّهِ ﷺ صَلَاةَ الصُّبْحِ بالحديبِيَّةِ عَلَى إِثْرِ سماء كانت من اليلِ ، فَلَمَّا انصَرَفَ أَقْبَلَ عَلَى النَّاسِ فَقَالَ : هَلْ تَدْرُونَ مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ ؟ قالوا الله ورسوله أعلم ، قَالَ : قال : أَصْبَحَ مِنْ عِبَادِي مُؤْمِنٌ بِي وَكَافِرٌ بِالْكَوَاكِبِ ، وَ أَمَّا مَنْ قَالَ : مُطِرْنَا بِفَضْلِ الله ورحمته ، فذالك كافر بي و مؤمن بالكواكب )) ( صحيح بخاري ، كتاب الاذان ، حديث رقم ٨٤٦ وصحيح مسلم كتاب الايمان حديث رقم (١٢٥)
अर्थ :- जैद बिन खालिद जुहनी (रजि) से रिवायत है कि एक दिन हुदैबिया में रात की वर्षा के बाद रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हम को फज्र की नमाज़ पढ़ाई। नमाज़ के बाद आप ने हमारी तरफ मुख करके फरमाया ( क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे रब ने क्या कहा ? )) सहाबा ने उत्तर दिया अल्लाह और उस के रसूल बेहतर जानते हैं। आप ने फरमाया कि अल्लाह ने यह कहा कि ( मेरे बन्दों ने इस अवस्था में सुबह की कि कुछ तो उन में से मोमिन थे और कुछ काफिर थे । जिस ने कहा कि अल्लाह के कृपा तथा उस की दया से वर्षा हुई है वह मुझ पर ईमान लाया और तारों (नक्षत्रों) का इनकार किया और जिस ने कहा कि फलाँ फलाँ तारे (नक्षत्र) के प्रभाव अथवा माध्यम से बारिश हुई उस ने मुझे इनकार किया और तारों पर ईमान लाया )) ( बुखारी तथा मुस्लिम )
, अर्थात जो व्यक्ति संसारिक कामों में अथवा अल्लाह के बनाए हुए नेज़ाम में तारे या नक्षत्र या किसी मखलूक के प्रभाव (तासीर) का परिणाम समझता है, अल्लाह तआला उसे अपने मुन्किरों तथा नाफरमानों में गिन लेता है। क्योंकि वह तारा पूजक (नक्षत्र पूजक) है। और जो यह कहता है कि संसार का सारा कारखाना, नेज़ाम अल्लाह के आदेश से चल रहा है वह
उस का प्रिय तथा फरमाँबरदार बन्दा है तारा पूजक (नक्षत्र पूजक) नहीं । मालूम हुआ कि नेक एवं बुरे समय के मानने, अच्छी बुरी तारीखों के या दिन के पूछने और भविष्यवक्ता की बात पर विश्वास करने से शिर्क का द्वार खुलता है। क्योंकि इन सब का सम्बन्ध नक्षत्र और तारों से है और नक्षत्र तथा तारों का मानना तारा पूजकों का काम है।
ज्योतिषी जादूगर तथा काहिन है
(( عن ابن عباس رضى الله عنهما قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : من اقتبس بابا من علم النجوم لغير ما ذكر الله فقد اقتبس شعبة من السحر ، المنجم كاهن ، والكاهن ساحر والساحر كافر )) (مشكاة المصابيح ، كتاب الطب والرقي ، باب الكهانة حديث رقم ٤٦٠٤)
हजरत इबने अब्बास (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया जिस ने ज्योतिष विद्या सीखा उस के अतिरिक्त जो अल्लाह ने बयान किया है तो उस ने जादू का एक भाग सीखा । ज्योतिषी काहिन है और काहिन जादूगर है और जादूगर काफिर है।
अर्थात कुरआन में तारों के उत्पन्न करने का उद्देश्य बयान किया गया है कि इन से अल्लाह तआला की कुदरत, शक्ति तथा हिक्मत मालूम होती है, और तारों से अकाश की शोभा है और इन से शैतानों को मार मार कर भगाया जाता है, और समुद्र एवं स्थल में यात्रियों के मार्गदर्शन के लिए हैं। यह बयान नहीं है कि इन का अल्लाह के कार्य या उस के कारखाने में कोई प्रभाव है या ये तारे अल्लाह के नेज़ाम में कुछ हस्तक्षेप करते हों। या दुनिया की भलाई एवं बुराई इन्ही के प्रभाव से हैं। अब यदि कोई व्यक्ति तारों के वह लाभ जो कुरआन में बयान किए गए हैं उन को छोड़ कर यह कहे कि संसार में जो परिवर्तन उत्पन्न होता है वह इन्ही के प्रभाव या हस्तक्षेप से है या परोक्ष विद्या का दावा करे । जिस तरह पण्डित और ब्रहमण शैतानों और भूत प्रेत से पूछ पूछ कर गैब की बातें बयान किया करते हैं इसी तरह ज्योतिषी तारों से मालूम करके बताते हैं। इस तरह काहिन, ज्योतिषी, भविषयवक्ता, पन्डित, ब्रहमण, रम्माल, जफ्फार और फाल खोलने वाला इन सब की राहें एक हैं । ज्योतिषी जादूगरों की तरह शैतानों, जिन्नातों, भूतों प्रेतों से दोसती गाँठता है और शैतानों से दोसती बिना उनकी पूजा किए नहीं हो सकती। जब उन की पूजा की जाए, उन की दोहाई दी जाए, उन को भोग दिया जाए तब जाकर दोसती पैदा होती है। अतः यह सब कुफ एवं शिर्क की बातें हैं। अल्लाह तआला मुसलमानों को शिर्क से बचाए आमीन ।
ज्योतिषी से पूछ ताछ करना महा पाप है
(( عن حفصة رضي الله عنها زوج النبي صلي الله عليه وسلم قالت : قال رسول الله الله من اني عرافا فسأله عن شيء لم تقبل له صلاة اربعين ليلة )) (صحیح مسلم ، کتاب السلام ، حديث رقم (۲۳۳۰)
हजरत हफसा (रजि) से रिवायत है कि नबी ने फरमाया जो खबरें बताने वाले ज्योतिषी अथवा भविष्यवक्ता के पास आया और उस से कुछ पूछा तो उस की चालीस दिन की नमाज़ कबूल नहीं होगी ।
अर्थात जो व्यक्ति गैब की बातें बताने का दावा करता है जैसे ज्योतिषी हुए भविष्यवक्ता हुए अर्राफ जो हाथ और माथे की लकीरें देखकर भाग्य बताते हैं, यदि किसी ने इन लोगों से जाकर कुछ पूछताछ कर लिया तो उस की चालीस दिन की उपासना भंग हो जाएगी, क्योंकि उस ने शिर्क किया और शिर्क समस्त उपासनाओं को मिटा देता है । नजूमी, ज्योतिषी, भविष्यवक्ता, जफ्फार, फाल खोलने वाले, नाम निकालने वाले, और कश्फ वाले सब अर्राफ में शामिल हैं।
