इस्लामी अक़ीदा- सवाल जवाब

Question

इस्लामी अक़ीदा- सवाल जवाब

: الحمد لله والصلاة والسلام على رسول الله، وبعد

बन्दों पर अल्लाह का हक़ :
सवाल (१) अल्लाह ने हमें किस लिए पैदा फरमाया है ?
जवाब : अल्लाह तआला ने हमें इस लिए पैदा किया है ताकि हम उस की इबादत करें और उस के साथ किसी को शरीक न ठहराएँ ।
दलील : अल्लाह का फरमान है :-
وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ ﴾ (الذاريات (٥٦)
मैं ने इन्सानों और जिन्नातों को केवल अपनी इबादत के लिए पैदा किया है। (सूरह अज़्ज़ारियात ५६)
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है :
((حَقُّ اللَّهِ عَلَى الْعِبَادِ أَنْ يَعْبُدُوهُ وَلَا يُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا.)) (متفق عليه)
बन्दों पर अल्लाह तआला का हक यह है कि वे केवल उसी की इबादत करें और उस के साथ किसी को शरीक न ठहराएँ । [बुखारी और मुस्लिम ]

सवाल (२) इबादत का अर्थ क्या है ?
जवाब : इबादत उन तमाम कामों और बातों को कहते हैं जिन को अल्लाह पसन्द फरमाता है। जैसे दुआ, नमाज़, कुरबानी वगैरा ।
दलील : अल्लाह का शुभ फरमान है :-
قُلْ إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ ) ( الانعام (١٦٢)
हे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ! कह दो बेशक मेरी नमाज़, मेरी कुरबानी, मेरा जीना और मरना सब अल्लाह रब्बुल् आलमीन के लिए है।
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :-
قَالَ الله تعالى (( وَمَا تَقَرَّبَ إِلَيَّ عَبْدِي بِشَيْءٍ أَحَبُّ إِلَيَّ مِمَّا افْتَرَضَتُهُ عَلَيْهِ . )) ( البخاري )
अल्लाह तआला का फरमान है किं (मेरा बन्दा जिन जिन चीज़ों के ज़रिये मेरी कुरबत हासिल करता है उन में जो चीजें मैंने उन के ऊपर फ़र्ज़ की हैं उन से बढ़कर मेरे नज़दीक कोई चीज़ महबूब नहीं है ।)) [ बुखारी़ ]

सवाल (३) हम अल्लाह तआला की इबादत किस तरह करें ?
जवाब : हम अल्लाह तआला की इबादत उसी तरह से करें जिस तरह अल्लाह और उस के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हुकम दिया है।
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद है:-
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَلَا تُبْطِلُوا أَعْمَالَكُمْ) ( محمد / ۳۳)
ऐ ईमान वालो तुम अल्लाह की इताअत् करो और रसूल की इताअत् करो (और इन दोनों की मुखालफत् करके ) अपने आमाल बरबाद न करो। (सूरह मुहम्मद ३३ )
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
((مَنْ عَمِلَ عَمَلاً لَيْسَ عَلَيْهِ أَمْرُنَا فَهُوَ رَدُّ )) ( مسلم)
जिस किसी ने कोई ऐसा काम किया जिसे करने का हमने आदेश नहीं दिया या उस काम को हम ने खुद नहीं किया तो वह मरदूद है। [ मुस्लिम ]

सवाल (४) क्या हम अल्लाह की इबादत डर और लालच से करते हैं ?
जवाब :- हाँ ! हम अल्लाह की इबादत खौफ (डर) और लालच से करते हैं।
दलील :- मोमिनों के गुण और विशेषताएँ ( सिफात ) बयान करते हुये अल्लाह तआला ने फरमाया :
يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفًا وَطَمَعًا ) ( السجدة (١٦) –
वह अपने रब की इबादत खौफ और लालच् के साथ करते हैं।
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
( أَسْأَلُ اللهُ الْجَنَّةَ وَأَعُوْذُ بِهِ مِنَ النَّارِ ) (أبوداؤد)
मैं अल्लाह से जन्नत माँगता हूँ और जहन्नम से उस की पनाह चाहता हूँ। [अबूदाऊद ]

सवाल (५) इबादत में इह्सान का क्या मतलब है ?
जवाब : इबादत में अल्लाह की निगरानी के मुकम्मल् यकीन को एहसान कहते हैं।
दलील :- अल्लाह तआला का फरमान है :
الَّذِي بَرَاكَ حِينَ تَقُومُ (۲۱۸) وَتَقَلْبَكَ فِي الساجدين (۲۱۹)) (الشمران، ۰۲۱۸ ۱۱۹)
अल्लाह वह है जो तुझ को नमाज़ में अकेले खड़े होते समय और नमाजियो के साथ जमाअत में तेरे उठने बैठने हर एक हरकत को देख रहा है। (सूरा अश्शोरा २१८-२१९ )
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
الْإِحْسَانُ أَنْ تَعْبُدَ اللهَ كَأَنَّكَ تَرَاهُ فَإِنْ لَمْ تَكُنْ تَرَاهُ فَإِنَّهُ يَرَاكَ ) (مسلم)
एहसान यह है कि तुम अल्लाह तआला की इबादत इस तरह करो गोया कि तुम उसे देख रहे हो और अगर तुम उसे नहीं देखते हो तो इस बात का मुकम्मल यकीन रखो कि वह तुम्हें देखता है। [मुस्लिम ]

तौहीद की किस्में और उस के लाभ

सवाल (६) अल्लाह तआला ने रसूलों को किस लिए भेजा । ?
जवाब : अल्लाह तआला ने रसूलों को अपनी इबादत की ओर आमंत्रित करने और शिर्क से घृणा करने और उस का इनकार करने के लिए भेजा ।
दलील :- अल्लाह तआला का फरमान है :
وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَسُولًا أَنِ اعْبُدُو الله وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوْنَ ) ( النحل / ٣٦)
और अवश्य हम ने हर कौम में एक रसूल भेजा ताकि अल्लाह की इबादत करो और शैतान की इबादत से बचो । [ सूरह अनहल /३६ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( وَالْأَنْبِيَاءُ إِخْوَةٌ وَدِينَهُمْ وَاحِدٌ )) ( متفق عليه )
तमाम अम्बिया आपस में भाई हैं और उन का दीन एक है।

सवाल (७) तौहीदे रुबूबीयत् का मतलब क्या है ?
जवाब : – अल्लाह तआला को उस के कामों में एक जानना और मानना । जैसे पैदा करना, तदबीर करना वगैरा ।
दलील :
अल्लाह तआला का फरमान है:
الْحَمْدُ للهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ (۲)) ( الفاتحة )
तमाम तारीफ और शुक्र उस अल्लाह के लिए है जो सारे संसार का पालनहार है। सूरा फातिहा )
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम् का फरमान है :
(( أَنْتَ رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ )) ( متفق عليه )
तू ही तमाम आसमानों और ज़मीन का रब है। [बुखारी, मुस्लिम ]

सवाल (८) तौहीदे उलूहीयत का क्या मतलब है ?
जवाब : तमाम इबादतों को अल्लाह तआला के लिए खास कर देना तौहीदे उलूहीयत् है। जैसे दुआ, कुरबानी, नज़ व नियाज़ वगैरा ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَإِلَهُكُمْ إِلَهُ وَاحِدٌ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الرَّحْمَانُ الرَّحِيمُ﴾ (البقرة ١٦٣)
और तुम्हारा माबूद एक ही माबूद है उस के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं। वह रहमान और रहीम है। [ सूरह अल-बकरह /१६३]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
فَلْيَكُنْ أَوَّلَ مَا تَدْعُوهُمْ إِلَيْهِ شَهَادَةً أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا الله )) (متفق عليه)
सब से पहले तुम इस बात की तरफ लोगों को बुलाओ कि अल्लाह के सिवा कोई भी इबादत के लायक नहीं । [ बुखारी, मुस्लिम]
और बुखारी की रिवायत में है :
إِلَى أَن يُوَحُدُوا اللَّهُ
यानी सब से पहले इसी तौहीद की तरफ उन्हें दावत देते रहो यहाँ तक्र कि वे इस को कबूल कर लें ।

सवाल (९) तौहीद अस्मा व सिफात का अर्थ क्या है ?
जवाब : अल्लाह तआला ने अपनी किताब कुरआन मजीद में जो अपनी सिफात बयान की हैं और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहीह हदीसों में जो सिफात अल्लाह तआला के बयान किए हैं उस को हकीकत पर महमूल (आधारित) करते हुए साबित मानना । उस की तावील न करना और न ही इस सिलसिला में तहरीफ़ व तम्सील और ततील का तरीका इख़्तियार करना । जैसे : इस्तिवा, नुजूल और यद् वगैरा जो अल्लाह के कमाल के लायक हैं।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ وَهُوَ السَّمِيعُ البَصِيرُ) ( الشوري (١١)
अल्लाह के मिस्ल कोई चीज़ नहीं और वह सुनने वाला और देखने वाला है। [ सूरह शूरा /११ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( يَنْزِلُ اللَّهُ فِي كُلِّ لَيْلَةٍ إِلَى سَمَاءِ الدُّنْيَا )) ( مسلم)
अल्लाह तआला हर रात पहले आसमान पर नुजूल फरमाता है। अर्थात पहले आसमान पर उतरता है।  [ मुस्लिम ]

