औलाद की तर्बियत की अहमियत

Question

औलाद की तर्बियत की अहमियत

अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत कृपालु और दयावान है।
बच्चों की शिक्षा का महत्व
अल्लाह फरमाता है:
“ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِي النَّاسِ”

खुश्की और तरी में फसाद ज़ाहिर हुआ लोगों के अमलों की वजह से” (अर-रूम 14)।
अल्लाह फरमाता है:
وَاللَّهُ اَخْرَجَكُمْ مِنْ بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ لَا تَعْلَمُوْنَ شَيْا

और अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी माताओं के गर्भ से तब निकाला जब तुम कुछ भी नहीं जानते थे। ” (अन-नहल 78)

अल्लाह फरमाता है:
وَأَمَّا مَنْ ثَقُلَتْ مَوَازِينُهُ فَهُوَ فِي عِيْشَةِ الرَّاضِيَةً وَأَمَّا مَنْ خَفَّتْ مَوَازِينُهُ فَأُمُّهُ هَاوِيَهُ، القارعة
जिसका (तराज़ू का) पलड़ा भारी हो गया तो वह ऐश की ज़िन्दगी में रहेगा ओर जिसका पलड़ा हलका हो गया तो उस का ठिकाना हाविया (जहन्नम) होगा ” [सूरह अल्-क़ारियह]

अल्लाह फरमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قُوْا أَنْفُسُكُمْ وَأَهْلِيكُمْ نَارًا وَقُوْدُهَا النَّاسُ وَالْحِجَارَةُ

ऐ ईमान वालो, अपने आप को और अपने परिवार को जहन्नम की आग से बचाओ, (एक ऐसी आग) जिसका ईंधन मनुष्य और पत्थर हैं। ” (सूरह अत-तहरीम 6:66)

عَنْ عَلَى بْنِ أَبِي طَالِبٍ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ فِي قَوْلِهِ عَزَّ وَجَلَّ قُوْا أَنْفُسَكُمْ وَ أَهْلِيكُمْ نَاراً
قَالَ : عَلِّمُوا أَنْفُسَكُمْ وَأَهْلِيكُمُ الْخَيْرَ : وَقَالَ الذَّهَبِي فِي التَّلْخِيصِ عَلَى شَرْطِ بخاری و مسلم، حاکم ۳۸۲۶
अली इब्न अबी तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) अल्लाह के इन शब्दों के संबंध में: “अपने आप को और अपने परिवार को आग से बचाओ।” का तफ्सीर मे फरमाते हैं कि ‘अपने आप को और अपने परिवार को अच्छाई सिखाओ’
(यह हदीस बुख़ारी और मुस्लिम की शर्त पर है लेकिन दोनो ने अपने किताब के अन्दर इस को रिवायत नहीं किया है।) अल-ज़हबी ने अल-तल्खिस में फरमाते हैं कि यह बुखारी और मुस्लिम की शर्तों के अनुसार है। [अल-हाकिम: 3826]

قَالَ سَلْمَانُ لَا بِي الدَّرْدَاءَ إِنَّ لِرَبِّكَ عَلَيْكَ حَقًّاً وَإِنَّ لِنَفْسِكَ عَلَيْكَ حَقًّا وَإِنَّ لَاهْلِكَ عَلَيْكَ حَقًّا فَاتِي كُلَّ ذِي حَقٌّ حَقَّهُ فَأَتَى أَبُو الدَّرْدَاءَ النَّبِيُّ فَذَكَرَ ذَالِكَ لَهُ فَقَالَ النَّبِيُّ صَدَقَ سَلْمَانُ

सलमान रज़ियल्लाहु अन्हु ने अबू दरदा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से कहा बेशक तेरे रब का तुझ पर हक़ है, तेरे नफ्स का तुझ पर हक़ है और तेरे अहल व अयाल का तुझ पर हक़ है तो हर हक़ वाले को उसका हक़ अदा करो ” अबू दरदा (रज़ियल्लाहु अन्हु) नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए और कहा मुझसे से सलमान (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने ऐसा-ऐसा कहते हैं तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फऱमाया “सलमान (रज़ियल्लाहु अन्हु) सच कहते हैं।” [बुखारी 1968, आदाब अल-मुफरद हदीस-6139]

सही तर्बियत का फायदा और गलत तरबियत का नुक़सान

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया :

“وَالرَّجُلُ رَاعٍ عَلَى أَهْلِ بَيْتِهِ وَالْمَرْأَةُ رَاعِيَةٌ عَلَى بَيْتِ زَوْجِهَا وَوَلَدِهِ فَكُلُّكُمْ رَاعٍ وَكُلُّكُمْ مَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ”

और पुरुष अपने परिवार का संरक्षक होता है, और स्त्री अपने पति के घर और बच्चों की संरक्षक होती है। अतः आप में से प्रत्येक संरक्षक है और उससे उसके संरक्षकता के बारे में प्रश्न किया जाएगा ” [सहीह बुख़ारी 7: 128, सहीह मुस्लिम-1496]

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“إِذَا مَاتَ الْإِنْسَانُ انْقَطَعَ عَنْهُ عَمَلُهُ إِلَّا مِنْ ثَلَاثَةٍ إِلَّا مِنْ صَدَقَةٍ جَارِيَةٍ أَوْ عِلْمٍ يُنْتَفَعُ بِهِ أَوْ وَلَدٍ صَالِحٍ يَدْعُو لَهُ”
जब इन्सान मर जाता है तो उस के तमाम कर्म समाप्त हो जाते हैं सिवाय तीन चीज़ों के सदक़ा जारिया या ऐस ज्ञान जिस से फायदा उठाया जाए , या नेक औलाद जो उसके लिए दुआ करे। ” [सही मुस्लिम: 4005) अदब अल-मुफ़रद, सुनन अल-तिर्मिज़ी: अबू हुरैरा (अल्लाह उनसे प्रसन्न हो) (सही अल-जामी’ (793)]