शकुन और फाल शिर्क की रस्में हैं
عن قطن بن قبيصة عن أبيه أن النبي صلي الله عليه وسلم قال : العيافة و الطيرة والطرق من الجبت () ( سنن أبي داؤد ، كتاب الكهانة ، حديث رقم (۳۹۰۱)
अर्थ :- हजरत क्तन् बिन बीसा (रह) अपने बाप कबीसा (रजि) से रिवायत करते हैं कि नबी ने फरमाया ((शकुन लेने के लिए जानवर भगाना या उड़ाना, फाल निकालने के लिए कुछ डालना या फेंकना (नोट-अल्ड्याफा :- चिड़िया को उड़ाते या हिरन् को भगाते यदि वह दाएँ तरफ जाता तो शुभ मानते यदि बाएँ तरफ जाता तो अशुभ समझते और काम से रुक जाते । तियरा का भी यही अर्थ है। तुरुक यह कङ्करी मारते या रेत पर लकीर खींचते और उस से शुभ तथा अशुभ का फाल निकालते थे ।) और बुरा शकुन लेना कुफ्र तथा शिर्क है।)) (अबू दाऊद )
(( عن عبد الله بن مسعود رضي الله عنه عن رسول الله ﷺ قال : الطيرة شرك ، الطيرة شرك ، الطيرة شرك )) (سنن أبي داؤد ، كتاب الكهانة ، حديث رقم ٣٩٠٤)
अर्थ :- हजरत अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया ( शकुन लेना शिर्क है, शकुन लेना शिर्क है, शकुन लेना शिर्क है।)) ( अबू दाऊद हदीस न० ३९०४)
अरब में शकुन लेने का बहुत रिवाज था और वे शकुन पर दृढ़ विश्वास रखते थे। इस लिए आप ने अनेक बार फरमाया कि शकुन लेना शिर्क है ताकि लोग इस से रुक जाएँ ।
(( عن سعد بن مالك رضي الله عنه أن رسول الله ﷺ قال : لا هامة ولا عدوي ولا طيرة ، وإن تكن الطيرة في شيء ففي الفرس والمرأة والدار (( ( سنن أبي داؤد ، كتاب الكهانة ، حديث رقم (٣٩١٤)
हजरत सद बिन मालिक् (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया ( न उल्लू अशुभ है, न किसी का रोग किसी अन्य को लगता है और न किसी चीज़ में नहूसत् (अशुभ) है और यदि नहूसत् होती तो औरत, घर और घोड़े में होती ।))
अर्थात अरब के जाहिलों का यह धारणा था कि यदि कोई कत्ल कर दिया जाए या मारा जाए और कोई उस का बदला न ले तो उस के खोपड़ी से एक उल्लू निकल कर दोहाई देता है और बदला लेने के लिए फरयाद करता फिरता है उसी को हाम्मा कहा जाता था। इस के विषय में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमया कि यह गलत है इसकी कोई वास्तविक्ता नहीं । इस हदीस से यह भी ज्ञात हुआ कि जो लोग यह कहते हैं कि आदमी मरने के पश्चात किसी जानवर का रुप धारण कर लेता है अर्थात आवागवन (तनासुखे अरवाह ) का अकीदा रखते हैं तो यह भी ग़लत् और बे बुनियाद चीज़ है । और अरब के जाहिलों में यह भी प्रसिद्ध था कि कुछ रोग जैसे खुजली, कोढ़ एक से दूसरे को लग जाते हैं तो आप ने फरमाया कि यह भी गलत् है ।
इस से यह भी मालूम हुआ कि लोगों में जो यह बात प्रचलित है कि चेचक वाले से प्रहेज़ करते हैं और बच्चों को उस के पास जाने नहीं देते कि कहीं उस को भी न लग जाए, तो यह शिर्क एवं कुफ्र की रस्म है इस को न मानना चाहिए । ( अथार्त यह अकीदा नहीं रखना चाहिए कि फलाँ आदमी की बीमारी हमें स्वयं बिना अल्लाह के आदेश से लग जाएगी, क्योंकि बीमारियाँ अल्लाह के हुकम से लगती हैं, हाँ अल्बत्ता स्वास्थ्य के नियमानुसार प्रहेज़ करने में कोई हरज नहीं) लोगों में यह बात भी मशहूर है कि फलाँ काम फलाँ को अशुभ होता है, रास नहीं आता, यह भी गलत है। और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि यदि इस बात का कुछ प्रभाव है तो तीन ही चीज़ों में है (( घर, घोड़ा, स्त्री में (यानि घर वह बुरा या अशुभ है जिस के पड़ोसी बुरे हों। औरत वह बुरी या अशुभ है जो बुरे स्भाव की हो। घोड़ा वह अशुभ है जो शोरी और अड़ियल् हो अपने ऊपर सवार न होने दे या सवार को गिरा देता हो । )) यह चीजें कभी ना मुबारक (अशुभ) भी होती हैं परन्तु इन की ना मुबारकी मालूम करने का कोई माध्यम नहीं बताया गया कि जिस से यह जाना जा सके कि यह शुभ है और यह अशुभ। और लोगों में जो यह प्रद्धि है कि शेर दहान घर(नोट-जो घर आगे से चौड़ा और पीछे से छोटा हो उसे शेर दहान कहते हैं। ग़ैर-मुस्लिमों के विचार में ऐसा घर अशुभ होता है।
मालूम हुआ कि बीमारियाँ बला के प्रभाव से नहीं होतीं । कुछ लोगों के विचार में कुछ बीमारियाँ बला के प्रभाव से होती है जैसे सतीला, मसानी, बराही, आदि)(नोट-ये सब ग़ैर-मुस्लिमों के विचार में बीमारियों की देवियाँ हैं, जिस की पूजा की जाती है ताकि बीमारियाँ दूर हो जाएँ।) सितारा पेशानी घोड़ा और कल्जिब्ही औरत अशुभ होती हैं। तो इस प्रकार की बातों का कोई प्रमाण नहीं है। बल्कि मुसलमानों के हृदय में यह शिर्क एवं कुफ्र की तरफ ले जाने वाला दुर्भावना नहीं आना चाहिए। और जब नयाँ घर लें या घोड़ा खरीदें या विवाह करें या लौंडी मोल लें तो अल्लाह ही से उस की भलाई माँगें और उस की बुराई से अल्लाह की शरण चाहें और बाकी अन्य चीज़ों में भी इस प्रकार की भावनाएँ न दौड़ाएँ कि फलाँ काम मुझे रास नहीं आया और फलाँ काम भी रास नहीं आया ।
(( عن أبي هريرة رضي الله عنه قال : قال رسول الله ﷺ : لا عدوي ولا صفر ولا هامة )) ( صحيح بخاري ، كتاب الطب ، باب لا هامة ، حديث رقم (٥٧٧٠)