उस तरह उतरता है जो अल्लाह तआला के शायाने शान है उस की मखलूकात में से किसी मखलूक की तरह नहीं ।

सवाल (१०) अल्लाह तआला कहाँ हैं ?
जवाब : अल्लाह तआला आसमान पर अर्श के ऊपर हैं।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है।
الرَّحْمَانُ عَلَى الْعَرْشِ اسْتَوَى) (طه / ٥)
रहमान अर्श पर मुस्तवी (विराजमान) हुआ। [ सूरा ताहा  /५ ]

मुस्तवी होने का अर्थ है बुलन्द होना, ऊँचा होना, जैसा कि बुखारी शरीफ में है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
إِنَّ اللَّهَ كَتَبَ كِتاباً. فَهُوَ عِنْدَهُ فَوْقَ الْعَرْشِ )) (متفق عليه)
बेशक् अल्लाह ने एक किताब लिखी जो उस के पास अर्श के ऊपर है। [ बुखारी तथा मुस्लिम ]

सवाल (११) क्या अल्लाह तआला हमारे साथ है ?
जवाब : अल्लाह तआला सुनने, देखने और इल्म के ऐतबार से हमारे साथ है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
قَالَ لَا تَخَافًا إِنَّنِي مَعَكُمَا أَسْمَعُ وَأَرَى) (طه /٤٦)
अल्लाह तआला ने फरमाया ऐ मूसा और हारून (( तुम दोनों न डरो बेशक मैं तुम्हारे साथ हूँ, सुनता और देखता हूँ।)) (ताहा / ४६)
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( إِنَّكُمْ تَدْعُونَ سَمِيعاً قَرِيبًا وَهُوَ مَعَكُمْ )) ( مسلم )
बेशक तुम सुनने वाले, बहुत ही करीब रहने वाले को पुकारते हो और वह तुम्हारे साथ है। (यानी इल्म, ज्ञान और सुनने, देखने के एतबार से अल्लाह तुम्हारे साथ है) [ मुस्लिम ]

सवाल (१२) तौहीद का फाइदा क्या है ?
जवाब : तौहीद का फाइदा है। आखिरत में अज़ाबे इलाही से अमन व अमान, दुनिया में हिदायत (मार्गदर्शन), शान्ति और गुनाहों से बख़्शिश् ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
الَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُمْ بِظُلْمٍ أُولَئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ وَهُمْ مُهْتَدُونَ) (الانعام / ۸۲)
जो लोग ईमान लाए और उन्हों ने अपने ईमान के साथ शिर्क को नहीं मिलाया ऐसे ही लोगों के लिए अम्न व सुकून है और यही लोग हिदायत याफता हैं। [ सूरह अल्अन्आम / ८२ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इरशाद है :
حَقُّ الْعِبَادِ عَلَى الله أَن لا يُعَذِّبَ مَنْ لا يُشْرِكْ بِه شَيْئًا )) (متفق عليه)
अल्लाह पर बन्दों का हक यह है कि वह उस को अज़ाब न दे जो उस के साथ किसी को शरीक न करता हो। [ बुखारी तथा मुस्लिम ]

अमल की कबूलियत् की शर्तें

सवाल (१३) अमल के कबूल होने की क्या शर्तें हैं ?
जवाब : अल्लाह के यहाँ अमल के कबूल होने की तीन शर्तें हैं।
– अल्लाह पर ईमान लाना और तौहीद पर मरते दम तक कायम रहना ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है।
إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ كَانَتْ لَهُمْ جَنَّاتُ الْفِرْدَوْسِ نُزُلًا) (الكهف (۱۰۷)
बेशक् जो लोग ईमान लाए और नेक अमल किये उन की मेहमानी के लिए फिरदौस (जन्नत) के बागैचे हैं ॥  [ सूरा अल-क़हफ /१०७ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
( قُلْ آمَنْتُ بِاللَّهِ ثُمَّ اسْتَقِمْ )) (مسلم)
कहो ! कि मैं अल्लाह तआला पर ईमान लाया फिर उस पर कायम हो । [ मुस्लिम ]

इखुलास : यानी अमल खालिस अल्लाह के लिए हो उस में किसी तरह की रिया व नमूद और दिखावा न हो ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
فاعبد الله مخلصًا لَهُ الدِّينَ) (الزمر (۲)
दीन को खालिस् करते हुये अल्लाह की इबादत् करो । [ जुमर/२ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
(( إِنَّمَا الْأَعْمَالُ بِالنَّيَّاتِ )) (متفق عليه)
बेशक अमल का दारवमदार नीयत पर है। [ बुखारी तथा मुस्लिम ]

अमल रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई शरीअत के मुताबिक और मुवाफ़िक हो ।
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद है :
وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانْتَهُوا ) ( الحشر (٧)
जो कुछ रसूल तुम्हें दें उसे ले लो और जिस से रोक दें उस से रुक् जाओ । [ सूरह अल-हश्र / ७ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है:
(( مَنْ عَمِلَ عَمَلاً لَيْسَ عَلَيْهِ أَمْرُنَا فَهُوَ رَدُّ )) ( مسلم )
जिस किसी ने कोई ऐसा अमल किया जिस को हम ने नहीं किया और न ही उस के करने का हुकम दिया, तो वह काम या अमल मरदूद है। [ मुस्लिम ]

शिर्के अकबर का बयान

सवाल (१) अल्लाह के नजदीक सब से बड़ा गुनाह कौन सा है?
जवाब : सब से बड़ा गुनाह अल्लाह के साथ शिर्क करना है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
يَا بُنَيَّ لَا تُشْرِكْ بِاللَّهِ إِنَّ الشَّرْكَ لَظُلْمٌ عَظِيمٌ) (لقمان (۱۳)
हजरत लुक्‌मान अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे को नसीहत करते हुए फरमाया था । (ऐ मेरे बेटे ! अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करना, बेशक शिर्क बहुत बड़ा जुल्म ( गुनाह तथा अत्याचार ) है।)) [ सूरह लुक़मान /१३ ]
और जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सवाल किया गया
(( أَيُّ الذِّنْبِ أَعْظَمُ ؟ قَالَ : أَنْ تَجْعَلَ الله مَدًا وَهُوَ خَلَقَكَ )) (متفق عليه )
कौनसा गुनाह सब से बड़ा है ? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम् ने फरमाया:
यह कि तुम अल्लाह के साथ शरीक ठेहराओ हालाँकि उस ने तुम को पैदा किया है। [ बुख़ारी व मुस्लिम ]

सवाल (२) शिर्के अकबर क्या है ?
जवाब : अल्लाह के सिवा किसी दूसरे की इबादत को शिर्के अकबर कहते हैं । जैसे अल्लाह के सिवा किसी अन्य से दुआ करना, मुर्दों या गायब ज़िन्दों से इस्तिगासा व फरयाद करना ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَاعْبُدُوا اللَّهَ وَلَا تُشْرِكُوا بِه شَيْئًا) (النساء (٣٦)
अल्लाह ही की इवादत करो और उस के साथ किसी को शरीक न ठहराओ । [ सूरह अन्-निसा / ३६ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
( مِنْ أَكْبَرِ الْكَبَائِرِ الشَّرْكُ بِاللَّهِ ))
सब से बड़ा गुनाह अल्लाह के साथ शिर्क करना है।

सवाल (३) क्या इस उम्मत ( मुस्लिम समुदाय) में भी शिर्क मौजूद है ?
जवाब : हाँ मौजूद है।
दलील : अल्लाह का फरमान है :
وَمَا يُؤْمِنُ أَكْثَرُهُمْ بِاللَّهِ إِلَّا وَهُمْ مُشْرِكُونَ) (يوسف / ١٠٦)
अक्सर लोग ऐसे हैं जो अल्लाह पर ईमान रखने का दावा भी करते हैं और इस के बावजूद वे शिर्क में ग्रस्त होते हैं। [ सूरह यूसुफ / १०६]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( لَا تَقُوْمُ السَّاعَةُ حَتَّى تَلْحَقَ قَبَائِلُ مِنْ أُمَّتِي بِالْمُشْرِكِينَ وَحَتَّى تُعْبَدَ الْأَوْثَانُ )) ( صحيح رواه الترمذى )
क़यामत नहीं कायम होगी यहाँ तक कि मेरी उम्मत ( अर्थात मुस्लिम समुदाय) के बहुत सारे कबीले मुशरिकों से जा मिलेंगे और बुतों की इबादत करने लगेंगे। [ सहीह तिर्मिज़ी ]