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“تُرْفَعُ لِلْمَيِّتِ دَرَجَتَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَيَقُولُ مِنْ أَيْنَ هَذَا فَيُقَالُ إِنَّ وَلَدَكَ اسْتَغْفَرَ لَكَ”
क़यामत के दिन मृतक का दर्जा बढ़ाया जाएगा और वह कहेगा, “यह सब कहाँ से आया?” तब कहा जाएगा, “तुम्हारे बच्चों द्वारा तुम्हारे लिए क्षमा मांगने के कारण हुआ है।” [अदब अल्-मुफरद, अहमद, इब्न माजाह, बैहक़ी, सहीह अल-जामी -1617]

तालीम (शिक्षा)

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“كُلُّ مُوْلُودُ يُوْلَدُ عَلَى الْفِطْرَةُ حَتَّى يُعْرَفَ لِسَانُهُ”
हर बच्चा फितरत (प्रकृति) के अनुसार बनाया गया है, यहाँ तक कि उसकी ज़बान समझी जाए ।” [तबरानी, ​​बुखारी, मुस्लिम]

आसानियाँ पैदा करें और खुशख़बरी सुनाएँ

अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने रिवायत किया कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“يَسْرُوْا وَلَا تُعَسِّرُوْا وَبَشِّرُوْا وَلَا تُنفِرُوا”
आसानियाँ पैदा करो और मुश्किल न बनाओ और ख़ुशख़बरी दो और लोगों में नफरत न पैदा करो” [सहीह बुखारी: 1:69 सहीह मुस्लिम: 4300]

छोटे बच्चों को क्या सिखाएं
(1) शहादतैन
“َشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ”
मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद (इबादत के लायक) नहीं है, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके सेवक और रसूल हैं। (मुस्लिम: 234)”

(2) (शर्मगाह) निजी अंगों को छिपाना

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“مَا كَانَ الْفُحْشُ فِي شَيْءٍ إِلَّا شَانَهُ
وَمَا كَانَ الْحَيَاءُ فِي شَيْءٍ إِلَّا زَانَهُ”
अश्लीलता हर चीज को दोषपूर्ण बना देती है, और हया हर चीज को सुंदर बना देती है।” [(तिर्मिज़ी) (सहीह अल्-जामी’: 5655)]

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“خُذْ عَلَيْكَ تُوْبَكَ وَلَا تَمْشِ عُرَاةً”

“अपने कपड़े संभाल कर रखें और नग्न अवस्था में इधर-उधर न घूमें।” [अबू दाऊद, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-3212]

3. खाने से पहले बिस्मिल्लाह, दाहिने हाथ से खाना, सामने से खाना

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:

“إِنَّ الشَّيْطَانَ يَسْتَحِلُّ الطَّعَامَ أَنْ لَا يُذْكَرَ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ”
जब भोजन पर अल्लाह का नाम नहीं लिया जाता, तो शैतान उसे (अपने लिए)वैध बना देता है।” [अहमद, मुस्लिम, अबू दाऊद, नसाई, हुज़ैफा रज़ियल्लाहु अन्हु, सहीह जामेअ्, हदीस-1653]

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“إِذَا أَكَلَ أَحَدُكُمْ فَلْيَأْكُلْ بِيَمِينِهِ وَإِذَا شَرِبَ فَلْيَشْرَبْ بِيَمِينِهِ فَإِنَّ الشَّيْطَانَ يَأْكُلُ بِشِمَالِهِ وَيَشْرَبُ بِشِمَالِهِ”

जो कोई भोजन करे, वह अपने दाहिने हाथ से खाए, और जब कोई पानी पिए, तो वह अपने दाहिने हाथ से ही पिए, क्योंकि शैतान अपने बाएँ हाथ से खाता-पीता है।
[अहमद, मुस्लिम, अबू दाऊद, इब्न उमर (अल्लाह उनसे प्रसन्न हो) (नसाई, अबू हुरैरा (अल्लाह उनसे प्रसन्न हो)) (सहीह अल-जामी: हदीस-383)]

عَنْ عُمَرَ بْنِ أَبِي سَلَمَةَ وَهُوَ ابْنُ أُمِّ سَلَمَةَ زَوْجِ النَّبِيِّ ﷺ قَالَ
أَكَلْتُ يَوْمًا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ( طَعَامًا فَجَعَلْتُ أَكُلُ مِنْ نَوَاحِي الصَّحْفَةِ فَقَالَ لِي رَسُولُ اللَّهِ ﷺ كُلِّ مِمَّا يَلِيكَ

उमर इब्न अबी सलामा (रज़ियल्लाहु अन्हु), जो उम्म अल-मुमिनीन उम्म सलामा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के पुत्र थे, ने कहा:
एक दिन मैंने पैगंबर (ﷺ) के साथ भोजन कर रहा था और मैंने थाली के किनारों से खाना शुरू कर दिया तो अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने मुझसे फरमया : ‘जो तुम्हारे सामने है, उसी में से खाओ।’” [(बुखारी: 5377, मुस्लिम: 2022) (अहमद, बैहक़ी,इब्न अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु)(सहीह अल-जामी’: 4502)]
अल्लाह के नबी (ﷺ) ने कहा: (बर्तन में) यानी, वे बर्तन को अपने मुंह से हटा देते। [हाशिया अल्-सिन्दी अला इब्न माज़ा]