अरब के लोग जूउल् कल्ब के रोगी के विषय में यह विचार रखते थे कि इस के पेट में कोई बला घुसी हुई है जो खाया हुआ खाना चट कर जाती है, इसी लिए इस ग़रीब का पेट नहीं भरता । इस भूत और बला का नाम वे “सफर ” के नाम से प्रसिद्ध किए हुए थे।परन्तु यह बात गलत है। अरब के लोग इस्लाम से पूर्व काल में सफर महीने को अशुभ समझते थे और इस महीने में कोई काम नहीं करते थे। अतः यह भी गलत है। मालूम हुआ कि सफर महीने के तेरा दिनों को अशुभ समझना और यह अकीदा रखना कि इस महीने में बलाएँ उतरती हैं और इसी कारण इस का नाम ” तेरा तीजी ” रखा गया कि इन की तेज़ी से काम बिगड़ जाते है, तो यह विचार तथा भावना भी गलत है। इसी प्रकार किसी चीज़ को या तारीख को या दिन को या घन्टे और मिनट् को अशुभ समझना ये सब शिर्क की बातें हैं। आप ने फरमाया कि यह केवल भावना है भूत प्रेत का कोई प्रभाव नहीं होता ।
(( عن جابر رضي الله عنه أن رسول الله ﷺ أخذ بيد مجذوم فوضعها معه في القصعة فقال : كل ثقة بالله وتوكلا عليه )) (سنن ابي داؤد ، كتاب الكهانة ، باب في الطيرة ، رقم ۳۹۱۸ – وسنن ترمذي ، كتاب الاطعمة ، باب رقم ۱۹ – حديث رقم ۱۸۲۲ و سنن ابن ماجة ، كتاب الطب ، باب الجذام ، حديث رقم ٣٥٤٢ )
अर्थ (( हजरत जाबिर (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक कोढ़ी का हाथ पकड़ कर उसे अपने साथ प्याला में रखकर फरमाया “अल्लाह पर भरोसा कर के खा “।))
अर्थात हमारा केवल अल्लाह पर भरोसा है वह जिसे चाहे बीमार कर दे और जिसे चाहे तन्दुरुस्त कर दे। हम किसी के साथ खाने से प्रहेज नहीं करते। और बीमारी का बिना अल्लाह की इच्छा के स्वयं लग जाने को नहीं मानते ।
एक दीहाती की उपदेश पूर्ण कहानी
अल्लाह तआला को सिफारशी न बनाओ
(( عَنْ جُبَيْرِ بْنِ مُطْعِمٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ أَنِّي رَسُولُ اللَّهِ ﷺ أَعْرَابِي فَقَالَ : جُهِدَت الأَنْفُسُ وَ ضَاعَتِ الْعِيَالُ وَ نُهِكَتِ الأموال و هَلَكَتِ الْأَنْعَامُ فَاسْتَسْقِ اللَّهَ لَنَا ، فَإِنَّا نَسْتَشفَعُ بِكَ عَلَى اللَّهِ ونَسْتَشفَعُ بِالله عَلَيْكَ ، فَقَالَ النَّبِيُّ ﷺ : سُبْحَانَ اللَّهِ سُبْحَانَ الله ! فَمَا زَالَ يُسَبِّحُ حَتَّي عُرِفَ ذَالِكَ فِي وُجُوهِ أَصْحَابِهِ ، ثُمَّ قَالَ : وَيْحَكَ أَتَدْرِي مَا اللَّهُ ؟ إِنَّ عَرْشَهُ عَلَى سَمَاوَاتِهِ لَهَكَذَا ، وَقَالَ بِأَصَابِعِهِ مِثْلُ الْقُبَّةِ عَلَيْهِ ، وَإِنَّهُ لَيَبْطُ بِهِ أَطِيْطَ الرَّحْلِ بِالرَّاكِبِ )) (سنن أبي داؤد ، كتاب السنة ، رقم الحديث (٤٧١١)
अर्थ :- हजरत जुबैर बिन मुत्अिम् (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास एक दीहाती ने आकर कहा ” लोग परेशानी में पड़ गए, बच्चे भूख से बिल्बिला रहे हैं, माल बर्बाद हो गए, जानवर मर गए। आप हमारे लिए अल्लाह से बारिश की दुआ माँगें, हम अल्लाह के पास आप को सिफारशी बनाते हैं, और आप के पास अल्लाह तआला को नबी ने फरमाया सुब्हानल्लाह सुब्हानल्लाह ! (अर्थात अल्लाह पवित्र है आप इत्नी देर तक अल्लाह की “
पवित्रता बयान करते रहे कि सहाबा केराम के चेहरों पर उस का प्रभाव दिखने लगा। फिर आप ने फरमाया : नादान ! अल्लाह तआला किसी से सिफारिश नहीं करता, उसकी शान इस से कहीं उच्च एवं स्वच्छ है। मूर्ख ! क्या तू अल्लाह की महिमा जानता है और अल्लाह की जात को पहचानता है ? उस का अर्श उस के आसमानों पर इस तरह है और आप ने अपनी उँगलियों पर हथेली को गुम्बद् की तरह करके बताया। इस के कारण वह अर्श (सिंहाँसन) चर चरा रहा है, जिस तरह ऊँट का पालान (काठी) सवार के बोझ से चर चराता है।)) (अबूदाऊद)
अर्थात एक बार अरब में काल पड़ गया और बारिश रुक गई । एक दीहाती ने आप के पास आकर लोगों की परेशानी और संकट बयान की और आप को अल्लाह से दुआ के लिए कहा, और साथ ही यह भी कहा कि हम आप की सिफारिश अल्लाह के पास तथा अल्लाह की सिफारिश आप के पास चाहते हैं। यह बात सुनकर आप के डर और भय से काँपने लगे और आप अल्लाह अल्लाह की प्रशंसा तथा महानता बयान करने लगे। वहां उपस्थित सहाबा केराम के चेहरे भी अल्लाह की महानता सोचकर बदल गए। फिर आप ने उस दीहाती को समझाया कि अधिकार तो केवल अल्लाह ही का चलता है यदि अल्लाह दुआ के कारण हालत् संवार दे तो यह उस की मेहरबानी है । और आप ने उस को बताया कि जब यह कहा गया कि हम अल्लाह को पैगम्बर के पास सिफारशी बना कर लाए तो इस का अर्थ यह हुआ कि मालिक एवं अधिकारी पैग़म्बर को बना दिया गया, हालाँ कि यह शान अल्लाह की है। अब इस के बाद ऐसा शब्द कभी जबान से न निकालना । अल्लाह की शान बहुत बड़ी है, समस्त अम्बिया अवलिया उस के सामने एक कण की भी हैसियत नहीं रखते । आसमान तथा ज़मीन को उस का अर्श एक गुम्बद की तरह घेरे हुए है। अल्लाह का अर्श (सिंहाँसन) तो बहुत बड़ा तथा विशाल है परन्तु फिर भी उस शहन्शाह की महानता को संभाल नहीं सकता और चर चरा रहा है। सृष्टि की बुद्धि विवेक में उस की महानता नहीं आ सकती और वह उसकी महानता को बयान भी नहीं कर सकता । उस के काम में हस्तक्षेप करने की और उस के विशाल राज्य में हाथ डालने की किस में शक्ति है ?