सवाल (४) मुर्दों और गायब् ज़िन्दों को पुकारना कैसा है ?
जवाब : मुर्दों और गायब् जिन्दों को पुकारना शिर्के अकबर है।
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद है :
وَلَا تَدْعُ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنْفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَ فَإِنْ فَعَلْتَ فَإِنَّكَ إِذَا مِنْ الظالمين) ( يونس /١٠٦)
अल्लाह के सिवा किसी दूसरे को मत् पुकारो जो न तो तुम्हें नफा पहुँचा सकते हैं और न नुकसान। अगर तुम ने ऐसा किया तो बेशक तुम ज़ालिमों (मुशरिकों) में से हो जाओगे ।
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
(( مَنْ مَاتَ وَهُوَ يَدْعُوا مِنْ دُوْنِ الله ندا دَخَلَ النَّارَ )) ( رواه البخاري )
जो आदमी इस हालत में मर गया कि वह अल्लाह को छोड़ कर किसी शरीक को पुकारता था तो ऐसा आदमी जहन्नम में दाखिल् होगा । [ बुखारी ]

सवाल (५) क्या दुआ इबादत है ?
जवाब : हाँ दुआ इबादत है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ) ( غافر / ٦٠)
और तुम्हारे रब ने कहा ! केवल मुझ को पुकारो मैं तुम्हारी पुकार को कबूल करूँगा । बेशक जो लोग मेरी इबादत से मुँह मोड़ते हैं और मेरी इबादत से भागते हैं अन्क़रीब ऐसे लोग जलील व रुस्वा होकर जहन्नम में दाखिल होंगे। [ गाफिर/६० ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( الدُّعَاءُ هُوَ الْعِبَادَةُ )) ( أحمد – وقال الترمذى حسن صحيح )
दुआ ही इबादत है। [ मुसनद अहमद् , तिर्मिज़ी ]

सवाल (६) क्या मुर्दे दुआ को सुनते हैं ?
जवाब : नहीं सुनते हैं।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَى) (النمل / ۸۰)
बेशक आप मुर्दों को नहीं सुना सकते हैं। [ सूरह नमल / ८० ]
وَمَا أَنتَ بِمُسْمِعٍ مَنْ فِي الْقُبُورِ ) (فاطر (۲۲)
आप क़ब्र वालों को नहीं सुना सकते हैं। [ सूरह फातिर  22]

शिर्के अकबर की किस्में

सवाल (७) क्या हम मुर्दों और गायब ज़िन्दों से इस्तिगासा व फरियाद कर सकते हैं। ?
जवाब : हम उन से इस्तिगासा व फरियाद नहीं कर सकते हैं।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
6 وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللهِ لَا يَخْلُقُونَ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ (۲۰) أَمْوَاتٌ غَيْرُ (النحل/ ٢٠-٢١) أَحْيَاء وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ (۲۱)).
और ये मुश़रिक अल्लाह के सिवा जिन जिन को पुकारते हैं वे कुछ नहीं पैदा कर सकते, बल्कि वे तो खुद पैदा किए गए हैं। और उन को तो यह भी मालूम नहीं है कि वे कब उठाये जायेंगे । [ सूरा अन्नहल / २०- २१ ]
और अल्लाह तआला एक दूसरी आयत में फरमाते हैं :
إِذْ تَسْتَغِيثُونَ رَبَّكُمْ فَاسْتَجَابَ لَكُمْ ( الانفال (۹)
जब तुम अपने रब से फरयाद कर रहे थे (बदर की लड़ाई के मौका पर ) तो अल्लाह ने तुम्हारी फरयाद सुन ली और तुम्हारी फरयाद रसी की । [सूरह अल्अन्‌फाल / ९ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम् का इरशाद है :
( حسن رواه الترمذي ) (( يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ بِرَحْمَتِكَ اَسْتَغِيْتُ )) ) .
ऐ हमेशा ज़िन्दा रहेने वाले ( चिरञ्जीवी) सब को संभालने वाले अल्लाह मैं तेरी रहमत् के वास्ते से इस्तिगासा व फरियाद करता हूँ।  [ तिर्मिज़ी ]

सवाल (८) क्या अल्लाह के सिवा किसी दूसरे से मदद् तलब् करना जायज् है । ?
जवाब : अल्लाह के सिवा किसी और से मदद तलब करना जायज नहीं है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ ( الفاتحه )
हम केवल तेरी ही इबादत करते हैं और तुझ ही से मदद् माँगते हैं । [ सूरह अल्-फातिहा ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
إِذْ سَأَلْتَ فَسْئَلِ اللَّهُ وَإِذَا اسْتَعَنْتَ فَاسْتَعِنْ بِالله )) ( حسن صحیح رویه هر سنی )
जब तुम माँगो तो अल्लाह ही से माँगो और जब मदद तलब करो तो अल्लाह ही से मदद तलब करो । [ तिर्मिज़ी ]

सवाल (९) क्या हम जिन्दों से मदद तलब कर सकते हैं ?
जवाब : हाँ जिन कामों के करने की उन को कुदरत और ताक़त न हो उन कामों में हम उन से मदद तलब कर सकते है ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبَرِّ وَالتَّقْوَى) ( المائده / ٢)
नेकी और तक़्वा के कामों में एक दूसरे की मदद् करो । [ सूरह अल्-मायदा / २ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( وَاللَّهُ فِي عَوْنِ الْعَبْدِ مَا كَانَ الْعَبْدُ فِي عَوْنِ أَخِيهِ )) ( مسلم )
अल्लाह अपने बन्दे की मदद में रहता है जब तक बन्दा अपने भाई की मदद् में होता है। [ मुस्लिम ]

सवाल (१०) क्या अल्लाह के सिवा किसी और के लिए नज़र मानना जायज है । ?
जवाब : नज़र व नियाज़ सिर्फ अल्लाह के लिए जायज् है और किसी के लिए नहीं ।
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद है :
رَبِّ إِنِّي نَذَرْتُ لَكَ مَا فِي بَطْنِي مُحرَّرًا) (آل عمران (٣٥)
ऐ मेरे ! रब् जो बच्चा कि मेरे पेट में है मैं उस को तेरी नज़र करती हूँ वह संसारिक कामों से आज़ाद रहेगा । [ सूरा आल-ए-इमरान् ३५ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है :
(( مَنْ نَذَرَ أَنْ يُطِيعَ اللهُ فَلْيُطِعْهُ وَمَنْ نَذَرَ أَنْ يَعْصِيَهُ فَلَا يَعْصِيْهِ )) (لمرى )
जिस ने यह नज़र मानी कि वह अल्लाह की इताअत् करेगा तो चाहिए कि वह अल्लाह की इताअत् करे और जिस ने यह नज़र मानी कि वह अल्लाह की नाफरमानी करेगा तो वह उस की नाफरमानी न करे । [ बुखारी ]

सवाल (११) क्या गैरुल्लाह के लिए जानवर ज़बह करना जायज है। ?
जवाब : गैरुल्लाह के लिए जानवर ज़बह करना जायज नहीं ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ ) ( الكوثر (٢)
अपने रब के लिए नमाज़ पढ़िए और उसी के लिए जानवर ज़बह कीजिए । [  सूरा अल्-क़ौसर / २ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है :
(( لَعَنَ اللَّهُ مَنْ ذَبَحَ لِغَيْرِ اللَّهِ )) ( مسلم )

अल्लाह की लानत ( अभिशाप) हो उस आदमी पर जो अल्लाह के सिवा किसी दूसरे के लिए जानवर ज़बह करे ।। [ मुस्लिम ]

सवाल (१२) क्या हम तक़र्रूब हासिल करने के लिए क़ब्रों का तवाफ कर सकते हैं। ?
जवाब : खाना काबा के सिवा किसी भी जगह का तवाफ नहीं कर सकते ।
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद है :
وَلْيَطَّوَّفُوا بِالْبَيْتِ الْعَتِيقِ) ( الحج / ٢٩)
और चाहिए कि लोग पुराने घर बैतुल्लाह का तवाफ करें ।
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
(صبح في ماله ) (( مَنْ طَافَ بِالْبَيْتِ سَبْعاً وَصَلَّى رَكْعَتَيْنِ كَانَ كَعِتْقِ رَقَبَةٍ ))
जिस ने बैतुल्लाह का सात चक्कर तवाफ किया और फिर दो रकात नमाज़ पढ़ी तो गोया उस ने एक गुलाम आज़ाद किया ।

सवाल (१३) जादू के बारे में क्या हुकम है ?
जवाब : जादू कुफ्र है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَلَكِنَّ الشَّيَاطِينَ كَفَرُوا يُعَلِّمُونَ النَّاسَ السِّحْرَ ) ( البقرة /١٠٢)
लेकिन शैतानों ने कुफ़्र किया क्योंकि वे लोगों को जादू सिखाते थे ।  [ सूरह अल्-बक़रह / १०२ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( اجتنبوا السَّبْعَ الْمُوْبِقَاتِ : أَلشَّرْكُ بِاللهِ ، وَالسِّحْرُ ……)) (مسلم)
सात हेलाक करने वाली चीज़ों से बचो अल्लाह के साथ शिर्क करना और जादू से ( मुस्लिम )