4. हर काम को दाहिने तरफ से शुरू करें

“كَانَ النَّبِيُّ لا يُحِبُّ التَّيَمُّنَ فِي شَانِهِ كُلِّهِ فِي تَرَجُلِهِ وَتَنَعَلِهِ وَطُهُوْرِهِ”

नबी करीम (ﷺ) कंघा करने , जूता पहनने और पाकी में और हर काम में दाहिनें तरफ को पसन्द करते थे ।” [सहीह इब्न माज़ा, हदीस-322]

5. छींक और जम्हाई के बारे में हुक्म
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“إِذَا عَطَسَ أَحَدُكُمْ فَلْيَقُلْ الْحَمْدُ لِلَّهِ”

“यदि आप में से कोई छींकता है, तो उसे ‘الْحَمْدُ لِلَّهِ’ कहना चाहिए,” [सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-2994]

“إِذَا تَتَابَ أَحَدُكُمْ فَلْيَكْظِمْ فَإِنَّ الشَّيْطَانَ يَدْخُلُ فِي فِيْهِ”

जब कोई जम्हाई लेता है, तो उसे दबाए (यानि रोकने की कोशिश करे) क्योंकि शैतान उसके मुंह में प्रवेश करता है।” [सहीह अल-जामेअ् हदीस-427]

5. घरों में दाख़िल होते वक़्त सलाम करना और इजाज़त मांगना

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“يَا بُنَيَّ إِذَا دَخَلْتَ عَلَى أَهْلِكَ فَسَلَّمْ يَكُنْ بَرَكَةً عَلَيْكَ وَعَلَى أَهْلِ بَيْتِكَ”

मेरे बेटे, जब तुम अपने परिवार के पास जाओ, तो सलाम कर वह तुम्हारे और तुम्हारे घर वालों पर बरकत का ज़रिया होगा।” [तिर्मिज़ी, हसन लिगैरिहि, सहीह तर्ग़ीब, हदीस-1608]

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“… رَجُلٌ دَخَلَ بَيْتَهُ بِسَلَامٍ فَهُوَ ضَامِنٌ عَلَى اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ جِ”

“जो व्यक्ति सलाम के साथ अपने घर में प्रवेश करता है, वह अल्लाह तआला की सुरक्षा में होता है।”
[अबू दाऊद, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-3053]

“عَنْ مُسْلِمِ بْنِ نَذِيرٍ قَالَ سَأَلَ رَجُلٌ حُذَيْفَةَ فَقَالَ أَسْتَأْذِنُ عَلَى أَمِّي ؟ فَقَالَ : إِنْ لَمْ تَسْتَأْذِنْ عَلَيْهَا رَأَيْتَ مَا تَكْرَهُ”

मुस्लिम बिन् नज़ीर कहते हैं एक शख़्स ने हुज़ैफा रज़ियल्लाहु अन्हु से पूछा, क्या मैं अपनी माँ के पास भी इजाज़त ले कर जाऊँ ? तो उन्होंने कहा : ‘अगर तुम इजाज़त नहीं लोगे तो वह देख लोगे जिसे तुम (देखना) ना पसन्द करते हो’” [अल्-अदब अल्-मुफर्द, हदीस-1060, हसन]

(7) माता-पिता और बड़ों की आज्ञा का पालन करना।

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“لَيْسَ مِنْ أُمَّتِي مَنْ لَمْ يُحِلُّ كَبِيرَنَا وَيَرْحَمْ صَغِيرَنَا وَيَعْرِفُ لِعَالِمِنَا حَقَّهُ”

वह मेरी उम्मत में से नहीं जो हम में से बड़े की ताज़ीम न करे और हमारे छोटे पर रहम न करे और हमारे जानने वाले का हक़ न जाने ।” [अहमद, हाकिम : उबादाह इब्न सामित, सहीह जामेअ्, हदीस-5443]

(8) भाइयों, बहनों और साथियों के साथ सम्मान और आदर का व्यवहार करना।

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:

“الْمُؤْمِنُ الَّذِي يُخَالِطُ النَّاسَ وَيَصْبِرُ عَلَى أَذَاهُمْ أَفْضَلُ مِنَ الْمُؤْمِنِ الَّذِي لَا يُخَالِطُ النَّاسَ وَلَا يَصْبِرُ عَلَى أَذَاهُمْ؛”

वह मोमिन जो लोगों के साथ रहता है और उनकी तकलीफों पर सब्र करता है उस मोमिन से बेहतर है जो लोगों से न मिलता है और न उन की तकलीफों पर सब्र करता है ।” [ अहमद, तिर्मिज़ी, इब्न माजा, सहीह अल-जामेअ्, हदीस-6651 ]

(9) सही और विनम्र भाषा का प्रयोग करें।

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
“مَا كَانَ الْفُحْشُ فِي شَيْءٍ إِلَّا شَانَهُ”
“अश्लीलता हर चीज को दोषपूर्ण बना देती है।” [तिर्मिज़ी, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-5655]

 

“فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَا عَائِشَةُ مَتَى عَهِدَتِنِي فَخَاشًا إِنَّ شَرَّ النَّاسِ عِنْدَ اللهِ مَنْزِلَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ مَنْ تَرَكَهُ النَّاسُ الْقَاءَ شَرِّهِ”

तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया, ‘ऐ आयशा ! तुमने मुझे कब फहाश देखा ? बेशक, क़यामत के दिन अल्लाह की नज़र में सबसे बुरे लगो वे होंगे जिन्हें लोगों ने उनकी बुराई से बचने के लिए छोड़ दिया होगा । ‘” [बुखारी, हदीस-6032, मुस्लिम, हदीस-2591]