वह शहन्शाह तो बिना फौज और लश्कर के और बिना वज़ीर और सलाहकार के एक क्षण में करोड़ों काम बना देता है वह भला किसी के पास आकर क्यों सिफारिश करे ? और कौन उस के सामने मालिक व मुख्तार तथा अधिकारी बन सकता है ?
सुब्हानल्लाह ! तमाम इन्सानों में सब से अफ्ज़ल् इन्सान, महबूबे इलाही, अहमदे मुज्तबा, रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तो यह हालत कि एक दीहाती के मुंह से एक ब्यर्थ एवं गलत बात निकल गई तो आप के डर और भय के कारण होश उड़ गए। और आप अर्श से फर्श तक जो अल्लाह की महानता और प्रशंसा भरा हुआ है उस को बयान करने लगे । परन्तु उन लोगों को क्या कहा जाए जो अल्लाह की शान में बढ़ बढ़ के बातें करते हैं। कोई कहता है मैं ने अल्लाह को एक कौड़ी में खरीद लिया है। कोई कहता है मैं रब से दो बरस बड़ा हूँ। कोई कहता है यदि मेरा रब मेरे पीर कीसूरत के सिवा किसी अन्य सूरत (रुप) में जाहिर हो तो में कभी उसे न देखूँ। और किसी ने यह कविता कहा है।
दिल् अजू मुहरे मुहम्मद् रेश दारम् रकाबत् बा खुदाए खवैश दारम
अर्थ :- मेरा दिल मुहम्मद मैं अपने रब से रक़ाबत् रखता हूँ। और किसी ने यह कहा । की मुहब्बत से जख्मी है,
बा खुदा दीवाना बाश व बा मुहम्मद होशयार
अर्थ :- रब के साथ दीवाना और मुहम्मद के साथ होशयार रहो ।
कोई रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अल्लाह से अफज़ल बताता है । अल्लाह की पनाह ! अल्लाह की पनाह ! इन मुसलमानों को क्या हो गया है ? कुरआन के होते हुए इन की बुद्धि पर पत्थर क्यों पड़ गए ? सुब्हानल्लाह यह गुमराहियाँ ! ऐ अल्लाह हमें ऐसी गुमराही से बचा ले। आमीन ।
किसी ने क्या ही खूब कहा है।
अजू खुदा खवाहेम तौफीके अदन् । बे अदबू महरूम गश्त अजू फज़ले रख ।
अर्थ :- हम अल्लाह से अदब की तौफीक माँगते हैं। बे अदब् रब के फज़ल से महरुम रह जाता है।
अल्लाह के नज़दीक सब से प्यारे नाम
(( عن ابن عمر رضي الله عنهما قال : قال رسول الله ﷺ : إن أحب أسماء كم عبد الله وعبد الرحمان )) ( صحيح مسلم ، كتاب الآداب ، حديث رقم ۲۱۳۲ )
हजरत अब्दुल्लाह बिन् उमर (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि तुम्हारे बहुत ही प्यारे नाम अब्दुल्लाह और अब्दुर्रहमान हैं)) (मुस्लिम )
अल्लाह का बन्दा या रहमान का बन्दा कितना प्यारा नाम है । इन्हीं नामों में अब्दुल् कुहूस, अब्दुल् जलील, अब्दुल् खलिक, इलाही बख़्श, अल्लाह दिया, अल्लाह दाद आदि शामिल् हैं। जिन में अल्लाह की ओर निस्बत् प्रकट होती है।
अल्लाह के नाम के साथ कुन्नियत न रखो ।
(( عَنْ شُرَيْحٍ بْنِ هَانِيءٍ عَنْ أَبِيهِ أَنَّهُ لَمَّا وَقَدَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ ﷺ مَعَ قَوْمِهِ سَمِعَهُمْ يُكَنُّونَهُ بِأَبِي الْحَكَمِ ، فَدَعَاهُ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ فَقَالَ : إِنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَكَمُ وَإِلَيْهِ الْحُكْمُ ، فَلِمَ تُكَنِّي أَبَا الْحَكَمِ ؟ )) ) سنن أبي داؤد ، كتاب الادب ، حديث رقم ٤٩٤٥ – وسنن ترمذي ، ابواب الدعوات ، باب رقم ۸۲ و سنن نسائی ، کتاب آداب القضاة باب رقم (۷)
अर्थ :- ( हजरत हानी (रजि) का बयान है कि जब मैं अपनी कौम की एक जमाअत् के साथ रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया तो आप ने उन से सुना कि मुझे मेरे साथी अबुल् हकम् यह अरबी का शब्द है अबू का अर्थ होता है बाप और हकम् कहते हैं उसको जिसकी बात किसी भी झगड़े में मान ली जाए, और हर झगड़े में जिस की बात मानी जा सके वह केवल अल्लाह है। ” कह कर आवाज़ देते हैं। आप ने मुझे बुला कर फरमाया कि हकम् अल्लाह ही है और हुकम उसी का है। तुम्हारी कुन्नियत् अबुल् हकम् क्यों रखी गई है?।))
अर्थात हर फैसले का चुका देना और हर झगड़े को मिटा देना यह अल्लाह ही की शान है, जो प्रलय के दिन इस प्रकार प्रकट होगा कि वहाँ अगले पिछले सारे झगड़े निपट जाएँगे । ऐसी ताकत् किसी भी मख़लूक में नहीं है। इस हदीस से मालूम हुआ कि जो शब्द अल्लाह ही की शान के योग्य है उसे अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए न प्रयोग किया जाए ।
मिसाल के रुप में शहन्शाह केवल अल्लाह तआला को कहा जाए। वह सारे संसार का रब है जो चाहे कर डाले। यह शब्द केवल अल्लाह ही की शान में बोला जा सकता है। इसी तरह मबूद, बड़ा दाना (सर्व ज्ञनी) बे परवाह आदि शब्द अल्लाह तआला ही की शान के लायक हैं।
केवल माशाअल्लाह (अल्लाह जो चाहे) कहो ।
) عَنْ حُذَيْفَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ الله قَالَ : لَا تَقُولُوا مَا شَاءَ الله وَشَاءَ مُحَمَّدٌ ، وَقُولُوا مَا شَاءَ اللهُ وَحْدَهُ )) ( شرح السنة للبغوي ج ۱۲ ص ۳۶۱ حديث رقم ۸۸۹۱ )
