क्या इस्लाम में सवाल पूछने की अनुमति नहीं है?
:الحمد لله والصلاة والسلام على رسول الله، وبعد
बहुत से लोगों के मन में यह सवाल आता है कि क्या इस्लाम में सवाल पूछना मना है? इसका सीधा जवाब है: नहीं। इस्लाम में ज्ञान हासिल करने, दीन समझने और सही बात जानने के लिए सवाल पूछना जायज़ है, बल्कि इसकी प्रोत्साहना दी गई है। हाँ, बेकार, झगड़े वाले, जिद्दी या परेशानी पैदा करने वाले सवालों से रोका गया है।
क़ुरआन में सवाल पूछने की अनुमति
अल्लाह तआला फरमाता है:
فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
“अगर तुम्हें ज्ञान नहीं है तो ज्ञान वालों से पूछो।” [सूरह अन-नहल, आयत 43]
यह आयत स्पष्ट करती है कि इस्लाम में सवाल करना सीखने का माध्यम है।
बेवजह सवालों से मना
अल्लाह तआला फरमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَسْأَلُوا عَنْ أَشْيَاءَ إِن تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ
“ऐ ईमान वालो! ऐसी चीज़ों के बारे में सवाल मत करो, जो अगर तुम्हारे सामने खोल दी जाएँ तो तुम्हें तकलीफ़ दें।”
[सूरह अल-माइदा, आयत 101]
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
إِنَّ اللَّهَ كَرِهَ لَكُمْ ثَلَاثًا: قِيلَ وَقَالَ، وَكَثْرَةَ السُّؤَالِ، وَإِضَاعَةَ الْمَالِ
“अल्लाह ने तुम्हारे लिए तीन चीज़ों को नापसंद किया है: बेकार बातें करना, बहुत ज़्यादा (फालतू) सवाल करना और माल बर्बाद करना।” [सहीह बुखारी, हदीस 1477]
यहाँ “बहुत ज़्यादा सवाल” से मतलब ऐसे सवाल हैं जो बेवजह हों, झगड़ा पैदा करें या लोगों के लिए मुश्किल पैदा करें।
अज्ञानता का इलाज सवाल है
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
فَإِنَّمَا شِفَاءُ الْعِيِّ السُّؤَالُ
“जान लो! अज्ञानता का इलाज सवाल पूछना है।” [अबू दाऊद, हदीस 336]
इस हदीस से पता चलता है कि सही सवाल इंसान को ज्ञान तक पहुँचाते हैं।
दीन सीखने के लिए सवाल
सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम नबी ﷺ से दीन सीखने के लिए सवाल पूछा करते थे। वे नमाज़, ज़कात, ईमान, हलाल-हराम और दूसरे धार्मिक मसलों के बारे में पूछते थे। हदीस जिब्रील में जिब्रील अलैहिस्सलाम ने नबी ﷺ से सवाल किए ताकि सहाबा सुनकर दीन सीख सकें।
يَا مُحَمَّدُ أَخْبِرْنِي عَنِ الإِسْلَامِ
“ऐ मुहम्मद, मुझे इस्लाम के बारे में बताइए।”
قَالَ: أَنْ تَشْهَدَ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ
“आप ﷺ ने कहा: इस्लाम यह है कि तुम गवाही दो कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।”
وَتُقِيمَ الصَّلَاةَ، وَتُؤْتِيَ الزَّكَاةَ، وَتَصُومَ رَمَضَانَ، وَتَحُجَّ الْبَيْتَ إِنِ اسْتَطَعْتَ إِلَيْهِ سَبِيلًا
“और नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो, रमज़ान के रोज़े रखो, और अगर रास्ता मिल जाए तो बैतुल्लाह का हज करो।”
يَا مُحَمَّدُ أَخْبِرْنِي عَنِ الإِيمَانِ
“ऐ मुहम्मद, मुझे ईमान के बारे में बताइए।”
قَالَ: أَنْ تُؤْمِنَ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ
“आप ﷺ ने कहा: ईमान यह है कि तुम अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों और आख़िरत के दिन पर ईमान लाओ।”
وَتُؤْمِنَ بِالْقَدَرِ خَيْرِهِ وَشَرِّهِ
“और तक़दीर के अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं पर ईमान लाओ।”……
इस तरह नबी ﷺ ने जवाब दिया और सहाबा ने दीन सीखा। इससे पता चलता है कि सवाल करना दीन सीखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
इस्लाम किन सवालों को पसंद नहीं करता?
इस्लाम ऐसे सवालों को नापसंद करता है:
- जो बेवजह झगड़ा पैदा करें।
- जो सिर्फ बहस के लिए पूछे जाएँ।
- जिनका अमल से कोई सम्बन्ध न हो।
- जो दीन को बेवजह कठिन बना दें।
- जो लोगों में शक और भ्रम पैदा करें।
अल्लाह तआला फरमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَسْأَلُوا عَنْ أَشْيَاءَ إِنْ تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ
“ऐ ईमान वालो! ऐसी चीज़ों के बारे में मत पूछो जो अगर तुम्हारे सामने खोल दी जाएँ तो तुम्हें परेशानी दें।” [सूरह अल-माइदा, आयत 101]
इस्लाम कहता है कि सीखने के लिए पूछो, लेकिन ऐसे सवाल मत करो जो परेशानी या फितना बन जाएँ।
सहाबा किराम (रज़ि.) सवाल कैसे पूछते थे?