“أَنْ يَهُودَ أَتَوْا النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالُوا السَّامُ عَلَيْكُمْ فَقَالَتْ عَائِشَةُ : ( ( عَلَيْكُمْ وَلَعَنَكُمْ اللَّهُ وَغَضِبَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ ))”

“यहूदी रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए, और कहा, “तुम पर मौत आए।” तो आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने फरमाया, “ईश्वर तुम पर लानत भेजे और तुमसे क्रोधित हो।”

قَالَ: ((مَهْلًا يَا عَائِشَةُ عَلَيْكِ بِالرِّفْقِ وَإِيَّاكِ وَالْعُنْفَ وَالْفُحْشَ )) قَالَتْ أَوَلَمْ تَسْمَعُ مَا قَالُوا قَالَ (( أَوَلَمْ تَسْمَعِي مَا قُلْتُ رَدَدْتُ عَلَيْهِمْ فَيُسْتَجَابُ لِي فِيهِمْ وَلَا يُسْتَجَابُ لَهُمْ فِي ))

आयशा (अल्लाह उनसे प्रसन्न हों) ने रिवायत किया: यहूदी पैगंबर (अल्लाह उन पर शांति और आशीर्वाद भेजें) के पास आए और उन्होंने कहा, “आप पर मृत्यु आए।” उन्होंने कहा, “अल्लाह का अभिशाप और अल्लाह का क्रोध आप पर आए।”
पैगंबर (अल्लाह उन पर शांति और आशीर्वाद भेजें) ने कहा, “ऐ आयशा, नरमी अख़्तियार करो और कठोर और अभद्र दोनों तरह की बातों से बचो।” आयशा (अल्लाह उनसे प्रसन्न हों) ने कहा, “क्या आपने नहीं सुना कि इन लोगों ने क्या कहा?”
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया, “क्या तुमने नहीं सुना कि मैंने क्या कहा?”
मैंने उन्हें जवाब दिया, इसलिए मेरी दुआ उनके लिए कुबूल हुई और उनकी दुआ मेरे लिए कुबूल नहीं हुई।”
(बुखारी, मुस्लिम, तिरमिज़ी, इब्न माजा, अहमद, दारिमी: ये शब्द बुखारी से हैं: “पैगंबर (अल्लाह उन पर शांति और आशीर्वाद भेजें) अभद्र या अनैतिक नहीं थे।”)

10. जिद्द और हठधर्मी की इस्लाह

(11) शांतिपूर्ण खेल

हमें उन बच्चों को क्या बताना चाहिए जो बड़े हैं और अच्छी तरह समझते हैं?

(1) एकेश्वरवाद (तौहीद) और आस्था (ईमान) के स्तंभ

عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ قَالَ
كُنْتُ خَلْفَ رَسُولِ اللَّهِ يَوْمًا
فَقَالَ يَا غُلَامُ إِنِّي أُعَلِّمُكَ كَلِمَاتٍ
احْفَظِ اللَّهَ يَحْفَظْكَ احْفَظِ اللَّهَ تَجِدُهُ تِجَاهَكَ
وَإِذَا سَاءَ لَتَ فَاسْتَلِ اللَّهَ وَإِذَا اسْتَعَنْتَ فَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ
وَاعْلَمْ أَنَّ الَّامَةَ لَوِ اجْتَمَعَتْ عَلَى أَنْ يَنْفَعُوكَ بِشَيْءٍ
لَمْ يَنْفَعُوكَ بِشَيْءٍ إِلَّا قَدْ كَتَبَ اللَّهُ لَكَ
وَلَوِ اجْتَمَعُوْا عَلَى أَنْ يَضَرُّوكَ بِشَيْءٍ
لَمْ يَضُرُّوكَ إِلَّا بِشَيْءٍ قَدْ كَتَبَ اللَّهُ عَلَيْكَ
رُفِعَتِ الْأَقْلَامُ وَجَفَّتِ الصُّحُفْ

अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (अल्लाह उनसे प्रसन्न हों) से रिवायत है कि उन्होंने कहा: एक दिन मैं रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पीछे सवारी कर रहा था, तब उन्होंने कहा: ओह लड़के, मैं तुम्हें कुछ शब्द सिखाऊंगा।, अल्लाह तुम्हें याद रखेगा, अल्लाह को याद रखो और तुम उसे अपने सामने पाओगे, जब तुम कुछ मांगो तो उससे मांगो और जब तुम मदद चाहो तो उससे मदद मांगो। और निश्चिंत रहो कि अगर सभी लोग तुम्हारा भला करने के लिए सहमत हों, तो वे तुम्हें उतना ही भला करेंगे जितना अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिखा है, और अगर सभी लोग तुम्हें हानि पहुंचाने के लिए सहमत हों, तो वे तुम्हें उतना ही हानि पहुंचाएंगे जितना अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिखा है। कलम उठा ली गई हैं और कागज सूख गया है।
[सुन्नन तिर्मिज़ी, इमाम अल्बानी ने अपने सहीह सुनन तिर्मिज़ी और मिश्कात अल-मसाबिह, 53021 में इसे सहीह कहा है]

एकेश्वरवाद के विपरीत कहानियों और किस्सों से बचाएं, जिन्न और भूतों की घटनाओं से दूर रखें ।

अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया:
“لِكَيْلَا تَأْسَوْا عَلَى مَا فَاتَكُمْ وَلَا تَفْرَحُوا بِمَا آتَاكُمْ”

ताकि जो चीज़ तुमसे छूट जाए उस पर तुम दुखी न हो, और जो चीज़ तुम्हें मिल जाए उस पर घमंड न करो। (सूरह हदीद 57:22–23)