सवाल (१४) क्या हम अर्राफ (भविष्यवक्ता) काहिन् और नजूमी की तस्दीक ( पुष्टि) इल्मे गैब (परोक्ष विद्या ) के बारे में कर सकते हैं ?
जवाब : इल्मे गैब के सिलसिले में हम उन की तस्दीक नहीं कर सकते हैं ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
قُلْ لَا يَعْلَمُ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ الْغَيْبَ إِلَّا اللَّهُ) (النمل (٦٥)
हे नबी ! आप कह दीजिए कि ज़मीन व आसमान में अल्लाह तआला के सिवा कोई भी गैब नहीं जानता । [ सूरह नमल / ६५ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम् का फरमान है :
(( مَنْ أَتَى عَرَّافاً أَوْ كَاهِنَا فَصَدَّقَهُ بِمَا يَقُوْلُ فَقَدْ كَفَرَ بِمَا أُنْزِلَ عَلَى مُحَمَّدٍ )) ( صحيح رواه أحمد )
जो आदमी अरीफ या काहिन के पास आया और उस की कही हुई बातों की तस्दीक की तो उस ने मुहम्मद पर नाज़िल की हुई शरीअत् के साथ कुफ्र किया । ‘
‘ यह तो तस्दीक करने वाले के बारे में है और अगर तस्दीक नहीं की केवल उस के पास जाकर सवाल किया है तो ऐसे आदमी के विषय में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह फरमान है :
(( مَنْ أَتَى عَرَّافًا فَسَأَلَهُ عَنْ شَيْءٍ لَمْ تُقْبَلْ لَهُ صَلاةُ أَرْبَعِينَ لَيْلَةً )) (مسلم )
जो आदमी अर्राफ के पास आया और उस से किसी चीज़ के बारे में सवाल किया तो उस की चालीस दिन की नमाज़ कबूल न की जायेगी । [ मुस्लिम ]

सवाल (१५) क्या किसी को गैब मालूम है ?
जवाब : अल्लाह के सिवा किसी को भी गैब मालूम नहीं । हाँ मगर रसूलों में से जिस को अल्लाह रब्बुल् आलमीन चाहता है उसे गैब की कुछ बातें बता देता है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
عَالِمُ الْغَيْبِ فَلَا يُظْهِرُ عَلَى غَيْبِهِ أَحَدًا (٢٦) إِلَّا مَنْ ارْتَضَى مِنْ رَسُولٍ)

अल्लाह तआला आलिमुल् गैब है। वह किसी को गैब की चीज़ो पर मुत्तल (अवगत्) नहीं करता है। मगर रसूलों में से जिस को चाहे।  [ सूरह अल्-जिन्न / २६ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( لَا يَعْلَمُ الْغَيْبَ إِلَّا الله )) ( حسن رواه الطبراني )
अल्लाह के सिवा गैब कोई नहीं जानता । [ तबरानी ]
गैब और इल्मे गैब दोनों में बहुत अन्तर है। कुछ लोग कहते हैं कि अम्बिया को इल्म गैब अताई हासिल होता है। यह अकीदा बिलकुल गलत है। क्योकि यहाँ पर अल्लाह तआला ने गैब की कुछ बातें बतलाने के बारे में कहा है न कि इल्मे गैब के बारे में।

सवाल (१६) क्या हम शिफा (स्वस्थ्य) हासिल करने के लिए धागा और छल्ला पहन सकते हैं ?
जवाब : नहीं पहन सकते ।.
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद है :
وَإِنْ يَمْسَسْكَ اللَّهُ بِضُرٍّ فَلَا كَاشِفَ لَهُ إِلَّا هُوَ ( الانعام (۱۷)
और अगर अल्लाह तुम्हें कोई तकलीफ पहुँचाये तो उस के सिवा उस को कोई दूर करने वाला नहीं है। [ अल्-अन्आम/१७ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
( صحيح ، رواه الحاكم وصححه ووافقه الذهبي ) (( أَمَا إِنَّهَا لَا تَزِيْدُكَ إِلَّا وَهْنَا الْبِذْهَا عَنْكَ فَإِنَّكَ لَوْمِتْ مَا أَفْلَحْتَ أَبَداً ))
यह तो सिर्फ तुम को कमज़ोर ही करेगा, इस को निकाल फेंको, अगर तुम इसी हालत में मर गये तो कभी भी कामियाब न होगे । [ मुस्तदरक् हाकिम ]

सवाल (१७) क्या हम मन्का, कौड़ी, सीपी और घोंघा वगैरा इस तरह की चीजें नज़्र ए बद् से बचने के लिए लटका सकते हैं ?
जवाब : हम नज़्र ए बद् से बचने के लिए या शिफा (स्वस्थ्य) हासिल करने के लिए इन चीज़ों को नहीं लटका सकते हैं ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है।
وَإِنْ يَمْسَسْكَ اللَّهُ بِضُرٍّ فَلَا كَاشِفَ لَهُ إِلَّا هُوَ (الانعام /۱۷)
और अगर अल्लाह तुम्हें कोई तक्लीफ पहुँचाये तो उस के सिवा कोई उस को दूर नहीं कर सकता। [ अल्अन्आम/१७ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है :
(( مَنْ عَلْقَ تَمِيمَةٌ فَقَدْ أَشْرَكَ )) ( صحيح رواه أحمد )
जिस ने तावीज़ लटकाई उस ने शिर्क किया । [ मुसनद अहमद ]

सवाल (१८) इस्लाम के मुखालिफ (विरुद्ध – विपरीत) कानून (नियम) पर अमल करने का क्या हुक्म है ?
जवाब : जायज् या दुरुस्त समझकर उन नियमों पर अमल करना कुफ्र है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنزَلَ اللهُ فَأُوْلَئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ) (المائده /٤٤)
जो अल्लाह की नाज़िल की हुई शरीअत के मुताबिक फैसला न करें वही लोग काफिर है। [ अल्-माइदा / ४४ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम् का इरशाद है :
( حسن ، رواه ابن ماجه وغيره ) (( وَمَا لَمْ تَحْكُمْ أَئِمَتُهُمْ بِكِتَابِ اللَّهِ وَيَتَخَيَّرُوا مِمَّا أَنْزَلَ اللَّهُ الَّا جَعَلَ اللَّهُ بَأْسَهُمْ بَيْنَهُمْ ))
जब मुस्लिम हुक्मरान अल्लाह की किताब के मुताबिक फैसला न करेंगे और अल्लाह के नाज़िल किए गये नियमों को इख़्तियार न करेंगे । तो अल्लाह उन के दरमियान फूट डालदेगा । [ इब्ने माजा ]

सवाल (१९) शैतानी सवाल और शैतानी वस्वसा कि “अल्लाह को किस ने पैदा किया ?” अगर किसी के दिल में यह वस्वसा उठे तो इस को कैसे दूर किया जाये ?
जवाब : जब शैतान किसी के दिल में यह वस्वसा पैदा करे तो उस को चाहिए कि अल्लाह तआला की पनाह चाहे । और निम्नलिखित मासूरा दुआ पढ़े ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَإِمَّا يَنْزَغَنَّكَ مِنْ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ)
और अगर शैतान दिल में वस्वसा डाले तो अल्लाह की पनाह माँग बेशक वह सुनने वाला और जानने वाला है । [ सूरह फुस्सिलत/३६ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने शैतानी वस्वसा दूर करने के लिए हमें यह दुआ सिखलाई है।
(( امَنتُ باللهِ وَرُسُلِه ، اللهُ أَحَدٌ ، اللهُ الصَّمَدُ، لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُواً أَحَدٌ ))
मैं अल्लाह पर और उस के रसूलों पर ईमान लाया, अल्लाह एक है, अल्लाह बेनियाज़ है न उस ने किसी को जना है और न वह जना गया है और न ही उस का कोई हमसर है।
फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह तरकीब बतलाई :
ثُمَّ لَيَنْقُلْ عَنْ يَسَارِهِ ثَلاثاً وَلْيَسْتَعِذْ مِنَ الشَّيْطَانِ وَلَيَنْتَهِ فَإِنَّ ذلك يَذْهَبُ عَنْهُ (( ( ملخصا من البخاري ومسلم واحمد وابي داؤد )
फिर चाहिए कि अपने बायें तरफ तीन मरतबा थुत्कार दे और शैतान से अल्लाह की पनाह मांगे यानि أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيطَانِ   الرَّجِيمِ पढ़े और इस तरह की भावनाओं, विचारों और खेयालात से रुक जाये । यह अमल उस वस्वसा को दूर कर देगा ।