सहाबा का तरीका अदब, आवश्यकता और समझदारी वाला था। वे छोटे, स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण सवाल पूछते थे। हदीस जिब्रील में आता है:
جَاءَ رَجُلٌ إِلَى النَّبِيِّ ﷺ فَقَالَ: أَخْبِرْنِي عَنْ الإِسْلَامِ
“मुझे इस्लाम के बारे में बताइए।” [सहीह मुस्लिम]
यह सवाल छोटा, स्पष्ट और सीखने की नीयत से पूछा गया था।
ज़्यादा सवाल करने से क्यों रोका गया?
अल्लाह तआला फरमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَسْأَلُوا عَنْ أَشْيَاءَ إِن تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ
“ऐ ईमान वालो! ऐसी चीज़ों के बारे में मत पूछो जो अगर ज़ाहिर कर दी जाएँ तो तुम्हें परेशान कर दें।” [सूरह अल-माइदा, आयत 101]
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
إِنَّ أَعْظَمَ النَّاسِ جُرْمًا مَنْ سَأَلَ عَنْ شَيْءٍ لَمْ يُحَرَّمْ فَحُرِّمَ مِنْ أَجْلِ مَسْأَلَتِهِ
“सबसे बड़ा गुनाहगार वह है जिसने किसी चीज़ के बारे में सवाल किया, जो पहले हराम नहीं थी, फिर उसके सवाल की वजह से वह हराम कर दी गई।” [सहीह बुखारी]
इसकी हिकमत
- दीन को आसान बनाए रखना।
- लोगों पर अनावश्यक बोझ न बढ़ाना।
- नई पाबंदियाँ पैदा होने से बचाना।
- भ्रम और विवाद से बचाना।
- अमल पर ध्यान देना, केवल बहस पर नहीं।
अल्लाह तआला फरमाता है:
يُرِيدُ اللَّهُ بِكُمُ الْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ الْعُسْرَ
“अल्लाह तुम्हारे लिए आसानी चाहता है, कठिनाई नहीं।” [सूरह अल-बकरा 2:185]
क्या हर सवाल का जवाब देना ज़रूरी है?
हर सवाल का जवाब देना ज़रूरी नहीं है। कुछ सवालों का जवाब दिया जाता है, कुछ को छोड़ दिया जाता है और कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब देना उचित नहीं होता क्योंकि वे नुकसान, भ्रम या विवाद का कारण बन सकते हैं।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
مِنْ حُسْنِ إِسْلَامِ الْمَرْءِ تَرْكُهُ مَا لَا يَعْنِيهِ.
“इंसान के अच्छे इस्लाम में से यह है कि वह उन चीज़ों को छोड़ दे जो उसके काम की नहीं हैं।” [तिर्मिज़ी, [इब्न माज़ाह]
नबी ﷺ को किस प्रकार के सवाल पसंद नहीं थे?
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
إِنَّ أَبْغَضَ الرِّجَالِ إِلَى اللَّهِ الأَلَدُّ الخَصِمُ
“अल्लाह के नज़दीक सबसे नापसंद व्यक्ति वह है जो बहुत झगड़ालू और बहस करने वाला हो।” [सहीह बुखारी]
नबी ﷺ को ऐसे सवाल पसंद नहीं थे:
- जो केवल बहस के लिए पूछे जाएँ।
- जो जिद की नीयत से पूछे जाएँ।
- जिनका कोई व्यावहारिक लाभ न हो।
- जो लोगों के लिए सख्ती और कठिनाई पैदा करें।
क्या ज़्यादा सवाल बिदअत की तरफ ले जा सकते हैं?
कुछ परिस्थितियों में जब सवाल सीखने के लिए नहीं बल्कि बहस, कल्पना या नई-नई बातें निकालने के लिए किए जाते हैं, तो इससे दीन में ऐसी बातें शामिल होने लगती हैं जिनकी कोई बुनियाद नहीं होती।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدٌّ
“जिसने हमारे इस दीन में कोई ऐसी नई चीज़ शामिल की जो उसमें नहीं थी, वह अस्वीकार है।” [सहीह मुस्लिम, हदीस-1718]
और फरमाया:
وَكُلُّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ
“हर बिदअत गुमराही है।” [सहीह बुखारी, मुस्लिम]
लेकिन यह याद रखना चाहिए कि हर सवाल बिदअत नहीं है। नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हलाल-हराम, सुन्नत और दैनिक जीवन के धार्मिक मसलों के बारे में पूछना इल्म हासिल करना है, बिदअत नहीं।
इस्लाम सवाल पूछने से नहीं रोकता, बल्कि सही और लाभदायक सवाल पूछने की शिक्षा देता है।
दीन सीखने, हलाल-हराम समझने, अज्ञानता दूर करने और सही मार्गदर्शन पाने के लिए सवाल करना ज़रूरी है। लेकिन बेकार, झगड़े वाले, जिद्दी और भ्रम पैदा करने वाले सवालों से बचना चाहिए। इस्लाम का संदेश स्पष्ट है:
“सवाल करो ताकि सीखो, लेकिन ऐसे सवाल मत करो जो दीन को कठिन, विवादित या बोझिल बना दें। सही सवाल ज्ञान बढ़ाते हैं, जबकि अनावश्यक सवाल इंसान को भ्रम और ग़लत रास्ते की तरफ ले जा सकते हैं।”
और अल्लाह ही बेहतर इल्म रखने वाला है।


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