ईद ए मिलाद की सहीह तारीख क्या है ?
ईद ए मिलाद की सहीह तारीख क्या है ?
﷽
निसार तेरी चहल-पहल पर हजारों ईद ए रबी उल अव्वल ।सिवाए इब्लिस के जहां में सभी तो खुशियां मना रहें हैं ।।
किसी ने आम लोगों को भटकाने के लिए यह शेर तो लिख दिया लेकिन सवाल यह है कि :
1. क्या रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ईद ए मिलाद मनाया ?
2. क्या सहाबा किराम (रिज़वानुल्लाहि अलैहिम अजमईन) ने ईद ए मिलाद मनाया ?
3. क्या सहाबा के बाद की जमात यानि ताबईन (रहिमहुमुल्लाह) मे से किसी ने ईद ए मिलाद मनाया ?
4. क्या ताबईन के बाद की जमाअत यानि तबा ताबईन में से किसी ने ईद ए मिलाद मनाया ?
5. क्या चारों इमामों या मुहद्दीसीन में से किसी ने ईद ए मिलाद मनाया ?
ये सब वह लोग हैं जो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की एक सुन्नत पर अमल करने के लिए किसी भी मुसीबत का सामना करने को तैयार रहते थे। क्या वह लोग रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुहब्बत नहीं करते थे जो ईद ए मिलाद नहीं मनाते थे।
समझने वालों के लिए यह अल्लाह तआला का फरमान काफी है:
وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانتَهُوا…..
“और जो कुछ रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तुमकों जो दें उसको पकड़ लो और जिस बात से मना करें उस से रूक जाओ” ।
जब नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईद ए मिलाद नहीं मनाया और न सहाबा, न ताबईन, न तबा ताबईन और न ही इमामों और मुहद्दीसीन ने मनाया । यह तो साबित है कि न यह फर्ज, न वाज़िब, न सुन्नत और न मुस्तहब और न ही मुबाह है क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा ने इसको नहीं मनाया। तो सवाल यह उठता है कि सबसे पहले इसको किसने ईजाद किया ?
इतिहास कि किताबों में सबसे पहला जो मिलाद का ज़िक्र हुआ वह जमालुद्दीन इब्न अल्-मामून जिनकी 1192 ईसवीं में मृत्यु हुई की किताब में मिलता है। ज्यादातर लोग यह समझते हैं कि मुजफ्फरूद्दीन ने सबसे पहले मिलाद मनाने त्योहार ईजाद किया जबकि हक़ीकत में मिस्र के ग़ैर सुन्नी हाक़िमों ने इसको ईज़ाद किया था। उन्होंने ने बहुत से त्योहारों का ईज़ाद किया जिसमें दसवीं मुहर्रम, ईद ए मिलाद नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु का जन्मदिवस, हज़रत हसन रज़ियल्लाहु अन्हु का जन्मदिवस और हज़रत हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु का जन्मदिवस, अम्मी फतिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु अन्हा का जन्मदिवस, वक़्त के हाक़िम का जन्म दिवस , रज़ब और शाबान का त्योहार...
फिर अफज़ल बिन अमीरूल जैश ने इन्हें निरस्त कर दिया, लेकिन फिर आमिर बि-अहकामिल्लाह फातिमी के द्वारा 524 हिजरी यानि 12वीं सदी ईसवी में पुनः इन्हें आरम्भ कर दिया गया जबकि लोग लगभग इन्हें भुला चुके थे।
इरबल नामी नगर में मीलादुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सर्व प्रथम अविष्कार मलिक मुज़फ्फर अबू सईद कौकबूरी ने सातवीं शताब्दी हिजरी यानि 604 हिजरी (1207 ईसवी) में किया, और आज तक उस पर अमल होता चला आ रहा है।
जब हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह मिलाद की तारीख़ किताबों में ढूँढ़ते हैं तो इब्न इशाक (150 हिजरी) जो कि सबसे पहले के रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की जीवनी लिखने वालों में से हैं वह बिना किसी सनद या हवाला के 12 रब्बी उल अव्वल, सोमवार का दिन फरमाते हैं जो कि हाथी वाले साल हुए थे।
इब्न इशाक़ और रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पैदाईश में लगभग 200 साल का अन्तर है। तो इस तारीख पे ऐतबार करने के लिए कुछ और सहीह रिवायत या हवाला चाहिए।
ईद ए मिलाद मनाने न मनाने का मसला तो बाद की बात है पहले किसी सहीह सनद से साबित तो हो कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का मिलाद कब हुआ ?