(2) वुज़ू और नमाज़ का तरीका सिखाना

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
“مُرُوا الصَّبَى بِالصَّلَاةِ إِذَا بَلَغَ سَبْعَ سِنِينَ وَ إِذَا بَلَغَ عَشَرَ سِنِينَ فَاضْرِبُوا عَلَيْهَا”

अपने बच्चों को नमाज़ का हुक्म दो जब वे सात साल के हो जाएँ, और जब वे दस साल के हो जाएँ तो नमाज़ न पढ़ने पर उन्हें सख़्ती करो।
(अबू दाऊद: 2-494, सहीह अल्-जामेअ हदीस-5867 – सहीह)

(3) क़ुरआन पढ़ने (तिलावत) का हुक्म देना
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“وَيُكْسَى وَالِدَاهُ حُلَّتَيْنِ لَا تَقُوْمُ لَهُمُ الدُّنْيَا وَمَا فِيْهَا فَيَقُولَانِ يَا رَبِّ أَنَّى لَنَا هَذَا فَيُقَالُ بِتَعْلِيمِ وَلَدِكَ الْقُرْآنُ”

क़ियामत के दिन क़ुरआन पढ़ने वाले के माता-पिता को दो ऐसे कपड़े पहनाए जाएँगे जिनकी क़ीमत दुनिया और उसमें मौजूद हर चीज़ से ज़्यादा होगी
वे कहेंगे: ‘ऐ हमारे रब! हमें यह कैसे मिला?’तो कहा जाएगा: ‘तुम्हारे बच्चे को क़ुरआन सिखाने की वजह से।’” (सिलसिला सहीहा: 2829)

(4) रोज़े का हुक्म देना

रबीअ बिन्त मुअव्विज़ رضي الله عنها से रिवायत है:

“أَرْسَلَ النَّبِيُّ الغَدَاةَ يَوْمَ عَاشُوْرَاءَ إِلَى قُرَى الْأَنْصَارِ مَنْ أَصْبَحَ مُفَطَّرًا فَلْيَتُمْ بَقِيَّةَ يَوْمِهِ وَمَنْ أَصْبَحَ صَائِمًا فَلْيُصَمْ
قَالَتْ فَكُنَّا نَصُوْمُهُ بَعْدُ وَ نَصُوْمُ صِبْيَانَا وَ نَجْعَلُ لَهُمُ اللَّعْبَةَ مِنَ الْعِهْنِ فَإِذَا بَكَى أَحَدُهُمْ عَلَى الطَّعَامِ أَعْطَيْنَاهُ ذَاكَ حَتَّى يَكُوْنَ عِنْدَ الْأَقْطَارِ”

उन्होंने कहा कि आशूरा के दिन सुबह अल्लाह के रसूल ﷺ ने अंसार की बस्तियों में यह एलान करवाया:
जिसने सुबह कुछ खा लिया हो, वह दिन के बाक़ी हिस्से में कुछ न खाए और अपना रोज़ा पूरा करे। और जिसने रोज़े की हालत में सुबह की हो, वह अपना रोज़ा पूरा करे।

वह कहती हैं:
इसके बाद हम भी रोज़ा रखते थे और अपने बच्चों को भी रोज़ा रखवाते थे। हम बच्चों के लिए ऊन से खिलौने बना देते थे। जब कोई बच्चा खाने के लिए रोता, तो हम उसे खिलौना दे देते, यहाँ तक कि इफ़्तार का समय हो जाता।
(सहीह बुख़ारी 3:181, सहीह मुस्लिम 2531)

आदाब (शिष्टाचार)

(1) खाने-पीने के आदाब
उमर बिन अबी सलमा رضي الله عنه (जो उम्मुल मोमिनीन उम्मे सलमा رضي الله عنها के बेटे थे) बयान करते हैं:
“أَكَلْتُ يَوْمًا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ( طَعَامًا
فَجَعَلْتُ أَكُلُ مِنْ نَوَاحِي الصَّحْفَةِ
فَقَالَ لِي رَسُولُ اللَّهِ كُلِّ مِمَّا يَلِيكَ”

“एक दिन मैं अल्लाह के रसूल ﷺ के साथ खाना खा रहा था और थाली के किनारों से खाने लगा।
तो अल्लाह के रसूल ﷺ ने मुझसे कहा:
अपने सामने से खाओ।’” (बुख़ारी: 5377, मुस्लिम: 2022)

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
إِذَا أَكَلَ أَحَدُكُمْ فَلْيَأْكُلْ بِيَمِينِهِ وَإِذَا شَرِبَ فَلْيَشْرَبْ بِيَمِينِهِ فَإِنَّ الشَّيْطَانَ يَأْكُلُ بِشِمَالِهِ وَيَشْرَبُ بِشِمَالِهِ

जब तुम में से कोई खाए तो दाएँ हाथ से खाए और जब पिए तो दाएँ हाथ से पिए, क्योंकि शैतान बाएँ हाथ से खाता और पीता है।” (अहमद, मुस्लिम, अबू दाऊद, नसाई – सहीह, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-383)

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:

“إِنَّ الشَّيْطَانَ يَسْتَحِلُّ الطَّعَامَ أَنْ لَا يُذْكَرَ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ”

“जिस खाने पर अल्लाह का नाम न लिया जाए, शैतान उसे अपने लिए जायज़ (हलाल) समझ लेता है।”
(अहमद, मुस्लिम, अबू दाऊद, नसाई – सहीह, सहीह अल्-जामेअ् हदीस-1653)

(2) सोने और जागने के आदाब
अल्लाह के रसूल ﷺ सोते समय यह दुआ पढ़ते थे:
“بِاسْمِكَ اللَّهُمَّ أَمُوْتُ وَأَحْيَا”