सवाल (२०) शिर्के अकबर (बड़े शिर्क) का नुक्सान क्या है ?
जवाब : शिर्के अकबर (बड़ा शिर्क) हमेशा हमेशा के लिए जहन्नम में रहने का सबब् बनता है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
إِنَّهُ مَنْ يُشْرِكْ بِاللهِ فَقَدْ حَرَّمَ اللهُ عَلَيْهِ الْجَنَّةَ وَمَأْوَاهُ النَّارُ وَمَا لِلظَّالِمِينَ من أنصار) (المائده /۷۲)
बेशक जो अल्लाह के साथ शिर्क करता है उस पर अल्लाह ने जन्नत को हराम कर दिया है। और उस का ठेकाना जहन्नम है और ज़ालिमों (मुश्श्रिकों) का कोई मददगार नहीं होगा।
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(مسلم) (( مَنْ لَقِيَ اللَّهُ يُشْرِكْ بِهِ شَيْئًا دَخَلَ النَّارَ ))
जो अल्लाह से इस हाल में मिले कि उस के साथ किसी को शरीक करता हो वह जहन्नम में दाखिल् होगा । [ मुस्लिम ]

सवाल (२१) क्या शिर्क के साथ कोई नेक अमल् फाइदा देगा ?
जवाब : शिर्क के साथ नेक अमल् फायदा नहीं देगा ।
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद है अम्बिया किराम के बारे में।
وَلَوْ أَشْرَكُوا لَحَبِطَ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ) (الانعام (۸۸)
अगर वे (अम्बिया) भी शिर्क करते तो उन की नेकियाँ भी अकारत और बरबाद होजातीं। [ सूरह अल्-अन्आम /८८]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
قَالَ اللَّهُ تَعَالَى أَنَا أَغْنَى الشَّرَكَاءِ عَنِ الشَّرْكِ مَنْ عَمِلَ عَمَلًا أَشْرَكَ مَعِي فِيْهِ غَيْرِي تَرَكْتُهُ وَشِرَكَهُ )) ( مسلم)
अल्लाह तआला का फरमान है कि मैं सब से ज़्यादा शिर्क से बेनियाज़ हूँ जिस किसी ने कोई ऐसा अमल किया जिस में मेरे साथ दूसरों को शरीक किया तो मैं उस को और उस के शिर्क को छोड़ देता हूँ। [ मुस्लिम ]

शिर्के असग़र (छोटा शिर्क )

सवाल (१) शिर्क-ए-असग़र (छोटा शिर्क) क्या है ?
जवाब : रिया व नमूद, दिखावा यह शिर्क-ए-असग़र कहलाता है ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है।
فَمَنْ كَانَ يَرْجُوا لِتَاءَ رَبِّهِ فَلْيَعْمَلْ عَمَلًا صَالِحًا وَلَا يُشْرِكْ بِعِبَادَةِ رَبِّهِ أَحَدًا) (الكهف / ١١٠)
जो आदमी अल्लाह से मिलने की उम्मीद व यकीन रखता है उसे चाहिये कि नेक अमल् करे और अपने रब की इबादत में किसी को शरीक न करे। [ सूरह अल्-कहफ / ११० ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( إِنْ أَخْوَفَ مَا أَخَافُ عَلَيْكُمْ الشَّرْكُ الْأَصْغَرُ : الرياء )) (صحيح ، رواه أحمد )
बेशक सब से ज़्यादा मैं तुम्हारे बारे में जिस चीज़ से डरता हूँ वह शिर्के असग़र यानी रिया व नमूद और दिखावा है। [ अहमद ]
और शिर्के अस्ग्र (छोटा शिर्क) आदमी का यह कहना भी है। “अगर अल्लाह न होता और आप न होते” या “जो अल्लाह चाहे और आप चाहें “
रसूलुल्लाह ने फरमाया :
لا تَقُولُوا مَا شَاءَ اللهُ وَشَاءَ فُلانٌ وَلَكِنْ قُولُوا: مَا شَاءَ اللَّهُ ثُمَّ شَاءَ فُلانٌ )) (صحيح الولد مريوم)
यह न कहो कि जो अल्लाह चाहे और फलाँ आदमी चाहे बल्कि इस तरह कहो कि जो अल्लाह चाहे फिर उस के बाद फलाँ आदमी चाहे । [ अबू दाऊद ]

सवाल (२) क्या अल्लाह के सिवा किसी दूसरे की कसम खानी जायज है ?
जवाब : अल्लाह के सिवा किसी और की कसम खानी जायज नहीं है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है।
قُلْ بَلَى وَرَبِّي لَتَبْعَثُنَّ) (التغابن (۷)
कहो ! क्यों नहीं, मेरे रब् की कसम् तुम ज़रूर उठाये जाओगे ।
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :

۱- ( صحيح ، رواه أحمد ) (( مَنْ خَلَفَ بِغَيْرِ اللَّهِ فَقَدْ أَشْرَكَ ))

۲ ( متفق عليه ) (( مَنْ كَانَ خَالِفاً فَلْيَحْلِفُ بِغَيْرِ الله أَوْ لِيَصْمتُ ))
जिस ने गैरुल्लाह की क्सम् खाई उस ने शिर्क किया । [ अहमद ] जिस को कसम खानी हो उसे चाहिये कि अल्लाह की कसम खाये वरना खामोश रहे। [ बुखारी तथा मुस्लिम ]

वसीला पकड़ना और शिफाअत् तलब करना

सवाल (१) हम अल्लाह से किन चीज़ों से वसीला पकड़ें ?
जवाब : वसीला की दो किस्में हैं। (१) जायज् वसीला । (२) मम्नूस् और नाजायज् वसीला ।
(१) जायज और मशुरू व मत्लूब वसीला यह है कि आदमी अल्लाह तआला के अस्माये हुस्ना ( अच्छे, अच्छे नामों) और उस की सिफात (गुणों) और नेक आमाल का वसीला पकड़े ।
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद है।
وَلِلَّهِ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى فَادْعُوهُ بِهَا) (الاعراف/ ۱۸۰)
अल्लाह के लिए अस्माये हुस्ना (अच्छे अच्छे नाम) हैं तो उन्हीं नामों से उस को पुकारो। [ सूरह अल्-आराफ /१८० ]
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ)
ऐ लोगो जो ईमान लाये हो अल्लाह से डरो और उस की तरफ् वसीला चाहो ।
हजरत क़तादा (रजि) फरमाते हैं यानी अल्लाह का तकर्रूब चाहो , उस की इताअत और फरमाबरदारी करके और ऐसे अमल के जरिये जो उस को पसन्द हो । [ इब्ने कसीर ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
أسْأَلُكَ بِكُلِّ اسْمٍ هُوَ لَكَ )) (مسلم)
ऐ अल्लाह ! मैं तुझ से माँगता हूँ हर उस नाम के जरिया जो तेरे लिए है। [ मुस्लिम ]
और एक सहाबी से आप ने फरमाया जिन्हों ने जन्नत में आप के साथ रहने की तमन्ना जाहिर की थी।
(( أَعِنِّي عَلَى نَفْسِكَ بِكَثْرَةِ السُّجُودِ )) (مسلم)
तुम अपने बारे में मेरी मदद् करो ज़्यादा से ज़्यादा नफली नमाज़ें पढ़ के । [ मुस्लिम ] और नमाज़ भी नेक अमल है। इसी तरह गार वालों का किस्सा जो सहीह बुखारी में है कि उन्हों ने अपने अपने नेक आमाल को वसीला बना कर अल्लाह से दुआ की थी तो अल्लाह ने उन की मुसीबत को दूर कर दिया था ।
नोट : वसीला के सिलसिले में तफ्सीली मालूमात के लिए उर्दू ज़बान में ( हकीकते बसीला, लेखक् मक्सूदुल्हसन् फैज़ी )) और अद्दारुस्सलफीया मुम्बई से प्रकाशित किताब (( मम्नूअ व मश्रू वसीला की हकीकत् )) बहुत मुफीद है।

(२) मम्नूअ् और ना जायज वसीला ।
इस की एक सूरत तो यह है कि आदमी मुर्दों को पुकारे और उन से जरूरतें तलब करे, जैसा कि आज कल हो रहा है। यह शिर्के अकबर है।
दलील : अल्लाह का फरमान है :
وَلَا تَدْعُ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنْفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَ فَإِنْ فَعَلْتَ فَإِنَّكَ إِذَا مِنْ الظَّالِمِينَ) ( يونس / ١٠٦)
और अल्लाह के सिवा दूसरों को न पुकारो जो न तुम को नफा दे सकते हैं और न नुक्सान पहुंचा सकते हैं। अगर तुम ने ऐसा किया तो ऐसी सूरत् में तुम ज़ालिमों (यानी मुशरिकों) में से हो जाओगे । [ सूरह यूनुस् /१०६ ]