शुरूआती दौर के एक और महत्वपूर्ण स्रोत, इब्न साद (मृत्यु 230 हिजरी) अपने तबक़ात में कुछ शुरूआती अधिकारिक स्रोतों की राय नकल किया है जो कि मिलाद की तारीख़ इस प्रकार है बयान करते हैं :
1. सोमवार, 10 रब्बी उल अव्वल, हाथी वाले साल
2. सोमवार, 2 रब्बी उल अव्वल
3. सोमवार, कोई निर्धारित तारीख़ नहीं
4. हाथी वाली घटना के साल, कोई निर्धारित तारीख़ नहीं
1. 2 रब्बी उल अव्वल, यह राय है अबू मअ्शर अल्-सिंदी (मृत्यु 171 हिजरी) जो कि शुरूआती दौर के जिवनी लिखने वाले विद्वानों में से हैं और प्रसिद्ध मालिकी आलीम इब्न अब्द अल् -बर्र (मृत्यु 463 हिजरी). इसको अल्-वाक़िदी (मृत्यु 207 हिजरी) ने भी अपने रायों में से एक राय के तौर पर लिया है।
इब्न कस़ीर (मृत्यु. 774 हिजरी) जो मध्यकालीन दौर के बहुत ही प्रसीद्ध इतिहासकार है, अपनी किताब अल्-बिदाया वल्-निहाया में बहुत से राय नकल करते हैं, वह फरमाते हैं कि बहुसंख्यक विद्वानों का यही मानना है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का जन्म रब्बी उल् अव्वल में हुआ था लेकिन किसी खास तारीख़ के विषय में
इख़्तिलाफ है। इन में से कुछ राय इस प्रकार हैं :
2. 8 रब्बी उल् अव्वल : यह विचार है अन्दलुसियन आलिम इब्न (मृत्यु 456 हिजरी) और बहुत से शुरू के आलिमों का। इमाम मालिक (मृत्यु 179 हिजरी) ने यह राय अल्-ज़ुहरी (मृत्यु 128) और मुहम्मद बिन् जुबैर बिन् मुत्अिम् से रिवायत किया है।
3. 10 रब्बी उल् अव्वल : इब्न असाकिर (मृत्यु 571 हिजरी) ने अबू जाफर अल्-बाक़िर (मृत्यु 114 हिजरी) से रिवायत किया है। यही राय अल्- शाअ्बी (मृत्यु 100 हिजरी) और अल्-वाक़िदी (मृत्यु 207) की है।
4. 12 रब्बी उल् अव्वल : यह मानना है इब्न इशाक़ (मृत्यु 150 हिजरी) जिन्होंने इसे बिना किसी हवाला के रिवायत किया है। दूसरे रिवायात में यह हज़रत जाबिर और इब्न अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत हुआ है लेकिन बिना किसी सनद के। और इसकी सनद किसी भी मुख़्य किताबों में नहीं मिलता है। इब्न कसीर फरमाते हैं कि यह इस विषय पर सबसे आम राय है और अल्लाह ही बेहतर जानता है।
5. 17 रब्बी उल् अव्वल ; यह मानना था कुछ शिया समुदाय के विद्वानों का लेकिन इसको ज्यादातर सुन्नी विद्वानों ने नकार दिया।
6. 22 रब्बी उल् अव्वल : यह राय भी इब्न हज़म की बताया जाता है।
7. रमज़ान के महीने में बिना किसी विशेष तारीख़ के , हाथी वाली घटना के साल। यह मानना था शुरूआती दौर के प्रसिद्ध इतिहासकार अल्-जुबैर बिन् अल्-बाकर (मृत्यु 256 हिजरी) जिन्होंने सबसे पहली और अधिकारिक तारीख़ लिखा मक्का का और शुरूआती जानकार उनसे सहमत भी थे।
8. 12 रमज़ान बिना किसी विशेष तारीख़ के, हाथी वाली घटना के साल। यह मानना था इब्न असाकिर का जैसा कि कुछ शुरूआती लोग की मान्यता थी।
अब जब तारीख़ किसी को मालूम ही नहीं तो जन्मदिन किसका मनाते हैं यह लोग। अल्लाह हम सबको किताब व सुन्नत पर अमल करने की तौफीक़ फरमाये ।
पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :
“ इस्लाम की शुरूआत अजनबियत की हालत में हुई है (यानी शुरू में इसके मानने वाले थोड़े थे) और फिर निकट ही उसी अजनबियत की हालत पर लौट आये गा जैसाकि उसका आरम्भ हुआ था, तो शुभ सूचना है उन अजनबी लोगों के लिए। ” पूछा गया : ऐ अल्लाह के पैग़म्बर वह कौन लोग हैं? आप ने फरमाया : “ जो लोग उस समय सुधार का काम करेंगे जब कि लोगों में बिगाड़ पैदा हो जायेगा। ” (यह एक सहीह हदीस है)
तथा इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं
“ जमाअत वह है जो हक के अनुकूल (मुताबिक) हो अगरचे तुम अकेले ही क्यों न हो। ”
यह एक बिद्अत है और मुसलमानों को इन सब जूलुस और बाजों से दूर रहना चाहिए जैसा कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:
“ तुम में से जो आदमी मेरे बाद ज़िन्दा रहे गा वह बहुत अधिक इख़्तिलाफ (मतभेद) देखेगा, अतः तुम मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायत याफ्ता (पथप्रदर्शित ) खुलफा-ए-राशिदीन की सुन्नत को दृढ़ता से थाम लो और उसे दाँतों से जकड़ लो। तथा धर्म में नयी ईजाद कर ली गयी चीज़ों (यानी बिद्अतों) से बचो, क्योंकि हर बिद्अत गुमराही (पथभ्रष्टता) है। “
[अहमद, तिर्मिज़ी, इब्ने गाजा, दारमी, हाकिम, इब्ने हिब्बान, तथा अल्बानी ने किताबुस्सुन्नह की तखरीज में इस सहीह कहा है]
बिद्अत अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है बिना पूर्व उदाहरण के ईजाद कर ली गई चीज़।
शरीअत की इस्तिलाह में धर्म में गढ़ लिया गया ऐसा तरीका जो शरीअत की समानता (बराबरी) करता हो। इस प्रकार बिअत सुन्नत के विरूद्ध और सुन्नत के विपरीत है।
अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:
“ जिसे अल्लाह तआला मार्गदर्शन प्रदान कर दे उसे कोई पथ-भ्रष्ट करने वाला नहीं, और वह जिसे पथ-भ्रष्ट कर दे उसे कोई मार्ग दर्शन करने वाला नहीं, और सर्वश्रेष्ठ बात अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल की किताब है, और सब से बेहतरीन तरीका मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीका है, और सब से बुरी बात धर्म में नयी ईजाद कर ली गई चीजें हैं, और धर्म में हर नयी ईजाद कर ली गई चीज़ बिद्अत है। ” [मुस्लिम, बैहकी तथा बैहकी और नसाई के यहाँ सहीह सनद के साथ यह भी है कि { और हर गुमराही जहन्नम में ले जाने वाली है }
अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया “ पैरवी करो और बिद्अत ईजाद न करो, क्योंकि तुम पर्याप्त किये जा चुके हो। ” (इसे तबरानी और दारमी ने सहीह इसनाद के साथ रिवायत किया है)
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं “ हर बिद्अत गुमराही है, अगर लोग उसे अच्छा ही क्यों न समझें। ” (इसे दारमी ने सहीह इसनाद के साथ रिवायत किया है)
और यह है उम्मत के सलफ (पूर्वज) का बिद्अत के खतरे की समझ :
चुनाँचि दारूल हिजरत (मदीना के इमाम मालिक रहिमहुल्लाह फरमाते हैं:
“ जिसने इस्लाम में कोई बिद्अत ईजाद की जिसे वह अच्छा समझता है, तो उस ने यह गुमान किया कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अल्लाह का संदेश पहुँचाने में खियानत से काम लिया , क्योंकि अल्लाह तआला फरमाता है कि :
*الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الإِسْلَامَ دِيناً )*
“ आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमतें सम्पूर्ण कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम थर्म को पसन्द कर लिया।” (सूरतुल-माईदाः3)
अतः जो चीज़ उस दिन धर्म न थी वह आज धर्म नही बन सकती।”
तथा इमाम शाफेई रहिमहुल्लाह ने फरमाया: “ जिस ने (धर्म में) किसी चीज़ को अच्छा समझा, उसने शरीअत गढ़ी। ” तथा इमाम अहमद रहिमहुल्लाह ने फरमाया “ हमारे निकट सुन्नत के सिद्धांत यह हैं कि अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा जिस तरीके पर थे उसको दृढ़ता से थाम लिया जाये और उनका अनुसरण किया जाये, तथा बिद्अत को छोड़ दिया जाये और हर बिद्अत गुमराही है। ”
और अल्लाह तआला ही बेहतर इल्म वाला है।


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