अर्थ :- (( हजरत हुज़ेफा (रजि) से रिवायत है कि नबी ने फरमाया ( इस प्रकार न कहो, जो अल्लाह और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) चाहे । परन्तु इस प्रकार कहो, जो अकेला अल्लाह चाहे । ))(शरहुस्सुन्ना लिल् बगवी )
अर्थात शाने उलूहीयत् में किसी मखुलूक का दखल नहीं, चाहे कितना ही बड़ा और कितना निकटतम (मुक़र्रब) क्यों न हो, उदाहरणार्थ यह न कहा जाए कि अल्लाह और रसूल चाहेगा तो काम हो जाएगा, क्योंकि संसार का सम्पूर्ण काम अल्लाह ही के चाहने से होता है। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के चाहने से कुछ नहीं होता। अथवा यदि कोई व्यक्ति पूछे कि फलाँ के दिल् में क्या है?
या फलाँ की शादी कब होगी ? या फलाँ पेड़ पर कित्ने पत्ते हैं? या आसमान में कितने तारे हैं ? तो उस के जवाब में यूँ न कहे कि अल्लाह और रसूल ही जानें । क्योंकि गैब की बात की खबर केवल अल्लाह ही को है, रसूल को ख़बर नहीं। परन्तु दीनी बातों में यदि इस प्रकार कह दिया गया जेसा कि आप की मौजूदगी में सहाबा किराम दीनी बातों में कह दिया करते थे तो कोई हरज नहीं। क्योंकि अल्लाह ने अपने रसूल को दीन की हर बात बता दी थी। किन्तु आप की मृत्यु के बाद अब इस प्रकार की दीनी बातों में भी नहीं कहना चाहिए । बल्कि इस प्रकार कहे कि (अल्लाह बेहतर जानते हैं))
अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की सौगन्ध खानी शिर्क है
) عن ابن عمر رضى الله عنهما قال سمعت رسول الله ﷺ يقول : من حلف بغير الله فقد كفر أو أشرك )) ( سنن ترمذي ، أبواب النذور ، حديث رقم ١٥٣٩ )
अर्थ (( हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर (रजि) से रिवायत है कि मैं ने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से सुना आप फरमा रहे थे जिस ने अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की कसम खाया उस ने शिर्क किया।)) (तिर्मिज़ी)
(( عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَانِ بْنِ سَمُرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُوْلُ اللَّهِ : لَا تَحْلِفُوا بِالطَّواغي وَلَا بِآبَائِكُمْ )) ( صحيح مسلم ، كتاب الايمان ، حديث رقم (١٦٤٦)
अर्थ (( हजरत अब्दुर्रहमान बिन समुरा (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया (बुतों की कस्में न खाओ, और न ही बापों की कस्में खाओ । )) (मुस्लिम)
(( عَنِ ابْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ قَالَ : إِنَّ اللَّهَ يَنْهَاكُمْ أَنْ تَحْلِفُوا بِآبَائِكُمْ ، مَنْ كَانَ حَالِفاً فَلْيَحْلِف بِاللهِ أَوْ ليصمت )) ( صحيح بخاري ، كتاب الايمان ، حديث رقم ٦٦٤٦ – وصحيحمسلم ، کتاب الايمان ، حديث رقم ١٦٤٦ )
अर्थ (( हजरत अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि (अल्लाह तआला तुम को बाप दादा की कस्में खाने से मना फरमाता है। जिस आदमी को कसम खाने की जरुरत पड़ जाए तो केवल अल्लाह की कसम खाए, वर्ना चुप रहे।)) (बुखारी, मुसिलम)
(( عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ الله قَالَ : مَنْ خَلَفَ فَقَالَ فِي حَلِفِهِ بِاللَّاتِ وَالْعُزَّي فَلَيَقُلْ : لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ )) ) صحيح بخاري، كتاب الايمان حديث رقم ٦٦٥- وصحيح مسلم ، كتاب الايمان ، حديث رقم ١٦٤٧ )
अर्थ (( हजरत अबू हुरैरा (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया (जिस ने गलती से लात एवं उज्ज़ा की कसम खाई (अर्थात बिना इच्छा व इरादा के गलती से मुँह से निकल गया तो उसे लाइलाहा इल्लल्लाह कह लेना चाहिए । )) (बुखारी तथा मुस्लिम )
अर्थात इस्लाम से पहले जाहिलीयत् के ज़माने में लोग बुतों की कस्में खाते थे। परन्तु अब इस्लाम में यदि किसी मुसलमान के मुंह से बिना इच्छा व इरादा के गलती से अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की क़सम् निकल् जाए तो उसी समय जलदी से लाइलाहा इल्लल्लाह पढ़ कर तौहीद का इकरार करले । मालूम हुआ कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी चीज़ की कसम न खाई जाए। यदि गलती से बिना इच्छा व इरादा के अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की कसम ज़बान से निकल् जाए तो जलदी से तौबा और क्षमायाचना की जाए ।
नज़ व नियाज़ के विषय में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का निर्णय