और मम्नूअ् तथा नाजायज वसीला की दूसरी शकल यह है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जाह व हश्मत मोकाम व मरतबा का वसीला लिया जाये । ( और इसी तरह अम्बिया तथा औलिया की जात या हक व हुरमत और बरकत का वसीला लिया जाये या किसी के वसीला से अल्लाह पर कसम खाया जाये । ) मिसाल के तौर पर कहा जाये कि ऐ अल्लाह ! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जाह व हश्मत के वसीला से हमें शिफा (स्वस्थ्य) दे तो यह शकल बिद्अत् है क्योंकि सहाबा किराम (रजि) से यह साबित नहीं ।
चुनाँचे जब हजरत उमर (रजि) के दौरे खिलाफत में कहत साली आई और उस मौका पर जब इस्तिस्का के लिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चचा हजरत अब्बास ( रजि) को आगे बढ़ाया गया तो उस समय हजरत अब्बास ( रजि) की दुआओं का वसीला लिया गया था जो कि ज़िन्दा थे । और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मरने के बाद आप से वसीला नहीं पकड़ा, हालाँ कि आप की कबर मदीना में मौजूद थी। [ बुखारी ]
अगर कोई यह अकीदा रखे कि अल्लाह तआला किसी बशर के वास्ते का मुहताज है जिस तरह अमीर और हाकिम मुहताज होते हैं। तो वसीला की यह शकल शिर्क तक पहुँचा देती है। इस लिए कि खालिक व मखलूक के दरमियान कोई मुशाबहत नहीं ।

सवाल (२) क्या दुआ में किसी बशर के वास्ता की जरूरत है ?
जवाब : दुआ में किसी बशर की कोई जरूरत नहीं।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ) ( البقرة / ١٨٦)
और जब आप से मेरे बन्दे मेरे बारे में सवाल करें तो आप उन्हें बता दें कि मैं उन से बिल्कुल क़रीब हूँ। [ सूरह अल्-बकरह /१८६ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(( إِنَّكُمْ تَدْعُوْنَ سَمِيعاً قَرِيبًا وَهُوَ مَعَكُمْ )) ( مسلم )
बेशक तुम सुनने वाले, करीब रहने वाले को पुकारते हो । वह अपने इल्म, ज्ञान तथा सुनने और देखने के ऐतबार (आधार) से तुम्हारे साथ है। [ मुस्लिम ]

सवाल (३) क्या ज़िन्दों से दुआ कराना जायज है ?
जवाब : हाँ ! नेक और स्वालेह ज़िन्दों से दुआ कराना जायज है न कि मुर्दों से ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَاسْتَغْفِرْ لِذَنْبِكَ وَالْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ) (محمد (۱۹)
और आप अपने और मोमिन मर्दों तथा मोमिना औरतों के गुनाहों के लिए इस्तिगफार कीजिए।  [ सूरा मुहम्मद /१९ ]
और तिर्मिज़ी शरीफ की सहीह हदीस है :
أَنَّ رَجُلًا ضَرِيرَ الْبَصَرِ أَتَي النَّبِيُّ صَلَّى الله عليه وسلم فَقَالَ أَدْعُ الله أَن يُعَافِينِي ……))
एक अन्धा आदमी रसूलुल्लाह के पास आया और कहा कि आप मेरे लिए अल्लाह से दुआ करें कि अल्लाह मुझे आफियत् दे दे । [ तिर्मिज़ी ]

नोट : लेकिन आप की वफात के बाद किसी सहाबी ने आप से दुआ का मुतालबा नहीं किया। इसलिए मुर्दों से दुआ तलब करना जायज नहीं ।
सवाल (४) रसूलुल्लाह किस चीज़ का वास्ता हैं ?
जवाब : रसूलुल्लाह तब्लीग यानी बन्दों तक अल्लाह का हुकम पहुँचाने का वास्ता हैं ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ ) ( المائده / ٦٧)
ऐ रसूल ! तुम पर तुम्हारे रब की तरफ से जो कुछ नाज़िल् किया गया है उस को लोगों तक पहुँचा दो । [ सूरा अल्-माइदा /६७ ]
और सहाबा किराम रिजवानुल्लाहि अलैहिम ने जब कहा । (( نَشْهَدُ أَنَّكَ قَدْ بَلِّغْتَ )) हम इस बात की गवाही देते हैं कि आप ने पहुँचा दिया है। तो आप ने फरमाया :

(مسلم) (( أَللَّهُمَّ أَشْهَدْ ))
ऐ अल्लाह ! तू इस बात पर गवाह रह। ( मुस्लिम )

सवाल (५) रसूलुल्लाह की शफाअत किस से तलब करें ?
जवाब : रसूलुल्लाह की शफाअत अल्लाह तआला से तलब करनी चाहिए ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
قُلْ لِلَّهِ الشَّفَاعَةُ جَمِيعًا ) ( الزمر / ٤٤)
हे नबी ! आप लोगों से कह दीजिये कि तमाम शफाअतें अल्लाह ही के अधिकार में हैं। [ सूरह जुमर / ४४ ]
और रसूलुल्लाह ने एक सहाबी को यह दुआ सिखाई थी :
( حسن صحيح ، رواه الترمذي ) (( أَللَّهُمَّ شَفَعَهُ فِيَّ ))
ऐ अल्लाह ! रसूलुल्लाह को मेरे बारे में शफाअत करने वाला बना दे । [ तिर्मिज़ी ]
और रसूलुल्लाह का फरमान है :
( صحيح مسلم) (( إِنِّي اخْتَبَأْتُ دَعْوَتِي شَفَاعَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ مَنْ مَاتَ مِنْ أُمَّتِي لَا يُشْرِكُ بالله شَيْئاً ))
बेशक मैं ने अपनी दुआ को क़ियामत के दिन अपनी उम्मत के उन लोगों की शफाअत के लिए छिपा रखा है जो इस हाल में मरें कि वे अल्लाह के साथ ज़र्रा बराबर भी शिर्क न करते हों । [ सहीह मुस्लिम ]

सवाल (६) क्या हम ज़िन्दों से शफाअत ( सिफारिश्) तलब कर सकते हैं ?
जवाब : हाँ ! ज़िन्दों से दुनियावी कामों और चीज़ों में ( जो जायज् तथा हलाल भी हों) शफाअत् (सिफा।श्) तलव् कर सकते हैं।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है।
مَنْ يَشْفَعْ شَفَاعَةٌ حَسَنَةٌ يَكُنْ لَهُ نَصِيبٌ مِنْهَا وَمَنْ يَشْفَعْ شَفَاعَةٌ سَيِّئَةٌ يَكُنْ لَهُ كفل مِنْهَا ) ( النساء / ٨٥)
जो आदमी अच्छी बात की सिफारिश करे उस को उस में से एक भाग मिलेगा और जो आदमी बुरी बात की सिफारिश करे उस को एक भाग उस में से मिलेगा। [ सूरह अन्-निसा / ८५ ]
और रसूलुल्लाह का फरमान है :
( صحيح ، رواه ابوداؤد )  (( إِشْفَعُوا تُؤْجَرُوا ))
सिफारिश करो तुम्हें सवाब मिलेगा। [ अबू दाऊद ]

सवाल (७) क्या हम रसूलुल्लाह की तारीफ व प्रशंसा में मुबालगा ( अतियुक्ति) कर सकते हैं ?
जवाब : आप की तारीफ व प्रशंसा में हम मुबालगा नहीं कर सकते ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
قُلْ إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ مِثْلُكُمْ يُوحَى إِلَيَّ أَنَّمَا إِلَهُكُمْ إِلَهُ وَاحِدٌ) (الكهف / ١١٠)
आप कह दीजिये कि बेशक मैं तुम्हारी तरह एक इन्सान हूँ । मेरी तरफ वहय की गई है कि तुम्हारा माबूद एक ही माबूद है । [ सूरह अल्-कहफ / ११० ]
और रसूलुल्लाह का फरमान है :
(( لا تَطْرُونِي كَمَا أَطَرَتِ النَّصَارَي عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ فَإِنَّمَا أَنَا عَبْدٌ فَقُولُوا عَبْدُ اللَّهِ وَرَسُولُهُ )) ( رواه البخاري )
तुम मेरी प्रशंसा और तारीफ में हद् (सीमा) से आगे न बढ़ो जिस तरह नसारा ने ईसा बिन् मरयम की तारीफ में हद सीमा) से आगे बढ़ गए थे। बेशक मैं एक बन्दा हूँ इस लिए तुम मुझे अल्लाह का बन्दा और उस का रसूल कहो [ बुखारी  ]

जेहाद, वला (दोस्ती) और हकम् ( निर्णय )

सवाल (१) अल्लाह की राह में जेहाद का क्या हुकम है ?
जवाब : अल्लाह की राह में माल व जान और ज़बान के जरिया जेहाद करना वाजिब है ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
انفروا خِفَافًا وَثِقَالًا وَجَاهِدُوا بِأَمْوَالِكُمْ وَأَنفُسِكُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ .
मुसलमानों ! हलके हो या भारी निकल खड़े हो और अल्लाह की राह में अपने जान व माल से जिहाद करो। [ सूरा तौबा/४१ ]
नोट : हलके और भारी का मतलब यह है कि तुम खुश हाल हो या तङ्गदस्त, जवान हो या बूढ़े, तन्दुरुस्त हो या बीमार, तन्हा हो या बाल बच्चों वाले हथियार से लैस हो या बेहथियार हर हाल में निकलना जरूरी है।
और रसूलुल्लाह का फरमान है :
(صحيح ، رواه أبو داود) (( جَاهِدُوا الْمُشْرِكِيْنَ بِأَمْوَالِكُمْ وَأَنْفُسِكُمْ وَأَلْسِنَتِكُمْ ))
तुम मुशरिकों से अपने मालों और जानों और ज़बानों के जरिया जेहाद करो । [ अबू दाऊद ]