“ऐ अल्लाह! तेरे नाम से मैं मरता हूँ और जीता हूँ।” (बुख़ारी)

और जब नींद से जागते तो यह दुआ पढ़ते:
“الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَحْيَانَا بَعْدَ مَا آمَتَنَا وَإِلَيْهِ النُّشُورُ”

सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, जिसने हमें मौत के बाद ज़िंदगी दी, और उसी की ओर हमें लौटना है।” (बुख़ारी: 2425)

(3) पेशाब और पाख़ाना के आदाब

ज़ैद बिन अर्क़म رضي الله عنه से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“إِنَّ هَذِهِ الْحُشُوشَ مُحْتَضَرَةٌ فَإِذَا أَتَى أَحَدُكُمُ الْخَلَاءَ فَلْيَقُلْ أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَائِثِ”

ये जगहें (पेशाब-पाख़ाने की) शैतानों और गंदी आत्माओं के मौजूद रहने की जगहें होती हैं। जब तुम में से कोई शौचालय जाए तो यह दुआ पढ़े: ‘मैं अल्लाह की पनाह माँगता हूँ नापाक मर्द और औरत जिनों से।’
(अहमद, अबू दाऊद, नसाई, इब्न माजह – सहीह, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-2263)

आइशा رضي الله عنها से रिवायत है:

“أَنَّ النَّبِيَّ كَانَ إِذَا خَرَجَ مِنَ الْغَائِطِ قَالَ غُفْرَانَكَ”

“अल्लाह के नबी ﷺ जब पाख़ाने से बाहर आते तो कहते थे: ‘ऐ अल्लाह! मैं तुझसे माफ़ी चाहता हूँ।’” (अहमद, सुन्नन अरबा, इब्न हिब्बान – हसन,सहीह अल्-जामेअ् हदीस-4707)

(4) सलाम और बातचीत के आदाब

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:

“يُسَلِّمُ الرَّاكِبُ عَلَى المَاشِي وَالْمَاشِي عَلَى الْقَاعِدِ
وَالْقَلِيلُ عَلَى الْكَثِيرِ وَ الصَّغِيرِ عَلَى الْكَبِيرِ”

सवारी पर बैठा हुआ व्यक्ति पैदल चलने वाले को सलाम करे, पैदल चलने वाला बैठे हुए को सलाम करे,
कम लोग ज़्यादा लोगों को सलाम करें, और छोटा बड़े को सलाम करे।” [सहीह अल-अदबुल मुफ़रद: 423]

बातचीत के आदाब

हज़रत आइशा رضي الله عنها से रिवायत है:

“كَانَ كَلَامُ رَسُولِ اللَّهِ كَلَامًا فَضْلًا يَفْهَمُهُ كُلُّ مَنْ سَمِعَهُ”

अल्लाह के रसूल ﷺ की बातचीत साफ़-साफ़ और अलग-अलग शब्दों में होती थी,
जिसे हर सुनने वाला आसानी से समझ सकता था।” (हसन – सहीह जामे: 4926)

हज़रत इब्न अब्बास رضي الله عنه कहते हैं:

قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا : لِجَلِيسِي عَلَيَّ ثَلَاتٌ :
أنْ أَرْمِيَهُ بِطَرْفَى إِذَا أَقْبَلَ وَأَنْ أَوْسَعَ لَهُ فِي الْمَجْلِسِ إِذَا جَلَسَ
وَأَنْ أَصْغَىٰ إِلَيْهِ إِذَا تَحَدَّثَ

मेरे साथ बैठने वाले के मुझ पर तीन हक़ हैं:
जब वह आए तो मैं उसकी तरफ़ देखूँ,
जब वह बैठे तो उसके लिए जगह बनाऊँ,
और जब वह बात करे तो ध्यान से सुनूँ।” [उयुन अल्-अख़बार, 306/1]

हसन बसरी رحمه الله कहते हैं:
“إِذَا جَالَسْتَ فَكُنْ عَلَى أَنْ تَسْمَعَ أَحْرَصُ مِنْكَ عَلَى أَنْ تَقُوْلَ
وَتَعَلَّمُ حُسْنَ الْإِسْتِمَاع كَمَا تَتَعَلَّمُ حُسْنَ الْقَوْلِ وَلَا تُقَطِّعُ عَلَى أَحَدٍ حَدِيثَهُ”

जब तुम किसी सभा में बैठो तो बोलने से ज़्यादा सुनने वाले बनो।
अच्छे तरीक़े से सुनना वैसे ही सीखो जैसे अच्छा बोलना सीखते हो,
और किसी की बात बीच में न काटो।
(अल-मुन्तक़ा मिन मकारिमुल अख़लाक़, पृष्ठ 155)

ग़लत शिक्षा

बच्चों में पैदा होने वाली कुछ बुरी आदतें

(1) साफ़-सफ़ाई

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:

“الطَّهُورُ شَطْرُ الْإِيْمَانِ”

“पवित्रता (सफ़ाई) आधा ईमान है।”
(अहमद, मुस्लिम, तिरमिज़ी – सहीह. हदीस-3957)

(2) बेशर्मी

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
“مَا كَانَ الْفُحْشُ فِي شَيْءٍ إِلَّا شَانَهُ
وَمَا كَانَ الْحَيَاءُ فِي شَيْءٍ إِلَّا زَانَهُ”

बेशर्मी जिस चीज़ में होती है उसे बिगाड़ देती है,
और शर्म (हया) जिस चीज़ में होती है उसे सुंदर बना देती है।
(तिरमिज़ी – सहीह, सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-5655)