)) عَنْ ثَابِتِ بْنِ ضَحَاكَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : نَذَرَ رَجُلٌ عَلَى عَهْدِ رَسُول الله ﷺ أَنْ يَنْحَرَ إِبلاً بُيُوَانَةَ ، فَأَتَى رَسُولَ اللَّهِ ﷺ فَأَخْبَرَهُ ، فَقَالَ رَسُولُ الله ﷺ : هَلْ كَانَ فِيْهَا وَتَنْ مِنْ أَوْثَانِ الْجَاهِلِيَّةِ يُعْبَدُ؟ قَالُوا : لا ، قَالَ : هَلْ كَانَ فِيهَا عِيدٌ مِنْ أَعْيَادِهِمْ ؟ قَالُوا : لَا ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ : أَوْفَ بِنَدْرِكَ فَإِنَّهُ لَا وَفَاءَ لِنَذْرٍ فِي مَعْصِيَةِ اللَّهِ )) ) سنن أبي داؤد، كتاب الايمان والنذور ، حدیث رقم (۳۳۰۳)
अर्थ :- (( हजरत साबित बिन दहाक (रजि) का बयान है कि एक व्यक्ति ने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में यह नज़ मानी कि बवाना नामक् जगह में जाकर ऊँट ज़ब्ह करूँगा । फिर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आकर आप नज़ के विषय में खबर दिया। आप को अपनी इस ने वहाँ उपस्थित सहाबा से पूछा (( क्या जाहिलीयत् के थानों में से कोई थान वहाँ था ? सहाबा ने उत्तर दिया कि वहाँ कोई थान वगैरा नहीं था। आप ने फिर पूछा वहाँ कोई तिहवार या ईद तो नहीं मनाया जाता था ? बोले नहीं। आप ने उस नज़ मानने वाले व्यक्ति से फरमाया अब जा अपनी नज़ पूरी करले क्योंकि उस नज़ को पूरा करना मना है जिस में अल्लाह तआला की नाफरमानी होती हो ।)) (अबूदाऊद)
सजदा केवल अल्लाह के लिए जायज है
) عَنْ قَيْسِ بْنِ سَعْدٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ أَتَيْتُ الْحِيَرَةَ فَرَأَيْتُهُمْ يَسْجُدُونَ لِمَرْزُبَانِ لَهُمْ ، فَقُلْتُ : رَسُولُ اللَّهُ أَحَقُّ أَن يُسْجَدَ لَهُ فَأَتَيْتُ رَسُولَ اللهِ ﷺ فَقُلْتُ إِنِّي أَتَيْتُ الْحِيَرَةَ فَرَأَيْتُهُمْ يَسْجُدُونَ لِمَرْزُبَان لَهُمْ ، فَأَنْتَ أَحَقُّ أَنْ نَسْجُدَ لَكَ ، فَقَالَ أَرَأَيْتَ لَوْ مَوَرَتَ بِقَبْرِي أَكُنتَ تَسْجُدُ لَهُ ؟ قُلْتُ لَا ، قَالَ : فَلَا تَفْعَلُوا )) ( سنن أبي داؤد ، كتاب النكاح ، حديث رقم (٢١٤٠)
हजरत कैस बिन साद (रजि) का बयान है कि मैं हियरा नाम वाले शहर में गया तो मैं ने वहाँ के लोगों को अपने राजा को सजदा करते हुए देखा। मैं ने अपने दिल में कहा कि वास्तव में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हकदार हैं । अतः मैं ने आप सजदा किए जाने के ज़्यादा के पास आकर कहा ” मैं ने हियरा नामक शहर में देखा कि लोग अपने राजा को सजदा कर रहे हैं। इस लिए आप इस बात के ज़्यादा हक्दार हैं कि हम आप को सजदा करें।” यह सुनकर आप ने फरमाया ” भला बता तो सही यदि तू मेरी कबर पर गुज़रे तो क्या तू उस पर सजदा करेगा ? मैं ने कहा नहीं । आप ने फरमाया यह काम भी न करो। (अर्थात मेरे जीवन तथा मृत्यु के पश्चात कभी भी मुझे सजदा मत करना ) ( अबूदाऊद )
अर्थात एक न एक दिन मैं भी मर कर कबर में पहुँच जाऊँगा तो मैं सजदा के लायक नहीं हूँ। सजदा के लायक् तो वही पवित्र जात है जो चिरन्जीवी है। इस हदीस से यह मालूम हुआ कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी बड़े से बड़े मखलूक को भी सजदा करना जायज़ नहीं। चाहे वह ज़िन्दा हो या मुर्दा और न किसी कबर को जायज् है और न किसी थान या दरबार को। क्योंकि जिन्दा एक दिन मरने वाला है और जो मर गया वह कभी जिन्दा और इन्सान था। फिर मरने के बाद वह अल्लाह नहीं होगया बल्कि बन्दा ही है।
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का शुभ उपदेश अपने आदर एवं सम्मान के विषय में
((عَنْ عُمَرَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُوْلُ اللَّهِ ﷺ : لَا تُطْرُوني كَمَا أَطَرْت النَّصَارَى عِيسَى بْنَ مَرْيَمَ ، فَإِنَّمَا أَنَا عَبْدُهُ ، فَقُولُوا : عبد الله وَرَسُولُهُ )) ( بخاري ، كتاب الانبياء ، رقم الحديث ٣٤٤٥ ومسند أحمد ٢٣/١)
अर्थ (( हजरत उमर (रजि) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया ” मुझे मेरे पद से आगे मत बढ़ाना जैसा कि ईसाइयों ने हजरत ईसा अलैहिस्सलाम को उनके पद से आगे बढ़ा दिया। मैं केवल अल्लाह का बन्दा हूँ इस लिए तुम मुझे अल्लाह का बन्दा और उस का रसूल कहो । )) (बुखारी )
अर्थात अल्लाह तआला ने मुझे जिन खूबियों और कमालात से नवाज़ा है, वह सब बन्दा और रसूल कह देने में आ जाते हैं। क्योंकि बशर (मनुष्य) के लिए रिसालत ( ईशदूतत्तव) से बढ़ कर और क्या पद हो सकता है ? सारे पद इस पद से नीचे हैं। परन्तु मनुष्य रसूल बनकर भी मनुष्य ही रहता है। बन्दा होना ही उस के लिए गौरव का माध्यम एवं कारण है।
नबी बनकर मनुष्य में शाने उलूहीयत् ( ईश्वरीय महिमा एव गुण नहीं आ जाती और अल्लाह तआला की ज़ात में नहीं मिल जाता । मनुष्य को मानव ही के पद पर रखो। ईसाइयों की तरह न बनो कि उन्हों ने हजरत ईसा अलैहिस्सलाम को मनुष्य और रसूल के पद से निकाल कर उलूहियत् के पद पर पहुँचा दिया। जिस की वजह से ये लोग काफिर और मुशरिक बन गए और अल्लाह तआला का प्रकोप तथा अभिशाप उन पर अवतरित हुआ । इसी लिए नबीए अकरम ने अपनी उम्मत को खबरदार कर दिया कि ईसाइयों की सी चाल मत चलना और मेरी प्रशंसा में मुबालगा (अतियुक्ति) मत करना । परन्तु अफ्सोस है कि इस उम्मत के बेअदबों ने आप का कहना नहीं माना और ईसाइयों की सी चाल चलनी शुरु करदी ।