सवाल (२) वला किस को कहते हैं ?
जवाब : वला, मोहब्बत् (प्रेम) और नुस्रत् ( मदद्) को कहते हैं।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَالْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ) (التوبة (۷۱)
मोमिन मर्द और मोमिना औरतें एक दूसरे के लिए आपस में दोस्त और मददगार हैं। [ सूरा तौबा ७१ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
(مسلم) (( أَلْمُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِ كَالْبُنْيَانِ يَشُدُّ بَعْضَهُ بَعْضاً ))
एक मोमिन दूसरे मोमिन के लिए उस इमारत की तरह है जिस का एक हिस्सा दूसरे हिस्से से ताकत (बल) हासिल करता है।

सवाल (३) क्या काफिरों से दोस्ती और उन की नुसरत (मदद्) जायज है ?
जवाब : काफिरों से दोस्ती और उन की नुस्रत् मदद जायज नहीं है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ﴾ (المائده / ٥١)
तुम में से जो आदमी उन से ( यानी कारिफरों से ) दोस्ती गाँठेगा वह उन्हीं में से है। [ सूरा अल्‌ माइदा / ५१ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(صحيح ، رواه أحمد )  (( إِنَّ آلَ بَنِي فَلَانَ لَيْسُوا بِأَوْلِيائي ))
बेशक फलाँ खानदान वाले मेरे दोस्त नहीं। [ मुसनद अहमद ]

सवाल (४) वली किस को कहते हैं।
जवाब : प्रहेज़गार, मुत्तकी और नेक मोमिन् को वली कहते हैं।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
أَلا إِنْ أَوْلِيَاءَ الله لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (٦٢) الَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ (٦٣) ) (يونس / ٦٣٦٢)
खबरदार ! बेशक अल्लाह के वलियों पर न खौफ तारी होता है और न वे गमगीन होते हैं। और वली वह लोग हैं जो ईमान लाए और अल्लाह से डरते हैं। [ सूरा यूनुस / ६२-६३ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि का फरमान है :
(( إِنَّمَا وَلِيَ اللَّهُ وَصَالِحُ الْمُؤْمِنِينَ )) ( صحيح ، رواه أحمد )
बेशक मेरा वली (दोस्त) अल्लाह है और नेक मोमिनीन । [ अहमद ]

सवाल (५) मुसलमानों को किस चीज़ के मुताबिक फैसला करना चाहिये ?
जवाब : मुस्लमानों को कुरआन मजीद और सहीह हदीस के मुताबिक फैसला करना चाहिये ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَأَنْ احْكُمْ بَيْنَهُمْ بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ ) ( المائده / ٤٩)
आप इन के दरमियान उस के मुताबिक फैसला करें जो अल्लाह ने नाज़िल् किया है। [ सूरह अल्-माइदा / ४९ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम् का फरमान है :
( مسلم) (( عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ أَنْتَ تَحْكُمُ بَيْنَ عِبَادِكَ ))
तू गायब और हाजिर का जानने वाला है, तू ही अपने बन्दों के दरमियान फैसला करता है। [ मुस्लिम ]

कुरआन और हदीस पर अमल

सवाल (१) कुरआन किस लिए नाज़िल किया गया ?
जवाब : कुरआन इस लिए नाज़िल किया गया ताकि लोग उस पर अमल करें ।
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद :
اتَّبِعُوا مَا أُنْزِلَ إِلَيْكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ (الاعراف (۳)
उस चीज़ की पैरवी करो जो तुम्हारी तरफ तुम्हारे रब की तरफ से नाज़िल की गई है।  [ सूरह अल्-आराफ /३ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है :
(صحيح ، رواه أحمد )  (( إِقْرَوُا الْقُرْآنَ وَاعْمَلُوا بِهِ وَلَا تَأْكُلُوا به ))
कुरआन पढ़ो और उस पर अमल करो और उसे पेट भरने का जरिया न बनाओ । [ मुसनद अहमद ]

सवाल (२) सहीह हदीस पर अमल करने का क्या हुकम है ?
जवाब : सहीह हदीस पर अमल् करना वाजिब है ।
दलील : अल्लाह तआला का इरशाद है :
وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانْتَهُوا) (الحشر (۷)
रसूलुल्लाह जो तुम को दें वह ले लो और जिस चीज़ से रोक दें उस से रुक जाओ । [ सूरा अल्-हश्र /७ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
(( عَلَيْكُمْ بِسُنَنِي وَسُنَّةِ الْخُلَفَاءِ الرَّاشِدِيْنَ الْمَهْدِيِّينَ تَمَسَّكُوا بِهَا )) (صحيح ، رواه أحمد )
तुम मेरी सुन्नत और हिदायत याफ्ता खुलफाए राशिदीन की सुन्नत लाज़िम पकड़ो और उसे मजबूती के साथ थामे रहो ।

सवाल (३) क्या हम केवल कुरआन पर अमल करके हदीस से बेनियाज़ हो सकते हैं ?
जवाब : हम हदीस से बेनियाज़ नहीं हो सकते हैं ?
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
وَأَنزَلْنَا إِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ إِلَيْهِمْ ( النحل / ٤٤)
और हम ने तुम्हारी तरफ ज़िक्र (कुरआन ) नाज़िल किया ताकि आप लोगों के सामने उस चीज़ को खोल खोल कर बयान कर दे जो उन की तरफ नाज़िल किया गया है। [ सूरह नहल/४४ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
(صحيح ، رواه أبوداؤد وغيره) (( أَلَا إِنِّى أُوتِيتُ الْقُرْآنَ وَمِثْلَهُ مَعَهُ ))
खबरदार ! बेशक् मैं कुरआन दिया गया हूँ और उस के साथ उस के मिस्ल दिया गया हूँ। [ अबू दाऊद ]

सवाल (४) क्या अल्लाह और उस के रसूल के कौल (कथन) पर किसी के कौल को मोक़द्दम किया जा सकता है ?
जवाब : अल्लाह और उस के रसूल के कौल पर किसी का कौल मोकद्दम नहीं कर सकते ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيَّ اللَّهِ وَرَسُولِهِ) (الحجرات
(۱) ऐ ईमान वालो ! अल्लाह और उस के रसूल से आगे बढ़ने की जसारत् मत् करो । [ सूरा अल्हुजुरात / १ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
( صحيح ، رواه الطبراني ) (( لَأَطَاعَةَ لِمَخْلُوقِ فِي مَعْصِيَةِ الْخَالِقِ ))
जब खालिक ( अल्लाह) की नाफरमानी हो रही हो तो ऐसी हालत में किसी मखलूक (सृष्टि) की फरमांबरदारी जायज नहीं ।
और हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि) ने फरमाया :
يُوشِكُ أَنْ تَنْزِلَ عَلَيْكُمْ حِجَارَةً مِنَ السَّمَاءِ أَقُولُ لَكُمْ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلي الله عليه وسلم وَتَقُولُوْنَ قَالَ أَبُو بَكْرٍ وَعُمَرُ)) والديت والدتون (٣٤ – يسرفر والحميد (١٤)
हो सकता है कि तुम्हारे ऊपर आसमान से पत्थर बरसने लगें, इस कारण कि मैं तुम से कहता हूँ कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया और तुम अबू बक्र व उमर का कौल (कथन) पेश करते हो । [ अल्-हदीस वल् मुहद्दीसुन् ३४ तैसीरुल् अजिजिल् हमदी /५४४ ]

सवाल (५) जब आपस में इख़्तिलाफ पैदा हो तो हम क्या करें ?
जवाब : जब इख़्तिलाफ पैदा हो तो कुरआन और सहीह हदीस की तरफ रुजू करें ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
فَإِنْ تَنَازَعْتُمْ فِي شَيْءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى اللهِ وَالرَّسُولِ إِنْ كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ذَلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا) (النساء (٥٩)
अगर तुम आपस में किसी चीज़ के बारे में इख़्तिलाफ करो तो अल्लाह और रसूल की तरफ रुजूअ करो (यानी कुरआन तथा हदीस में उस झगड़े का समाधान खोजो) अगर तुम अल्लाह और आखिरत के दिन पर ईमान रखते हो । यही तरीका बेहतर है और इस का अन्जाम भी बेहतर होगा। [ सूरह निसा /५९ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का बयान है :
عَلَيْكُمْ بِسُنَّتِي وَسُنَّةِ الْخُلَفَاءِ الرَّاشِدِيْنَ وَتَمَسَّكُوا بِهَا ) (صحيح ، رواه أحد )
तुम मेरी सुन्नत को और खुलफाये राशिदीन के तरीके को लाजिम पकड़ो और उसे मज़बूती के साथ थामे रहो । [अहमद् ]