(3) झूठ

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
“عَلَيْكُمْ بِالصِّدْقِ فَإِنَّ الصِّدْقَ يَهْدِي إِلَى الْبِرِ
وَإِنَّ الْبَرَّ يَهْدِى إِلَى الْجَنَّةِ وَمَا يَزَالُ الرَّجُلُ يَصْدُق
وَيَتَحَرَّى الصِّدْقِ حَتَّى يُكْتَبَ عِنْدَ اللَّهِ صِدِّيقًا
وَإِيَّاكُمْ وَالْكَذِبَ فَإِنَّ الْكَذِبَ يَهْدِي إِلَى الْفُجُور
وَإِنَّ الْفُجُورَ يَهْدِي إِلَى النَّارِ وَمَا يَزَالُ الرَّجُلُ يَكْذِبُ
وَيَتَحَرَّى الْكَذِبَ حَتَّى يُكْتَبَ عِنْدَ اللَّهِ كَذَّابًا

तुम सच्चाई को अपनाओ, क्योंकि सच्चाई नेकी की ओर ले जाती है। सच इंसान को नेकी की राह दिखाता है और नेकी जन्नत की तरफ ले जाती है। आदमी लगातार सच बोलता रहता है और सच की तलाश करता है, यहाँ तक कि अल्लाह के यहाँ उसे बहुत सच्चा (सिद्दीक़) लिख दिया जाता है। और झूठ से बचो, क्योंकि झूठ बुराई की तरफ ले जाता है और बुराई जहन्नम की तरफ ले जाती है। आदमी बार-बार झूठ बोलता रहता है और झूठ को अपनाता है, यहाँ तक कि अल्लाह के यहाँ उसे झूठा लिख दिया जाता है।” [अहमद, अदब अल्-मुफर्रद, मुस्लिम, तिर्मिज़ी, इब्न मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु, सहीह अल्-जामेअ् 4071]

4. चोरी

अल्लाह तआला का फरमान (चोरी के बारे में):
“وَالسَّارِقُ وَالسَّارِقَةُ فَاقْطَعُوا أَيْدِيَهُمَا جَزَاء بِمَا كَسَبَا نَكَالاً مِّنَ اللَّهِ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ”

चोर मर्द और चोर औरत — दोनों के हाथ काट दिए जाएँ। यह उनके किए की सज़ा है और अल्लाह की तरफ से सख़्त दंड है। अल्लाह बहुत ताक़तवर और हिकमत वाला है। (सूरह मायदह : 38)

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया (दूसरे के माल के बारे में):
“فَلَا يَحْلِبَنَّ مَاشِيَتَهُ أَحَدٌ إِلَّا بِإِذْنِهِ”
कोई भी व्यक्ति किसी के जानवर का दूध उसकी इजाज़त के बिना न दुहे। [सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-7636]

5. गाली

गाली देने के बारे में रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

“مَلْعُوْنَ مَنْ سَبْ أَبَاهُ”

उस व्यक्ति पर अल्लाह की लानत है जो अपने माता-पिता को गाली देता है।“[सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-5891, सहीह]

6. नक़ल करना

नक़ल करने के बारे में रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
“لَيْسَ مِنَّا مَنْ تَشَبَّهَ بِغَيْرِنَا لَا تَشَبَّهُوا بِالْيَهُودِ وَلَا بِالنَّصَارَى”
जो हमारी क़ौम के अलावा दूसरों की नकल करता है, वह हम में से नहीं है। यहूदियों और ईसाइयों की नकल मत करो। [सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-5434, हसन]

“مَنْ تَشَبَّهَ بِقَوْمٍ فَهُوَ مِنْهُمْ”
जो किसी क़ौम की नकल करता है, वह उन्हीं में से माना जाता है। [सहीह अल्-जामेअ्, हदीस-6149, सहीह]

मर्द और औरत की बनावट के बारे में रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
“لَعَنَ اللَّهُ الْمُخَنِّفِينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالْمُتَرَجُلَاتِ مِنَ النِّسَاءِ”
अल्लाह ने उन मर्दों पर लानत भेजी है जो औरतों जैसी हरकतें करते हैं, और उन औरतों पर जो मर्दों जैसी बनावट और आदतें अपनाती हैं। [बुखारी फतहुल् बारी, 10-333]

औरत–मर्द के कपड़ों के बारे में रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
“لَعَنَ اللهُ الرَّجُلَ يَلْبَسُ لُبْسَةَ الْمَرْأَةِ وَالْمَرْئَةُ تَلْبَسُ لُبْسَةُ الرَّجُلِ”
अल्लाह की लानत हो उन मर्दों पर जो औरतों जैसे कपड़े पहनते हैं, और उन औरतों पर जो मर्दों जैसे कपड़े पहनती हैं। (अबू दाऊद) (सहीह सहीह अल-जामे : 571)

7. नाच गाना

इमरान बिन हुसैन رضي الله عنه बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“فِي هَذِهِ الْأُمَّةِ خَسْفٌ وَمَسْحُ وَقَدْفَ فَقَالَ رَجُلٌ مِنَ الْمُسْلِمِينَ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَمَتَى ذَاكَ قَالَ إِذَا ظَهَرَتْ الْقَيْنَاتُ وَالْمَعَازِفُ وَشُرِبَتْ الْخُمُورُ”

इस उम्मत में ज़मीन में धँस जाना, लोगों के चेहरों का बदल दिया जाना और पत्थरों की बारिश होगी।”
मुसलमानों में से एक आदमी ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ! यह कब होगा?
आप ﷺ ने फ़रमाया: “जब गाने वाली औरतें ज़्यादा हो जाएँ, गाने-बजाने के साज़ आम हो जाएँ और शराब पीना आम हो जाए।” (तिर्मिज़ी : इमरान बिन हुसैन رضي الله عنه) (सहीह सहीह अल-जामे : 4273)