ईसाई हजरत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में कहते थे कि अल्लाह तआला उन के रुप में प्रकट हुआ था, वह एक तरह से मनुष्य हैं और एक तरह से अल्लाह हैं। कुछ मूर्ख लोगों ने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बारे में बिलकुल् ऐसा ही कहा है। एक व्यक्ति ने कहा कि ” पैग़म्बरों के रुप में हर ज़माने में अल्लाह ही आता जाता रहा, अन्तिम में वह अरब देश में नबी के रुप में आकर संसार का राजा बन गया । लाहौला वला कूवता इल्ला बिल्लाह । ऐसे शिर्क से भरे हुए वाक्य बोले जाते हैं जो आसमान तथा धरती में कहीं भी न समा सकें। अल्लाह पाक मुसलमानों को समझ दे । आमीन ! कुछ झूठों ने अपनी तरफ से हदीसें गढ़कर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तरफ मन्सूब कर दी। उन्हीं गढ़ी हुई हदीसों में से एक यह भी है कि आप ने फरमाया انا احمد بلاميم अहद् यानी अल्लाह हूँ (यह निः सन्देह गढ़ी हुई हदीस है।)। जैसे ईसाइयों का यह अकीदा है कि हजरत ईसा अलैहिस्सलाम को दोनों जहान का अधिकार प्राप्त है। यदि कोई उन को मान कर उन से प्रार्थना करता है तो उसे अल्लाह के उपासना की जरुरत नहीं है। गुनाह ऐसे व्यक्ति के ईमान में कोई प्रभाव नहीं डालता।
उस के लिए सभी हराम वस्तुएँ हलाल हो जाती हैं। वह अल्लाह तआला का साँड बन जाता है जो चाहे करे, हजरत ईसा अलैहिस्सलाम प्रलय के दिन उस की सिफारिश करके अल्लाह के अज़ाब से छुड़ा लेंगे । जाहिल और मूर्ख मुसलमान हू बहू यही अकीदा नबीए अकरम के बारे में रखते हैं । बल्कि इमामों और वलियों के विषय में भी इन का यही अकीदा है ।
अल्लाह तआला मुसलमानों को हिदायत दे । आमीन !
(( عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الشَّخَيْرِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: انْطَلَقْتُ فِي وَفْدِ بَنِي عَامِرٍ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ ﷺ فَقُلْنَا: أَنْتَ سَيِّدُنَا ، فَقَالَ: السَّيِّدُ اللَّهُ، قُلْنَا: وأَفْضَلْنَا فَضْلاً وَأَعْظَمُنَا طَوْلاً : فَقَالَ قُولُوا بِقَوْلِكُمْ أَوْ بَعْضٍ قَوْلِكُمْ ولَا يَسْتَجْرِينَكُمُ الشَّيْطَانُ )) (سنن أبي داؤد، كتاب الأدب ، رقم الحديث ٤٧٩٦ ، ومسند أحمد (٢٥/٤)
हजरत अब्दुल्लाह बिन् शिख़्ज़ीर (रजि) से रिवायत है कि बनु आमिर समुदाय की एक जमाअत् के साथ मैं भी रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की खिदमत में हाजिर हुआ। हम ने कहा आप हमारे सय्यद् हैं आप ने फरमाया सय्यद् अल्लाह है । फिर हम ने कहा आप हम में सब से अफ्ञ्जल् हैं और वड़े हैं और ज़्यादा सखी (दान करने वाले) हैं। आप ने फरमाया हाँ ये सारी बातें या इस प्रकार की कुछ बातें कह सकते हो और देखो कहीं शैतान तुम को सीमा से आगे न बढ़ा दे ।
अर्थात किसी बुजुर्ग की शान में ज़बान संभाल कर बात करनी चाहिए । ताकि कहीं शाने उलूहीयत् में बे अद्वी न हो जाए ।
सय्यद् शब्द के दो अर्थ होते हैं मालूम होना चाहिए कि सय्यद् शब्द के दो अर्थ हैं। (१) एक तो यह कि वह स्वयं मालिक एवं अधिकारी हो, किसी के अधीन में न हो, उस पर किसी का आदेश न चलता हो , अपनी इच्छा से जो चाहे करे तो एसी शान केवल अल्लाह की है इस अर्थ और माना में अल्लाह के अतिरिक्त कोई सय्यद् नहीं । (२) उस का दूसरा अर्थ यह है कि वह मनुष्य और प्रजा ही में से हो परन्तु अन्य प्रजा से वह अधिक 1 विशेषता रखता हो, इस प्रकार कि असल हाकिम का आदेश सर्वप्रथम उसी के पास आए और उस के ज़बानी अन्य लोगों तक पहुँचे, तो इस माना में प्रत्येक नबी अपनी उम्मत का सरदार है। और इसी अर्थ के अनुसार हमारे नबी सम्पूर्ण जगत के सय्यद् (सरदार) हैं क्योंकि अल्लाह के पास उनका पद सब से बड़ा है और अल्लाह के आदेशों पर सब से अधिक चलने वाले थे। और अल्लाह का धर्म सीखने में लोग आप ही के मुहूताज हैं, इस माना के अनुसार आपको सारे संसार का सय्यद् (सरदार) कहा जा सकता है, बल्कि कहना भी चाहिए। और पहले माना के लेहाज से एक चींटी का सरदार भी आप को न माना जाए, क्योकि आप एक चींटी के भी मालिक नहीं और न ही उसमें अधिकार जमानेकी क्षमता रखते थे।
चित्र और चित्रकारी के विषय में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का शुभ आदेश ।
(( عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا أَنَّهَا اشْتَرَتْ نَمْرَقَةً فِيهَا تَصَاوِيرُ ، فَلَمَّا رأَهَا رَسُولُ اللهِ ﷺ قَامَ عَلَى الْبَابِ فَلَمْ يَدْخُلْ ، فَعَرَفْتُ فِي وَجْهِهِ الْكَرَاهَةَ ، قَالَتْ : فَقُلْتُ : يَا رَسُولَ اللَّهِ أَتُوْبُ إِلَى اللَّهِ وَإِلَى رَسُولِهِ ، مَاذَا أَذْنَبْتُ ؟ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ ﷺ : مَا بَالُ هَذِهِ النَّمْرَقَةِ ؟ قَالَتْ : قُلْتُ اسْتَرَيْتُهَا لَكَ لِتَقْعُدَ عَلَيْهَا وَتَوَسَّدَهَا ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ : إِنَّ أَصْحَابَ هَذِهِ الصُّوَرِ يُعَذِّبُوْنَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ، وَيُقَالُ لَهُمْ: أَحْيَوَامَا خَلَقْتُمْ ، وَقَالَ : إِنَّ الْبَيْتَ الَّذِي فِيهِ الصُّوَرُ لَا تَدْخُلُهُ الْمَلَائِكَةُ )) (صحيح بخاري، كتاب البيوع ، حديث رقم (٢١٠٥)
अर्थ :- ((हजरत आइशा (रजि) का बयान है कि उन्हों ने एक कालीन खरीदा जिस में चित्र (तसवीरें) थे। जब उस को रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने देखा तो आप दरवाजे पर ही खड़े रहे अन्दर नहीं आए। हजरत आइशा (रजि) फरमाती हैं कि मैं ने आप के चेहरे पर अप्रसन्नता महसूस की। मैं ने कहा ऐ अल्लाह के रसूल ( मैं अल्लाह और उस के रसूल के सामने तौबा करती हूँ मुझ से कोनसा पाप होगया ? आप ने फरमाया यह कालीन किस लिए पड़ा है ? हजरत आइशा फरमाती हैं कि मैं ने कहा (( इसे मैं ने आप के लिए खरीदा है ताकि आप इस पर बैठें और आराम फरमाएँ। आप ने फरमाया (इन चित्रकारों पर क्यामत के दिन अज़ाब होगा और इन से कहा जाएगा कि अपनी बनाई हुई तस्वीरों को जिन्दा करो । आप ने फरमाया ( जिस घर में तसवीरें होती हैं उस में फरिशते नहीं आते )) (बुखारी )
अर्थात मुशरिक लोग मूर्तियों की पूजा करते हैं इस लिए फरिशतों और नबियों को तस्वीरों से घिन् आती है। इसी कारण फरिश्ते ऐसे घर में नहीं प्रवेश करते जिस में चित्र हो । चित्र बनाने वालों पर अज़ाब होगा क्योंकि ये लोग मूर्ति पूजा का कारण बनते हैं और उस के लिए सामग्री एकत्रित करते हैं। मालूम हुआ कि चित्र चाहे पैग़म्बर की हो या इमाम की या वली की हो या कुतुब् की या पीर की हो या मुरीद की अतः समस्त प्राणीयों में से किसी की भी
अपने बारे में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन’
(( عَنْ أَنَسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللهِ ﷺ إِنِّي لَا أُرِيدُأَنْ تَرْفَعُونِي فَوْقَ مَنْزِلَتِيَ الَّتِي أَنْزَلَنِيهَا اللَّهُ تَعَالَي ، أَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ الله عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ )) ( رواه رزين
हजरत अनस् (रजि) से रिवायत् है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया (( मैं नहीं चाहता कि तुम लोग मुझे मेरे इस पद से आगे बढ़ाओ जिस पद पर कि अल्लाह ने मुझे रखा है। मैं मुहम्मद हूँ, अब्दुल्लाह का बेटा हूँ, अल्लाह का बन्दा हूँ और उस का रसूल हूँ।))
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी उम्मत पर बड़े मेहरबान थे। आप को रात दिन यही चिन्ता लगी रहती थी कि मेरी उम्मत का दीन संवर जाए। जब आप को मालूम हुआ कि मेरे उम्मती मुझ से बड़ी मुहब्बत करते हैं और मेरे बहुत इसान मन्द हैं और यह भी मालूम था कि प्रेमी प्रियतम को प्रसन्न करने के लिए आसमान व ज़मीन के कुलाबे मिलाया करता है और मुबालगा करते हुए प्रशंसा में सीमा से आगे बढ़ जाता है। तो ऐसा न हो कि ये मेरी प्रशंसा में सीमा से आगे बढ़ जाएँ, जिस से अल्लाह तआला की शान में बे अद्बी हो जाए और इस के कारण उन का ईमान और धर्म नष्ट हो जाए और मेरी अप्रसन्नता भी वाजिब हो जाए । इस लिए आप ने फरमाया कि मुझे मुबालगा (अतियुक्ति) पसन्द नहीं । मेरा नाम मुहम्मद है, मैं खालिक या सजिक नहीं। मैं आम लोगों की तरह अपने बाप ही से पैदा हुआ हूँ। और मेरा आदर एवं सम्मान बन्दा होने में है। परन्तु अन्य लोगों से मैं इस बात में अलग हूँ कि मेरे पास अल्लाह की तरफ से वहय आती है, और मैं अल्लाह के आदेशों को जानता हूँ। लोग नहीं जानते । अतः लोगों को मुझ से अपना दीन सीखना चाहिए ।
ए अल्लाह हमारे नबीए अकरम् पर अपनी दया एवं कृपा की वर्षा कर । ऐ अल्लाह हम तेरे विनीत और बे बस् बन्दे हैं हमारे अधिकार में कुछ नहीं है। जिस प्रकार तूने हमें अपनी दया, कृपा से शिर्क एवं तौहीद का अर्थ अच्छी तरह समझाया लाइलाहा इल्लल्लाह के तकाज़ों से ख़बरदार किया, और मुश्किों से निकाल कर मोवहूहिद बनाया, इसी प्रकार अपनी दया तथा अनुकम्पा से हमें तौहीद पर साबित कदमी प्रदान कर। बिदअतियों तथा पथ भ्रष्टों के समूह से निकाल कर कुरआन तथा हदीस का अनुसरण करने वाला बना । आमीन !
समाप्त
स्रोत- मौलाना शाह इस्माईल शहीद देहलवी रहिमहुल्लाह की किताब तक़वियतुल ईमान