सवाल (६) तुम अल्लाह और उस के रसूल से किस तरह मोहब्बत करते हो ?
जवाब : हम अल्लाह और उस के रसूल से उन की फरमाँबरदारी और उन के हुकमों की पैरवी करके मोहब्बत करते हैं।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है:
قُلْ إِنْ كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ) ( آل عمران / ۳۱ )
कह दीजिए अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करो अल्लाह तुम को महबूब रखेगा और तुम्हारे गुनाहों को बख़्श देगा अल्लाह बख़्शने वाला और मेहरबान है। [ सूरह आले इमरान् / ३१ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
( متفق عليه ) (( لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِن وَّالِدِهِ وَوَلَدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ ))
तुम में से कोई आदमी उस समय तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक कि मैं उस के नजदीक उस के वालिद, औलाद और तमाम लोगों से ज्यादा महबूब न हो जाऊँ । [ बुखारी व मुस्लिम ]

सवाल (७) क्या हम तक्दीर पर भरोसा करके अमल को छोड़ दें ?
जवाब : अमल को नहीं छोड़ सकते ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
فَأَمَّا مَنْ أَعْطَى وَاتَّقَى (٥) وَصَدَّقَ بِالْحُسْنَى (٦) فَسَيَسْرُهُ لليسرى (۷)) (الليل / ٧٥)
जिस ने अल्लाह के लिए धन माल खर्च किया और परहेज़गारी इख़्तियार किया और भलाई की तस्दीक की तो हम उसे आसान काम की तरफ लगा देंगें। (यानी हम उसे नेकी और अच्छे काम की तौफीक देंगें ।) [ सूरह अल्-लैल /५/६/७१ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
( بخاری ) (( إِعْمَلُوْا فَكُلُّ مُبَسِّرٌ لِمَا خُلِقَ ))
अमल करते रहो हर एक के लिए वह चीज़ आसान कर दी गई है जिस के लिए वह पैदा किया गया है। [ बुखारी ]

सुन्नत और बिदअत्

सवाल (१) दीन में बिदअत् किस को कहते हैं ?
जवाब : दीन में बिदअत् यह है कि आदमी दीन के अन्दर कोई चीज़ अपनी तरफ से बढ़ाये या कमी करे । और यह मरदूद है।
दलील : अल्लाह तआला ने मुशरिकीन और उन की, बिदअतों पर नकीर (उल्लंघन) करते हुए फ़रमाया :
أَمْ لَهُمْ شُرَكَاءُ شَرَعُوا لَهُمْ مِنْ الدِّينِ مَا لَمْ يَأْذَنَ بِهِ اللَّهُ ) ( الشورى (۲۱)
क्या उन लोगों ने शरीक बना रखे हैं। जो उन को दीन का रस्ता बताते हैं जिस का अल्लाह ने हुकम नहीं दिया । [सूरह शूरा ] और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है।
(( مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدُّ ) (متفق عليه )
जिस किसी ने मेरे इस दीन में ऐसी चीज़ ईजाद (उत्पत्त) की जो इस में नहीं है तो वह मरदूद है।    [ बुखारी तथा मुस्लिम ]

सवाल (२) क्या दीन में बिदअत ए हसना भी है ?
जवाब : दीन में कोई बिदअत ए हसना नहीं है।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है :
الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَالمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْنِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا ) ( المائده (٣)
आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया है और तुम पर अपनी नेमत तमाम कर दी है और तुम्हारे लिए इस्लाम को दीन के रूप में पसन्द फरमाया है। [ सूरह अल्-माइदा / ३ ]
और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
( صحيح ، رواه أحمد ) (( وَكُلَّ بَدْعَةٍ ضَلَالَةٌ وَكُلِّ ضَلَالَةٍ فِي النَّارِ ))
और हर बिदअत्  गुमराही है और हर गुमराह का ठेकाना जहन्नम है। [ मुसनद अहमद ]

सवाल (३) क्या इस्लाम में सुन्नते हस्ना है ?
जवाब : हाँ इस्लाम में सुन्नते हसना है ।
दलील : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :
(( مَنْ سَنَّ فِي الْإِسْلَامِ سُنَّةٌ حَسَنَةٌ فَلَهُ أَجْرُهَا وَأَجْرُ مَنْ عَمِلَ بِهَا مِنْ بَعْدِهِ مِنْ غَيْرِ أَنْ يُنْقَصَ مِنْ أُجُوْرِهِمْ شَيْءٌ )) ( بخاري )
जिस ने इस्लाम में किसी सुन्नते हसना को जारी किया उस को उस का सवाब मिलेगा और उस के बाद जो उस पर अमल करेंगें उन का भी सवाब मिलेगा, बगैर इस के कि उन के सवाबों में किसी तरह की कमी आये । [ बुखारी ]

सवाल (४) मुसलमानों को गलबा कब हासिल होगा ?
जवाब : मुसलमानों को गलबा उस समय हासिल होगा जब वे अल्लाह की किताब और अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत पर अमल करेंगें और तौहीद पर साबित कदम रहते हुए उस का प्रचार व प्रसार करेंगें और शिर्क जैसे महापाप से बचेंगें और अपने दुश्मनों के मुकाबिला के लिए क्षमतानुसार तैयारी करेंगें ।
दलील : अल्लाह तआला का फरमान है  :
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنْ تَنصُرُوا اللهَ يَنصُرْكُمْ وَيُثَبِّتْ أَقْدَامَكُمْ (۷)) (محمد)

ऐ ईमान वालो अगर तुम अल्लाह की मदद करोगे तो अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हारे पैरों को जमा देगा । [ सूरह मुहम्मद /७ ]

وَعَدَ اللهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنْكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُم في الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ الَّذِي ارْتَضَى لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُمْ مِنْ بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنَا يَعْبُدُونَنِي لَا يُشْرِكُونَ بِي شَيْئًا ) ( النور (٥٥)
जो लोग तुम में से ईमान लाये और अच्छे काम किए अल्लाह तआला ने उन से वादा किया है कि एक न एक दिन उन को ज़मीन में हुकूमत देगा जिस तरह उस ने इन से पहले के लोगों को हुकूमत प्रदान की थी, और जिस दीन को उन के लिए पसन्द किया है उस को साबित व गालिब कर देगा और भय के बाद उन्हें शान्ति प्रदान करेगा, वे केवल मेरी इबादत करेंगें और मेरे साथ किसी अन्य को शरीक न करेंगें ।   [ सूरह नूर/५५ ]

कुबूल होने वाली दुआ

اللهُمَّ إِنِّي عَبْدُكَ، وَابْنُ عَبْدِكَ، وَابْنُ أَمَتِكَ، نَاصِيَتِي بِيَدِكَ، مَاضٍ فِيَّ حُكْمُكَ ، عَدْلٌ فِي قَضَاؤُكَ، أَسْأَلُكَ بِكُلِّ اسْمٍ هُوَ لَكَ، سَمَّيْتَ بِهِ نَفْسَكَ، أَوْ أَنْزَلْتُهُ في كتابكَ ، أَوْ عَلَّمْتَهُ أَحَداً مِنْ خَلْقِكَ، أَوِ اسْتَأْثَرْتَ بِهِ فِي عِلْمِ الْغَيْبِ عِنْدَكَ، أَنْ تَجْعَلَ الْقُرْآنَ رَبِيعَ قَلْبِي ، وَنُورَ صَدْرِي، وَجَلَاءَ حُزْنِي، وَذَهَابَ ممي ( صحيح ، رواه أحمد في مسنده )
ऐ अल्लाह मैं तेरा बन्दा हूँ। तेरे बन्दे का बेटा हूँ। और तेरी बाँदी का बेटा हूँ। मेरी पेशानी तेरे हाथ में है। मुझ में तेरा हुकम जारी है । मेरे बारे में तेरा फैसला न्याय पूर्ण है। मैं तुझ से तेरे हर उस नाम से माँगता हूँ जो तेरे लिए है जो नाम तूने अपना रखा है और अपनी किताब में नाज़िल किया है या अपनी मखुलूक में से किसी को सिखाया है या अपने इलमे गैब में महफूज़ कर रखा है कि कुरआन को मेरे दिल की बहार और मेरे सीने का नूर बना दे और मेरे गम् को दूर करने वाला और मेरी चिन्ता फ़िक्र को हरण करने वाला बना दे।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है कि जब किसी बन्दे को गम और चिन्ता लाहिक् हो तो वह ऊपर वाली दुआ पढ़े अल्लाह तआला अपनी रहमत से उस के गम और शोक, चिन्ता को दूर कर देगा और तन्गी की जगह कुशादगी प्रदान करेगा । [ मुसनद अहमद ]

स्रोत : शैख़ मुहम्मद बिन् जमील ज़ैनू की किताब इस्लामी अक़ीदा सवाल-जवाब, अनुवादक- शैख़ आबिद बिन् सनाउल्लाह मदनी

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