8. टीवी

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“إِنَّ الْعَيْنَانِ تَزْنِيَانِ زِنَاهُمَا النَّظَرُ وَالْقَلْبُ تَمَنِي وَتَشْتَهِي”

दोनों आँखें भी ज़िना करती हैं, और उनकी ज़िना देखना है, और दिल चाहत और इच्छा करता है। (बुख़ारी, मुस्लिम, अहमद)

मुरब्बी (पालन-पोषण करने वालों) के लिए कुछ ज़रूरी नसीहतें

(1) बच्चों के साथ नर्मी और रहमदिली से पेश आएँ:
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
“إِنَّ اللَّهَ رَفِيقٌ يُحِبُّ الرِّفْقَ
وَيُعْطِي عَلَى الرِّفْقِ مَا لَا يُعْطِي عَلَى الْعُنْفِ
وَمَا لَا يُعْطِي عَلَى مَا سِوَاهِ”
निश्चय ही अल्लाह नर्म है, नर्मी को पसंद करता है, और नर्मी पर वह वह चीज़ देता है जो सख़्ती पर नहीं देता, और जो किसी और चीज़ पर भी नहीं देता।” (मुस्लिम : 4697)

(2) बच्चों के बीच बराबरी करें:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“اعْدِلُوْا بَيْنَ أَوْلَادِكُمْ”
अपनी औलाद के बीच इंसाफ़ करो।” (तबरानी : 1046) (सहीह अल-जामे)

(3) जायज़ और ज़रूरी ज़रूरतों को पूरा करें:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“كَفَى بِالْمَرْءِ إِثْمَا أَنْ يُضِيعَ مَنْ يَقُوْتُ”
किसी आदमी के गुनहगार होने के लिए इतना ही काफ़ी है कि वह उन लोगों की रोज़ी बर्बाद कर दे जिनका खर्च उसकी ज़िम्मेदारी है। (अहमद, हाकिम, अबू दाऊद, बैहक़ी) (हसन सहीह अल-जामे : 4481)

(4) किफ़ायत (फिज़ूलखर्ची से बचने) की शिक्षा:
अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
“إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ”
फिज़ूल खर्च करने वाले शैतानों के भाई होते हैं।” (सूरह अल-इसरा : 27)

(5) हुकूमत / हावी होने की चाह से बचना:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“الْمُؤْمِنُ الْفَ مَالُوْفَ لَا خَيْرَ فِيمَنْ لَا يَالَفُ وَلَا يُؤْلَفُ”
मोमिन प्यार करता है और उससे प्यार किया जाता है। उस व्यक्ति में कोई भलाई नहीं जो न किसी से मेल-जोल रखे और न लोग उससे मेल-जोल रखें।” (अहमद : 6661) (सहीह अल-जामे)

(6) अच्छा उदाहरण बनने का हुक्म, और कथनी–करनी में फर्क से बचना:

अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
“أَتَأْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبِرِّ وَتَنسَوْنَ أَنفُسَكُمْ وَأَنتُمْ تَتْلُونَ الْكِتَابَ أَفَلَا تَعْقِلُونَ”
क्या तुम लोगों को नेकी का हुक्म देते हो और अपने आप को भूल जाते हो, जबकि तुम किताब (क़ुरआन) पढ़ते हो? क्या तुम समझते नहीं?” (सूरह अल-बक़रह : 44)

अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
“يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لِمَ تَقُولُونَ مَا لا تَفْعَلُونَ كَبُرَ مَقْتًا عِندَ اللَّهِ أَن تَقُولُوا مَا لَا تَفْعَلُونَ”
ऐ ईमान वालों! तुम वह बात क्यों कहते हो जो खुद नहीं करते? अल्लाह के यहाँ यह बहुत नापसंद है कि तुम कहो और खुद अमल न करो।” (सूरह अस-सफ़ : 2)

(7) ग़लतियों की सुधार में देर करने से बचें।

(8) सज़ा देने में इंसाफ़ और न्याय:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“اتَّقُوا الظُّلْمَ فَإِنَ الظُّلْمَ ظُلُمَاتُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ”
ज़ुल्म से बचो, क्योंकि ज़ुल्म क़ियामत के दिन अंधेरों का कारण बनेगा।” (अहमद, तबरानी, बैहक़ी) (सहीह अल-जामे : 101)

(9) बेटियों के साथ कमतर व्यवहार से बचना:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“مَنْ عَالَ جَارِيَتَيْنِ دَخَلْتَ أَنَا وَهُوَ فِي الْجَنَّةِ كَهَاتِينِ”
जो व्यक्ति दो बेटियों (या दो बहनों) की परवरिश करेगा, वह और मैं जन्नत में इस तरह साथ होंगे — (और आपने दो उँगलियों को मिलाकर दिखाया)।” (मुस्लिम, तिर्मिज़ी) (सहीह अल-जामे : 6391)

(10) बच्चों के सामने लड़ाई-झगड़े से बचें:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“ابْغَضُ الرِّجَالِ إِلَى اللَّهِ الْآلَدُّ الْخَصِمُ”

अल्लाह के नज़दीक लोगों में सबसे बुरा वह है जो बहुत झगड़ालू होता है।” (बुख़ारी व मुस्लिम) (सहीह अल-जामे : 39)

 

और अल्लाह तआला ही बेहतर इल्म वाला है ।

स्रोत: शैख़ अबू ज़ैद ज़मीर , विषय: औलाद की तर्बियत

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